| Adhyaya | Verse | Hindi | English | |
|---|---|---|---|---|
| Story of Queen Savithri. | ||||
| 1 | 3-20-293 | मार्कण्डेय उवाच शृणु राजन् कुलस्त्रीणां महाभाग्यं युधिष्ठिर । सर्वमेतद् यथा प्राप्तं सावित्र्या राजकन्यया ॥4॥ |
मार्कण्डेयजी बोले--राजा युधिष्ठिर! राजकन्या सावित्रीने कुलकामिनियोंके लिये परम सौभाग्यरूप यह पातिव्रत्य आदि सब सदगुणसमूह जिस प्रकार प्राप्त किया था, वह बताता हूँ, सुनो ॥4॥ | Markandeya said: O King Yudhisthira! I will tell you how the princess Savitri acquired this supreme fortune for women, all the virtues like chastity. Listen. [4] |
| 2 | 3-20-293 | आसीन्मद्रेषु धर्मात्मा राजा परमधार्मिकः । ब्रह्मण्यश्च महात्मा च सत्यसंधो जितेन्द्रियः ॥5॥ |
प्राचीनकालकी बात है, मद्रदेशमें एक परम धर्मात्मा राजा राज्य करते थे। वे ब्राह्मण- भक्त, विशालहृदय, सत्य-प्रतिज्ञ और जितेन्द्रिय थे ॥5॥ | In ancient times, a supremely righteous king ruled in the Madra country. He was devoted to Brahmins, large-hearted, true to his vows, and self-controlled. [5] |
| 3 | 3-20-293 | यज्वा दानपतिर्दक्षः पौरजानपदप्रियः । पार्थिवोऽश्चपतिर्नाम सर्वभूतहिते रतः ॥6॥ |
वे यज्ञ करनेवाले, दानाध्यक्ष, कार्यकुशल, नगर और जनपदके लोगोंके परम प्रिय तथा सम्पूर्ण भूतोंके हितमे तत्पर रहनेवाले भूपाल थे। उनका नाम अश्वपति था ॥6॥ | He was a performer of sacrifices, a giver of donations, efficient in his duties, very dear to the people of the city and countryside, and a king engaged in the welfare of all beings. His name was Ashwapati. [6] |
| 4 | 3-20-293 | क्षमावाननपत्यश्च सत्यवाग् विजितेन्द्रियः । अतिक्रान्तेन वयसा संतापमुपजग्मिवान् ॥7॥ |
राजा अश्वपति क्षमाशील, सत्यवादी और जितेन्द्रिय होनेपर भी संतानहीन थे। बहुत अधिक अवस्था बीत जानेपर इसके कारण उनके मनमें बड़ा संताप हुआ ॥7॥ | Despite being forgiving, truthful, and self-controlled, King Ashwapati was childless. Having passed a very long time, his mind was greatly afflicted by this. [7] |
| 5 | 3-20-293 | अपत्योत्पादनार्थं च तीव्रं नियममास्थितः । काले परिमिताहारो ब्रह्मचारी जितेन्द्रियः ॥8॥ |
अतः उन्होने संतानकी उत्पत्तिके लिये कठोर नियमोंका आश्रय लिया। वे निश्चित समयपर थोड़ा-सा भोजन करते और ब्रह्मचर्यका पालन करते हुए इन्द्रियोंको संयममे रखते थे ॥8॥ | Therefore, he resorted to severe austerities for the birth of a child. He ate a little food at fixed times and practiced celibacy, keeping his senses under control. [8] |
| 6 | 3-20-293 | हुत्वा शतसहस्रं स सावित्र्या राजसत्तमः । षष्ठे षष्ठे तदा काले बभूव मितभोजनः ॥9॥ |
राजाओंमें श्रेष्ठ अश्वपति ब्राह्मणोंके साथ प्रतिदिन गायत्री-मन्त्रसे एक लाख आहुति देकर दिनके छठे भागमें परिमित भोजन करते थे ॥9॥ | Ashwapati, the best among kings, along with the Brahmins, offered one lakh oblations with the Gayatri mantra every day and ate limited food in the sixth part of the day. [9] |
| 7 | 3-20-293 | एतेन नियमेनासीद् वर्षाण्यष्टादशैव तु । पूर्णे त्वष्टादशे वर्षे सावित्री तुष्टिमभ्यगात् ॥10॥ |
उनको इस नियमसे रहते हुए अठारह वर्ष बीत गये। अठारहवाँ वर्ष पूर्ण होनेपर सावित्रीदेवी संतुष्ट हुईं ॥10॥ | Eighteen years passed while he lived by this rule. When the eighteenth year was completed, Goddess Savitri was pleased. [10] |
| 8 | 3-20-293 | रूपिणी तु तदा राजन् दर्शयामास तं नृपम् । अग्निहोत्रात् समुत्थाय हर्षेण महतान्विता । उवाच चैनं वरदा वचनं पार्थिवं तदा ॥11॥ (सा तमश्चपतिं राजन् सावित्री नियमे स्थितम् ॥) |
राजन्! तब मूर्तिमती सावित्रीदेवीने अग्निहोत्रकी अग्निसे प्रकट होकर बड़े हर्षके साथ राजाको प्रत्यक्ष दर्शन दिया और वर देनेके लिये उद्यत हो अनुष्ठानके नियमोंमें स्थित उस राजा अश्वपतिसे इस प्रकार कहा ॥ | O King! Then, Goddess Savitri, embodied, appeared from the fire of the Agnihotra, gave darshan to the king directly with great joy, and, ready to grant a boon, spoke thus to King Ashwapati, who was steadfast in the rules of the ritual— [11] |
| 9 | 3-20-293 | सावित्र्युवाच ब्रह्मचर्येण शुद्धेन दमेन नियमेन च । सर्वात्मना च भवत्या च तुष्टास्मि तव पार्थिव ॥12॥ |
सावित्री बोली-राजन्! मैं तुम्हारे विशुद्ध ब्रह्मचर्य, इन्द्रियसंयम, मनोनिग्रह तथा सम्पूर्ण हृदयसे की हुई भक्तिके द्वारा बहुत संतुष्ट हुई हूँ ॥12॥ | Savitri said: O King! I am very pleased by your pure celibacy, control of the senses, restraint of the mind, and devotion offered with your whole heart. [12] |
| 10 | 3-20-293 | वरं वृणीष्वाश्चपते मद्रराज यदीप्सितम् । न प्रमादश्च धर्मेषु कर्तव्यस्ते कथञ्चन ॥13॥ |
मद्रराज अश्वपते! तुम्हें जो अभीष्ट हो, वह वर माँगो। धर्मोंके पालनमें तुम्हें कभी किसी तरह भी प्रमाद नहीं करना चाहिये ॥13॥ | O Madraraja Ashwapati! Ask for whatever boon you desire. You should never be negligent in any way in the observance of Dharma. [13] |
| 11 | 3-20-293 | अश्वपतिरुवाच अपत्यार्थः समारम्भः कृतो धर्मेप्सया मया । पुत्रा मे बहवो देवि भवेयुः कुलभावनाः ॥14॥ |
अश्वपतिने कहा-देवि! मैंने धर्मप्राप्तिकी इच्छासे संतानके लिये यह अनुष्ठान आरम्भ किया था। आपकी कृपासे मुझे बहुत-से वंशप्रवर्तक पुत्र प्राप्त हों ॥14॥ | Ashwapati said: O Goddess! I started this ritual desiring a child for the attainment of Dharma. By your grace, may I obtain many sons who will continue my lineage. [14] |
| 12 | 3-20-293 | तुष्टासि यदि मे देवि वरमेतं वृणोम्यहम् । संतानं परमो धर्म इत्याहुर्मा द्विजातयः ॥15॥ |
देवि! यदि आप प्रसन्न हैं तो मैं आपसे यह संतानसम्बन्धी वर ही माँगता हूँ; क्योकि द्विजातिगण मुझसे बराबर यही कहते हैं कि 'न्याययुक्त संतानोत्पादन (भी) परम धर्म है! ॥15॥ | O Goddess! If you are pleased, I ask you for this boon related to children; because the twice-born constantly tell me that 'the righteous production of children is the supreme Dharma!' [15] |
| 13 | 3-20-293 | सावित्र्युवाच पूर्वमेव मया राजन्नभिप्रायमिमं तव । ज्ञात्वा पुत्रार्थमुक्तो वै भगवांस्ते पितामहः ॥16॥ |
सावित्री बोली-राजन्! मैंने पहले ही तुम्हारे इस अभिप्रायको जानकर पुत्रके लिये भगवान् ब्रह्माजीसे निवेदन किया था ॥16॥ | Savitri said: O King! Having known this intention of yours beforehand, I have requested Lord Brahma for a son. [16] |
| 14 | 3-20-293 | प्रसादाच्चैव तस्मात् ते स्वयम्भुविहिताद् भुवि । कन्या तेजस्विनी सौम्य क्षिप्रमेव भविष्यति ॥17॥ |
अतः सौम्य! भगवान् ब्रह्माजीके कृपाप्रसादसे तुम्हें शीघ्र ही इस पृथ्वीपर एक तेजस्विनी कन्या प्राप्त होगी ॥17॥ | Therefore, O gentle one! By the grace of Lord Brahma, you will soon obtain a radiant daughter on this earth. [17] |
| 15 | 3-20-293 | उत्तरं च न ते किंचिद् व्याहर्तव्यं कथञ्चन । पितामहनिसर्गेण तुष्टा ह्योतद् ब्रवीमि ते ॥18॥ |
इस विषयमें तुम्हें किसी तरह भी कोई प्रतिवाद या उत्तर नहीं देना चाहिये। मैं ब्रह्माजीकी आज्ञासे संतुष्ट होकर तुमसे यह बात कहती हूँ ॥18॥ | You should not give any kind of counter-argument or reply in this matter. I say this to you, pleased by the command of Brahma. [18] |
| 16 | 3-20-293 | मार्कण्डेय उवाच स तथेति प्रतिज्ञाय सावित्र्या वचनं नृपः । प्रसादयामास पुनः क्षिप्रमेतद् भविष्यति ॥19॥ |
मार्कण्डेयजी कहते हैं-राजन्! सावित्रीदेवीकी बात सुनकर राजाने “बहुत अच्छा' कहकर उनकी आज्ञाका पालन करनेकी प्रतिज्ञा की और पुनः सावित्रीदेवीको इस उद्देश्यसे प्रसन्न किया कि यह भविष्यवाणी शीघ्र सफल हो ॥19॥ | Markandeya says: O King! Hearing the words of Goddess Savitri, the king said "Very well" and vowed to obey her command, and again pleased Goddess Savitri with the intention that this prophecy should be fulfilled quickly. [19] |
| 17 | 3-20-293 | अन्तर्हितायां सावित्र्यां जगाम स्वपुरं नृपः । स्वराज्ये चावसद् वीरः प्रजा धर्मेण पालयन् ॥20॥ |
जब सावित्रदेवी अन्तर्धान हो गयीं, तब वीर राजा अश्वपति भी अपने नगरको चले गये और प्रजाका धर्मपूर्वक पालन करते हुए अपने राज्यमे ही रहने लगे ॥ | When Goddess Savitri disappeared, the valiant King Ashwapati also went to his city and continued to rule his kingdom righteously. [20] |
| 18 | 3-20-293 | कस्मिंश्चित् तु गते काले स राजा नियतव्रतः । ज्येष्ठायां धर्मचारिण्यां महिष्यां गर्भमादधे ॥21॥ |
नियमपूर्वक उत्तम व्रतका पालन करनेवाले राजा अश्वपतिने किसी समय अपनी धर्मपरायणा बड़ी रानीमें गर्भ स्थापित किया ॥21॥ | King Ashwapati, who followed excellent vows regularly, at one time established conception in his righteous senior queen. [21] |
| 19 | 3-20-293 | राजपुत्र्यास्तु गर्भः स मालव्या भरतर्षभ । व्यवर्धत तदा शुक्ले तारापतिरिवाम्बरे ॥22॥ |
भरतश्रेष्ठ! अश्वपतिकी पत्नी मालवदेशकी राजकुमारी थीं। उनका वह गर्भ आकाशमें शुक्लपक्षीय चन्द्रमाकी भाँति दिनोदिन बढ़ने लगा ॥22॥ | O best of Bharatas! Ashwapati's wife was the princess of the Malava country. That embryo of hers grew day by day like the moon in the bright fortnight of the sky. [22] |
| 20 | 3-20-293 | प्राप्ते काले तु सुषुवे कन्यां राजीवलोचनाम् । क्रियाश्च तस्या मुदितश्चक्रे च नृपसत्तमः ॥23॥ |
समय प्राप्त होनेपर महारानीने एक कमलनयनी कन्याको जन्म दिया तथा नृपश्रेष्ठ अश्वपतिने अत्यन्त प्रसन्न होकर उसके जातकर्म आदि संस्कार सम्पन्न करवाये ॥23॥ | When the time came, the great queen gave birth to a lotus-eyed daughter, and the best of kings, Ashwapati, had her birth rituals and other ceremonies performed with great joy. [23] |
| 21 | 3-20-293 | सावित्र्या प्रीतया दत्ता सावित्र्या हुतया ह्यपि । सावित्रीत्येव नामास्याश्चक्कुर्विप्रास्तथा पिता ॥24॥ |
सावित्रीने प्रसन्न होकर उस कन्याको दिया था तथा गायत्री-मन्त्रद्वारा आहुति देनेसे ही सावित्रीदेवी प्रसन्न हुई थीं, अतः ब्राह्मणों तथा पिताने उस कन्याका नाम “सावित्री” ही रखा ॥24॥ | Savitri had given that daughter with pleasure, and Goddess Savitri was pleased only by offering oblations with the Gayatri mantra, hence the Brahmins and her father named that daughter "Savitri." [24] |
| 22 | 3-20-293 | सा विग्रहवतीव श्रीर्व्यवर्धत नृपात्मजा । कालेन चापि सा कन्या यौवनस्था बभूव ह ॥25॥ |
वह राजकन्या मूर्तिमती लक्ष्मीके समान बढ़ने लगी और यथासमय उसने युवावस्थामें प्रवेश किया ॥25॥ | That princess grew like Lakshmi embodied, and in due course, she entered youth. [25] |
| 23 | 3-20-293 | तां सुमध्यां पृथुश्रोणीं प्रतिमां काञ्चनीमिव । प्राप्तेयं देवकन्येति दृष्ट्वा सम्मेनिरे जनाः ॥26॥ |
उसके शरीरका कटिभाग परम सुन्दर तथा नितम्बदेश पृथुल था। वह सुवर्णकी बनी हुई प्रतिमा-सी जान पड़ती थी। उसे देखकर सब लोग यही मानते थे कि यह कोई देवकन्या आ गयी है ॥26॥ | Her waist was extremely beautiful, and her hips were full. She appeared like a statue made of gold. Seeing her, everyone believed that a divine maiden had arrived. [26] |
| 24 | 3-20-293 | तां तु पद्मपलाशाक्षीं ज्वलन्तीमिव तेजसा । न कश्चिद् वरयामास तेजसा प्रतिवारितः ॥27॥ |
उसके नेत्रयुगल विकसित नील कमलदलके समान मनोहर थे। वह अपने तेजसे प्रज्वलित-सी जान पड़ती थी। उसके तेजसे प्रतिहत हो जानेके कारण कोई भी राजा या राजकुमार उसका वरण नहीं कर सका ॥27॥ | Her eyes were as charming as blooming blue lotus petals. She appeared to be blazing with her radiance. Due to her radiance, no king or prince could choose her. [27] |
| 25 | 3-20-293 | अथोपोष्य शिरःस्नाता देवतामभिगम्य सा । हुत्वाग्निं विधिवद् विप्रान् वाचयामास पर्वणि ॥28॥ |
एक दिन किसी पर्वके अवसरपर उपवासपूर्वक शिरसे स्नान करके सावित्री देवताके दर्शनके लिये गयी और विधिपूर्वक अग्निमें आहुति दे उसने ब्राह्मणोंसे स्वस्तिवाचन कराया ॥28॥ | One day, on the occasion of a festival, Savitri, having fasted and bathed her head, went to see the deity and, having offered oblations to the fire according to the rules, had the Brahmins recite auspicious verses. [28] |
| 26 | 3-20-293 | ततः सुमनसः शेषाः प्रतिगृह्य महात्मनः । पितुः समीपमगमद् देवी श्रीरिव रूपिणी ॥29॥ |
तदनन्तर इष्टदेवताका प्रसाद लेकर मूर्तिमती लक्ष्मीदेवीके समान सुशोभित होती हुई वह अपने महात्मा पिताके समीप गयी ॥29॥ | Then, having taken the deity's prasad, she, shining like Lakshmi embodied, went to her great-souled father. [29] |
| 27 | 3-20-293 | साभिवाद्य पितुः पादौ शेषाः पूर्व निवेद्य च । कृताञ्जलिर्वरारोहा नृपतेः पार्श्वमास्थिता ॥30॥ |
पहले प्रसाद आदि निवेदन करके उसने पिताके चरणोंमें प्रणाम किया। फिर वह सुन्दरी कन्या हाथ जोड़कर पिताके पार्श्चभागमें खड़ी हो गयी ॥30॥ | First, having offered the prasad, she bowed at her father's feet. Then, that beautiful maiden stood with folded hands beside her father. [30] |
| 28 | 3-20-293 | यौवनस्थां तु तां दृष्ट्वा स्वां सुतां देवरूपिणीम् । अयाच्यमानां स वरैर्नुपतिर्दुःखितोऽभवत् ॥31॥ |
अपनी देवस्वरूपिणी पुत्रीको युवावस्थामें प्रविष्ट हुई देख और अभीतक इसके लिये किसी वरने याचना नहीं की, यह सोचकर मद्रनरेशको बड़ा दुःख हुआ ॥31॥ | Seeing his divine-like daughter entered youth and that no suitor had yet asked for her hand, the king of Madra was greatly saddened. [31] |
| 29 | 3-20-293 | राजोवाच पुत्रि प्रदानकालस्ते न च काश्चिद् वृणोति माम् । स्वयमन्विच्छ भर्तारं गुणैः सदृशमात्मनः ॥32॥ |
राजा बोले-बेटी! अब किसी वरके साथ तेरा ब्याह कर देनेका समय आ गया है, परंतु (तेरे तेजसे प्रतिहत हो जानेके कारण) कोई भी मुझसे तुझे माँग नहीं रहा है। इसलिये तू स्वयं ही ऐसे वरकी खोज कर ले जो गुणोंमें तेरे समान हो ॥32॥ | The king said: Daughter! Now is the time to marry you to a suitor, but (due to your radiance) no one is asking me for you. Therefore, you yourself search for a suitor who is equal to you in virtues. [32] |
| 30 | 3-20-293 | प्रार्थितः पुरुषो यश्च स निवेद्यस्त्वया मम । विमृश्याह प्रदास्यामि वरय त्वं यथेप्सितम् ॥33॥ |
जिस पुरुषको तू पतिरूपमें प्राप्त करना चाहे, उसका मुझे परिचय दे देना; फिर मैं सोच-विचारकर उसके साथ तेरा ब्याह कर दूँगा। तू मनोवांछित वरका वरण कर ले ॥33॥ | Whichever man you wish to have as your husband, introduce him to me; then, after careful consideration, I will marry you to him. Choose a husband according to your desire. [33] |
| 31 | 3-20-293 | EE श्रुतं हि धर्मशास्त्रेषु पठ्यमानं द्विजातिभिः । तथा त्वमपि कल्याणि गदतो मे वचः शृणु ॥34॥ |
कल्याणि! मैंने ब्राह्मणोंके मुखसे धर्मशास्त्रोंकी जो बात सुनी है, उसे बता रहा हूँ, तू भी सुन ले ॥34॥ | O auspicious one! I am telling you what I have heard from the Brahmins about the scriptures of Dharma, you also listen. [34] |
| 32 | 3-20-293 | अप्रदाता पिता वाच्यो वाच्यश्चानुपयन् पतिः । मृते भर्तरि पुत्तश्च वाच्यो मातुररक्षिता ॥35॥ |
'विवाहके योग्य हो जानेपर कन्याका दान न करनेवाला पिता निन्दनीय है। ऋतुकालमें पत्नीके साथ समागम न करनेवाला पति निन्दाका पात्र है तथा पतिके मर जानेपर विधवा माताकी रक्षा न करनेवाला पुत्र धिक्कारके योग्य है" ॥35॥ | A father who does not give away his daughter when she is eligible for marriage is reprehensible. A husband who does not have intercourse with his wife during her fertile period is worthy of condemnation, and a son who does not protect his widowed mother after her husband's death is worthy of reproach.' [35] |
| 33 | 3-20-293 | इदं मे वचनं श्रुत्वा भर्तुरन्वेषणे त्वर । देवतानां यथा वाच्यो न भवेयं तथा कुरु ॥36॥ |
मेरी यह बात सुनकर तू पतिकी खोज करनेमें शीघ्रता कर। ऐसी चेष्टा कर, जिससे मैं देवताओंकी दृष्टिमें अपराधी न बनूँ ॥36॥ | Hearing this from me, be quick in searching for a husband. Act in such a way that I do not become an offender in the eyes of the gods. [36] |
| 34 | 3-20-293 | मार्कण्डेय उवाच एवमुक्त्वा दुहितरं तथा वृद्धांश्च मन्त्रिणः । व्यादिदेशानुयात्रं च गम्यतां चेत्यचोदयत् ॥37॥ |
मार्कण्डेयजी कहते हैं—युधिष्ठिर! पुत्रीसे ऐसा कहकर राजाने बूढ़े मन्त्रियोंको आज्ञा दी--'“आपलोग यात्राके लिये आवश्यक सामग्री (वाहन आदि) लेकर सावित्रीके साथ जाये" ॥37॥ | Markandeya says: Yudhisthira! Having said this to his daughter, the king ordered the old ministers, "You should go with Savitri, taking the necessary travel equipment (vehicles, etc.)." [37] |
| 35 | 3-20-293 | साभिवाद्य पितुः पादौ व्रीडितेव मनस्विनी । पितुर्वचनमाज्ञाय निर्जगामाविचारितम् ॥38॥ |
मनस्विनी सावित्रीने कुछ लज्जित-सी होकर पिताके चरणोंमें प्रणाम किया और उनकी आज्ञा शिरोधार्य करके बिना कुछ सोच-विचार किये उसने प्रस्थान कर दिया ॥38॥ | The thoughtful Savitri, somewhat embarrassed, bowed at her father's feet and, accepting his command, set out without any hesitation. [38] |
| 36 | 3-20-293 | सा हैमं रथमास्थाय स्थविरैः सचिवैर्वृता । तपोवनानि रम्याणि राजर्षीणां जगाम ह ॥39॥ |
सुवर्णमय रथपर सवार हो बूढ़े मन्त्रियोंसे घिरी हुई वह राजकन्या राजर्षियोंके सुरम्य तपोवनोंमें गयी ॥39॥ | Mounted on a golden chariot, surrounded by the old ministers, that princess went to the beautiful hermitages of the royal sages. [39] |
| 37 | 3-20-293 | मान्यानां तत्र वृद्धानां कृत्वा पादाभिवादनम् । वनानि क्रमशस्तात सर्वाण्येवाभ्यगच्छत ॥40॥ |
तात! वहाँ माननीय वृद्धजनोंकी चरणवन्दना करके उसने क्रमशः सभी वनोंमें भ्रमण किया ॥40॥ | O father! There, having paid obeisance to the venerable elders, she gradually visited all the forests. [40] |
| 38 | 3-20-293 | एवं तीर्थेषु सर्वेषु धनोत्सर्ग नृपात्मजा । कुर्वती द्विजमुख्यानां तं तं देशं जगाम ह ॥41॥ |
इस प्रकार राजकुमारी सावित्री सभी ती्थोमिं जाकर श्रेष्ठ ब्राह्मणोंको धनदान करती हुई विभिन्न देशोंमें घूमती फिरी ॥41॥ | In this way, Princess Savitri, visiting all the holy places and giving wealth to the best Brahmins, wandered in various countries. [41] |
| 39 | 3-20-293 | इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि पतिव्रतामाहात्म्यपर्वणि सावित्र्युपाख्याने त्रिनवत्यधिकद्विशततमोऽध्यायः ॥ 293 ॥ | इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत पतिव्रतामाहात्म्यपर्वमें सावित्री- उपाख्यानविषयक दो सौ तिरानबेवॉ अध्याय पूरा हुआ ॥293॥ | Thus ends the two hundred ninety-third chapter, concerning the Savitri episode, within the Pativrata Mahatmya Parva of the Vana Parva in the Shrimahabharata. [293] |
| 40 | 3-20-294 | (दाक्षिणात्य अधिक पाठका ह श्लोक मिलाकर कुल 41 ई श्लोक हैं) | (दाक्षिणात्य अधिक पाठका ह श्लोक मिलाकर कुल 41 ई श्लोक हैं) | (Including 41 verses by adding 6 verses of Dakshinatya Adhika Patha) |
| 41 | 3-20-294 | चतुर्नवत्यधिकद्विशततमोध्याय: | दो सौ चौरानबेवाँ अध्याय | Chapter Two Hundred Ninety-Fourth |
| 42 | 3-20-294 | सावित्रीका सत्यवान्के साथ विवाह करनेका दृढ़ निश्चय | सावित्रीका सत्यवान्के साथ विवाह करनेका दृढ़ निश्चय | Savitri's Firm Resolve to Marry Satyavan |
| 43 | 3-20-294 | मार्कण्डेय उवाच अथ मद्राधिपो राजा नारदेन समागतः । उपविष्टः सभामध्ये कथायोगेन भारत ॥1॥ |
मार्कण्डेयजी कहते हैं-भरतनन्दन युधिष्ठिर! एक दिन मद्रराज अश्वपति अपनी सभामें बैठे हुए देवर्षि नारदजीके साथ मिलकर बातें कर रहे थे ॥1॥ | Markandeya says: O descendant of Bharata, Yudhisthira! One day, King Ashwapati of Madra was sitting in his court, conversing with the divine sage Narada. [1] |
| 44 | 3-20-294 | ततोऽभिगम्य तीर्थानि सर्वाण्येवाश्रमांस्तथा । आजगाम पितुर्वेश्म सावित्री सह मन्त्रिभिः ॥2॥ |
उसी समय सावित्री सब तीर्थो और आश्रमोंमें घूम-फिरकर मन्त्रियोंके साथ अपने पिताके घर आ पहुँची ॥2॥ | At that time, Savitri, having traveled through all the pilgrimage sites and hermitages, arrived at her father's house with her ministers. [2] |
| 45 | 3-20-294 | नारदेन सहासीनं सा दुष्ट्वा पितरं शुभा । उभयोरेव शिरसा चक्रे पादाभिवादनम् ॥3॥ |
वहाँ पिताको नारदजीके साथ बैठे हुए देखकर शुभलक्षणा सावित्रीने दोनोंके चरणोंमें मस्तक रखकर प्रणाम किया ॥3॥ | Seeing her father seated with Narada, the auspicious Savitri bowed her head at their feet. [3] |
| 46 | 3-20-294 | नारद उवाच क्व गताभूत् सुतेयं ते कुतश्चैवागता नृप । किमर्थ युवतीं भर्त्रे न चैनां सम्प्रयच्छसि ॥4॥ |
नारदजीने पूछा-राजन्! आपकी यह पुत्री कहाँ गयी थी और कहाँसे आ रही है? अब तो यह युवती हो गयी है। आप किसी वरके साथ इसका विवाह क्यों नहीं कर देते हैं? ॥4॥ | Narada asked, "O King! Where did your daughter go and where is she coming from? She has now come of age. Why don't you marry her to a suitor?" [4] |
| 47 | 3-20-294 | अश्वपतिरुवाच कार्येण खल्वनेनैव प्रेषिताद्यैव चागता । एतस्याः शृणु देवर्षे भतरं योऽनया वृतः ॥5॥ |
अश्वपतिने कहा--देवर्षे! इसे मैने इसी कार्यसे भेजा था और यह अभी-अभी लौटी है। इसने अपने लिये जिस पतिका वरण किया है, उसका नाम इसीके मुखसे सुनिये ॥5॥ | Ashwapati said, "O divine sage! I sent her for this very purpose, and she has just returned. Please hear from her own mouth whom she has chosen as her husband." [5] |
| 48 | 3-20-294 | मार्कण्डेय उवाच सा ब्रूहि विस्तरेणेति पित्रा संचोदिता शुभा । तदैव तस्य वचनं प्रतिगृह्योदमब्रवीत् ॥6॥ |
मार्कण्डेयजी कहते हैं-युधिष्ठिर! पिताके यह कहनेपर कि “बेटी! तू अपनी यात्राका वृतान्त विस्तारके साथ बतला" शुभलक्षणा सावित्री उनकी आज्ञा मानकर उस समय इस प्रकार बोली ॥6॥ | Markandeya says: Yudhisthira! When her father said, "Daughter! Tell me the details of your journey," the auspicious Savitri, obeying his command, spoke thus at that time. [6] |
| 49 | 3-20-294 | सावित्र्युवाच आसीच्छाल्वेषु धर्मात्मा क्षत्रियः पृथिवीपतिः । द्युमत्सेन इति ख्यातः पश्चाच्चान्धो बभूव ह ॥7॥ |
सावित्रीने कहा-पिताजी! शाल्वदेशमें द्युमत्सेन नामसे प्रसिद्ध एक धर्मात्मा क्षत्रिय राजा राज्य करते थे। पीछे वे अंधे हो गये ॥7॥ | Savitri said, "Father! In the Shalva country, there lived a righteous Kshatriya king named Dyumatsena. Later, he became blind. [7] |
| 50 | 3-20-294 | विनष्टचक्षुषस्तस्य बालपुत्रस्य धीमतः । सामीप्येन हतं राज्यं छिद्रेऽस्मिन् पूर्ववैरिणा ॥8॥ |
उनकी आँखें चली गयीं और पुत्र अभी बाल्यावस्थामें था, यह अवसर पाकर उनके पूर्वशत्रु एक पड़ोसी राजाने आक्रमण किया और उस बुद्धिमान् नरेशका राज्य हर लिया ॥8॥ | "When his eyes were lost and his son was still a child, a neighboring king, his former enemy, seized the opportunity and usurped the kingdom of that wise king." [8] |
| 51 | 3-20-294 | स बालवत्सया सार्ध भार्यया प्रस्थितो वनम् । महारण्यं गतश्चापि तपस्तेपे महाव्रतः ॥9॥ तस्य पुत्रः पुरे जातः संवृद्धश्च तपोवने । सत्यवाननुरूपो मे भर्तेति मनसा वृतः ॥10॥ |
तब अपनी छोटी अवस्थाके पुत्रवाली पत्नीके साथ वे वनमें चले आये और विशाल वनके भीतर रहकर बड़े-बड़े व्रतोंका पालन करते हुए तपस्या करने लगे। उनके एक पुत्र हैं सत्यवान्, जो पैदा तो नगरमें हुए हैं, परंतु उनका पालन-पोषण एवं संवर्धन तपोवनमें हुआ है। वे ही मेरे योग्य पति हैं। उन्हीका मैंने मन-ही-मन वरण किया है ॥ 9-10॥ | "Then, he came to the forest with his wife, who had a young son, and, living within the vast forest, began to practice austerities following great vows. He has a son, Satyavan, who was born in the city but was raised and nurtured in the hermitage. He is worthy of being my husband. I have chosen him in my heart." [9-10] |
| 52 | 3-20-294 | नारद उवाच अहो बत महत् पापं सावित्र्या नृपते कृतम् । अजानन्त्या यदनया गुणवान् सत्यवान् वृतः ॥11॥ |
(यह सुनकर) नारदजी बोल उठे-अहो! यह बड़े खेदकी बात है। राजन्! सावित्रीने बिना जाने ही अपना बड़ा अनिष्ट किया है, जो कि इसने सत्यवानूको गुणवान् समझकर वरण कर लिया है ॥11॥ | (Hearing this) Narada exclaimed, "Alas! This is very sad. O King! Savitri has unknowingly done herself great harm by choosing Satyavan, thinking him to be virtuous." [11] |
| 53 | 3-20-294 | सत्यं वदत्यस्य पिता सत्यं माता प्रभाषते । तथास्य ब्राह्मणाश्चक्रुनमितत् सत्यवानिति ॥12॥ |
इस राजकुमारके पिता सदा सत्य बोलते हैं। इसकी माता भी सत्यभाषण करती है। इसलिये ब्राह्मणोंने इसका नाम “सत्यवान् रख दिया था ॥12॥ | "This prince's father always speaks the truth. His mother also speaks the truth. Therefore, Brahmins named him 'Satyavan.'" [12] |
| 54 | 3-20-294 | बालस्याश्चाः प्रियश्चास्य करोत्यश्चांश्च मृन्मयान् । चित्रेऽपि विलिखत्यश्चांश्चित्राश्च इति चोच्यते ॥13॥ |
इस बालकको अश्व बहुत प्रिय हैं। यह मिट्टीके अश्व बनाया करता है और चित्र लिखते समय भी अश्चोंको ही अंकित करता है, अतः इसे 'चित्राश्व' भी कहते हैं ॥13॥ | "This boy is very fond of horses. He makes horses out of clay and also draws horses while painting, hence he is also called 'Chitrashva.'" [13] |
| 55 | 3-20-294 | राजोवाच अपीदानीं स तेजस्वी बुद्धिमान् वा नृपात्मजः । क्षमावानपि वा शूरः सत्यवान् पितृवत्सलः ॥14॥ |
राजाने पूछा-देवर्षे! इस समय पितृभक्त राजकुमार सत्यवान् तेजस्वी, बुद्धिमान्, क्षमावान् और शूरवीर तो है न? ॥14॥ | The king asked, "O divine sage! Is the pious prince Satyavan radiant, intelligent, forgiving, and valiant at this time?" [14] |
| 56 | 3-20-294 | नारद उवाच विवस्वानिव तेजस्वी बृहस्पतिसमो मतौ । महेन्द्र इव वीरश्च वसुधेव समन्वितः ॥15॥ |
नारदजीने कहा-वह राजकुमार सूर्यके समान तेजस्वी, बृहस्पतिके समान बुद्धिमान्, इन्द्रके समान वीर और पृथ्वीके समान क्षमाशील है ॥15॥ | Narada said, "That prince is radiant like the sun, intelligent like Brihaspati, valiant like Indra, and forgiving like the earth." [15] |
| 57 | 3-20-294 | अश्वपतिरुवाच अपि राजात्मजो दाता ब्रह्मण्यश्चापि सत्यवान् । रूपवानप्युदारो वाप्यथवा प्रियदर्शनः ॥16॥ |
अश्वपतिने पूछा-क्या राजपुत्र सत्यवान् दानी, ब्राह्मणभक्त, रूपवान्, उदार अथवा प्रियदर्शन भी है? ॥ | Ashwapati asked, "Is Prince Satyavan also generous, devoted to Brahmins, handsome, magnanimous, or pleasing to look at?" [16] |
| 58 | 3-20-294 | नारद उवाच सांकृते रन्तिदेवस्य स्वशक्त्या दानतः समः । ब्रह्मण्यः सत्यवादी च शिबिरौशीनरो यथा ॥17॥ |
नारदजीने कहा-सत्यवान् अपनी शक्तिके अनुसार दान देनेमें संकृतिनन्दन रन्तिदेवके समान है तथा उशीनरपुत्र शिबिके समान ब्राह्मणभक्त और सत्यवादी है ॥17॥ | Narada said, "Satyavan is generous according to his capacity, like Rantideva, the son of Samkriti, and devoted to and truthful like Shibi, the son of Usheenara." [17] |
| 59 | 3-20-294 | ययातिरिव चोदारः सोमवत् प्रियदर्शनः । रूपेणान्यतमोऽश्चिभ्यां द्युमत्सेनसुतो बली ॥18॥ |
वह ययातिकी भाँति उदार और चन्द्रमाके समान प्रियदर्शन है। द्युमत्सेनका वह बलवान् पुत्र रूपवान् तो इतना है मानो आश्चिनीकुमारोंमेंसे ही एक हो ॥18॥ | "He is magnanimous like Yayati and pleasing to look at like the moon. That strong son of Dyumatsena is so handsome as if he were one of the Ashwini Kumaras." [18] |
| 60 | 3-20-294 | स दान्तः स मृदुः शूरः स सत्यः संयतेन्द्रियः । स मैत्रः सोऽनसूयश्च स ह्रीमान् द्युतिमांश्च सः ॥19॥ |
वह जितेन्द्रिय, मृदुल, शूरवीर, सत्यस्वरूप, इन्द्रियसंयमी, सबके प्रति मैत्रीभाव रखनेवाला, अदोषदर्शी, लज्जावान् और कान्तिमान् है ॥19॥ | "He is self-controlled, gentle, valiant, truthful, restrained, friendly to all, faultless, modest, and radiant." [19] |
| 61 | 3-20-294 | नित्यशश्चार्जवं तस्मिन् स्थितिस्तस्यैव च ध्रुवा । संक्षेपतस्तपोवृद्धैः शीलवृद्धैश्च कथ्यते ॥20॥ |
तप और शीलमें बढ़े हुए वृद्ध पुरुष संक्षेपमें उसके विषयमें ऐसा कहते हैं कि राजकुमार सत्यवानमें सरलताका नित्य निवास है और उस सदगुणमें उसकी अविचल स्थिति है ॥20॥ | "Elderly men, advanced in austerity and virtue, say about him in brief that simplicity constantly resides in Prince Satyavan, and he is steadfast in that virtue." [20] |
| 62 | 3-20-294 | अश्वपतिरुवाच गुणैरुपेतं सर्वैस्तं भगवन् प्रब्रवीषि मे । दोषानप्यस्य मे ब्रूहि यदि सन्तीह केचन ॥21॥ |
अश्वपति बोले-भगवन्! आप तो उसे सभी गुणोंसे सम्पन्न ही बता रहे हैं, यदि उसमें कोई दोष हों तो उन्हें भी बतलाइये ॥21॥ | Ashwapati said, "O Lord! You are telling me that he is endowed with all virtues. If he has any faults, please tell me those also." [21] |
| 63 | 3-20-294 | नारद उवाच एक एवास्य दोषो हि गुणानाक्रम्य तिष्ठति । स च दोषः प्रयत्नेन न शक्यमतिवर्तितुम् ॥22॥ |
नारदजीने कहा--दोष तो एक ही है, जो उसके सभी गुणोंको दबाकर स्थित है। उस दोषको प्रयत्न करके भी हटाया नहीं जा सकता ॥22॥ | Narada said, "He has only one fault, which overshadows all his virtues. That fault cannot be removed even by trying." [22] |
| 64 | 3-20-294 | एको दोषोऽस्ति नान्योऽस्य सोऽद्यप्रभृति सत्यवान् । संवत्सरेण क्षीणायुर्देहन्यासं करिष्यति ॥23॥ |
आजसे लेकर एक वर्ष पूर्ण होनेतक सत्यवानूकी आयु पूर्ण हो जायगी और वह शरीर त्याग देगा। केवल यही दोष उसमें है, दूसरा नहीं ॥23॥ | "From today until one year is completed, Satyavan's life will be over, and he will leave his body. That is his only fault, and there is no other." [23] |
| 65 | 3-20-294 | राजोवाच एहि सावित्रि गच्छस्व अन्यं वरय शोभने । तस्य दोषो महानेको गुणानाक्रम्य च स्थितः ॥24॥ |
राजा बोले_बेटी सावित्री! यहाँ आ। शोभने! तू पुनः यात्रा कर और दूसरे किसी पुरुषका वरण कर ले। सत्यवान्का यह एक ही बहुत बड़ा दोष है जो उसके सभी गुणोंको दबाकर स्थित है ॥24॥ | The king said, "Daughter Savitri! Come here. O beautiful one! Travel again and choose another man. Satyavan has this one great fault, which overshadows all his virtues." [24] |
| 66 | 3-20-294 | यथा मे भगवानाह नारदो देवसत्कृतः । संवत्सरेण सोऽल्पायुर्देहन्यासं करिष्यति ॥25॥ |
जैसा कि देववदिन्त भगवान् नारदजी कह रहे हैं, सत्यवान्की आयु बहुत थोड़ी है और वह एक ही वर्षमें देहत्याग कर देगा ॥25॥ | "As the divine sage Narada is saying, Satyavan's life is very short, and he will leave his body in just one year." [25] |
| 67 | 3-20-294 | सावित्र्युवाच सकृदंशो निपतति सकृत् कन्या प्रदीयते । सकृदाह ददानीति त्रीण्येतानि सकृत् सकृत् ॥26॥ दीर्घायुरथवाल्पायुः सगुणो निर्गुणोऽपि वा । सकृद् वृतो मया भर्ता न द्वितीयं वृणोम्यहम् ॥27॥ |
सावित्री बोली-भाइयोंमें धनका बँटवारा एक ही बार होता है, कन्या एक ही बार दी जाती है तथा श्रेष्ठ दाता “मैं दूँगा', यह कहकर एक ही बार वचनदान करता है। ये तीन बातें एक-एक बार ही होती हैं। सत्यवान् दीर्घायु हों या अल्पायु, गुणवान् हों या गुणहीन; मैंने उन्हें एक बार अपना पति चुन लिया। अब मैं दूसरे किसी पुरुषका वरण नहीं कर सकती ॥ 26-27॥ | Savitri said, "Wealth is divided among brothers only once, a daughter is given only once, and a noble giver makes a promise only once, saying 'I will give.' These three things happen only once. Whether Satyavan has a long life or a short life, is virtuous or without virtues, I have chosen him once as my husband. Now I cannot choose any other man." [26-27] |
| 68 | 3-20-294 | मनसा निश्चयं कृत्वा ततो वाचाभिधीयते । क्रियते कर्मणा पश्चात् प्रमाणं मे मनस्ततः ॥28॥ |
पहले मनसे निश्चय करके फिर वाणीद्वारा कहा जाता है। तत्पश्चात् उसे कार्यरूपमें परिणत किया जाता है, अतः इस विषयमें मेरा मन ही प्रमाण है ॥28॥ | "First, a decision is made in the mind, then it is spoken with words. Then it is put into action, so my mind is the proof in this matter." [28] |
| 69 | 3-20-294 | नारद उवाच स्थिरा बुद्धिर्नरश्रेष्ठ सावित्र्या दुहितुस्तव । नैषा वारयितुं शक्या धर्मादस्मात् कथंचन ॥29॥ |
नारदजी बोले- नरश्रेष्ठ! आपकी पुत्री सावित्रीकी बुद्धि स्थिर है। इसे इस धर्ममार्गसे किसी तरह हटाया नहीं जा सकता ॥29॥ | Narada said, "O best among men! Your daughter Savitri's mind is steady. She cannot be turned away from this path of Dharma." [29] |
| 70 | 3-20-294 | नान्यस्मिन् पुरुषे सन्ति ये सत्यवति वै गुणाः । प्रदानमेव तस्मान्मे रोचते दुहितुस्तव ॥30॥ |
सत्यवान जो गुण हैं, वे दूसरे किसी पुरुषमें हैं भी नहीं। अतः मुझे आपकी पुत्रीका सत्यवानूके साथ विवाह कर देना ही ठीक मालूम पड़ता है ॥30॥ | "The virtues that Satyavan has are not found in any other man. Therefore, it seems to me that it is right to marry your daughter to Satyavan." [30] |
| 71 | 3-20-294 | राजोवाच अविचाल्यं तदुक्तं यत् तथ्यं भगवता वचः । करिष्याम्येतदेवं च गुरुर्हि भगवान् मम ॥31॥ |
राजा बोले-देवर्षे! आपने जो बात कही है, वह ठीक है। उसे टाला नहीं जा सकता। अतः मैं ऐसा ही करूँगा, क्योंकि आप मेरे गुरु हैं ॥31॥ | The king said, "O divine sage! What you have said is correct. It cannot be avoided. Therefore, I will do as you say, because you are my guru." [31] |
| 72 | 3-20-294 | नारद उवाच अविघ्नमस्तु सावित्र्याः प्रदाने दुहितुस्तव । साधयिष्याम्यहं तावत् सर्वेषां भद्रमस्तु वः ॥32॥ |
नारदजीने कहा-राजन्! आपकी पुत्री सावित्रीके विवाहमें किसी प्रकारकी विघ्न बाधा न आवे। अच्छा, अब मैं चलता हूँ। आप सब लोगोंका कल्याण हो ॥ | Narada said, "O King! May there be no obstacles in the marriage of your daughter Savitri. Very well, I must go now. May you all be well." [32] |
| 73 | 3-20-294 | मार्कण्डेय उवाच एवमुक्त्वा समुत्पत्य नारदस्त्रिदिवं गतः । राजापि दुहितुः सज्जं वैवाहिकमकारयत् ॥33॥ |
मार्कण्डेयजी कहते है--युधिष्ठिर! ऐसा कहकर नारदजी उठे और स्वर्गलोकमें चले गये। इधर राजा भी अपनी पुत्रीके विवाहकी तैयारी कराने लगे ॥33॥ | Markandeya says: Yudhisthira! Saying this, Narada got up and went to heaven. Meanwhile, the king began to make preparations for his daughter's marriage. [33] |
| 74 | 3-20-294 | इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि पतिव्रतामाहात्म्यपर्वणि सावित्र्युपाख्याने चतुर्नवत्यधिकद्विशततमो ऽध्यायः ॥294॥ | इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत पतिव्रतामाहात्म्यपर्वमें सावित्री- उपाख्यानविषयक दो सौ चौरानबेवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ 294 ॥ | Thus ends the two hundred ninety-fourth chapter, concerning the Savitri episode, within the Pativrata Mahatmya Parva of the Vana Parva in the Shrimahabharata. [294] |
| 75 | 3-20-295 | पञ्चनवत्यधिकद्धिशततमोऽध्यायः | दो सौ पंचानबेवो अध्याय | Chapter 295 |
| 76 | 3-20-295 | सत्यवान् और सावित्रीका विवाह तथा सावित्रीका अपनी सेवाओंद्धारा सबको संतुष्ट करना | सत्यवान् और सावित्रीका विवाह तथा सावित्रीका अपनी सेवाओंद्धारा सबको संतुष्ट करना | The Marriage of Satyavan and Savitri, and Savitri's Satisfaction of Everyone Through Her Services |
| 77 | 3-20-295 | मार्कण्डेय उवाच अथ कन्याप्रदाने स तमेवार्थं विचिन्तयन् । समानिन्ये च तत् सर्व भाण्डं वैवाहिकं नृपः ॥1॥ |
मार्कण्डेयजी कहते हैं-युधिष्ठिर! तदनन्तर कन्यादानके विषयमें नारदजीके ही कथनपर विचार करते हुए राजा अश्वपतिने विवाहके लिये सारी सामग्री एकत्र करवायी ॥1॥ | Markandeya said, "Yudhishthira! Thereafter, considering Narada's words regarding the giving away of the bride, King Ashwapati gathered all the necessary materials for the marriage. [1] |
| 78 | 3-20-295 | ततो वृद्धान् द्विजान् सर्वानृत्विजः सपुरोहितान् । समाहूय दिने पुण्ये प्रययौ सह कन्यया ॥2॥ |
फिर उन्होंने बूढ़े ब्राह्मणों, समस्त ऋत्विजों तथा पुरोहितोंको बुलाकर किसी शुभ दिनमें कन्याके साथ तपोवनको प्रस्थान किया ॥2॥ | Then he summoned the elderly Brahmins, all the priests, and the family priests, and set out for the hermitage in the forest on an auspicious day with his daughter. [2] |
| 79 | 3-20-295 | मेध्यारण्यं स गत्वा च द्युमत्सेनाश्रमं नृपः । पद्भयामेव द्विजैः सार्ध राजर्षि तमुपागमत् ॥3॥ |
पवित्र वनमें द्युमत्सेनके आश्रमके निकट पहुंचकर राजा अश्वपति ब्राह्मणोंके साथ पैदल ही उन राजर्षिके पास गये ॥3॥ | Reaching near Dyumatsena's hermitage in the sacred forest, King Ashwapati, along with the Brahmins, went to the royal sage on foot. [3] |
| 80 | 3-20-295 | तत्रापश्यन्महा भागं शालवृक्षमुपाश्रितम् । कौश्यां बृस्यां समासीनं चक्षुर्हींनं नृपं तदा ॥4॥ |
वहाँ उन्होंने उन महाभाग नेत्रहीन नरेशको शालवृक्षके नीचे एक कुशकी चटाईपर बैठे देखा ॥4॥ | There, he saw the noble, blind king sitting on a Kusha mat under a Sal tree. [4] |
| 81 | 3-20-295 | स राजा तस्य राजर्षे: कृत्वा पूजां यथार्हतः । वाचा सुनियतो भूत्वा चकारात्मनिवेदनम् ॥5॥ तस्यार्घ्यमासनं चैव गां चावेद्य स धर्मवित् । किमागमनमित्येवं राजा राजानमब्रवीत् ॥6॥ |
राजा अश्वपतिने राजर्षि द्युमत्सेनकी यथायोग्य पूजा की और वाणीको संयममें रखकर उन्होंने उनके समक्ष अपना परिचय दिया। तब धर्मज्ञ राजा द्युमत्सेनने मद्रराज अश्वपतिको अर्घ्य, आसन और गौ निवेदन करके उनसे पूछा-'किस उद्देश्यसे आपका यहाँ शुभागमन हुआ है?” ॥ 5-6॥ | King Ashwapati respectfully greeted Rajarshi Dyumatsena and introduced himself with measured words. Then, the righteous King Dyumatsena offered Madra king Ashwapati the ritual offerings, a seat, and a cow, and asked, 'For what purpose have you graced us with your presence?' [5-6] |
| 82 | 3-20-295 | तस्य सर्वमभिप्रायमितिकर्तव्यतां च ताम् । सत्यवन्तं समुद्दिश्य सर्वमेव न्यवेदयत् ॥7॥ |
तब राजाने उनसे सत्यवानके उद्देश्यसे अपना सारा अभिप्राय तथा कैसे-कैसे क्या-क्या करना है इत्यादि बातोंका विवरण सब कुछ स्पष्ट बता दिया ॥7॥ | Then the king explained his entire intention concerning Satyavan, detailing everything that needed to be done. [7] |
| 83 | 3-20-295 | अश्वपतिरुवाच सावित्री नाम राजर्षे कन्येयं मम शोभना । तां स्वधर्मेण धर्मज्ञ स्नुषार्थे त्वं गृहाण मे ॥8॥ |
अश्वपति बोले--धर्मज्ञ राजर्षे! सावित्री नामसे प्रसिद्ध मेरी यह सुन्दरी कन्या है। इसे आप धर्मतः अपनी पुत्रवधू बनानेके लिये स्वीकार करें ॥8॥ | Ashwapati said, 'Righteous Rajarshi! This beautiful daughter of mine, known as Savitri, I request you to accept her as your daughter-in-law according to dharma.' [8] |
| 84 | 3-20-295 | ह्ुमत्येन उवाच च्युताः स्म राज्याद् वनवासमाश्रिता- श्चराम धर्म नियतास्तपस्विनः । कथं त्वनर्हा वनवासमाश्रमे निवत्स्यते क्लेशमिमं सुता तव ॥9॥ |
द्युमत्सेन बोले-महाराज! हम राज्यसे भ्रष्ट हो चुके हैं एवं वनका आश्रय लेकर संयम-नियमके साथ तपस्वी जीवन बिताते हुए धर्मका अनुष्ठान करते हैं। आपकी कन्या ये सब कष्ट सहन करनेयोग्य नहीं है। ऐसी दशामें यह आश्रममें रहकर वनवासके इस कष्टको कैसे सह सकेगी? ॥9॥ | Dyumatsena replied, 'O King! We have been ousted from our kingdom and now live in the forest, leading an ascetic life of self-discipline and following dharma. Your daughter is not accustomed to such hardships. How will she bear the rigors of forest life in this hermitage?' [9] |
| 85 | 3-20-295 | अश्वपतिरुवाच सुखं च दुःखं च भवाभवात्मकं यदा विजानाति सुताहमेव च । न मद्विधे युज्यति वाक्यमीदृशं विनिश्चयेनाभिगतोऽस्मि ते नृप ॥10॥ |
अश्वपतिने कहा-राजन्! सुख और दुःख तो उत्पन्न और नष्ट होनेवाले हैं। इस बातको मैं और मेरी पुत्री दोनों जानते हैं। मेरे-जैसे मनुष्यसे आपको ऐसी बात नहीं कहनी चाहिये। मैं तो सब प्रकारसे निश्चय करके ही आपके पास आया हूँ ॥10॥ | Ashwapati said, 'O King! Pleasure and pain are transient. Both my daughter and I understand this. You should not speak thus to someone like me. I have come to you after careful consideration of all aspects.' [10] |
| 86 | 3-20-295 | आशां नार्हसि मे हन्तुं सौहृदात् प्रणतस्य च । अभितश्चागतं प्रेम्णा प्रत्याख्यातुं न मार्हसि ॥11॥ |
मैं सौहार्दभावसे आपकी शरणमे आया हूँ। आप मेरी आशा भग्न न करें-प्रेमपूर्वक अपने पास आये हुए मुझ प्रार्थीको निराश न लौटावें ॥11॥ | I have come to you in goodwill. Please do not disappoint my hopes. Do not turn away a petitioner who has come to you with love. [11] |
| 87 | 3-20-295 | अनुरूपो हि युक्तश्च त्वं ममाहं तवापि च । स्नुषां प्रतीच्छ मे कन्यां भार्या सत्यवतः सतः ॥12॥ |
आप सर्वथा मेरे अनुरूप और योग्य हैं। मैं भी आपके योग्य हूँ। आप मेरी इस कन्याको अपने श्रेष्ठ पुत्र सत्यवान्की पत्नी एवं अपनी पुत्रवधूके रूपमें ग्रहण कीजिये ॥12॥ | You are entirely suitable and worthy for me, and I am worthy for you. Please accept my daughter as the wife of your noble son Satyavan and as your daughter-in-law. [12] |
| 88 | 3-20-295 | हुमत्सेन उवाच पूर्वमेवाभिलषितः सम्बन्धो मे त्वया सह । भ्रष्टराज्यस्त्वहमिति तत एतद् विचारितम् ॥13॥ |
द्युमत्सेन बोले-महाराज! मैं तो पहलेसे ही आपके साथ सम्बन्ध करना चाहता था; परंतु इस समय अपने राज्यसे भ्रष्ट हो गया हूँ, ऐसा सोचकर मैंने ऐसा विचार कर लिया था कि अब यह सम्बन्ध नहीं हो सकेगा ॥13॥ | Dyumatsena said, 'O King! I had wished to form an alliance with you before, but considering my present state of being deprived of my kingdom, I thought it would not be possible now.' [13] |
| 89 | 3-20-295 | अभिप्रायस्त्वयं यो मे पूर्वमेवाभिकाङ्क्षितः । स निर्वर्ततु मेऽद्यैव काङ्क्षितो ह्यसि मेऽतिथिः ॥14॥ |
किंतु मेरा यह अभिप्राय, जो मुझे पहलेसे ही अभीष्ट था, यदि आज ही सिद्ध होना चाहता है तो अवश्य हो। आप मेरे मनोवांछित अतिथि हैं ॥14॥ | But if this long-cherished wish is to be fulfilled today, so be it. You are a guest I have longed for.' [14] |
| 90 | 3-20-295 | ततः सर्वान् समानाय्य द्विजानाश्रमवासिनः । यथाविधि समुद्धाहं कारयामासतुर्नुपौ ॥15॥ |
तदनन्तर उस आश्रममें रहनेवाले सभी ब्राह्मणोंको बुलाकर दोनों राजा ओने सत्यवान्- सावित्रीका विवाह-संस्कार विधिवत् सम्पन्न कराया ॥15॥ | Then, summoning all the Brahmins living in the hermitage, both kings conducted the marriage ceremony of Satyavan and Savitri according to the prescribed rituals. [15] |
| 91 | 3-20-295 | दत्त्वा सोऽश्वपतिः कन्यां यथार्ह सपरिच्छदम् । ययौ स्वमेव भवनं युक्तः परमया मुदा ॥16॥ |
राजा अश्वपति दहेजसहित कन्यादान देकर बड़ी प्रसन्नताके साथ अपनी राजधानीको लौट गये ॥16॥ | King Ashwapati, after giving away his daughter with a dowry, happily returned to his capital. [16] |
| 92 | 3-20-295 | सत्यवानपि तां भार्या लब्ध्वा सर्वगुणान्विताम् । मुमुदे सा च तं लब्ध्वा भर्तारं मनसेप्सितम् ॥17॥ |
उस सर्वसदगुणसम्पन्न भार्याको पाकर सत्यवान्को बड़ी प्रसन्नता हुई और सत्यवानूको अपने मनोवांछित पतिके रूपमें पाकर सावित्रीको भी बड़ा आनन्द हुआ ॥ | Satyavan was delighted to have found such a virtuous wife, and Savitri was equally pleased to have Satyavan as her desired husband. [17] |
| 93 | 3-20-295 | गते पितरि सर्वाणि संन्यस्याभरणानि सा । जगृहे वल्कलान्येव वस्त्रं काषायमेव च ॥18॥ |
पिताके चले जानेपर सावित्री अपने सब आभूषण उतारकर वल्कल तथा गेरुआ वस्त्र पहनने लगी ॥18॥ | After her father's departure, Savitri removed all her ornaments and began wearing bark clothes and saffron garments. [18] |
| 94 | 3-20-295 | परिचारीर्गुणैश्चैव प्रश्रयेण दमेन च । सर्वकामक्रियाभिश्च सर्वेषां तुष्टिमादधे ॥19॥ |
सावित्रीने सेवा, गुण, विनय, संयम और सबके मनके अनुसार कार्य करनेसे सभीको प्रसन्न कर लिया ॥19॥ | Savitri pleased everyone with her service, virtues, humility, self-control, and by acting according to everyone's wishes. [19] |
| 95 | 3-20-295 | श्वश्रू शरीरसत्कारैः सर्वैराच्छादनादिभि: । श्वशुरं देवसत्कारैर्वाचः संयमनेन च ॥20॥ |
उसने शारीरिक सेवा तथा वस्त्राभूषण आदिके द्वारा सासको और वाणीके संयमपूर्वक देवोचित सत्कारद्वारा ससुरको संतुष्ट किया ॥20॥ | She satisfied her mother-in-law with physical service and by providing clothing and ornaments, and she pleased her father-in-law with restrained speech and divine reverence. [20] |
| 96 | 3-20-295 | तथैव प्रियवादेन नैपुणेन शमेन च । रहश्चैवोपचारेण भर्तारं पर्यतोषयत् ॥21॥ |
इसी प्रकार मधुर सम्भाषण, कार्य-कुशलता, शान्ति तथा एकान्तसेवाद्वारा पतिदेवको भी सदा प्रसन्न रखा ॥21॥ | Similarly, she always kept her husband happy with sweet talk, efficient work, peace, and secluded service. [21] |
| 97 | 3-20-295 | एवं तत्राश्रमे तेषां तदा निवसतां सताम् । कालस्तपस्यतां कश्चिदपाक्रामत भारत ॥22॥ |
भरतनन्दन! इस प्रकार उन सब लोगोंको उस आश्रममें रहकर तपस्या करते कुछ काल व्यतीत हो गया ॥22॥ | O descendant of Bharata! Thus, some time passed as they all lived and practiced penance in that hermitage. [22] |
| 98 | 3-20-295 | सावित्र्या ग्लायमानायास्तिष्ठन्त्यास्तु दिवानिशम् । नारदेन यदुक्तं तद् वाक्यं मनसि वर्तते ॥23॥ |
इधर सावित्री निरन्तर चिन्तासे गली जा रही थी। दिन-रात सोते-उठते हर समय नारदजीकी कही हुई बात उसके मनमें बनी रहती थी-वह उसे क्षणभरके लिये भी नहीं भूलती थी ॥23॥ | Meanwhile, Savitri was constantly consumed by worry. Day and night, waking or sleeping, Narada's words remained in her mind; she could not forget them for even a moment. [23] |
| 99 | 3-20-295 | इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि पतिव्रतामाहात्म्यपर्वणि सावित्र्युपाख्याने पञ्चनवत्यधिकद्विशततमोऽध्यायः ॥295॥ | इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत पतिव्रतामाहात्म्यपर्वमें सावित्री- उपाख्यानविषयक दो सौ पंचानबेवो अध्याय पूरा हुआ ॥295॥ | Thus ends the two hundred ninety-fifth chapter relating to the anecdote of Savitri in the 'Pativrata Mahatmya Parva' section of the 'Vana Parva' of the Srimahabharata." |
| 100 | 3-20-296 | षण्णवत्यधिकद्विशततमोध्याय: | दो सौ छानबेवाँ अध्याय | Chapter 296 |
| 101 | 3-20-296 | सावित्रीकी व्रतचर्या तथा सास-ससुर और पतिकी आज्ञा लेकर सत्यवानूके साथ उसका वनमें जाना | सावित्रीकी व्रतचर्या तथा सास-ससुर और पतिकी आज्ञा लेकर सत्यवानूके साथ उसका वनमें जाना | Savitri's Observance of Vows and Her Going to the Forest with Satyavan, Taking Permission from Her In-Laws and Husband |
| 102 | 3-20-296 | मार्कण्डेय उवाच ततः काले बहुतिथे व्यतिक्रान्ते कदाचन । प्राप्तः स कालो मर्तव्यं यत्र सत्यवता नृप ॥1॥ |
मार्कण्डेयजी कहते हैं-युधिष्ठिर! तदनन्तर बहुत दिन बीत जानेपर एक दिन वह समय भी आ पहुँचा जब कि सत्यवानकी मृत्यु होनेवाली थी ॥1॥ | Markandeya said, "Yudhishthira! Thereafter, after many days had passed, the day arrived when Satyavan was destined to die. [1] |
| 103 | 3-20-296 | गणयन्त्याश्च सावित्र्या दिवसे दिवसे गते । यद् वाक्यं नारदेनोक्तं वर्तते हृदि नित्यशः ॥2॥ |
सावित्री एक-एक दिन बीतनेपर उसकी गणना करती रहती थी। नारदजीने जो बात कही थी, वह उसके हृदयमें सदा विद्यमान रहती थी ॥2॥ | Savitri kept counting each passing day. The words spoken by Narada were ever-present in her heart. [2] |
| 104 | 3-20-296 | चतुर्थेऽहनि मर्तव्यमिति संचिन्त्य भाविनी । व्रतं त्रिरात्मुद्विश्य दिवारात्रं स्थिताभवत् ॥3॥ |
भाविनी सावित्रीको जब यह निश्चय हो गया कि मेरे पतिको आजसे चौथे दिन मरना है, तब उसने तीन रातका व्रत धारण किया और उसमें वह दिन-रात खड़ी ही रही ॥3॥ | When Savitri became certain that her husband would die on the fourth day from that day, she undertook a three-night vow, during which she remained standing day and night. [3] |
| 105 | 3-20-296 | तं श्रुत्वा नियमं तस्या भृशं दुःखान्वितो नृपः । उत्थाय वाक्यं सावित्रीमब्रवीत् परिसान्त्वयन् ॥4॥ |
सावित्रीका यह कठोर नियम सुनकर राजा द्युमत्सेनको बड़ा दुःख हुआ। उन्होने उठकर सावित्रीको सान्त्वना देते हुए कहा ॥4॥ | Hearing of Savitri's severe austerity, King Dyumatsena was greatly saddened. He rose and consoled Savitri, saying, [4] |
| 106 | 3-20-296 | ह्ुमत्येन उवाच अतितीव्रोऽयमारम्भस्त्वयाऽऽरब्धो नृपात्मजे । तिसृणां वसतीनां हि स्थानं परमदुश्चरम् ॥5॥ |
द्युमत्सेन बोले-राजकुमारी! तुमने यह बड़ा कठोर व्रत आरम्भ किया है। तीन दिनोंतक निराहार रहना तो अत्यन्त दुष्कर कार्य है ॥5॥ | Dyumatsena said, 'Princess! You have begun a very difficult vow. To remain without food for three days is extremely challenging.' [5] |
| 107 | 3-20-296 | सावित्र्युवाच न कार्यस्तात संतापः पारयिष्याम्यहं व्रतम् । व्यवसायकृतं हीदं व्यवसायश्च कारणम् ॥6॥ |
सावित्री बोली-पिताजी! आप चिन्ता न करें। मैं इस व्रतको पूर्ण कर लूँगी। दृढ़ निश्चय ही व्रतके निर्वाहमें कारण हुआ करता है, सो मैंने भी दृढ़ निश्चयसे ही इस व्रतको आरम्भ किया है ॥6॥ | Savitri replied, 'Father, please do not worry. I will complete this vow. Firm resolve is the cause of fulfilling a vow, and I have begun this vow with firm resolve.' [6] |
| 108 | 3-20-296 | ह्ुमत्येन उवाच व्रतं भिन्धीति वक्तुं त्वां नास्मि शक्तः कथञ्चन । पारयस्वेति वचनं युक्तमस्मद्विधो वदेत् ॥7॥ |
द्युमत्सेनने कहा-यह तो मैं तुम्हें किसी तरह नहीं कह सकता कि “बेटी! तुम व्रत भंग कर दो।' मेरे-जैसा मनुष्य यही समुचित बात कह सकता है कि “तुम व्रतको निर्विघ्न पूर्ण करो" ॥7॥ | Dyumatsena said, 'I cannot possibly tell you, "Daughter, break your vow." A person like me can only say the appropriate thing, which is, "May you complete your vow without any obstacles."' [7] |
| 109 | 3-20-296 | मार्कण्डेय उवाच एवमुक्त्वा द्युमत्सेनो विरराम महामनाः । तिष्ठन्ती चैव सावित्री काष्ठभूतेव लक्ष्यते ॥8॥ |
मार्कण्डेयजी कहते हैं-युधिष्ठिर! ऐसा कहकर महामना द्युमत्सेन चुप हो गये। सावित्री एक स्थानपर खड़ी हुई काठ-सी दिखायी देती थी ॥8॥ | Markandeya says, "Yudhishthira! Having said this, the noble-minded Dyumatsena remained silent. Savitri stood there as still as a wooden statue. [8] |
| 110 | 3-20-296 | श्वोभूते भर्तृमरणे सावित्र्या भरतर्षभ । दुःखान्वितायास्तिष्ठन्त्या सा रात्रिर्व्धत्यवर्तत ॥9॥ |
भरतश्रेष्ठ! कल ही पतिदेवकी मृत्यु होनेवाली है, यह सोचकर दु:खमें डूबी हुई सावित्रीकी वह रात खड़े-ही-खड़े बीत गयी ॥9॥ | O best of the Bharatas! Thinking that her husband would die the next day, Savitri spent that night standing, immersed in sorrow. [9] |
| 111 | 3-20-296 | अद्य तद् दिवसं चेति हुत्वा दीप्तं हुताशनम् । युगमात्रोदिते सूर्ये कृत्वा पौर्वाह्लिकीः क्रियाः ॥10॥ |
दूसरे दिन यह सोचकर कि आज ही वह दिन है, उसने सूर्यदेवके चार हाथ ऊपर उठते- उठते पूर्वाह्नकालके सब कृत्य पूरे कर लिये और प्रज्वलित अग्निमें आहुति दी ॥10॥ | The next day, thinking that it was the day, she completed all her morning rituals and offered oblations to the blazing fire before the sun rose four hands high. [10] |
| 112 | 3-20-296 | ततः सर्वान् द्विजान् वृद्धान् श्वश्रूं श्वशुरमेव च । अभिवाद्यानुपूर्व्येण प्राञ्जलिर्नियता स्थिता ॥11॥ |
फिर सभी ब्राह्मणों, बड़े-बूढ़ों और सास-ससुरको क्रमशः प्रणाम करके वह नियमपूर्वक हाथ जोड़कर उनके सामने खड़ी रही ॥11॥ | Then, she bowed down to all the Brahmins, elders, and her in-laws, and stood before them with folded hands, following the proper decorum. [11] |
| 113 | 3-20-296 | अवैधव्याशिषस्ते तु सावित्र्यर्थ हिताः शुभाः । ऊचुस्तपस्विनः सर्वे तपोवननिवासिनः ॥12॥ |
उस तपोवनमें रहनेवाले सभी तपस्वियोंने सावित्रीके लिये अवैधव्यसूचक-- सौभाग्यवर्धक, शुभ और हितकर आशीर्वाद दिये ॥12॥ | All the ascetics living in that hermitage gave Savitri auspicious and beneficial blessings for her unbroken marital bliss. [12] |
| 114 | 3-20-296 | एवमस्त्विति सावित्री ध्यानयोगपरायणा । मनसा ता गिरः सर्वा प्रत्यगृह्णात् तपस्विनाम् ॥13॥ |
सावित्रीने ध्यानयोगमें स्थित हो तपस्वियोंकी उस आशीर्वादमयी वाणीको “एवमस्तु (ऐसा ही हो) कहकर मन-ही-मन शिरोधार्य किया ॥13॥ | Savitri, absorbed in meditation, accepted those blessings of the ascetics, saying "So be it" in her mind. [13] |
| 115 | 3-20-296 | तं कालं तं मुहूर्त च प्रतीक्षन्ती नृपात्मजा । यथोक्तं नारदवचश्चिन्तयन्ती सुदुःखिता ॥14॥ |
फिर पतिकी मृत्युसे सम्बन्ध रखनेवाले समय और मुहूर्तकी प्रतीक्षा करती हुई राजकुमारी सावित्री नारदजीके पूर्वोक्त वचनका चिन्तन करके बहुत दुःखी हो गयी ॥14॥ | Then, the princess Savitri, thinking of Narada's earlier words, became very distressed as she awaited the time and moment related to her husband's death. [14] |
| 116 | 3-20-296 | ततस्तु श्वश्रूश्चशुरावूचतुस्तां नृपात्मजाम् । एकान्तमास्थितां वाक्यं प्रीत्या भरतसत्तम ॥15॥ |
भरतश्रेष्ठ! तदनन्तर सास और ससुरने एकान्तमें बैठी हुई राजकुमारी सावित्रीसे प्रेमपूर्वक इस प्रकार कहा ॥15॥ | O best of the Bharatas! Thereafter, her in-laws lovingly spoke to Princess Savitri, who was sitting alone. [15] |
| 117 | 3-20-296 | वशुरादचदुः व्रतं यथोपदिष्टं तु तथा तत् पारितं त्वया । आहारकालः सम्प्राप्तः क्रियतां यदनन्तरम् ॥16॥ |
सास-ससुर बोले--बेटी! तुमने शास्त्रके उपदेशके अनुसार अपना व्रत पूरा कर लिया है, अब पारण करनेका समय हो गया है। अतः जो कर्तव्य है, वह करो ॥16॥ | Her in-laws said, 'Daughter, you have completed your vow according to the teachings of the scriptures, and now it is time to break the fast. Therefore, do what is necessary.' [16] |
| 118 | 3-20-296 | सावित्र्युवाच अस्तं गते मयाऽऽदित्ये भोक्तव्यं कृतकामया । एष मे हृदि संकल्पः समयश्च कृतो मया ॥17॥ |
सावित्री बोली-सूर्यास्त होनेपर जब मेरा मनोरथ पूर्ण हो जायगा तभी मैं भोजन करूगी। यह मेरे मनका संकल्प है और मैने ऐसा करनेकी प्रतिज्ञा कर ली है ॥17॥ | Savitri replied, 'I will eat only after my wish is fulfilled at sunset. This is my resolve, and I have taken a vow to do so.' [17] |
| 119 | 3-20-296 | मार्कण्डेय उवाच एवं सम्भाषमाणायाः सावित्र्या भोजनं प्रति । स्कन्धे परशुमादाय सत्यवान् प्रस्थितो वनम ॥18॥ |
मार्कण्डेयजी कहते हैं-युधिष्ठिर! जब सावित्री भोजनके सम्बन्धमें इस प्रकार बातें कर रही थी, उसी समय सत्यवान् कंधेपर कुल्हाड़ी रखकर (फल-फूल, समिधा आदि लानेके लिये) वनकी ओर चले ॥18॥ | Markandeya says, "Yudhishthira! While Savitri was speaking about food in this manner, Satyavan, with an axe on his shoulder, set out towards the forest (to fetch fruits, flowers, firewood, etc.). [18] |
| 120 | 3-20-296 | सावित्री त्वाह भर्तारं नेकस्त्वं गन्तुमर्हसि । सह त्वया गमिष्यामि न हि त्वां हातुमुत्सहे ॥19॥ |
उस समय सावित्रीने अपने पतिसे कहा-नाथ! आप अकेले न जाइये। मैं भी आपके साथ चलूँगी। आज मैं आपको अकेला नहीं छोड़ सकती ॥19॥ | At that time, Savitri said to her husband, 'My lord, do not go alone. I will also come with you. Today, I cannot leave you alone.' [19] |
| 121 | 3-20-296 | सत्यवानुवाच वनं न गतपूर्वं ते दुःख: पन्थाश्च भाविनि । व्रतोपवासक्षामा च कथं पद्भयां गमिष्यसि ॥20॥ |
सत्यवानूने कहा-सुन्दरि! तुम पहले कभी वनमे नहीं गयी हो। वनका रास्ता बड़ा दुःखदायक होता है, तुम व्रत और उपवास करनेके कारण दुर्बल हो रही हो। ऐसी दशामें पैदल कैसे चल सकोगी? ॥20॥ | Satyavan said, 'O beautiful one! You have never been to the forest before. The path in the forest is very difficult, and you are weak due to fasting and vows. How will you walk?' [20] |
| 122 | 3-20-296 | सावित्र्युवाच उपवासान्न मे ग्लानिर्नास्ति चापि परिश्रमः । गमने च कृतोत्साहां प्रतिषेदधुं न मार्हसि ॥21॥ |
सावित्री बोली-उपवासके कारण मुझे किसी प्रकारकी शिथिलता और थकावट नहीं है। चलनेके लिये मेरे मनमें पूर्ण उत्साह है, अतः आप मुझे मना न कीजिये ॥ | Savitri replied, 'I do not feel any weakness or fatigue due to the fast. I have full enthusiasm to walk, so please do not refuse me.' [21] |
| 123 | 3-20-296 | सत्यवानुवाच यदि ते गमनोत्साहः करिष्यामि तव प्रियम् । मम त्वामन्त्रय गुरून् न मां दोषः स्पृशेदयम् ॥22॥ |
सत्यवानूने कहा--यदि तुम्हें चलनेका उत्साह है तो मैं तुम्हारा प्रिय मनोरथ पूर्ण करूँगा। परंतु तुम मेरे माता-पितासे पूछ लो, जिससे मुझे दोषका भागी न होना पड़े ॥ | Satyavan said, 'If you are enthusiastic to go, then I will fulfill your dear wish. But you should ask my parents, so that I do not become liable for any fault.' [22] |
| 124 | 3-20-296 | मार्कण्डेय उवाच साभिवाद्याब्रवीच्छ्वश्रू श्वशुरं च महाव्रता । अयं गच्छति मे भर्ता फलाहारो महावनम् ॥23॥ इच्छेयमभ्यनुज्ञाता आर्यया श्वशुरेण ह । अनेन सह निर्गन्तुं न मेऽद्य विरहः क्षमः ॥24॥ गुर्वग्निहोत्रार्थकृते प्रस्थितश्च सुतस्तव । न निवार्यो निवार्यः स्यादन्यथा प्रस्थितो वनम् ॥25॥ संवत्सरः किंचिदूनो न निष्क्रान्ताहमाश्रमात् । वनं कुसुमितं द्रष्टुं परं कौतूहलं हि मे ॥26॥ |
मार्कण्डेयजी कहते हैं--तब महान् व्रतका पालन करनेवाली सावित्रीने अपने सास- ससुरको प्रणाम करके कहा--'ये मेरे पतिदेव फल आदि लानेके लिये महान् वनमें जा रहे हैं। यदि सासजी और ससुरजी मुझे आज्ञा दें तो मै भी इनके साथ जाना चाहती हूँ। आज मुझे इनका एक क्षणका भी विरह सहा नहीं जाता। आपके पुत्र आज गुरुजनोंके लिये तथा अग्निहोत्रके उद्देश्यसे फल, फूल और समिधा आदि लानेके लिये वनमें जा रहे हैं, अतः उनको रोकना उचित नहीं है। हाँ, यदि किसी दूसरे कार्यके लिये वनमें जाते होते तो उन्हें रोका भी जा सकता था। एक वर्षसे कुछ ही कम हुआ, मैं आश्रमसे बाहर नहीं निकली। अतः आज फूलोंसे भरे हुए वनको देखनेके लिये मेरे मनमें बड़ी उत्कण्ठा है ॥ 23-26॥ | Markandeya says, "Then, Savitri, who observed great vows, bowed down to her in-laws and said, 'My husband is going to the great forest to fetch fruits, etc. If my mother-in-law and father-in-law permit me, I also wish to go with him. Today, I cannot bear to be separated from him even for a moment. Your son is going to the forest to bring fruits, flowers, and firewood for the elders and for the Agnihotra (fire sacrifice), so it is not appropriate to stop him. However, if he were going to the forest for some other purpose, he could be stopped. It has been almost a year since I stepped out of the hermitage. Therefore, today, I have a great desire to see the forest filled with flowers.' [23-26] |
| 125 | 3-20-296 | हुमत्सेन उवाच यतः प्रभृति सावित्री पित्रा दत्ता स्नुषा मम । नानयाभ्यर्थनायुक्तमुक्तपूर्वं स्मराम्यहम् ॥27॥ |
द्युमत्सेन बोले-जबसे सावित्रीके पिताने इसे मेरी पुत्रवधू बनाकर दिया है, तबसे आजतक इसने पहले कभी मुझसे किसी बातके लिये प्रार्थना की हो, इसका मुझे स्मरण नहीं है ॥27॥ | Dyumatsena said, 'Since Savitri's father gave her to me as my daughter-in-law, I do not recall her ever making a request for anything until today.' [27] |
| 126 | 3-20-296 | तदेषा लभतां कामं यथाभिलषितं वधूः । अप्रमादश्च कर्तव्यः पुत्रि सत्यवतः पथि ॥28॥ |
अतः आज मेरी पुत्रवधू अपना अभीष्ट मनोरथ प्राप्त करे। बेटी! जा, सत्यवानूके मार्गमे सावधानी रखना ॥28॥ | Therefore, let my daughter-in-law have her desired wish fulfilled today. Daughter, go, and be careful on Satyavan's path.' [28] |
| 127 | 3-20-296 | मार्कण्डेय उवाच उभाभ्यामभ्यनुज्ञाता सा जगाम यशस्विनी । सह भर्त्रा हसन्तीव हृदयेन विदूयता ॥29॥ |
मार्कण्डेयजी कहते हैं—युधिष्ठिर! इस प्रकार सास और ससुर दोनोंकी आज्ञा पाकर यशस्विनी सावित्री अपने पतिदेवके साथ चल दी, वह ऊपरसे तो हँसती-सी जान पड़ती थी, किंतु उसका हृदय दुःखकी ज्वालासे दग्ध हो रहा था ॥29॥ | Markandeya says, "Yudhishthira! Having received permission from both her in-laws, the illustrious Savitri set out with her husband. She appeared to be smiling outwardly, but her heart was burning with the fire of sorrow. [29] |
| 128 | 3-20-296 | सा वनानि विचित्राणि रमणीयानि सर्वशः । मयूरगणजुष्टानि ददर्श विपुलेक्षणा ॥30॥ |
विशाल नेत्रोंवाली सावित्रीने सब ओर घूम-घूमकर मयूरसमूहोंसे सेवित रमणीय और विचित्र वन देखे ॥30॥ | The large-eyed Savitri saw the beautiful and wondrous forest, adorned with groups of peacocks, as she wandered around. [30] |
| 129 | 3-20-296 | नदीः पुण्यवहाश्चैव पुष्पितांश्च नगोत्तमान् । सत्यवानाह पश्येति सावित्रीं मधुरं वचः ॥31॥ |
पवित्र जल बहानेवाली नदियों तथा फूलोंसे लदे हुए सुन्दर वृक्षोंको लक्ष्य करके सत्यवान् सावित्रीसे मधुर वाणीमें कहते--'प्रिये! देखो, कैसा मनोहर दृश्य है” ॥31॥ | Pointing to the rivers with pure water and the beautiful trees laden with flowers, Satyavan said to Savitri in a sweet voice, 'Beloved, look at this beautiful scene!' [31] |
| 130 | 3-20-296 | निरीक्षमाणा भतरं सर्वावस्थमनिन्दिता । मृतमेव हि भर्तारं काले मुनिवचः स्मरन् ॥32॥ |
सती-साध्वी सावित्री अपने पतिकी सभी अवस्थाओंका निरीक्षण करती थी। नारदजीके वचनोंको स्मरण करके उसे निश्चय हो गया था कि समयपर मेरे पतिकी मृत्यु अवश्यम्भावी है ॥32॥ | The chaste and virtuous Savitri observed all the conditions of her husband. Remembering Narada's words, she was certain that her husband's death was inevitable at the appointed time. [32] |
| 131 | 3-20-296 | अनुव्रजन्ती भर्तारं जगाम मृदुगामिनी । द्विधेव हृदयं कृत्वा तं च कालमवेक्षती ॥33॥ |
मन्दगतिसे चलनेवाली सावित्री मानो अपने हृदयके दो भाग करके एकसे अपने पतिका अनुसरण करती और दूसरेसे प्रतिक्षण उनके मृत्युकालकी प्रतीक्षा कर रही थी ॥33॥ | Walking slowly, Savitri seemed to divide her heart into two parts: with one, she followed her husband, and with the other, she awaited the moment of his death every second. [33] |
| 132 | 3-20-296 | इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि पतिव्रतामाहात्म्यपर्वणि सावित्र्युपाख्याने षण्णवत्यधिकद्वधिशततमोऽध्यायः ॥296॥ | इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत पतिव्रतामाहात्म्यपर्वमें सावित्री- उपाख्यानविषयक दो सौ छानबेवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥296॥ | Thus ends the two hundred ninety-sixth chapter relating to the anecdote of Savitri in the 'Pativrata Mahatmya Parva' section of the 'Vana Parva' of the Srimahabharata." |
| 133 | 3-20-297 | सप्तनवत्यधिकद्धिशततमोऽध्यायः | दो सौ सत्तानबेवाँ अध्याय | Chapter 297 |
| 134 | 3-20-297 | सावित्री और यमका संवाद, यमराजका संतुष्ट होकर सावित्रीको अनेक वरदान देते हुए मरे हुए सत्यवानूको भी जीवित कर देना तथा सत्यवान् और सावित्रीका वार्तालाप एवं आश्रमकी ओर प्रस्थान | सावित्री और यमका संवाद, यमराजका संतुष्ट होकर सावित्रीको अनेक वरदान देते हुए मरे हुए सत्यवानूको भी जीवित कर देना तथा सत्यवान् और सावित्रीका वार्तालाप एवं आश्रमकी ओर प्रस्थान | Dialogue between Savitri and Yama; Yamraj, being pleased, bestows many boons on Savitri, including reviving the dead Satyavan; Conversation between Satyavan and Savitri and their departure towards the hermitage. |
| 135 | 3-20-297 | मार्कण्डेय उवाच अथ भार्यासहायः स फलान्यादाय वीर्यवान् । कठिनं पूरयामास ततः काष्ठान्यपाटयत् ॥1॥ |
मार्कण्डेयजी कहते हैं-तदनन्तर पत्नीसहित शक्तिशाली सत्यवानूने फल चुनकर एक काठकी टोकरी भर ली। तत्पश्चात् वे लकड़ी चीरने लगे ॥1॥ | Markandeya said: Then, the powerful Satyavan, along with his wife, collected fruits and filled a wooden basket. Afterwards, he began to chop wood. (1) |
| 136 | 3-20-297 | तस्य पाटयतः काष्ठं स्वेदो वै समजायत । व्यायामेन च तेनास्य जज्ञे शिरसि वेदना ॥2॥ सोऽभिगम्य प्रियां भार्यामुवाच श्रमपीडितः । |
लकड़ी चीरते समय परिश्रमके कारण उनके शरीरसे पसीना निकल आया और उसी परिश्रमसे उनके सिरमें दर्द होने लगा। तब वे श्रमसे पीड़ित हो अपनी प्यारी पत्नीके पास जाकर बोले ॥2-3॥ | While chopping wood, due to the exertion, sweat broke out on his body, and from that same exertion, his head began to ache. Then, afflicted by fatigue, he went to his beloved wife and spoke. (2-3) |
| 137 | 3-20-297 | सत्यवानुवाच व्यायामेन ममानेन जाता शिरसि वेदना ॥3॥ अङ्गानि चैव सावित्रि हृदयं दूयतीव च । अस्वस्थमिव चात्मानं लक्षये मितभाषिणि ॥4॥ शूलैरिव शिरो विद्धमिदं संलक्षयाम्यहम् । तत् स्वप्तुमिच्छे कल्याणि न स्थातुं शक्तिरस्ति मे ॥5॥ |
सत्यवानूने कहा-सावित्री! आज लकड़ी काटनेके परिश्रमसे मेरे सिरमें दर्द होने लगा है, सारे अंगोंमें पीड़ा हो रही है और हृदय दग्ध-सा होता जान पड़ता है। मितभाषिणी प्रिये! मै अपने-आपको अस्वस्थ-सा देख रहा हूँ। ऐसा जान पड़ता है, कोई शूलोंसे मेरे सिरको छेद रहा है। कल्याणि! अब मैं सोना चाहता हूँ। मुझमें खड़े रहनेकी शक्ति नहीं रह गयी है ॥3-5॥ | Satyavan said: Savitri! Today, from the exertion of chopping wood, my head has started to ache; all my limbs are in pain, and my heart feels as if it is burning. O soft-spoken beloved! I see myself as unwell. It seems as if someone is piercing my head with sharp stakes. O auspicious one! Now I want to sleep. I don't have the strength to stand. (3-5) |
| 138 | 3-20-297 | सा समासाद्य सावित्री भर्तारमुपगम्य च । उत्सङ्गेऽस्य शिरः कृत्वा निषसाद महीतले ॥6॥ |
यह सुनकर सावित्री शीघ्र अपने पतिके पास आयी और उनका सिर गोदीमें लेकर पृथ्वीपर बैठ गयी ॥6॥ | Hearing this, Savitri quickly came to her husband and, taking his head in her lap, sat down on the ground. (6) |
| 139 | 3-20-297 | ततः सा नारदवचो विमृशन्ती तपस्विनी । तं मुहूर्त क्षणं वेलां दिवसं च युयोज ह ॥7॥ |
फिर वह तपस्विनी राजकन्या नारदजीकी बात याद करके उस मुहूर्त, क्षण, समय और दिनका योग मिलाने लगी ॥7॥ | Then, that ascetic princess, remembering Narada's words, began to calculate the auspicious moment (muhurta), the instant (kshana), the time (vela), and the day. (7) |
| 140 | 3-20-297 | मुहूर्तादेव चापश्यत् पुरुषं रक्तवाससम् । बद्धमौलिं वपुष्मन्तमादित्यसमतेजसम् ॥8॥ श्यामावदातं रक्ताक्षं पाशहस्तं भयावहम् । स्थितं सत्यवतः पारश निरीक्षन्तं तमेव च ॥9॥ |
दो ही घड़ीमें उसने देखा, एक दिव्य पुरुष प्रकट हुए हैं, जिनके शरीरपर लाल रंगका वस्त्र शोभा पा रहा है। सिरपर मुकुट बंधा हुआ है। सूर्यके समान तेजस्वी होनेके कारण वे मूर्तिमान् सूर्य ही जान पड़ते हैं। उनका शरीर श्याम एवं उज्ज्वल प्रभासे उद्भासित है, नेत्र लाल हैं। उनके हाथमे पाश है। उनका स्वरूप डरावना है। वे सत्यवानूके पास खड़े हैं और बार-बार उन्हींकी ओर देख रहे हैं ॥ 8-9॥ | In just a couple of ghadis (a unit of time, about 24 minutes each), she saw a divine being appear, whose body was adorned with red-colored garments. A crown was tied on his head. Radiant like the sun, he appeared to be the sun incarnate. His body was dark and glowed with a bright aura; his eyes were red. He had a noose in his hand. His appearance was frightening. He was standing near Satyavan and repeatedly looking at him. (8-9) |
| 141 | 3-20-297 | तं दृष्ट्वा सहसोत्थाय भर्तुन्यस्य शनैः शिरः । कृताञ्जलिरुवाचार्ता हृदयेन प्रवेपती ॥10॥ |
उन्हें देखते ही सावित्रीने धीरेसे पतिका मस्तक भूमिपर रख दिया ओर सहसा खड़ी हो हाथ जोड़कर काँपते हुए हृदयसे वह आर्त वाणीमें बोली ॥10॥ | Upon seeing him, Savitri gently placed her husband's head on the ground and suddenly stood up. With folded hands, a trembling heart, and distressed voice, she spoke. (10) |
| 142 | 3-20-297 | सावित्र्युवाच दैवतं त्वाभिजानामि वपुरेतद्धयमानुषम् । कामया ब्रूहि देवेश कस्त्वं किं चिकीर्षसि ॥11॥ |
सावित्रीने कहा--मैं समझती हूँ, आप कोई देवता है; क्योंकि आपका यह शरीर मनुष्यों-जेसा नहीं है। देवेश्वर! यदि आपकी इच्छा हो तो बताइये आप कौन हैं और क्या करना चाहते हैं ॥11॥ | Savitri said: I believe you are a deity because your body is not like that of humans. O Lord of Gods! If it is your wish, tell me who you are and what you intend to do. (11) |
| 143 | 3-20-297 | यम उवाच पतिव्रतासि सावित्रि तथैव च तपोऽन्विता । अतस्त्वामभिभाषामि विद्धि मां त्वं शुभे यमम् ॥12॥ |
यमराज बोले-सावित्री! तू पतिव्रता और तपस्विनी है, इसलिये मैं तुझसे वार्तालाप कर सकता हूँ। शुभे! तू मुझे यमराज जान ॥12॥ | Yamraj said: Savitri! You are a devoted wife and an ascetic; therefore, I can converse with you. O auspicious one! Know me to be Yamraj. (12) |
| 144 | 3-20-297 | अयं ते सत्यवान् भर्ता क्षीणायुः पार्थिवात्मजः । नेष्यामि तमहं बद्ध्वा विद्धयेतन्मे चिकीर्षितम् ॥13॥ |
तेरे पति इस राजकुमार सत्यवानूकी आयु समाप्त हो गयी है, अतः मैं इसे बाँधकर ले जाऊँगा। बस, मैं यही करना चाहता हूँ ॥13॥ | Your husband, this prince Satyavan, his life has ended, so I will bind him and take him away. This is all I intend to do. (13) |
| 145 | 3-20-297 | सावित्र्युवाच श्रूयते भगवन् दूतास्तवागच्छन्ति मानवान् । नेतुं किल भवान् कस्मादागतोऽसि स्वयं प्रभो ॥14॥ |
सावित्रीने पूछा-भगवन्! मैने तो सुना है कि मनुष्योंको ले जानेके लिये आपके दूत आया करते हैं। प्रभो! आप स्वयं यहाँ कैसे चले आये? ॥14॥ | Savitri asked: Lord! I have heard that your messengers come to take humans. O Lord! How have you come here yourself? (14) |
| 146 | 3-20-297 | मार्कण्डेय उवाच इत्युक्तः पितृराजस्तां भगवान् स्वचिकीर्षितम् । यथावत् सर्वमाख्यातुं तत्प्रियार्थं प्रचक्रमे ॥15॥ |
मार्कण्डेयजी कहते हैं--युधिष्ठिर! सावित्रीके इस प्रकार पूछनेपर पितृराज भगवान् यमने उसका प्रिय करनेके लिये अपना सारा अभिप्राय यथार्थरूपसे बताना आरम्भ किया ॥15॥ | Markandeya said: O Yudhishthira! Upon Savitri's inquiry, the Lord of the Ancestors, Bhagavan Yama, began to explain his entire intention truthfully in order to please her. (15) |
| 147 | 3-20-297 | अयं च धर्मसंयुक्तो रूपवान् गुणसागरः । नार्हो मत्पुरुषैर्नेतुमतो ऽस्मि स्वयमागतः ॥16॥ |
“यह सत्यवान् धर्मात्मा, रूपवान् और गुणोंका समुद्र है। मेरे दूतोंद्वारा ले जाया जाने योग्य नहीं है। इसीलिये मैं स्वयं आया हूँ” ॥16॥ | "This Satyavan is righteous, handsome, and an ocean of virtues. He is not fit to be taken away by my messengers. That is why I have come myself." (16) |
| 148 | 3-20-297 | ततः सत्यवतः कायात् पाशबद्धं वशं गतम् । अङ्गुष्ठमात्रं पुरुषं निश्चकर्ष यमो बलात् ॥17॥ |
तदनन्तर यमराजने सत्यवानूके शरीरसे पाशमें बंधे हुए अंगुष्ठमात्र परिमाणवाले विवश हुए जीवको बलपूर्वक खींचकर निकाला ॥17॥ | Then, Yamraj forcibly extracted from Satyavan's body the thumb-sized, helpless soul, bound in a noose. (17) |
| 149 | 3-20-297 | ततः समुद्धृतप्राणं गतश्चासं हतप्रभम् । निर्विचेष्टं शरीरं तद् बभूवाप्रियदर्शनम् ॥18॥ |
फिर तो प्राण निकल जानेसे उसकी साँस बंद हो गयी-अंगकान्ति फीकी पड़ गयी और शरीर निश्चेष्ट होकर अपरूप दिखायी देने लगा ॥18॥ | Then, with the life-breath gone, his breathing stopped, his complexion faded, and his body became motionless and unsightly. (18) |
| 150 | 3-20-297 | यमस्तु तं ततो बद्ध्वा प्रयातो दक्षिणामुखः । सावित्री चैव दुःखार्ता यममेवान्वगच्छत । नियमव्रतसंसिद्धा महाभागा पतिव्रता ॥19॥ |
यमराज उस जीवको बाँधकर साथ लिये दक्षिण दिशाकी ओर चल दिये। सावित्री दुःखसे आतुर हो यमराजके ही पीछे-पीछे चल पड़ी। वह परम सौभाग्यवती पतिव्रता राजकन्या नियमपूर्वक व्रतोंके पालनसे पूर्णतः सिद्ध हो चुकी थी। (अतः निर्बाध गतिसे सर्वत्र आने-जानेमें समर्थ थी) ॥19॥ | Yamraj, taking that bound soul with him, proceeded towards the south. Savitri, distressed with sorrow, followed behind Yamraj. That supremely fortunate, devoted princess was completely perfected through the regular observance of vows. (Therefore, she was able to go and come everywhere without hindrance). (19) |
| 151 | 3-20-297 | यम उवाच निवर्त गच्छ सावित्रि कुरुष्वास्यौ्ध्वदेहिकम् । कृतं भर्तुस्त्वयाऽऽनृण्यं यावद् गम्यं गतं त्वया ॥20॥ |
यमराज बोले-सावित्री! अब तू लौट जा, सत्यवानूका अन्त्येष्टि-संस्कार कर। अब तू पतिके ऋणसे उऋण हो गयी। पतिके पीछे तुझे जहाँतक आना चाहिये था, तू वहाँतक आ चुकी ॥20॥ | Yamraj said: Savitri! Now turn back; go and perform Satyavan's last rites. You are now free from your husband's debt. You have come as far as you needed to come behind your husband. (20) |
| 152 | 3-20-297 | सावित्र्युवाच यत्र मे नीयते भर्ता स्वयं वा यत्र गच्छति । मया च तत्र गन्तव्यमेष धर्म: सनातनः ॥21॥ |
सावित्रीने कहा--जहाँ मेरे पति ले जाये जाते हैं अथवा ये स्वयं जहाँ जा रहे हैं, वहीं मुझे भी जाना चाहिये; यही सनातन धर्म है ॥21॥ | Savitri said: Wherever my husband is taken, or wherever he himself is going, I must also go there; this is the eternal Dharma. (21) |
| 153 | 3-20-297 | तपसा गुरुभक्त्या च भर्तुः स्नेहाद् व्रतेन च । तव चैव प्रसादेन न मे प्रतिहता गतिः ॥22॥ |
तपस्या, गुरुभक्ति, पतिप्रेम, व्रतपालन तथा आपकी कृपासे मेरी गति कहीं भी रुक नहीं सकती ॥22॥ | Through penance, devotion to my guru, love for my husband, observance of vows, and your grace, my progress is nowhere obstructed. (22) |
| 154 | 3-20-297 | प्राहुः साप्तपदं मैत्रं बुधास्तत्त्वार्थदर्शिन: । मित्रतां च पुरस्कृत्य किञ्चिद् वक्ष्यामि तच्छृणु ॥23॥ |
तत्त्वार्थदर्शी विद्वान् ऐसा कहते हैं कि सात पग साथ चलनेमात्रसे मैत्री-सम्बन्ध स्थापित हो जाता है, उसी मित्रताको सामने रखकर मैं आपसे कुछ निवेदन करूंगी, उसे सुनिये ॥23॥ | Truth-seeing scholars say that friendship is established by merely walking seven steps together. Keeping that friendship in mind, I will make a request to you; please listen. (23) |
| 155 | 3-20-297 | नानात्मवन्तस्तु वने चरन्ति धर्म च वासं च परिश्रमं च । विज्ञानतो धर्ममुदाहरन्ति तस्मात् सन्तो धर्ममाहुः प्रधानम् ॥24॥ |
जिन्होंने अपने मन और इन्द्रियोंको वशमें नहीं किया है, वे वनमें रहकर धर्मपालन, गुरुकुलवास तथा कष्टसहनरूप तपस्या नहीं कर सकते हैं। जितेन्द्रिय पुरुष ही यह सब कुछ करनेमें समर्थ हैं। महात्मालोग विवेक-विचारसे ही धर्म-प्राप्ति बताते हैं, अतः सभी सत्पुरुष धर्मको ही श्रेष्ठ मानते हैं ॥24॥ | Those who have not controlled their minds and senses cannot, while living in the forest, practice Dharma, reside in a Gurukul, or endure the hardships of penance. Only a self-controlled person is capable of all this. Great souls explain the attainment of Dharma through discernment; therefore, all virtuous people consider Dharma to be supreme. (24) |
| 156 | 3-20-297 | एकस्य धर्मेण सतां मतेन सर्वे स्म तं मार्गमनुप्रपन्नाः । मा वै द्वितीयं मा तृतीयं च वाञ्छे तस्मात् सन्तो धर्ममाहुः प्रधानम् ॥25॥ |
अपने एक ही वर्णके सत्पुरुष-सम्मत धर्मका पालन करनेसे सभी लोग उस विज्ञान- मार्गपर पहुँच जाते हैं, जो सबका लक्ष्य है। अतः दूसरे या तीसरे वर्णकी इच्छा नहीं रखनी चाहिये। इसलिये साधु पुरुष केवल वर्ण-धर्मको ही प्रधानता देते हैं ॥25॥ | By following the Dharma approved by virtuous people of one's own varna, everyone reaches that path of knowledge which is the goal of all. Therefore, one should not desire a second or third varna. For this reason, saintly people give প্রাধান্য (priority) only to varna-Dharma. (25) |
| 157 | 3-20-297 | यय उवाच निवर्त तुष्टोऽस्मि तवानया गिरा स्वराक्षरव्यञ्जनहेतुयुक्तया । वरं वृणीष्वेह विनास्य जीवितं ददानि ते सर्वमनिन्दिते वरम् ॥26॥ |
यमराज बोले-अनिन्दिते! तू लौट जा। स्वर, अक्षर, व्यंजन एवं युक्तियोंसे युक्त तेरी इन बातोंसे मैं बहुत प्रसन्न हूँ। तू यहाँ मुझसे कोई वर माँग ले। सत्यवानके जीवनके सिवा मैं और सब कुछ तुझे दे सकता हूँ ॥26॥ | Yamraj said: O blameless one! Turn back. I am very pleased with these words of yours, যুক্ত (endowed) with स्वर (musical notes), अक्षर (syllables), व्यंजन (consonants), and logic. Ask for a boon from me here. Except for Satyavan's life, I can give you anything else. (26) |
| 158 | 3-20-297 | सावित्र्युवाच च्युतः स्वराज्याद् वनवासमाश्रितो विनष्टचक्षुः श्वशुरो ममाश्रमे । स लब्धचक्षुर्बलवान् भवेन्नृप- स्तव प्रसादाज्ज्वलनार्कसंनिभ: ॥27॥ |
सावित्री बोली-भगवन्! मेरे श्वशुर अपने राज्यसे भ्रष्ट होकर वनमें रहते हैं। उनकी आँखें भी नष्ट हो गयी हैं। मैं चाहती हूँ, आपकी कृपासे उन महाराजको उनकी आँखें मिल जायँ और वे बलवान् तथा अग्नि एवं सूर्यके समान तेजस्वी हो जाये ॥27॥ | Savitri said: Lord! My father-in-law has been deposed from his kingdom and lives in the forest. His eyes have also been destroyed. I wish that, by your grace, the king may regain his eyes and become strong and radiant like fire and the sun. (27) |
| 159 | 3-20-297 | यम उवाच ददानि तेऽहं तमनिन्दिते वरं यथा त्वयोक्तभविता च तत् तथा । तवाध्वना ग्लानिमिवोपलक्षये निवर्त गच्छस्व न ते श्रमो भवेत् ॥28॥ |
यमराज बोले-अनिन्दिते! मैं तुझे वर देता हूँ। तूने जैसा कहा है, वह सब वैसा ही होगा। मैं देखता हूँ, तू राह चलनेके कारण बहुत थक गयी है। अब लौट जा, जिससे तुझे अधिक परिश्रम न हो ॥28॥ | Yamraj said: O blameless one! I grant you this boon. Everything will happen as you have said. I see that you are very tired from walking. Now return, so that you do not have to exert yourself further. (28) |
| 160 | 3-20-297 | सावित्र्युवाच श्रमः कुतो भर्तृसमीपतो हि मे यतो हि भर्ता मम सा गतिर्ध्रुवा । यतः पतिं नेष्यसि तत्र मे गतिः सुरेश भूयश्च वचो निबोध मे ॥29॥ |
सावित्री बोली-स्वामीके समीप रहते हुए मुझे श्रम हो ही कैसे सकता है। जहाँ मेरे पतिदेव रहेंगे, वहीं मेरी भी गति निश्चित है। आप जहाँ मेरे प्राणनाथको ले जायेंगे, वहीं मेरा जाना भी अवश्यम्भावी है। देवेश्वर! आप फिर मेरी बात सुनिये ॥29॥ | Savitri said: How can I feel fatigue while near my husband? Wherever my lord is, there is my destination. Wherever you take my life-breath (husband), there my going is also inevitable. O Lord of Gods! Listen again to my words. (29) |
| 161 | 3-20-297 | सतां सकृत्संगतमीप्सितं परं ततः परं मित्रमिति प्रचक्षते । न चाफलं सत्पुरुषेण सङ्गतं ततः सतां सन्निवसेत् समागमे ॥30॥ |
सत्पुरुषोंका एक बारका समागम भी अत्यन्त अभीष्ट होता है। उनके साथ मित्रता हो जाना उससे भी बढ़कर बताया गया है। साधु पुरुषका संग कभी निष्फल नहीं होता; अतः सदा सत्पुरुषोंके ही समीप रहना चाहिये ॥30॥ | Even a single meeting with the virtuous is highly desirable. Becoming friends with them is said to be even greater. The company of a saintly person is never fruitless; therefore, one should always remain in the company of the virtuous. (30) |
| 162 | 3-20-297 | यय उवाच मनोऽनुकूलं बुधबुद्धिवर्धनं त्वया यदुक्तं वचनं हिताश्रयम् । विना पुनः सत्यवतोऽस्य जीवितं वरं द्वितीयं वरयस्व भामिनि ॥31॥ |
यमराज बोले-भामिनी! तूने जो सबके हितकी बात कही है, वह मेरे मनके अनुकूल है तथा विद्वानोंकी भी बुद्धिको बढ़ानेवाली है; अतः इस सत्यवानूके जीवनको छोड़कर तू दूसरा कोई वर और माँग ले ॥31॥ | Yamraj said: O beautiful one! The words you have spoken for the benefit of all are pleasing to my mind and enhance the wisdom of the wise; therefore, ask for another boon, other than the life of this Satyavan. (31) |
| 163 | 3-20-297 | सावित्र्युवाच हृतं पुरा मे श्वशुरस्य धीमतः स्वमेव राज्यं लभतां स पार्थिवः । जह्यात् स्वधर्म न च मे गुरुर्यथा द्वितीयमेतद् वरयामि ते वरम् ॥32॥ |
सावित्री बोली--मेरे बुद्धिमान् श्वशुरका राज्य, जो पहले उनसे छीन लिया गया है, उसे वे महराज पुनः प्राप्त कर लें तथा वे मेरे पूज्य गुरु महाराज द्युमत्सेन कभी अपना धर्म न छोड़ें; यही दूसरा वर मैं आपसे माँगती हूँ ॥32॥ | Savitri said: May my wise father-in-law regain his kingdom, which was previously taken from him, and may my revered guru, Maharaj Dyumatsena, never forsake his Dharma; this is the second boon I ask of you. (32) |
| 164 | 3-20-297 | यम उवाच स्वमेव राज्यं प्रतिपत्स्यतेऽचिरा- न्न च स्वधर्मात् परिहास्यते नृपः । कृतेन कामेन मया नृपात्मजे निवर्त गच्छस्व न ते श्रमो भवेत् ॥33॥ |
यमराज बोले--राजा द्युमत्सेन शीघ्र एवं अनायास ही अपना राज्य प्राप्त कर लेंगे और वे कभी अपने धर्मका भी परित्याग नहीं करेंगे। राजकुमारी! मेरेद्वारा अब तेरी इच्छा पूरी हो गयी। तू लौट जा, जिससे तुझे परिश्रम न हो ॥33॥ | Yamraj said: King Dyumatsena will quickly and easily regain his own kingdom, and he will never abandon his Dharma. O princess! Your wish has now been fulfilled by me. Return, so that you do not become fatigued. (33) |
| 165 | 3-20-297 | सावित्र्युवाच प्रजास्त्वयैता नियमेन संयता नियम्य चैता नयसे निकामया । ततो यमत्वं तव देव विश्रुतं निबोध चेमां गिरमीरितां मया ॥34॥ |
सावित्री बोली-देव! इस सारी प्रजाको आप नियमसे संयममें रखते हैं और उसका नियमन करके आप अपनी इच्छाके अनुसार उसे विभिन्न लोकोंमें ले जाते हैं। इसीलिये आपका "यम" नाम सर्वत्र विख्यात है। मै जो बात कहती हूँ, उसे सुनिये ॥34॥ | Savitri said: O God! You keep all this creation restrained by rules, and by regulating it, you lead it to different worlds according to your will. That is why your name "Yama" is renowned everywhere. Listen to what I say. (34) |
| 166 | 3-20-297 | अद्रोहः सर्वभूतेषु कर्मणा मनसा गिरा । अनुग्रहश्च दानं च सतां धर्मः सनातनः ॥35॥ |
मन, वाणी और क्रियाद्वारा किसी भी प्राणीसे द्रोह न करना, सबपर दयाभाव बनाये रखना और दान देना यह साधु पुरुषोंका सनातन धर्म है ॥35॥ | Not harming any being through mind, speech, and action, maintaining compassion for all, and giving in charity – this is the eternal Dharma of saintly people. (35) |
| 167 | 3-20-297 | एवंप्रायश्च लोकोऽयं मनुष्याः शक्तिपेशला: । सन्तस्त्वेवाप्यमित्रेषु दयां प्राप्तेषु कुर्वते ॥36॥ |
प्रायः इस संसारके लोग अल्पायु होते हैं, मनुष्योंकी शक्तिहीनता तो प्रसिद्ध ही है। आप-जैसे संत-महात्मा तो अपनी शरणमे आये हुए शत्रुओंपर भी दया करते हैं। (फिर हम- जैसे दीन मनुष्योपर दया क्यों न करेंगे?) ॥36॥ | Generally, people in this world are short-lived; the weakness of humans is well known. Saints like you show compassion even to enemies who have come to you for refuge. (Then why not show compassion to humble people like us?) (36) |
| 168 | 3-20-297 | यय उवाच पिपासितस्येव भवेद् यथा पय- स्तथा त्वया वाक्यमिदं समीरितम् । विना पुनः सत्यवतोऽस्य जीवितं वरं वृणीष्वेह शुभे यदिच्छसि ॥37॥ |
यमराज बोले-शुभे! जैसे प्यासे मनुष्यको प्राप्त हुआ जल आनन्ददायक होता है, उसी प्रकार तेरी कही हुई यह बात मुझे अत्यन्त सुख दे रही है। अतः तू सत्यवानूके जीवनके सिवा और कोई वर, जिसे तू लेना चाहे, माँग ले ॥37॥ | Yamraj said: O auspicious one! Just as water received by a thirsty person is delightful, so too are these words spoken by you extremely pleasing to me. Therefore, ask for another boon, whichever you wish to receive, except for the life of Satyavan. (37) |
| 169 | 3-20-297 | सावित्र्युवाच ममानपत्यः पृथिवीपतिः पिता भवेत् पितुः पुत्रशतं तथौरसम् | कुलस्य सन्तानकरं च यद् भवेत् तृतीयमेतद् वरयामि ते वरम् ॥38॥ | सावित्रीने कहा-भगवन्! मेरे पिता महाराज अश्वपति पुत्रहीन हैं; उन्हें सौ ऐसे औरस पुत्र प्राप्त हों, जो उनके कुलकी संतानपरम्पराको चलानेवाले हों। मैं आपसे यही तीसरा वर माँगती हूँ ॥38॥ | Savitri said: Lord! My father, Maharaj Ashwapati, is sonless; may he obtain a hundred such legitimate sons who will continue the lineage of his family. This is the third boon I ask of you. (38) |
| 170 | 3-20-297 | यम उवाच कुलस्य सन्तानकरं सुवर्चसं शतं सुतानां पितुरस्तु ते शुभे । कृतेन कामेन नराधिपात्मजे निवर्त दूरं हि पथस्त्वमागता ॥39॥ |
यमराज बोले--शुभे! तेरे पिताके कुलकी संतान-परम्पराको चलानेवाले सौ तेजस्वी पुत्र होंगे। राजकुमारी! तेरी यह कामना भी पूरी हुई। अब लौट जा, तू रास्तेसे बड़ी दूर चली आयी है ॥39॥ | Yamraj said: O auspicious one! Your father will have a hundred radiant sons who will continue the lineage of his family. O princess! This wish of yours is also fulfilled. Now return; you have come a long way from the path. (39) |
| 171 | 3-20-297 | सावित्रयुवाच न दूरमेतन्मम भर्तृसंनिधौ मनो हि मे दूरतरं प्रधावति । अथ व्रजन्नेव गिरं समुद्यतां मयोच्यमानां शृणु भूय एव च ॥40॥ |
सावित्रीने कहा-भगवन्! मैं अपने स्वामीके समीप हूँ। इसलिये यह स्थान मेरे लिये दूर नहीं है। मेरा मन तो और भी दूरतक दौड़ लगाता है। आप चलते-चलते ही मेरी कही हुई ये प्रस्तुत बातें पुनः सुनें ॥40॥ | Savitri said: Lord! I am near my husband. Therefore, this place is not far for me. My mind runs even further. While you are walking, listen again to these presented words of mine. (40) |
| 172 | 3-20-297 | विवस्वतस्त्वं तनयः प्रतापवां- स्ततो हि वैवस्वत उच्यसे बुधैः । समेन धर्मेण चरन्ति ताः प्रजा- स्ततस्तवेहेश्चर धर्मराजता ॥41॥ |
देवेश्वर! आप विवस्वान् (सूर्य)-के प्रतापी पुत्र हैं; इसलिये विद्वान् पुरुष आपको वैवस्वत कहते हैं। आप समस्त प्रजाके साथ समतापूर्वक धर्मानुसार आचरण करते हैं, इसलिये आप धर्मराज कहलाते हैं ॥41॥ | O Lord of Gods! You are the glorious son of Vivasvan (the Sun); therefore, wise men call you Vaivasvata. You treat all beings equally according to Dharma; therefore, you are called Dharmaraj here. (41) |
| 173 | 3-20-297 | आत्मन्यपि न विश्वासस्तथा भवति सत्सु यः । तस्मात् सत्सु विशेषेण सर्वः प्रणयमिच्छति ॥42॥ |
मनुष्यको अपने-आपपर भी उतना विश्वास नहीं होता है, जितना संतोंपर होता है। इसलिये सब लोग संतोंसे विशेष प्रेम करना चाहते हैं ॥42॥ | A person does not have as much trust even in himself as he has in saints. Therefore, everyone wants to have special affection from saints. (42) |
| 174 | 3-20-297 | सौहृदात् सर्वभूतानां विश्वासो नाम जायते । तस्मात् सत्सु विशेषेण विश्वासं कुरुते जनः ॥43॥ |
सौहार्दसे ही समस्त प्राणियोंका एक-दूसरेके प्रति विश्वास उत्पन्न होता है। संतोंमें सौहार्द होनेके कारण ही सब लोग उनपर अधिक विश्वास करते हैं ॥43॥ | Trust arises among all beings through goodwill. Because saints possess goodwill, everyone trusts them more. (43) |
| 175 | 3-20-297 | यय उवाच उदाहतं ते वचनं यदङ्गने शुभे न तादृक् त्वदृते श्रुतं मया । अनेन तुष्टोऽस्मि विनास्य जीवितं वरं चतुर्थ वरयस्व गच्छ च ॥44॥ |
यमराज बोले-कल्याणि! तूने जेसी बात कही है, वैसी मैंने तेरे सिवा किसी दूसरेके मुखसे नहीं सुनी है। शुभे! तेरी इस बातसे मैं बहुत संतुष्ट हूँ; तू सत्यवान्के जीवनके सिवा और कोई चौथा वर माँग ले और यहाँसे लौट जा ॥44॥ | Yamraj said: O virtuous one! I have not heard such words as you have spoken from anyone else but you. O auspicious one! I am very pleased with these words of yours; ask for a fourth boon, except for the life of Satyavan, and return from here. (44) |
| 176 | 3-20-297 | सावित्र्युवाच ममात्मजं सत्यवतस्तथौरसं भवेदुभाभ्यामिह यत् कुलोद्वहम् । शतं सुतानां बलवीर्यशालिना- मिदं चतुर्थ वरयामि ते वरम् ॥45॥ |
सावित्रीने कहा- मेरे और सत्यवान्-दोनोंके संयोगसे कुलकी वृद्धि करनेवाले, बल और पराक्रमसे सुशोभित सौ औरस पुत्र हों। यह मैं आपसे चौथा वर माँगती हूँ ॥45॥ | Savitri said: May a hundred legitimate sons, enhancing the lineage, strong and valiant, be born from the union of myself and Satyavan. This is the fourth boon I ask of you. (45) |
| 177 | 3-20-297 | यय उवाच शतं सुतानां बलवीर्यशालिनां भविष्यति प्रीतिकरं तवाबले । परिश्रमस्ते न भवन्नृपात्मजे निवर्त दूरं हि पथस्त्वमागता ॥46॥ |
यमराज बोले- अबले] तुझे बल और पराक्रमसे सम्पन्न सौ पुत्र प्राप्त होंगे; जो तेरी प्रसन्नताको बढ़ानेवाले होंगे। राजकुमारी! अब तू लौट जा, जिससे तुझे थकावट न हो। तू रास्तेसे बहुत दूर चली आयी है ॥46॥ | Yamraj said: O slender one! You will have a hundred strong and valiant sons, who will increase your happiness. O princess! Now return, so that you do not become tired. You have come a long way from the path. (46) |
| 178 | 3-20-297 | सावित्र्युवाच सतां सदा शाश्चतधर्मवृत्तिः सन्तो न सीदन्ति न च व्यथन्ति । सतां सद्भिर्नाफलः सङ्गमोऽस्ति सद्भयो भयं नानुवर्तन्ति सन्तः ॥47॥ |
सावित्रीने कहा-सत्पुरुषोंकी वृत्ति निरन्तर धर्ममें ही लगी रहती है। श्रेष्ठ पुरुष कभी दुःखी या व्यथित नहीं होते। सत्पुरुषोंका संतोंके साथ जो समागम होता है, वह कभी निष्फल नहीं होता है। श्रेष्ठ पुरुष संतोंसे कभी भय नहीं मानते हैं ॥47॥ | Savitri said: The conduct of the virtuous is always constantly engaged in Dharma. Noble people are never distressed or afflicted. The association of the virtuous with saints is never fruitless. Noble people are never afraid of saints. (47) |
| 179 | 3-20-297 | सन्तो हि सत्येन नयन्ति सूर्य सन्तो भूमिं तपसा धारयन्ति । सन्तो गतिर्भूत भव्यस्य राजन् सतां मध्ये नावसीदन्ति सन्तः ॥48॥ |
श्रेष्ठ पुरुष सत्यके बलसे सूर्यका संचालन करते हैं। संत-महात्मा अपनी तपस्यासे इस पृथ्वीको धारण करते हैं। राजन्! सत्पुरुष ही भूत, वर्तमान और भविष्यके आश्रय हैं। श्रेष्ठ पुरुष संतोंके बीचमें रहकर कभी दुःख नहीं उठाते हैं ॥48॥ | Noble people move the sun with the power of truth. Saints support this earth with their penance. O King! Saints are the refuge of the past, present, and future. Noble people, living among saints, never suffer. (48) |
| 180 | 3-20-297 | आर्यजुष्टमिदं वृत्तमिति विज्ञाय शाश्वतम् । सन्तः परार्थ कुर्वाणा नावेक्षन्ति परस्परम् ॥49॥ |
यह सनातन सदाचार सत्पुरुषोंद्वारा सेवित है। यह जानकर सभी श्रेष्ठ पुरुष परोपकार करते हैं और आपसमें एक-दूसरेकी ओर स्वार्थकी दृष्टिसे कभी नहीं देखते हैं ॥49॥ | This eternal good conduct is practiced by the virtuous. Knowing this, all noble people perform acts of benevolence and never look at each other with a selfish perspective. (49) |
| 181 | 3-20-297 | न च प्रसादः सत्पुरुषेषु मोघो न चाप्यर्थो नश्यति नापि मानः । यस्मादेतन्नियतं सत्सु नित्यं तस्मात् सन्तो रक्षितारो भवन्ति ॥50॥ |
सत्पुरुषोंका प्रसाद कभी व्यर्थ नहीं जाता। वहाँ किसीको स्वार्थकी हानि नहीं उठानी पड़ती है और न मान-सम्मान ही नष्ट होता है। ये तीनों (प्रसाद, अर्थ और मान) संतोंमें नित्य-निरन्तर बने रहते हैं; इसलिये वे सम्पूर्ण जगत्के रक्षक होते हैं ॥50॥ | The grace of virtuous people is never in vain. There, no one suffers the loss of their self-interest, nor is their honor diminished. These three (grace, self-interest, and honor) are constantly present in saints; therefore, they are the protectors of the entire world. (50) |
| 182 | 3-20-297 | यय उवाच यथा यथा भाषसि धर्मसंहितं मनोऽनुकूलं सुपदं महार्थवत् । तथा तथा मे त्वयि भक्तिरुत्तमा वरं वृणीष्वाप्रतिमं पतिव्रते ॥51॥ |
यमराज बोले-पतिव्रते! जैसे-जैसे तू गम्भीर अर्थसे युक्त और सुन्दर पदोंसे विभूषित, मनके अनुकूल धर्मसंगत बातें मुझे सुनाती जा रही है, वैसे-ही-वैसे तेरे प्रति मेरी उत्तम भक्ति बढ़ती जाती है; अतः तू मुझसे कोई अनुपम वर माँग ले ॥51॥ | Yamraj said: O devoted wife! The more you speak words that are full of deep meaning, adorned with beautiful phrases, pleasing to the mind, and in accordance with Dharma, the more my excellent devotion to you increases; therefore, ask for an incomparable boon from me. (51) |
| 183 | 3-20-297 | सावित्र्युवाच न तेऽपवर्गः सुकृताद् विनाकृत- स्तथा यथान्येषु वरेषु मानद । वरं वृणे जीवतु सत्यवानयं यथा मृता होवमहं पतिं विना ॥52॥ |
सावित्रीने कहा-मानद! आपने मुझे जो पुत्र-प्राप्तिका वर दिया है, वह पुण्यमय दाम्पत्य-संयोगके बिना सफल नहीं हो सकता। अन्य वरोंकी जेसी स्थिति है, वैसी इस अन्तिम वरकी नहीं है। इसलिये मैं पुन: यह वर माँगती हूँ कि ये सत्यवान् जीवित हो जायं; क्योंकि इन पतिदेवताके बिना मैं मरी हुईके ही समान हूँ ॥52॥ | Savitri said: O bestower of honor! The boon of son- प्राप्ति (son-attainment) that you have given me cannot be fulfilled without a virtuous marital union. The condition of this final boon is not like that of the other boons. Therefore, I again ask for this boon: that this Satyavan may live; because without this husband of mine, I am as good as dead. (52) |
| 184 | 3-20-297 | न कामये भर्तृविनाकृता सुखं न कामये भर्तृविनाकृता दिवम् । न कामये भर्तृविनाकृता श्रियं न भर्तृहीना व्यवसामि जीवितुम् ॥53॥ |
पतिके बिना यदि कोई सुख मिलता है तो वह मुझे नहीं चाहिये। पतिदेवके बिना मैं स्वर्गलोकमें भी जानेकी इच्छा नहीं रखती। पतिके बिना मुझे धन-सम्पत्तिकी भी इच्छा नहीं है। अधिक क्या कहूँ, मैं पतिके बिना जीवित रहना भी नहीं चाहती ॥53॥ | I do not desire happiness without my husband; I do not desire to go to heaven without my husband. I do not desire wealth without my husband. What more can I say? I do not even wish to live without my husband. (53) |
| 185 | 3-20-297 | वरातिसर्गः शतपुत्रता मम त्वयैव दत्तो ह्वियते च मे पतिः । वरं वृणे जीवतु सत्यवानयं तवैव सत्यं वचनं भविष्यति ॥54॥ |
आपने ही मुझे सौ पुत्र होनेका वर दिया है और आप ही मेरे पतिको अन्यत्र लिये जा रहे हैं; अतः मैं वही वर माँगती हूँ कि ये सत्यवान् जीवित हो जायं, इससे आपका ही वचन सत्य होगा ॥54॥ | You yourself have given me the boon of having a hundred sons, and yet you are taking my husband elsewhere; therefore, I ask for that same boon: that this Satyavan may live. By this, your own words will be true. (54) |
| 186 | 3-20-297 | मार्कण्डेय उवाच तथेत्युक्त्वा तु तं पाश मुक्त्वा वैवस्वतो यमः । धर्मराजः प्रहृष्टात्मा सावित्रीमिदमब्रवीत् ॥55॥ |
मार्कण्डेयजी कहते हैं—युधिष्ठिर! तदनन्तर "तथास्तु" कहकर सूर्यपुत्र धर्मराज यमने सत्यवानूका बन्धन खोल दिया और प्रसन्नचित्त होकर सावित्रीसे इस प्रकार कहा-- | Markandeya said: O Yudhishthira! Then, saying "So be it," the son of the Sun, Dharmaraj Yama, released Satyavan's bonds and, with a delighted heart, spoke to Savitri in this way: |
| 187 | 3-20-297 | एष भद्रे मया मुक्तो भर्ता ते कुलनन्दिनि । (तोषितोऽहं त्वया साध्वि वावयैर्धर्मार्थसंहितैः । ) अरोगस्तव नेयश्च सिद्धार्थः स भविष्यति ॥56॥ |
"भद्रे! यह ले, मैंने तेरे पतिको छोड़ दिया। कुलनन्दिनी! तूने अपने धर्मार्थयुक्त वचनोंद्वारा मुझे पूर्ण संतुष्ट कर दिया है। साध्वी! यह सत्यवान् नीरोग, सफल-मनोरथ तथा तेरे द्वारा ले जानेयोग्य हो गया ॥56॥ | "O virtuous one! Here, I have released your husband. O delighter of your lineage! You have completely satisfied me with your words, which are in accordance with Dharma and its objectives. O virtuous one! This Satyavan has become free from disease, successful in his endeavors, and fit to be taken by you. (56) |
| 188 | 3-20-297 | चतुर्वर्षशतायुश्च त्वया सार्धमवाप्स्यति । इष्ट्वा यज्ञैश्च धर्मेण ख्यातिं लोके गमिष्यति ॥57॥ |
“यह तेरे साथ रहकर चार सौ वर्षोकी आयु प्राप्त करेगा। यज्ञोद्धारा भगवानका यजन करके यह अपने धर्माचरणके द्वारा सम्पूर्ण विश्वमे विख्यात होगा ॥57॥ | "He will attain a lifespan of four hundred years together with you. Worshipping God through sacrifices, he will attain fame in the entire world through his righteous conduct. (57) |
| 189 | 3-20-297 | त्वयि पुत्रशतं चैव सत्यवान् जनयिष्यति । ते चापि सर्वे राजानः क्षत्रियाः पुत्रपौत्रिणः ॥58॥ |
'सत्यवान् तेरे गर्भसे सौ पुत्र उत्पन्न करेगा और वे सभी राजकुमार राजा होनेके साथ ही पुत्र-पौत्रोंसे सम्पन्न होंगे ॥58॥ | Satyavan will beget a hundred sons through you, and all those princes will be kings, and also have sons and grandsons. (58) |
| 190 | 3-20-297 | ख्यातास्त्वन्नामधेयाश्च भविष्यन्तीह शाश्चताः । पितुश्च ते पुत्रशतं भविता तव मातरि ॥59॥ |
'तेरे ही नामसे उनकी सदा ख्याति होगी अर्थात् वे सावित्र नामसे प्रसिद्ध होंगे। तेरे पिताके भी तेरी माताके ही गर्भसे सौ पुत्र होंगे ॥59॥ | They will always be famous by your name, that is, they will be known as Savitras. Your father will also have a hundred sons through your mother. (59) |
| 191 | 3-20-297 | मालव्यां मालवा नाम शाश्चताः पुत्रपौत्रिणः । भ्रातरस्ते भविष्यन्ति क्षत्रियास्त्रिदशोपमाः ॥60॥ |
यम-सावित्री “वे तेरी माता मालवीसे उत्पन्न होनेके कारण मालव नामसे विख्यात होंगे। तेरे भाई मालव क्षत्रिय पुत्र-पौत्रोंसे सम्पन्न तथा देवताओंके समान तेजस्वी होंगे” ॥60॥ | Yama-Savitri: "They will be renowned as Malavas because they will be born of your mother, Malavi. Your brothers, the Malava Kshatriyas, will be endowed with sons and grandsons and will be as brilliant as the gods." (60) |
| 192 | 3-20-297 | एवं तस्यै वरं दत्त्वा धर्मराजः प्रतापवान् । निवर्तयित्वा सावित्रीं स्वमेव भवनं ययौ ॥61॥ |
सावित्रीको इस प्रकार वरदान दे प्रतापी धर्मराज उसे लौटाकर अपने लोकको चले गये ॥61॥ | Thus giving Savitri this boon, the glorious Dharmaraj sent her back and went to his own abode. (61) |
| 193 | 3-20-297 | सावित्र्यपि यमे याते भर्तारं प्रतिलभ्य च । जगाम तत्र यत्रास्या भर्तुः शावं कलेवरम् ॥62॥ |
यमराजके चले जानेपर सावित्री अपने पतिको पाकर उसी स्थानपर गयी: जहाँ पतिका मृत शरीर पड़ा था ॥62॥ | After Yamaraj's departure, Savitri, having regained her husband, went to the place where her husband's dead body lay. (62) |
| 194 | 3-20-297 | सा भूमौ प्रेक्ष्य भर्तारमुपसुत्योपगृह्या च । उत्सङ्गे शिर आरोप्य भूमावुपविवेश ह ॥63॥ |
वह पृथ्वीपर अपने पतिको पड़ा देख उनके पास गयी और पृथ्वीपर बैठ गयी, फिर पतिको उठाकर उसने उनके मस्तकको गोदीमें रख लिया ॥63॥ | Seeing her husband lying on the ground, she went to him, sat on the ground, and then, lifting her husband, she placed his head on her lap. (63) |
| 195 | 3-20-297 | संज्ञां च स पुनर्लब्ध्वा सावित्रीमभ्यभाषत । प्रोष्यागत इव प्रेम्णा पुनः पुनरुदीक्ष्य वै ॥64॥ |
तदनन्तर पुनः चेतना प्राप्त करके सत्यवान् परदेशमें रहकर लौटे हुए पुरुषकी भाँति बार-बार प्रेमपूर्वक सावित्रीकी ओर देखते हुए उससे बोले ॥64॥ | Then, regaining consciousness, Satyavan, like a man who had returned after living abroad, repeatedly looked at Savitri with love and spoke to her. (64) |
| 196 | 3-20-297 | सत्यवानुवाच सुचिरं बत सुप्तोऽस्मि किमर्थ नावबोधितः । क्व चासौ पुरुषः श्यामो योऽसौ मां संचकर्ष ह ॥65॥ |
सत्यवानूने कहा--प्रिये! खेद है कि मैं बहुत देरतक सोता रह गया। तुमने मुझे जगा क्यों नहीं दिया? वे श्यामवर्णके पुरुष कहाँ हैं जिन्होंने मुझे खींचा था? ॥65॥ | Satyavan said: Beloved! Alas, I have slept for a long time. Why didn't you wake me up? Where are those dark-complexioned men who were pulling me? (65) |
| 197 | 3-20-297 | सावित्र्युवाच सुचिरं त्वं प्रसुप्तोऽसि ममाङ्के पुरुषर्षभ । गतः स भगवान् देवः प्रजासंयमनो यमः ॥66॥ |
सावित्री बोली- नरश्रेष्ठ! आप मेरी गोदमें बहुत देरतक सोते रह गये। वे श्यामवण्कि पुरुष प्रजाको संयममे रखनेवाले साक्षात् भगवान् यम थे, जो अब चले गये हैं ॥66॥ | Savitri said: O best of men! You slept for a long time in my lap. Those dark-complexioned men were the very Bhagavan Yama, the controller of beings, who have now departed. (66) |
| 198 | 3-20-297 | विश्रान्तोऽसि महाभाग विनिद्रश्च नृपात्मज । यदि शक्यं समुत्तिष्ठ विगाढां पश्य शर्वरीम् ॥67॥ |
महाभाग! आपने विश्राम कर लिया। राजकुमार! अब आपकी नींद भी टूट चुकी है। यदि शक्ति हो तो उठिये; देखिये, प्रगाढ़ अन्धकारसे युक्त रात्रि हो गयी है ॥67॥ | O noble one! You have rested. O prince! Now your sleep has also broken. If you have the strength, get up; see, the night is filled with deep darkness. (67) |
| 199 | 3-20-297 | मार्कण्डेय उवाच उपलभ्य ततः संज्ञां सुखसुप्त इवोत्थितः । दिशः सर्वा वनान्तांश्च निरीक्ष्योवाच सत्यवान् ॥68॥ फलाहारोऽस्मि निष्क्रान्तस्त्वया सह सुमध्यमे । ततः पाटयतः काष्ठं शिरसो मे रुजाभवत् ॥69॥ |
मार्कण्डेयजी कहते है--युधिष्ठिर! तब होशमें आकर सत्यवान् सुखपूर्वक सोये हुए पुरुषकी भाँति उठकर सम्पूर्ण दिशाओं तथा वनप्रान्तकी ओर दृष्टि डालकर बोले --'सुमध्यमे! मैं फल लानेके लिये तुम्हारे साथ घरसे निकला था, फिर लकड़ी चीरते समय मेरे सिरमें जोर-जोरसे दर्द होने लगा था ॥ 68-69॥ | Markandeya says: O Yudhishthira! Then, regaining consciousness, Satyavan, like a man who had slept soundly, got up, looked in all directions and at the edge of the forest, and said, 'O slender-waisted one! I had set out with you to fetch fruits, and then, while chopping wood, a severe pain arose in my head. (68-69) |
| 200 | 3-20-297 | शिरोऽभितापसंतप्तः स्थातुं चिरमशवनुवन् । तवोत्सङ्गे प्रसुप्तोऽस्मि इति सर्व स्मरे शुभे ॥70॥ |
“शुभे! मस्तककी उस पीड़ासे संतप्त हो मैं देरतक खड़ा रहनेमें असमर्थ हो गया और तुम्हारी गोदमें सिर रखकर सो रहा। ये सारी बातें मुझे क्रमश: याद आ रही हैं ॥70॥ | “O auspicious one! Tormented by that pain in my head, I was unable to stand for long and fell asleep with my head in your lap. I remember all these things in sequence. (70) |
| 201 | 3-20-297 | त्वयोपगूढस्य च मे निद्रयापहृतं मनः । ततोऽपश्यं तमो घोरं पुरुषं च महौजसम् ॥71॥ |
“तुम्हारे अंगोंका स्पर्श होनेसे मेरा मन नींदमें खो गया। तत्पश्चात् मुझे घोर अंधकार दिखायी दिया। साथ ही एक महातेजस्वी दिव्य पुरुषका दर्शन हुआ ॥71॥ | “When you embraced me, my mind was lost in sleep. Afterwards, I saw a terrible darkness. I also saw a divine being of great splendor. (71) |
| 202 | 3-20-297 | तद् यदि त्वं विजानासि किं तद् ब्रूहि सुमध्यमे । स्वप्नो मे यदि वा दृष्टो यदि वा सत्यमेव तत् ॥72॥ |
“सुमध्यमे! यदि तुम जानती हो तो बताओ; वह सब क्या था? मैंने जो कुछ देखा है वह स्वप्न तो नहीं था? अथवा वह सब सत्य ही था” ॥72॥ | “O slender-waisted one! If you know, tell me; what was all that? Was what I saw a dream? Or was it all real?” (72) |
| 203 | 3-20-297 | तमुवाचाथ सावित्री रजनी व्यवगाहते । श्वस्ते सर्व यथावृत्तमाख्यास्यामि नृपात्मज ॥73॥ |
तब सावित्री उनसे बोली-राजकुमार! रात बढ़ती जा रही है। कल सबेरे मैं आपसे सब बातें ठीक-ठीक बताऊँगी ॥73॥ | Then Savitri said to him, "O prince! The night is deepening. Tomorrow morning, I will tell you everything exactly as it happened." (73) |
| 204 | 3-20-297 | उत्तिष्ठोत्तिष्ठ भद्रं ते पितरौ पश्य सुव्रत । विगाढा रजनी चेयं निवृत्तश्च दिवाकरः ॥74॥ |
“सुव्रत! उठिये, उठिये, आपका कल्याण हो। आप चलकर माता-पिताका दर्शन तो कीजिये। सूर्य डूब गये तथा रात घनी हो गयी है ॥74॥ | “O virtuous one! Get up, get up, may you be blessed. Go and see your parents. The sun has set, and the night has become dense." (74) |
| 205 | 3-20-297 | नक्तंचराश्चरन्त्येते हृष्टाः क्रूराभिभाषिणः । श्रूयन्ते पर्णशब्दाश्च मृगाणां चरतां वने ॥75॥ |
ये क्रूर बोली बोलनेवाले निशाचर यहाँ प्रसन्रतापूर्वक विचर रहे हैं। वनमें घूमते हुए मृगोंके पैरोंसे लगकर पत्तोंके मर्मर शब्द सुनायी पड़ते हैं ॥75॥ | These cruelly speaking night-wanderers are roaming here joyfully. The rustling sounds of leaves are heard as the animals move in the forest, their feet touching them. (75) |
| 206 | 3-20-297 | एता घोरं शिवा नादान् दिशं दक्षिणपश्चिमाम् । आस्थाय विरुवन्त्युग्राः कम्पयन्त्यो मनो मम ॥76॥ |
“दक्षिण और पश्चिमके कोणकी दिशामे जाकर ये उग्र सियारिनें भयंकर शब्द कर रही हैं, जिससे मेरा हृदय काँप उठता है ॥76॥ | “Going to the southwest corner, these fierce she-jackals are making terrible sounds, which make my heart tremble." (76) |
| 207 | 3-20-297 | सत्यवानुवाच वनं प्रतिभयाकारं घनेन तमसाऽऽवृतम् । न विज्ञास्यसि पन्थानं गन्तुं चैव न शक्ष्यसि ॥77॥ |
सत्यवान् बोले--प्रिये! यह वन गाढ अंधकारसे आच्छादित होकर अत्यन्त भयंकर दिखायी दे रहा है। इस समय न तो तुम्हें रास्ता सूझेगा और न तुम चल ही सकोगी ॥77॥ | Satyavan said: Beloved! This forest, covered with dense darkness, is appearing very frightening. At this time, you will neither see the path, nor will you be able to walk. (77) |
| 208 | 3-20-297 | सावित्र्युवाच अस्मिन्नद्य वने दग्धे शुष्कवृक्षः स्थितो ज्वलन् । वायुना धम्यमानोऽत्र दृश्यतेऽग्निः क्वचित् क्वचित् ॥78॥ |
सावित्रीने कहा-आज इस वनमें आग लगी थी। इसमें एक सूखा वृक्ष खड़ा है, जो जल रहा है। हवा लगनेसे उसमें कहीं-कहीं आग दिखायी देती है ॥78॥ | Savitri said: There was a fire in this forest today. A dry tree stands in it, which is burning. Blown by the wind, fire is visible here and there. (78) |
| 209 | 3-20-297 | ततोऽग्निमानयित्वेह ज्वालयिष्यामि सर्वतः । काष्ठानीमानि सन्तीह जहि सन्तापमात्मनः ॥79॥ |
वहींसे आग ले आकर मैं सब ओर लकड़ियाँ जलाउँगी। यहाँ बहुत-से काठ-कबाड़ पड़े हैं। आप मनसे चिन्ता निकाल दीजिये ॥79॥ | Bringing fire from there, I will light the wood all around. There is a lot of wood and debris here. Banish anxiety from your mind. (79) |
| 210 | 3-20-297 | यदि नोत्सहसे गन्तुं सरुजं त्वां हि लक्षये । न च ज्ञास्यसि पन्थानं तमसा संवृते वने ॥80॥ श्वः प्रभाते वने दृश्ये यास्यावोऽनुमते तव। वसावेह क्षपामेकां रुचितं यदि तेऽनघ ॥81॥ |
परंतु मैं आपको रुग्ण देख रही हूँ। ऐसी दशामें यदि आपके मनमें चलनेका उत्साह न हो अथवा इस तिमिराच्छन्र वनमें यदि आपको रास्तेका ज्ञान न हो सके तो आपकी अनुमति होनेपर हम दोनों कल सबेरे, जब वनकी हर एक वस्तु स्पष्ट दीखने लगे, घर चलेंगे। अनघ! यदि आपकी रुचि हो तो एक रात हमलोग यहीं निवास करें ॥ 80-81॥ | But I see you are unwell. In such a condition, if you do not have the enthusiasm to walk, or if you cannot discern the path in this forest covered in darkness, then, with your permission, we will go home tomorrow morning, when every object in the forest can be clearly seen. O sinless one! If you wish, we can stay here for one night. (80-81) |
| 211 | 3-20-297 | सत्यवानुवाच शिरोरुजा निवृत्ता मे स्वस्थान्यङ्गानि लक्षये । मातापितृभ्यामिच्छामि संगमं त्वत्प्रसादजम् ॥82॥ |
सत्यवानने कहा-प्रिये! मेरे सिरका दर्द दूर हो गया है। मुझे अपने सब अंग स्वस्थ दिखायी देते हैं। अब तुम्हारे कृपाप्रसादसे मैं अपने माता-पितासे मिलना चाहता ह॥82॥ | Satyavan said: Beloved! My headache is gone. I feel all my limbs are healthy. Now, by your grace, I want to meet my parents. (82) |
| 212 | 3-20-297 | न कदाचिद् विकालं हि गतपूर्वो मयाऽऽश्रमः। अनागतायां सन्ध्यायां माता मे प्ररुणद्धि माम् ॥83॥ |
आजसे पहले कभी भी मैं इतनी देर करके असमयमे अपने आश्रमपर नहीं लौटा हूँ। संध्या होनेसे पहले ही माता मुझे रोक लेती है--आश्रमसे बाहर नहीं जाने देती ॥83॥ | Never before have I returned to my hermitage so late and at such an untimely hour. Before evening falls, my mother restrains me – she does not let me go outside the hermitage. (83) |
| 213 | 3-20-297 | दिवापि मयि निष्क्रान्ते संतप्येते गुरू मम । विचिनोति हि मां तातः सहैवाश्रमवासिभिः ॥84॥ |
दिनमें भी यदि मैं आश्रमसे दूर निकल जाता हूँ तो मेरे माता-पिता व्याकुल हो उठते हैं एवं पिताजी आश्रमवासियोंके साथ मुझे खोजने निकल पड़ते हैं ॥ | Even during the day, if I go far from the hermitage, my parents become anxious, and my father goes out with the hermitage residents to search for me. |
| 214 | 3-20-297 | मात्रा पित्रा च सुभृशं दुःखिताभ्यामहं पुरा । उपालब्धश्च बहुशश्चिरेणागच्छसीति ह ॥85॥ |
मेरे माता-पिताने अत्यन्त दुःखी होकर पहले कई बार मुझे उलाहना दिया है कि 'तु देरसे घर लौटता है' ॥ | My parents, deeply distressed, have in the past often rebuked me, saying, 'You return home late.' |
| 215 | 3-20-297 | का त्ववस्था तयोरद्य मदर्थमिति चिन्तये । तयोरदृश्ये मयि च महद् दुःखं भविष्यति ॥86॥ |
आज मेरे लिये उन दोनोंकी क्या अवस्था हुई होगी? यह सोचकर मुझे बड़ी चिन्ता हो रही है। मुझे न देखनेपर उन दोनोंको महान् दुःख होगा ॥86॥ | What must be their condition today for my sake? Thinking this, I am very worried. Not seeing me, they will experience great sorrow. (86) |
| 216 | 3-20-297 | पुरा मामूचतुश्चैव रात्रावस्रायमाणकौ । भृशं सुदुःखितौ वृद्धौ बहुशः प्रीतिसंयुतौ ॥87॥ |
पहलेकी बात है, मेरे वृद्ध माता-पिताने अत्यन्त दुःखी हो रातमें आँसू बहाते हुए मुझसे बारंबार प्रेमपूर्वक कहा था-- ॥87॥ | It is a matter of the past; my aged parents, deeply distressed, shedding . It is a matter of the past; my aged parents, deeply distressed, shedding tears at night, repeatedly said to me with love -- (87) |
| 217 | 3-20-297 | त्वया हीनौ न जीवाव मुहूर्तमपि पुत्रक । यावद् धरिष्यसे पुत्र तावन्नौ जीवितं ध्रुवम् ॥88॥ |
'बेटा! तुम्हारे बिना हम दो घड़ी भी जीवित नहीं रह सकते। वत्स! तुम जबतक जीवित रहोगे, तभीतक हमारा भी जीवन निश्चित है ॥88॥ | Son! Without you, we cannot live even for a moment. Dear child! As long as you live, only that long is our life certain.' (88) |
| 218 | 3-20-297 | वृद्धयोरन्धयोर्दष्टिस्त्वयि वंशः प्रतिष्ठितः । त्वयि पिण्डश्च कीर्तिश्च संतानं चावयोरिति ॥89॥ |
“हम दोनों बूढ़े और अंधे हैं। तुम्हीं हमारी दृष्टि हो तथा तुम्हींपर हमारा वंश प्रतिष्ठित है। हम दोनोंका पिण्ड, कीर्ति और कुलपरम्परा सब कुछ तुमपर ही अवलम्बित है! ॥89॥ | "We are both old and blind. You are our sight, and our lineage is established in you. Our pinda (ancestral offerings), fame, and family tradition all depend on you!" (89) |
| 219 | 3-20-297 | माता वृद्धा पिता वृद्धस्तयोर्यष्टिरहं किल । तौ रात्रौ मामपश्यन्तौ कामवस्थां गमिष्यतः ॥90॥ |
मेरी माता बूढ़ी है। पिता भी वृद्ध हैं, केवल मैं ही उन दोनोंके लिये लाठीका सहारा हूँ। वे दोनों रातमें मुझे न देखकर पता नहीं किस दशाको पहुँच जायेंगे? ॥90॥ | My mother is old. My father is also old; I am the only staff of support for both of them. Not seeing me at night, I don't know what state they will be in. (90) |
| 220 | 3-20-297 | निद्रायाश्चाभ्यसूयामि यस्या हेतोः पिता मम । माता च संशयं प्राप्ता मत्कृतेऽनपकारिणी ॥91॥ |
मैं अपनी इस नींदको कोसता हूँ, जिसके कारण मेरे पिता तथा कभी मेरा अपकार न करनेवाली मेरी माताका जीवन संशयमें पड़ गया है ॥91॥ | I curse this sleep of mine, because of which my father and my mother, who has never done me any wrong, have had their lives put in doubt. (91) |
| 221 | 3-20-297 | अहं च संशयं प्राप्तः कृच्छामापदमास्थित: । मातापितृभ्यां हि विना नाहं जीवितुमुत्सहे ॥92॥ |
मैं भी कठिन विपत्तिमें फँसकर प्राण-संशयकी दशामें आ पहुँचा हूँ। माता-पिताके बिना तो मैं कदापि जीवित नहीं रह सकता ॥92॥ | I, too, have fallen into doubt, facing a difficult situation. Without my parents, I certainly cannot live. (92) |
| 222 | 3-20-297 | व्यक्तमाकुलया बुद्धया प्रज्ञाचक्षुः पिता मम । एकैकमस्यां वेलायां पृच्छत्याश्रमवासिनम् ॥93॥ |
निश्चय ही इस समय मेरे प्रज्ञाचक्षु (अंधे) पिता व्याकुल हृदयसे एक-एक आश्रमवासीके पास जाकर मेरे विषयमे पूछ रहे होंगे ॥93॥ | Surely, at this time, my wisdom-eyed (blind) father, with a troubled mind, is asking each and every आश्रमवासी (hermitage resident) about me. (93) |
| 223 | 3-20-297 | नात्मानमनुशोचामि यथाहं पितरं शुभे । भर्तरि चाप्यनुगतां मातरं परिदुर्बलाम् ॥94॥ |
शुभे! मुझे अपने लिये उतना शोक नहीं है, जितना कि पिताके लिये और उन्हीका अनुसरण करनेवाली दुबली-पतली माताके लिये है ॥94॥ | O auspicious one! I do not grieve for myself as much as I grieve for my father and for my frail mother, who follows him. (94) |
| 224 | 3-20-297 | मत्कृतेन हि तावद्य सन्तापं परमेष्यतः । जीवन्तावनुजीवामि भर्तव्यौ तौ मयेति ह ॥95॥ तयोः प्रियं मे कर्तव्यमिति जानामि चाप्यहम् । |
मेरे कारण आज मेरे माता-पिता बहुत संतप्त होंगे। उन्हें जीवित देखकर ही मैं जी रहा हूँ। मुझे उन दोनोंका भरण-पोषण करना चाहिये। मैं यह भी जानता हूँ कि माता-पिताका प्रिय करना ही मेरा कर्तव्य है ॥95॥ | Because of me, both of them will experience great sorrow today. I live only to see them alive; I should support them. I also know that it is my duty to do what is pleasing to my parents. (95) |
| 225 | 3-20-297 | मार्कण्डेय उवाच एवमुक्त्वा स धर्मात्मा गुरुभक्तो गुरुप्रियः ॥96॥ उच्छ्रित्य बाहू दुःखार्तः सुस्वरं प्ररुरोद ह । |
मार्कण्डेयजी कहते हैं—युधिष्ठिर! यों कहकर धर्मात्मा, गुरुभक्त एवं गुरुजनोंके प्रिय सत्यवान् दोनों बाँहें ऊपर उठाकर दुःखसे आतुर हो फूट-फूटकर रोने लगे ॥96॥ | Markandeya said: O Yudhishthira! Saying this, the righteous Satyavan, devoted to his elders and beloved by them, raised both his arms and, distressed with sorrow, began to weep loudly. (96) |
| 226 | 3-20-297 | ततोऽब्रवीत् तथा दृष्ट्वा भर्तारं शोककर्शितम् ॥97॥ प्रमृज्याश्रूणि नेत्राभ्यां सावित्री धर्मचारिणी । यदि मेऽस्ति तपस्तप्तं यदि दत्तं हुतं यदि ॥98॥ श्रश्रृश्चशुरभर्तृणां मम पुण्यास्तु शर्वरी । |
अपने पतिको इस प्रकार शोकसे कातर हुआ देख धर्मका पालन करनेवाली सावित्रीने नेत्रोंसे बहते हुए आँसुओंको पोंछकर कहा--“यदि मैने कोई तपस्या की हो, यदि दान दिया हो और होम किया हो तो मेरे सास-ससुर और पतिके लिये यह रात पुण्यमयी हो ॥ 97-98 ॥ | Seeing her husband thus overcome with grief, Savitri, the follower of Dharma, wiped the tears flowing from her eyes and said, "If I have performed any penance, if I have given any gifts, if I have performed any fire sacrifices, then may this night be auspicious for my father-in-law, mother-in-law, and husband. (97-98) |
| 227 | 3-20-297 | न स्मराम्युक्तपूर्व वै स्वैरेष्वनृतां गिरम् ॥99॥ तेन सत्येन तावद्य ध्रियेतां श्वशुरौ मम । |
“मैने पहले कभी इच्छानुसार किये जानेवाले क्रीडा-विनोदमें भी झूठी बात कही हो, मुझे इसका स्मरण नहीं है। उस सत्यके प्रभावसे इस समय मेरे सास-ससुर जीवित रहें ॥99॥ | "I do not remember ever having spoken a false word, even in playful jest. By the power of that truth, may my father-in-law and mother-in-law be alive at this time." (99) |
| 228 | 3-20-297 | सत्यवानुवाच कामये दर्शनं पित्रोर्याहि सावित्रि मा चिरम् ॥100॥ (अपि नाम गुरू तौ हि पश्येयं प्रीयमाणकौ । ) |
सत्यवानूने कहा-सावित्री! चलो, मैं शीघ्र ही माता-पिताका दर्शन करना चाहता हूँ। क्या मैं उन दोनोंको प्रसन्न देख सकूँगा? ॥100॥ | Satyavan said: Savitri! Let's go; I want to see my parents soon. Perhaps I might see those two revered ones joyful? (100) |
| 229 | 3-20-297 | पुरा मातुः पितुर्वापि यदि पश्यामि विप्रियम् । न जीविष्ये वरारोहे सत्येनात्मानमालभे ॥101॥ |
वरारोहे! मैं सत्यकी शपथ खाकर अपना शरीर छूकर कहता हूँ, यदि मैं माता अथवा पिताका अप्रिय देखूँगा तो जीवित नहीं रहूँगा ॥101॥ | O beautiful one! I swear by truth and touch my own body, if I see anything displeasing regarding my mother or father, I will not live. (101) |
| 230 | 3-20-297 | यदि धर्मे च ते बुद्धिर्मा चेज्जीवन्तमिच्छसि । मम प्रियं वा कर्तव्यं गच्छावाश्रममन्तिकात् ॥102॥ |
यदि तुम्हारी बुद्धि धर्में रत है, यदि तुम मुझे जीवित देखना चाहती हो अथवा मेरा प्रिय करना अपना कर्तव्य समझती हो तो हम दोनों शीघ्र ही आश्रमके समीप चलें ॥102॥ | If your mind is devoted to Dharma, if you wish me to live, or if you consider it your duty to do what is pleasing to me, then let us quickly go near the hermitage. (102) |
| 231 | 3-20-297 | मार्कण्डेय उवाच सावित्री तत उत्थाय केशान् संयम्य भाविनी । पतिमुत्थापयामास बाहुभ्यां परिगृह्य वै ॥103॥ |
मार्कण्डेयजी कहते हैं-युधिष्ठिर! तब पतिका हितचिन्तन करनेवाली सावित्रीने उठकर अपने खुले हुए केशोंको बाँध लिया और दोनों हाथोंसे पकड़कर पतिको उठाया ॥103॥ | Markandeya said: O Yudhishthira! Then Savitri, contemplating her husband's welfare, got up, tied up her loose hair, and, grasping her husband with both hands, helped him to his feet. (103) |
| 232 | 3-20-297 | उत्थाय सत्यवांश्चापि प्रमृज्याङ्गानि पाणिना । सर्वा दिशः समालोक्य कठिने दृष्टिमादधे ॥104॥ |
सत्यवानने भी उठकर एक हाथसे अपने सभी अंग पोंछे और चारों ओर देखकर फलोंकी टोकरीपर दृष्टि डाली ॥104॥ | Satyavan also got up, wiped all his limbs with one hand, and, looking all around, cast his eyes upon the basket of fruits. (104) |
| 233 | 3-20-297 | तमुवाचाथ सावित्री श्वः फलानि हरिष्यसि । योगक्षेमार्थमेतं ते नेष्यामि परशुं त्वहम् ॥105॥ |
तब सावित्रीने उनसे कहा-'कल सबेरे फलोंको ले चलियेगा। इस समय आपके योग- क्षेमके लिये इस कुल्हाड़ीको मैं साथ ले चलूँगी” ॥105॥ | Then Savitri said to him, "You will carry the fruits tomorrow morning. For your safety and well-being at this time, I will carry this axe." (105) |
| 234 | 3-20-297 | कृत्वा कठिनभारं सा वृक्षशाखावलम्बिनम् । गृहीत्वा परशुं भर्तुः सकाशे पुनरागमत् ॥106॥ |
फिर उसने टोकरीके बोझको पेड़की डालमें लटका दिया और कुल्हाड़ी लेकर वह पुनः पतिके पास आ गयी ॥106॥ | Then she hung the weight of the basket on a branch of the tree, and, taking the axe, she came back to her husband's side. (106) |
| 235 | 3-20-297 | वामे स्कन्धे तु वामोरूर्भतुर्बाहुं निवेश्य च । दक्षिणेन परिष्वज्य जगाम गजगामिनी ॥107॥ |
कमनीय ऊरुओंसे सुशोभित तथा हाथीके समान मन्द गतिसे चलनेवाली सावित्रीने पतिकी दाहिनी भुजाको अपने बायें कंधेपर रखकर दाहिने हाथसे उन्हें अपने पार्श्चभागमें सटा लिया और धीरे-धीर चलने लगी ॥107॥ | The beautiful-thighed and elephant-gaited Savitri, placing her husband's right arm on her left shoulder and embracing him with her right hand on his side, began to walk slowly. (107) |
| 236 | 3-20-297 | सत्यवानुवाच अभ्यासगमनाद् भीरु पन्थानो विदिता मम । वृक्षान्तरालोकितया ज्योत्स्नया चापि लक्षये ॥108॥ |
उस समय सत्यवानूने कहा-भीरु! बार-बार आने-जानेसे यहाँके सभी मार्ग मेरे परिचित हैं। वृक्षोंके भीतरसे दिखायी देनेवाली चाँदनीसे भी मैं रास्तोंकी पहचान कर लेता हूँ ॥108॥ | At that time, Satyavan said, "O timid one! Because of frequent travel, the paths here are known to me. I also recognize the paths by the moonlight visible through the trees. (108) |
| 237 | 3-20-297 | आगतौ स्वः पथा येन फलान्यवचितानि च । यथागतं शुभे गच्छ पन्थानं मा विचारय ॥109॥ |
यह वही मार्ग है जिससे हम दोनों आये थे और हमने फल चुने थे। शुभे! तुम जैसे आयी हो वैसे चली चलो। रास्तेका विचार न करो ॥109॥ | This is the same path by which we both came and gathered fruits. O auspicious one! Go as you came. Do not worry about the path. (109) |
| 238 | 3-20-297 | पलाशखण्डे चैतस्मिन् पन्था व्यावर्तते द्विधा । तस्योत्तरेण यः पन्थास्तेन गच्छ त्वरस्व च ॥110॥ स्वस्थोऽस्मि बलवानस्मि दिदृक्षुः पितरावुभौ । |
पलाश-वृक्षोंके इस वनप्रदेशमें यह मार्ग अलग-अलग दो दिशाओंकी ओर मुड़ जाता है। इन दोनोंमेंसे जो मार्ग उत्तरकी ओरसे जाता है, उसीसे चलो और शीप्रतापूर्वक पैर बढ़ाओ। अब मैं स्वस्थ हूँ, बलवान् हूँ और अपने माता तथा पिता दोनोंको देखनेके लिये उत्सुक हूँ ॥110॥ | In this area of Palasha trees, the path divides in two different directions. Of these two, take the path that goes to the north, and walk quickly. Now I am healthy, I am strong, and I am eager to see both my mother and father." (110) |
| 239 | 3-20-297 | मार्कण्डेय उवाच ब्रुवन्नेवं त्वरायुक्तः सम्प्रायादाश्रमं प्रति ॥111॥ | मार्कण्डेयजी कहते हैं--ऐसा कहते हुए सत्यवान् बड़ी उतावलीके साथ आश्रमकी ओर चलने लगे ॥111॥ | Markandeya said: Saying this, Satyavan, filled with haste, proceeded towards the hermitage. (111) |
| 240 | 3-20-297 | इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि पतिव्रतामाहात्म्यपर्वणि सावित्र्युपाख्याने सप्तनवत्यधिकद्वधिशततमोऽध्यायः ॥297॥ | इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत पतिव्रतामाहात्म्यपर्वमें सावित्री- उपाख्यानविषयक दो सौ सत्तानबेवाँ अध्याय पुरा हुआ ॥297॥ | Thus ends the two hundred and ninety-seventh chapter, titled "Savitri Upakhyana," within the "Patrivrata Mahatmya Parva" of the Vana Parva of the Sri Mahabharata. (297) |
| 241 | 3-20-297 | (दाक्षिणात्य अधिक पाठका 1 श्लोक मिलाकर कुल 112 श्लोक हैं) | (दाक्षिणात्य अधिक पाठका 1 श्लोक मिलाकर कुल 112 श्लोक हैं) | ("Including 1 additional verse from the Southern recension, there are a total of 112 verses.") |
| 242 | 3-20-298 | अष्टनवर्त्याधिकद्वधिशततमोऽध्यायः | दौ सौ अद्ठानबेवाँ अध्याय | Chapter 298: The Concern of King Dyumatsen with His Wife for Satyavan, the Rishis' Reassurance, the Arrival of Savitri and Satyavan, and Savitri's Explanation of the Delayed Arrival and Details of Obtaining Boons. |
| 243 | 3-20-298 | पत्नीसहित राजा झ्युमत्सेनकी सत्यवान्के लिये चिन्ता ऋषियोंका उन्हें आश्वासन देना, सावित्री और सत्यवान्का आगमन तथा सावित्रीद्वारा विलम्बसे आनेके कारणपर प्रकाश डालते हुए वरप्राप्तिका विवरण बताना | पत्नीसहित राजा झ्युमत्सेनकी सत्यवान्के लिये चिन्ता ऋषियोंका उन्हें आश्वासन देना, सावित्री और सत्यवान्का आगमन तथा सावित्रीद्वारा विलम्बसे आनेके कारणपर प्रकाश डालते हुए वरप्राप्तिका विवरण बताना | Chapter 298: The Concern of King Dyumatsen with His Wife for Satyavan, the Rishis' Reassurance, the Arrival of Savitri and Satyavan, and Savitri's Explanation of the Delayed Arrival and Details of Obtaining Boons. |
| 244 | 3-20-298 | मार्कण्डेय उवाच एतस्मिन्नेव काले तु द्युमत्सेनो महाबलः । लब्धचक्षुः प्रसन्नायां दृष्ट्यां सर्वं ददर्श ह ॥1॥ |
मार्कण्डेयजी कहते हैं-युथिष्ठिर! इसी समय महाबली महाराजा द्युमत्सेनको उनकी खोयी हुई आँखें मिल गयीं। दृष्टि स्वच्छ हो जानेके कारण वे सब कुछ देखने लगे ॥1॥ | Markandeya says, "Yudhishthira! At that very moment, the mighty King Dyumatsen regained his lost eyesight. With clear vision, he could see everything." (1) |
| 245 | 3-20-298 | स सर्वानाश्रमान् गत्वा शैब्यया सह भार्यया । पुत्रहेतोः परामार्तिं जगाम भरतर्षभ ॥2॥ |
भरतश्रेष्ठ! वे अपनी पत्नी शैब्याके साथ सभी आश्रमोंमें जाकर पुत्रका पता लगाने लगे। उस समय उन्हें सत्यवानूके लिये बड़ी वेदना हो रही थी ॥2॥ | "O best of the Bharatas! Along with his wife Shaibya, he began searching for his son in all the ashrams. During that time, he was greatly pained for Satyavan." (2) |
| 246 | 3-20-298 | तावाश्रमान् नदीश्चैव वनानि च सरांसि च । तस्यां निशि विचिन्वन्तौ दम्पती परिजग्मतुः ॥3॥ |
वे दोनों पति-पत्नी उस रातमें पुत्रकी खोज करते हुए विभिन्न आश्रमों, नदीके तटों तथा वनों और सरोवरोंमें भ्रमण करने लगे ॥3॥ | "That couple spent the night searching for their son, wandering through various ashrams, riverbanks, forests, and lakes." (3) |
| 247 | 3-20-298 | श्रुत्वा शब्दं तु यं कञ्चिदुन्मुखौ सुतशङ्कया । सावित्रीसहितोऽभ्येति सत्यवानित्यभाषताम् ॥4॥ |
जो कोई भी शब्द कानमें पड़ता, उसीको सुनकर वे अपने पुत्रके आनेकी आशंकासे उत्सुक हो उठते और परस्पर कहने लगते कि 'सावित्रीके साथ सत्यवान् आ रहा है" ॥4॥ | "Whenever they heard any sound, they would eagerly anticipate their son's arrival and say to each other, 'Satyavan is coming with Savitri.'" (4) |
| 248 | 3-20-298 | भिन्नैश्च परुषैः पादैः सव्रणैः शोणितोक्षितैः । कुशकण्टकविद्धाङ्गावुन्मत्ताविव धावतः ॥5॥ |
उनके पैरोंमें बिवाई फट गयी थी, वे कठोर हो गये थे तथा घाव हो जानेके कारण रक्तसे भीगे रहते थे, तो भी उन्हीं पैरोंसे वे दोनों दम्पति इधर-उधर पागलोंकी भाँति दौड़ रहे थे। उस समय उनके अंगोंमें कुश और कोटे बिंध गये थे ॥5॥ | "Their feet were cracked and hardened, and they were soaked in blood from the wounds, yet they wandered about like madmen. Their bodies were pierced by thorns and sharp grass." (5) |
| 249 | 3-20-298 | ततोऽभिसृत्य तैर्विप्रैः सर्वैराश्रमवासिभिः । परिवार्य समाश्वास्य तावानीतौ स्वमाश्रमम् ॥6॥ |
तब उन आश्रमोंमें रहनेवाले समस्त ब्राह्मणोंने उनके पास जा उन्हें सब ओरसे घेरकर आश्वासन दिया तथा उन दोनोंको उनके आश्रमपर पहुँचाया ॥6॥ | "Then, all the Brahmins living in those ashrams gathered around them, comforted them, and brought them back to their ashram." (6) |
| 250 | 3-20-298 | तत्र भार्यासहाय: स वृतो वृद्धैस्तपोधनै: । आश्वासितोडपि चित्रार्थ: पूर्वराज्ञां कथाश्रयैः ॥7॥ ततस्तौ पुनराश्चस्तौ वृद्धौ पुत्रदिदृक्षया । बाल्यवृत्तानि पुत्रस्य स्मरन्तौ भृशदुःखितौ ॥8॥ |
तपस्याके धनी वृद्ध ब्राह्मणद्वारा घिरे हुए पत्नीसहित राजा ह्युमत्सेनको प्राचीन राजाओंकी विचित्र अर्थोंसे भरी हुई कथाएँ सुनाकर पूरा आश्वासन दिया गया, तो भी वे दोनों वृद्ध बारंबार सान्त्वना मिलते रहनेपर भी अपने पुत्रको देखनेकी इच्छासे उसके बचपनकी बातें सोचते हुए बहुत दुःखी हो गये ॥ 7-8॥ | "Surrounded by the elderly Brahmins, King Dyumatsen and his wife were reassured with stories of ancient kings filled with profound meanings, but they were still deeply saddened, longing to see their son and reminiscing about his childhood." (7-8) |
| 251 | 3-20-298 | पुनरुक्त्वा च करुणां वाचं तौ शोककर्शितौ । हा पुत्र हा साध्वि वधू: क्वासि क्वासीत्यरोदताम् । ब्राह्मणः सत्यवाक् तेषामुवाचेदं तयोर्वचः ॥9॥ |
वे शोककातर दम्पति बारंबार करुण वचन बोलते हुए 'हा पुत्र! हा सती-साध्वी बहू! तुम कहाँ हो, कहाँ हो? यों कहकर रोने लगे। उस समय एक सत्यवादी ब्राह्मणने उन दोनोंसे इस प्रकार कहा ॥9॥ | "The grief-stricken couple repeatedly spoke mournful words, crying, 'O son! O virtuous daughter-in-law! Where are you?' At that moment, a truthful Brahmin spoke to them." (9) |
| 252 | 3-20-298 | सुवर्चा उवाच यथास्य भार्या सावित्री तपसा च दमेन च । आचारेण च संयुक्ता तथा जीवति सत्यवान् ॥10॥ |
सुवर्चा बोले-सत्यवानकी पत्नी सावित्री जैसी तपस्या, इन्द्रियसंयम तथा सदाचारसे संयुक्त है, उसे देखते हुए मैं कह सकता हूँ कि सत्यवान् जीवित है ॥10॥ | "Suvarcha said, 'Considering Savitri's penance, self-control, and virtuous conduct, I can say that Satyavan is alive.'" (10) |
| 253 | 3-20-298 | गौतम उवाच वेदाः साङ्गा मयाधीतास्तपो मे संचितं महत् । कौमारब्रह्मचर्य च गुरवोऽग्निश्च तोषिताः ॥11॥ समाहितेन चीर्णानि सर्वाण्येव व्रतानि मे । वायुभक्षोपवासश्च कृतो मे विधिवत् पुरा ॥12॥ अनेन तपसा वेयि सर्व परचिकीर्षितम् । सत्यमेतन्निबोधध्वं ध्रियते सत्यवानिति ॥13॥ |
गौतम बोले--मैंने छहों अंगोंसहित सम्पूर्ण वेदोंका अध्ययन किया है। महान् तपका संचय किया है। कुमारावस्थासे ही ब्रह्मचर्यका पालन करते हुए गुरुजनों तथा अग्निदेवको संतुष्ट किया है। एकाग्रचित्त होकर सभी व्रत पूर्ण किये हैं। पूर्वकालमें हवा पीकर विधिपूर्वक उपवासव्रतका साधन किया है। इस तपस्याके प्रभावसे मैं दूसरोंकी सारी चेष्टाओंको जान लेता हूँ। आपलोग मेरी यह बात सच मानें कि सत्यवान् जीवित है ॥ 11-13॥ | "Gautam said, 'I have studied all the Vedas with their six limbs. I have accumulated great penance. I have observed celibacy from childhood, pleasing the teachers and the fire god. I have completed all vows with a focused mind. In ancient times, I performed fasts by consuming only air. Through the power of this penance, I can perceive others' actions. Believe me, Satyavan is alive.'" (11-13) |
| 254 | 3-20-298 | शिष्य उवाच उपाध्यायस्य मे वक्त्राद् यथा वाक्यं विनिःसृतम् । नैव जातु भवेन्मिथ्या तथा जीवति सत्यवान् ॥14॥ |
गौतमके शिष्यने कहा-मेरे गुरुजीके मुखसे जो बात निकली है वह कभी मिथ्या नहीं हो सकती। सत्यवान् अवश्य जीवित है ॥14॥ | "Gautam's disciple said, 'What my guru has spoken is never false. Satyavan is certainly alive.'" (14) |
| 255 | 3-20-298 | ऋषय ऊचुः यथास्य भार्या सावित्री सर्वैरेव सुलक्षणैः । अवैधव्यकरैर्युक्ता तथा जीवति सत्यवान् ॥15॥ |
कुछ ऋषियोंने कहा-सत्यवानूकी पत्नी सावित्री उन सभी शुभ लक्षणोंसे युक्त है जो वैधव्यका निवारण करके सौभाग्यकी वृद्धि करनेवाले हैं, इसलिये सत्यवान् अवश्य जीवित है ॥15॥ | "Some Rishis said, 'Satyavan's wife, Savitri, possesses all the auspicious signs that ward off widowhood and enhance marital bliss. Therefore, Satyavan is surely alive.'" (15) |
| 256 | 3-20-298 | भारद्वाज उवाच यथास्य भार्या सावित्री तपसा च दमेन च । आचारेण च संयुक्ता तथा जीवति सत्यवान् ॥16॥ |
भारद्वाज बोले-सत्यवान्की पत्नी सावित्री जैसी तपस्या, इन्द्रियसंयम तथा सदाचारसे संयुक्त है, उसे देखते हुए गैं कह सकता हूँ कि सत्यवान् जीवित है ॥ | "Bhardwaj said, 'Considering Savitri's penance, self-control, and virtuous conduct, I can say that Satyavan is alive.'" (16) |
| 257 | 3-20-298 | दाल्भ्य उवाच यथा दृष्टिः प्रवृत्ता ते सावित्रयाश्च यथा व्रतम् । गताऽऽहारमकृत्वा च तथा जीवति सत्यवान् ॥17॥ |
दाल्भ्यने कहा--राजन्! जिस प्रकार आपको दृष्टि प्राप्त हो गयी और जिस प्रकार सावित्रीका उपवास-व्रत चल रहा था तथा जिस प्रकार वह आज भोजन किये बिना ही पतिके साथ गयी है, इन सब बातोंपर विचार करनेसे यही प्रतीत होता है कि सत्यवान् जीवित है ॥17॥ | "Dalbhya said, 'O King! Considering how you regained your sight, how Savitri was fasting, and how she went with her husband without eating today, it seems Satyavan is alive.'" (17) |
| 258 | 3-20-298 | आपस्तम्ब उवाच यथा वदन्ति शान्तायां दिशि वै मृगपक्षिणः । पार्थिवी च प्रवृत्तिस्ते तथा जीवति सत्यवान् ॥18॥ |
आपस्तम्ब बोले-इस शान्त (एवं प्रसन्न) दिशामे मृग और पक्षी जैसी बोली बोल रहे हैं और आपके द्वारा जिस प्रकार राजोचित धर्मका अनुष्ठान हो रहा है, उसके अनुसार यह कहा जा सकता है कि सत्यवान् जीवित है ॥18॥ | "Apastamb said, 'The birds and deer are speaking in a calm and pleasant direction, and considering your righteous conduct, it can be said that Satyavan is alive.'" (18) |
| 259 | 3-20-298 | धौम्य उवाच सर्वैर्गूणैरुपेतस्ते यथा पुत्रो जनप्रियः । दीर्घायुर्लक्षणोपेतस्तथा जीवति सत्यवान् ॥19॥ |
धौम्यने कहा-महाराज! आपका यह पुत्र जिस प्रकार समस्त सदगुणोंसे सम्पन्न, जनप्रिय तथा चिरजीवी पुरुषोंके लक्षणोंसे युक्त है, उसके अनुसार यही मानना चाहिये कि सत्यवान् जीवित है ॥19॥ | "Dhaumya said, 'O King! Considering that your son is endowed with all virtues, beloved by all, and possesses the signs of longevity, we should believe that Satyavan is alive.'" (19) |
| 260 | 3-20-298 | मार्कण्डेय उवाच एवमाश्चासितस्तैस्तु सत्यवाग्भिस्तपस्विभिः । तांस्तान् विगणयन् सर्वास्तत: स्थिर इवाभवत् ॥20॥ |
मार्कण्डेयजी कहते हैं-युधिष्ठिर! इस प्रकार सत्यवादी एवं तपस्वी मुनियोंने जब राजा द्युमत्सेनको पूर्णतः आश्वासन दिया, तब उन सबका समादर करते हुए उनकी बात मानकर वे स्थिर-से हो गये ॥20॥ | Markandeya says, "Yudhishthira! Thus, when the truthful and ascetic sages fully reassured King Dyumatsen, he accepted their words and became composed." (20) |
| 261 | 3-20-298 | ततो मुहूर्तात् सावित्री भर्त्रा सत्यवता सह । आजगामाश्रमं रात्रौ प्रहृष्टा प्रविवेश ह ॥21॥ |
तदनन्तर दो ही घड़ीमें सावित्री अपने पति सत्यवान्के साथ रातमें वहाँ आयी और बड़े हर्षके साथ उसने आश्रममें प्रवेश किया ॥21॥ | "Then, within two hours, Savitri arrived with her husband Satyavan at night and joyfully entered the ashram." (21) |
| 262 | 3-20-298 | ब्राह्मणा ऊचुः पुत्रेण संगतं त्वां तु चक्षुष्मन्तं निरीक्ष्य च । सर्वे वयं वै पृच्छामो वृद्धि वै पृथिवीपते ॥22॥ |
तब ब्राह्मणोंने कहा-महाराज! पुत्रके साथ आपका मिलन हुआ और आपको नेत्र भी प्राप्त हो गये, इस अवस्थामे आपको देखकर हम सब लोग आपका अभ्युदय मना रहे हैं ॥22॥ | "The Brahmins said, 'O King! We celebrate your prosperity as you have been reunited with your son and regained your sight.'" (22) |
| 263 | 3-20-298 | समागमेन पुत्रस्य सावित्र्या दर्शनेन च । चक्षुषश्चात्मनो लाभात् त्रिभिर्दिष्ट्या विवर्धसे ॥23॥ |
बड़े सौभाग्यकी बात है कि आपको पुत्रका समागम प्राप्त हुआ, बहू सावित्रीका दर्शन हुआ और अपने खोये हुए नेत्र पुनः मिल गये। इन तीनों बातोंसे आपका अभ्युदय सूचित होता है ॥23॥ | "'It is fortunate that you have been reunited with your son, have seen your daughter-in-law Savitri, and have regained your lost sight. These three events indicate your prosperity.'" (23) |
| 264 | 3-20-298 | सर्वैरस्माभिरुक्तं यत् तथा तन्नात्र संशयः । भूयोभूयः समृद्धिस्ते क्षिप्रमेव भविष्यति ॥24॥ |
हम सब लोगोंने जो बात कही है, वह ज्यों-की-त्यों सत्य निकली, इसमें संशय नहीं है। आगे भी शीघ्र ही आपकी बारंबार समृद्धि होनेवाली है ॥24॥ | "'What we have said has come true; there is no doubt. May you continue to prosper repeatedly.'" (24) |
| 265 | 3-20-298 | ततोऽग्निं तत्र संज्वाल्य द्विजास्ते सर्व एव हि । उपासांचक्रिरे पार्थ द्युमत्सेनं महीपतिम् ॥25॥ |
युधिष्ठिर! तदनन्तर सभी ब्राह्मण वहाँ आग जलाकर राजा द्युमत्सेनके पास बैठ गये ॥25॥ | "Yudhishthira! Then all the Brahmins lit a fire and sat around King Dyumatsen." (25) |
| 266 | 3-20-298 | शैब्या च सत्यवांश्चैव सावित्री चैकतः स्थिताः । सर्वैस्तैरभ्यनुज्ञाता विशोकाः समुपाविशन् ॥26॥ |
शैब्या, सत्यवान् तथा सावित्री-ये तीनों भी एक ओर खड़े थे, जो उन सब महात्माओंकी आज्ञा पाकर शोकरहित हो बैठ गये ॥26॥ | "Shaibya, Satyavan, and Savitri stood aside, and upon receiving their permission, they sat down without sorrow." (26) |
| 267 | 3-20-298 | ततो राज्ञा सहासीना: सर्वे ते वनवासिनः । जातकौतूहलाः पार्थ पप्रच्छुर्नुपतेः सुतम् ॥27॥ |
पार्थ! तत्पश्चात् राजाके साथ बैठे हुए वे सभी वनवासी कौतूहलवश राजकुमार सत्यवानसे पूछने लगे ॥27॥ | "Partha! Then, the forest-dwelling Rishis, sitting with the king, curiously asked Prince Satyavan." (27) |
| 268 | 3-20-298 | ऋषय ऊचुः प्रागेव नागतं कस्मात् सभार्येण त्वया विभो । विरात्रे चागतं कस्मात् कोऽनुबन्धस्तवाभवत् ॥28॥ |
ऋषि बोलेराजकुमार! तुम अपनी पत्नीके साथ पहले ही क्यों नहीं चले आये? क्यों इतनी रात बिताकर आये? तुम्हारे सामने कौन-सी अड़चन आ गयी थी? ॥28॥ | "The Rishis said, 'Prince! Why did you and your wife not come earlier? Why did you come so late at night? What obstacle did you face?'" (28) |
| 269 | 3-20-298 | संतापितः पिता माता वयं चैव नृपात्मज । कस्मादिति न जानीमस्तत् सर्व वक्तुमर्हसि ॥29॥ |
राजपुत्र! तुमने आनेमें विलम्ब करके अपने माता-पिता तथा हमलोगोंको भी भारी संतापमें डाल दिया था। तुमने ऐसा क्यों किया? यह हम नहीं जान पाते हैं, अतः सब बातें स्पष्ट रूपसे बताओ ॥29॥ | "'By coming late, you caused great distress to your parents and to us. Why did you do this? We do not know; please explain everything clearly.'" (29) |
| 270 | 3-20-298 | सत्यवानुवाच पित्राहमभ्यनुज्ञातः सावित्रीसहितो गतः । अथ मेऽभूच्छिरोदुःखं वने काष्ठानि भिन्दतः ॥30॥ |
सत्यवान् बोले—मैं पिताकी आज्ञा पाकर सावित्रीके साथ वनमें गया। फिर वनमें लकड़ियोंको चीरते समय मेरे सिरमें बड़े जोरसे दर्द होने लगा ॥30॥ | "Satyavan said, 'I went to the forest with Savitri, following my father's command. While cutting wood, I experienced a severe headache.'" (30) |
| 271 | 3-20-298 | सुप्तश्चाहं वेदनया चिरमित्युपलक्षये । तावत् कालं न च मया सुप्तपूर्व कदाचन ॥31॥ |
मैं समझता हूँ कि मैं वेदनासे व्याकुल होकर देरतक सोता रह गया। उतने समयतक मैं उसके पहले कभी नहीं सोया था ॥31॥ | "'I believe I fell asleep due to the pain and slept for a long time, something I had never done before.'" (31) |
| 272 | 3-20-298 | सर्वेषामेव भवतां संतापो मा भवेदिति । अतो विरात्रागमनं नान्यदस्तीह कारणम् ॥32॥ |
नींद खुलनेपर मैं इतनी रातके बाद भी इसलिये चला आया कि आप सब लोगोंको मेरे लिये चिन्तित न होना पड़े। इस विलम्बमें और कोई कारण नहीं है ॥32॥ | "'After waking up, I came late at night so that you all would not worry about me. There is no other reason for this delay.'" (32) |
| 273 | 3-20-298 | गौतम उवाच अकस्माच्चक्षुषः प्राप्तिर्दयुमत्सेनस्य ते पितुः । नास्य त्वं कारणं वेत्सि सावित्री वक्तुमर्हति ॥33॥ |
गौतम बोले--तुम्हारे पिता ह्युमत्सेनको जो सहसा नेत्रोंकी प्राप्ति हुई है, इसका कारण तुम नहीं जानते। सम्भवतः सावित्री बतला सकती है ॥33॥ | "Gautam said, 'You do not know the reason for your father Dyumatsen suddenly regaining his sight. Perhaps Savitri can explain.'" (33) |
| 274 | 3-20-298 | श्रोतुमिच्छामि सावित्रि त्वं हि वेत्थ परावरम् । त्वां हि जानामि सावित्रि सावित्रीमिव तेजसा ॥34॥ त्वमत्र हेतुं जानीषे तस्मात् सत्यं निरूच्यताम् । रहस्यं यदि ते नास्ति किंचिदत्र वदस्व नः ॥35॥ |
सावित्री! मैं इसका रहस्य तुमसे सुनना चाहता हूँ; क्योंकि तुम भूत और भविष्य सब कुछ जानती हो। मैं तुम्हें साक्षात् सावित्रीदेवीके समान तेजस्विनी जानता हूँ। राजाको जो सहसा नेत्रोंकी प्राप्ति हुई है, इसका कारण तुम जानती हो। सच-सच बताओ, यदि इसमें कुछ छिपानेकी बात न हो तो हमसे अवश्य कहो ॥ 34-35॥ | "'Savitri! I want to hear this secret from you, for you know the past and the future. I know you are as radiant as Savitri Devi herself. Tell us the reason for the king suddenly regaining his sight, if there is nothing to hide.'" (34-35) |
| 275 | 3-20-298 | सावित्र्युवाच एवमेतद् यथा वेत्थ संकल्पो नान्यथा हि वः । न हि किंचिद् रहस्यं मे श्रूयतां तथ्यमेव यत् ॥36॥ |
सावित्री बोली-मुनीश्चरो! आपलोग जैसा समझते हैं, ठीक है। आपलोगोंका संकल्प अन्यथा नहीं हो सकता। मेरे लिये कोई छिपानेकी बात नहीं है। मैं सब घटनाएँ ठीक-ठीक बताती हूँ, सुनिये ॥36॥ | "Savitri said, 'O sages! You are correct. Your resolve cannot be otherwise. There is nothing to hide from me. I will explain everything truthfully; please listen.'" (36) |
| 276 | 3-20-298 | मृत्युर्मे पत्युराख्यातो नारदेन महात्मना । स चाद्य दिवसः प्राप्तस्ततो नैनं जहाम्यहम् ॥37॥ |
महात्मा नारदजीने मुझसे मेरे पतिकी मृत्युका हाल बताया था। वह मृत्युदिवस आज ही आया था; इसलिये मैं इन्हें अकेला नहीं छोड़ती थी ॥37॥ | "'The great sage Narada had told me about my husband's death. That day of death was today, so I did not leave him alone.'" (37) |
| 277 | 3-20-298 | सुप्तं चैनं यमः साक्षादुपागच्छत् सकिङ्करः । स एनमनयद् बद्धवा दिशं पितृनिषेविताम् ॥38॥ |
जब ये सिरके दर्दसे व्याकुल होकर सो गये, उस समय साक्षात् भगवान् यमराज अपने सेवकके साथ पधारे। वे इन्हें बाँधकर दक्षिण दिशाकी ओर ले चले ॥38॥ | "'When he fell asleep due to a headache, Lord Yama himself arrived with his attendants. He bound him and took him south.'" (38) |
| 278 | 3-20-298 | अस्तौषं तमहं देवं सत्येन वचसा विभुम् । पञ्च वै तेन मे दत्ता वराः शृणुत तान् मम ॥39॥ |
उस समय मैने सत्यवचनोंद्वारा उन भगवान् यमकी स्तुति की। तब उन्होंने मुझे पाँच वर दिये। उन वरोंको आप मुझसे सुनिये ॥39॥ | "'I praised Lord Yama with truthful words, and he granted me five boons. Please listen to those boons.'" (39) |
| 279 | 3-20-298 | चक्षुषी च स्वराज्यं च द्वौ वरी श्वशुरस्य मे । लब्धं पितुः पुत्रशतं पुत्राणां चात्मनः शतम् ॥40॥ |
नेत्र तथा अपने राज्यकी प्राप्ति-ये दो वर मेरे श्वशुरके लिये प्राप्त हुए हैं। इसके सिवा मैने अपने पिताके लिये सौ पुत्र तथा अपने लिये भी सौ पुत्र होनेके दो वर और पाये हैं ॥40॥ | "'The regaining of sight and the kingdom were two boons for my father-in-law. I also received two boons for my father: a hundred sons, and for myself, a hundred sons.'" (40) |
| 280 | 3-20-298 | चतुर्वर्षशतायुर्मे भर्ता लब्धश्च सत्यवान् । भर्तुर्हि जीवितार्थं तु मया चीर्ण त्विदं व्रतम् ॥41॥ |
पाँचवें वरके रूपमे मुझे मेरे पति सत्यवान् चार सौ वर्षोकी आयु लेकर प्राप्त हुए हैं। पतिके जीवनकी रक्षाके लिये ही मैंने यह व्रत किया था ॥41॥ | "'The fifth boon was that I received my husband Satyavan with four hundred years of life. I undertook this vow to protect my husband's life.'" (41) |
| 281 | 3-20-298 | एतत् सर्व मयाऽऽख्यातं कारणं विस्तरेण वः । यथावृत्तं सुखोदर्कमिदं दुःखं महन्मम ॥42॥ |
इस प्रकार मैंने आपलोगोंसे विलम्बसे आनेका कारण और उसका यथावत् वृत्तान्त विस्तारपूर्वक बताया है। मुझे जो यह महान् दुःख उठाना पड़ा है उसका अन्तिम फल सुख ही हुआ है ॥42॥ | "'Thus, I have explained the reason for my delayed arrival and the events in detail. The great sorrow I endured has ultimately resulted in happiness.'" (42) |
| 282 | 3-20-298 | ऋषय ऊचुः निमज्जमानं व्यसनैरभिद्रुतं कुलं नरेन्द्रस्य तमोमये हृदे । त्वया सुशीलव्रतपुण्यया कुलं समुद्धृतं साध्वि पुनः कुलीनया ॥43॥ |
ऋषि बोले-पतिव्रते! राजा द्युमत्सेनका कुल भाँति-भाँतिकी विपत्तियोंसे ग्रस्त होकर दुःखके अंधकारमय गढ़ेमें डूबा जा रहा था; परंतु तुझ-जैसी सुशीला, व्रतपरायणा और पवित्र आचरणवाली कुलीन वधूने आकर इसका उद्धार कर दिया ॥43॥ | "The Rishis said, 'O virtuous wife! King Dyumatsen's lineage was plunged into the dark abyss of suffering due to various calamities, but a virtuous, devoted, and pure-minded daughter-in-law like you has rescued it.'" (43) |
| 283 | 3-20-298 | मार्कण्डेय उवाच तथा प्रशस्य ह्याभिपूज्य चैव वरस्त्रियं तामृषयः समागताः । नरेन्द्रमामन्त्र्य सपुत्रमञ्जसा शिवेन जम्मुर्मुदिताः स्वमालयम् ॥44॥ |
मार्कण्डेयजी कहते हैं—युधिष्ठिर! इस प्रकार वहाँ आये हुए महर्षियोंने स्त्रियोंमें श्रेष्ठ सावित्रीकी भूरि-भूरि प्रशंसा तथा आदर-सत्कार करके पुत्रसहित राजा द्युमत्सेनकी अनुमति ले सुख और प्रसन्नताके साथ अपने-अपने घरको प्रस्थान किया ॥44॥ | Markandeya says, "Yudhishthira! Thus, the visiting sages praised and honored the best of women, Savitri, and then, with the permission of King Dyumatsen, departed for their homes with joy and satisfaction." (44) |
| 284 | 3-20-298 | इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि पतिव्रतामाहात्म्यपर्वणि सावित्र्युपाख्याने अष्टनवत्यधिकद्वधिशततमोऽध्यायः ॥298॥ | इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत पतिव्रतामाहात्म्यपर्वमें सावित्री- उपाख्यानविषयक दौ सौ अद्ठानबेवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥298॥ | "Thus ends the two hundred and ninety-eighth chapter, Savitri's narrative, in the section on the greatness of a devoted wife, within the Vana Parva of the Shri Mahabharata." (298) |
| 285 | 3-20-299 | नवनवर्त्याधिकद्धिशततमोऽध्यायः | दो सौ निन्यानबेवो अध्याय | Chapter 299 |
| 286 | 3-20-299 | शाल्वदेशकी प्रजाके अनुरोधसे महाराज द्युमत्सेनका राज्याभिषेक कराना तथा सावित्रीको सौ पुत्रों और सौ भाइयोंकी प्राप्ति | शाल्वदेशकी प्रजाके अनुरोधसे महाराज द्युमत्सेनका राज्याभिषेक कराना तथा सावित्रीको सौ पुत्रों और सौ भाइयोंकी प्राप्ति | The Coronation of Maharaja Dyumatsena at the Request of the People of the Shalva Country, and Savitri's Obtaining a Hundred Sons and a Hundred Brothers |
| 287 | 3-20-299 | मार्कण्डेय उवाच तस्यां रात्र्यां व्यतीतायामुदिते सूर्यमण्डले । कृतपौर्वाल्लिकाः सर्वे समेयुस्ते तपोधनाः ॥1॥ |
मार्कण्डेयजी कहते हैं-जब वह रात बीत गयी और सूर्यमण्डलका उदय हुआ, उस समय सब तपोधन ऋषिगण पूर्वाह्नकालका नित्यकृत्य पूरा करके पुनः उस आश्रममें एकत्र हुए ॥1॥ | Markandeya says, "When that night passed and the orb of the sun arose, all the ascetics, having completed their morning rituals, gathered again in that hermitage. [1] |
| 288 | 3-20-299 | तदेव सर्व सावित्र्या महाभाग्यं महर्षयः । द्युमत्सेनाय नातृप्यन् कथयन्तः पुनः पुनः ॥2॥ |
वे महर्षिगण राजा द्युमत्सेनसे सावित्रीके उस परम सौभाग्यका बारंबार वर्णन करते हुए भी तृप्त नहीं होते थे ॥ | Those great sages were never tired of repeatedly describing the supreme good fortune of Savitri to King Dyumatsena. [2] |
| 289 | 3-20-299 | ततः प्रकृतयः सर्वाः शाल्वेभ्योऽभ्यागता नृप । आचख्युर्निहतं चैव स्वेनामात्येन तं द्विषम् ॥3॥ |
राजन्! उसी समय शाल्वदेशसे वहाँकी सारी प्रजाओंने आकर महाराज ह्युमत्सेनसे कहा-'प्रभो! आपका शत्रु अपने ही मन्त्रीके हाथों मारा गया है” ॥3॥ | O King! At that very moment, all the people from the Shalva country came there and said to Maharaja Dyumatsena, 'O Lord! Your enemy has been killed by his own minister.' [3] |
| 290 | 3-20-299 | तं मन्त्रिणा हतं श्रुत्वा ससहायं सबान्धवम् । न्यवेदयन् यथावृत्तं विद्रुतं च द्विषद्बलम् ॥4॥ ऐकमत्यं च सर्वस्य जनस्याथ नृपं प्रति । सचक्षुर्वाप्यचक्षुर्वा स नो राजा भवत्विति ॥5॥ |
उन्होंने यह भी निवेदन किया कि “उसके सहायक और बन्धु-बान्धव भी मन्त्रीके ही हाथों मर चुके हैं। शत्रुकी सारी सेना पलायन कर गयी है। यह यथावत् वृत्तान्त सुनकर सब लोगोंका एकमतसे यह निश्चय हुआ है कि हमें पूर्व नरेशपर ही विश्वास है। उन्हें दिखायी देता हो या न दीखता हो, वे ही हमारे राजा हों! ॥ 4-5॥ | They also reported that, 'His supporters and relatives have also been killed by the minister. The enemy's entire army has fled. Having heard this true account, everyone has unanimously decided that we have faith in the former king. Whether he can see or not, he should be our king! [4-5] |
| 291 | 3-20-299 | अनेन निश्चयेनेह वयं प्रस्थापिता नृप । प्राप्तानीमानि यानानि चतुरङ्गं च ते बलम् ॥6॥ |
'नरेश्वर! ऐसा निश्चय करके ही हमें यहाँ भेजा गया है। ये सवारियाँ प्रस्तुत हैं और आपकी चतुरंगिणी सेना भी सेवामें उपस्थित है” ॥6॥ | O Lord of men! Having made this decision, we have been sent here. These mounts are ready, and your four-limbed army is also present in your service.' [6] |
| 292 | 3-20-299 | प्रयाहि राजन् भद्रं ते घुष्टस्ते नगरे जयः । अध्यास्स्व चिररात्राय पितृपैतामहं पदम् ॥7॥ |
'राजन्! आपका कल्याण हो। अब अपने राज्यमें पधारिये। नगरमें आपकी विजय घोषित कर दी गयी है। आप दीर्घकालतक अपने बाप-दादोंके राज्यपर प्रतिष्ठित रहें! ॥7॥ | O King! May you be well. Now, please go to your kingdom. Your victory has been proclaimed in the city. May you be established on the kingdom of your ancestors for a long time!' [7] |
| 293 | 3-20-299 | चक्षुष्मन्तं च तं दृष्ट्वा राजानं वपुषान्वितम् । मूर्ध्ना निपतिताः सर्वे विस्मयोत्फुल्ललोचनाः ॥8॥ |
तत्पश्चात् राजा द्युमत्सेनको नेत्रयुक्त और स्वस्थ शरीरसे सुशोभित देखकर उन सबके नेत्र आश्चर्यसे खिल उठे और सबने मस्तक झुकाकर उन्हें प्रणाम किया ॥8॥ | Thereafter, seeing King Dyumatsena endowed with eyesight and a healthy body, everyone's eyes widened with wonder, and they bowed their heads in reverence to him. [8] |
| 294 | 3-20-299 | ततोऽभिवाद्य तान् वृद्धान् द्विजानाश्रमवासिनः । तैश्चाभिपूजितः सर्वैः प्रययौ नगरं प्रति ॥9॥ |
इसके बाद राजाने आश्रममें रहनेवाले उन वृद्ध ब्राह्मणोंका अभिवादन किया और उन सबसे समादृत हो वे अपनी राजधानीकी ओर चले ॥9॥ | After this, the king greeted the elderly Brahmins living in the hermitage, and, honored by them all, he set out towards his capital. [9] |
| 295 | 3-20-299 | शैब्या च सह सावित्र्या स्वास्तीर्णेन सुवर्चसा । नरयुक्तेन यानेन प्रययौ सेनया वृता ॥10॥ |
शैब्या भी अपनी बहू सावित्रीके साथ सुन्दर बिछावनसे युक्त तेजस्वी शिबिकापर, जिसे कई कहार ढो रहे थे, आरूढ़ हो सेनासे घिरी हुई चल दी ॥10॥ | Shaibya, along with her daughter-in-law Savitri, seated on a splendid, radiant palanquin carried by many bearers, proceeded surrounded by the army. [10] |
| 296 | 3-20-299 | ततोऽभिषिषिचुः प्रीत्या द्युमत्सेनं पुरोहिताः । पुत्रं चास्य महात्मानं यौवराज्येऽभ्यषेचयन् ॥11॥ |
वहाँ पहुँचनेपर पुरोहितोंने बड़ी प्रसन्नताके साथ द्युमत्सेनका राज्याभिषेक किया। साथ ही उनके महामना पुत्र सत्यवानूको भी युवराजके पदपर अभिषिक्त कर दिया ॥11॥ | Upon reaching there, the priests joyfully coronated Dyumatsena. At the same time, his noble-minded son Satyavan was also anointed as the crown prince. [11] |
| 297 | 3-20-299 | ततः कालेन महता सावित्र्याः कीर्तिवर्धनम् । तद् वै पुत्रशतं जज्ञे शूराणामनिवर्तिनाम् ॥12॥ |
तदनन्तर दीर्घकालके पश्चात् सावित्रीके गर्भसे उसकी कीर्ति बढ़ानेवाले सौ पुत्र उत्पन्न हुए। वे सब-के-सब शूरवीर तथा संग्राममे कभी पीछे न हटनेवाले थे ॥12॥ | Then, after a long time, Savitri gave birth to a hundred sons who increased her fame. All of them were brave and never retreated in battle. [12] |
| 298 | 3-20-299 | | शा सोवा च तथैवास्याभवच्छतम् । श्वपतेर्मालव्यां सुमहद् बलम् ॥13॥ |
इसी प्रकार मद्रराज अश्वपतिके भी मालवीके गर्भसे सावित्रीके सौ सहोदर भाई उत्पन्न हुए, जो अत्यन्त बलशाली थे ॥13॥ | Similarly, from Malavi's womb, King Ashwapati of Madra also had a hundred uterine brothers of Savitri, who were extremely powerful. [13] |
| 299 | 3-20-299 | एवमात्मा पिता माता श्वश्रूः श्वशुर एव च । भर्तुः कुलं च सावित्र्या सर्व कृच्छ्रात् समुद्धृतम् ॥14॥ |
इस तरह सावित्रीने अपने आपको, पिता-माताको, सास-ससुरको तथा पतिके समस्त कुलको भी भारी संकटसे बचा लिया था ॥14॥ | In this way, Savitri saved herself, her parents, her in-laws, and the entire lineage of her husband from great calamity. [14] |
| 300 | 3-20-299 | तथैवैषा हि कल्याणी द्रौपदी शीलसम्मता । तारयिष्यति वः सर्वान् सावित्रीव कुलाङ्गना ॥15॥ |
सावित्रीकी ही भाँति यह कल्याणमयी उत्तम कुलवाली सुशीला द्रौपदी तुम सब लोगोंका महान् संकटसे उद्धार करेगी ॥15॥ | Like Savitri, this auspicious, noble-natured Draupadi will rescue all of you from great distress. [15] |
| 301 | 3-20-299 | वैशम्पायन उवाच एवं स पाण्डवस्तेन अनुनीतो महात्मना । विशोको विज्वरो राजन् काम्यके न्यवसत् तदा ॥16॥ |
वैशम्पायनजी कहते हैं-जनमेजय! इस प्रकार उन महात्मा मार्कण्डेयजीके समझाने-बुझाने और आश्वासन देनेपर उस समय पाण्डुनन्दन राजा युधिष्ठिर शोक तथा चिन्तासे रहित हो काम्यकवनमें सुखपूर्वक रहने लगे ॥16॥ | Vaishampayana says, "O Janamejaya! Thus, after being consoled and reassured by that great soul Markandeya, the Pandava king Yudhishthira, free from sorrow and anxiety, lived happily in the Kamyaka forest. [16] |
| 302 | 3-20-299 | यश्चेदं शृणुयाद् भक्त्या सावित्र्याख्यानमुत्तमम् । स सुखी सर्वसिद्धार्थो न दुःखं प्राप्नुयान्नरः ॥17॥ |
जो इस परम उत्तम सावित्री-उपाख्यानको भक्तिभावसे सुनेगा, वह मनुष्य सदा अपने समस्त मनोरथोंके सिद्ध होनेसे सुखी होगा और कभी दुःख नहीं पायेगा ॥17॥ | Whoever listens with devotion to this most excellent Savitri narrative will always be happy with the fulfillment of all their desires and will never experience sorrow. [17] |
| 303 | 3-20-299 | इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि पतिव्रतामाहात्म्यपर्वणि सावित्र्युपाख्याने नवनवत्यधिकद्वधिशततमोऽध्यायः ॥299॥ | इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत पतिव्रतामाहात्म्यपर्वमें सावित्री- उपाख्यानविषयक दो सौ निन्यानबेवो अध्याय पूरा हुआ ॥299॥ | Thus ends the two hundred ninety-ninth chapter relating to the anecdote of Savitri in the 'Pativrata Mahatmya Parva' section of the 'Vana Parva' of the Srimahabharata." [299] |