| Verse | Hindi | English |
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| Pramadvara and Ruru, story about true Love and Marriage. | ||
| अष्टमोऽध्यायः | आठवाँ अध्याय | Chapter Eight |
| प्रमद्वराका जन्म, रुरुके साथ उसका वाग्दान तथा विवाहके पहले ही साँपके काटनेसे प्रमद्वराकी मृत्यु | प्रमद्वराका जन्म, रुरुके साथ उसका वाग्दान तथा विवाहके पहले ही साँपके काटनेसे प्रमद्वराकी मृत्यु | The Birth of Pramadvara, Her Betrothal to Ruru, and Pramadvara’s Death from a Snakebite Before the Wedding |
| सौतिरुवाच स चापि च्यवनो ब्रह्मन् भार्गवोऽजनयत् सुतम् । सुकन्यायां महात्मानं प्रमतिं दीप्ततेजसम् ॥1॥ प्रमतिस्तु रुरुं नाम घृताच्यां समजीजनत् । रुरुः प्रमद्वरायां तु शुनकं समजीजनत् ॥2॥ |
उग्रश्रवाजी कहते है-ब्रह्मन्! भृगुपुत्र च्यवनने अपनी पत्नी सुकन्याके गर्भसे एक पुत्रको जन्म दिया, जिसका नाम प्रमति था। महात्मा प्रमति बड़े तेजस्वी थे। फिर प्रमतिने घृताची अप्सरासे रुरु नामक पुत्र उत्पन्न किया तथा रुरुके द्वारा प्रमद्वराके गर्भसे शुनकका जन्म हुआ ॥ 1-2॥ | Ugrashrava said: O Brahmin! Bhrigu’s son Chyavana had a son from his wife Sukanya, named Pramati. The great soul Pramati was very radiant. Then Pramati begot a son named Ruru from the Apsara Ghritachi, and from Pramadvara through Ruru, Shunaka was born. ॥ 1-2 ॥ |
| (शौनकस्तु महाभाग शुनकस्य सुतो भवान् । ) शुनकस्तु महासत्त्वः सर्वभार्गवनन्दनः । जातस्तपसि तीव्रे च स्थितः स्थिरयशास्ततः ॥3॥ |
महाभाग शौनकजी! आप शुनकके ही पुत्र होनेके कारण “शौनकः कहलाते हैं। शुनक महान् सत्त्वगुणसे सम्पन्न तथा सम्पूर्ण भृगुवंशका आनन्द बढ़ानेवाले थे। वे जन्म लेते ही तीव्र तपस्यामें संलग्न हो गये। इससे उनका अविचल यश सब ओर फैल गया ॥3॥ | O great-souled Shaunaka! You are called “Shaunaka” because you are the son of Shunaka. Shunaka was endowed with great Sattva Guna (quality of goodness) and brought joy to the entire Bhrigu dynasty. He became engaged in intense penance from birth. As a result, his unwavering fame spread everywhere. ॥ 3 ॥ |
| तस्य ब्रह्मन् रुरोः सर्व चरितं भूरितेजसः । विस्तरेण प्रवक्ष्यामि तच्छृणु त्वमशेषतः ॥4॥ |
ब्रह्मन्! मैं महातेजस्वी रुरुके सम्पूर्ण चरित्रका विस्तारपूर्वक वर्णन करूँगा। वह सब- का-सब आप सुनिये ॥4॥ | O Brahmin! I will describe in detail the entire character of the highly radiant Ruru. Please listen to all of it. ॥ 4 ॥ |
| ऋषिरासीन्महान् पूर्व तपोविद्यासमन्वितः । स्थूलकेश इति ख्यातः सर्वभूतहिते रतः ॥5॥ |
पूर्वकालमें स्थूलकेश नामसे विख्यात एक तप और विद्यासे सम्पन्न महर्षि थे; जो समस्त प्राणियोंके हितमें लगे रहते थे ॥5॥ | In ancient times, there was a sage named Sthulakesha, renowned for his penance and knowledge, who was engaged in the welfare of all beings. ॥ 5 ॥ |
| एतस्मिन्नेव काले तु मेनकायां प्रजज्ञिवान् । गन्धर्वराजो विप्रर्षे विश्वावसुरिति स्मृतः ॥6॥ |
विप्रर्षे! इन्हीं महर्षिके समयकी बात है-गन्धर्वराज विश्वावसुने मेनकाके गर्भसे एक संतान उत्पन्न की ॥6॥ | O best of Brahmins! It was during the time of this sage that the Gandharva king Vishvavasu had a child from Menaka. ॥ 6 ॥ |
| अप्सरा मेनका तस्य तं गर्भ भृगुनन्दन । उत्ससर्ज यथाकालं स्थूलकेशाश्रमं प्रति ॥7॥ |
भृगुनन्दन! मेनका अप्सराने गन्धर्वराजद्वारा स्थापित किये हुए उस गर्भको समय पूरा होनेपर स्थूलकेश मुनिके आश्रमके निकट जन्म दिया ॥7॥ | O descendant of Bhrigu! The Apsara Menaka, after the gestation period, gave birth to that embryo conceived by the Gandharva king near the hermitage of Muni Sthulakesha. ॥ 7 ॥ |
| उत्सृज्य चैव तं गर्भ नद्यास्तीरे जगाम सा । अप्सरा मेनका ब्रह्मन् निर्दया निरपत्रपा ॥8॥ |
ब्रह्मन्! निर्दय और निर्लज्ज मेनका अप्सरा उस नवजात गर्भको वहीं नदीके तटपर छोड़कर चली गयी ॥8॥ | O Brahmin! The heartless and shameless Apsara Menaka left that newborn child, who was shining with divine splendor like a daughter of the gods, on the bank of the river and went away. ॥ 8 ॥ |
| कन्याममरगर्भाभां ज्वलन्तीमिव च श्रिया । तां ददर्श समुत्सृष्टां नदीतीरे महानृषिः ॥9॥ स्थूलकेशः स तेजस्वी विजने बन्धुवर्जिताम् । स तां दृष्ट्वा तदा कन्यां स्थूलकेशो महाद्विजः ॥10॥ जग्राह च मुनिश्रेष्ठः कृपाविष्टः पुपोष च । ववृधे सा वरारोहा तस्याश्रमपदे शुभे ॥11॥ |
तदनन्तर तेजस्वी महर्षि स्थूलकेशने एकान्त स्थानमें त्यागी हुई उस बन्धुहीन कन्याको देखा, जो देवताओंकी बालिकाके समान दिव्य शोभासे प्रकाशित हो रही थी। उस समय उस कन्याको वैसी दशामें देखकर द्विजश्रेष्ठ मुनिवर स्थूलकेशके मनमें बड़ी दया आयी; अतः वे उसे उठा लाये और उसका पालन-पोषण करने लगे। वह सुन्दरी कन्या उनके शुभ आश्रमपर दिनोदिन बढ़ने लगी ॥ 9-11॥ | Thereafter, the radiant Maharishi Sthulakesha saw that abandoned, friendless girl in a secluded place, shining with divine beauty like a celestial maiden. Seeing the girl in that condition, the best of the twice-born, the sage Sthulakesha, felt great compassion; therefore, he picked her up and nurtured her. That beautiful girl grew day by day in his auspicious hermitage. ॥ 9-11 ॥ |
| जातकाद्याः क्रियाश्चास्या विधिपूर्वं यथाक्रमम् । स्थूलकेशो महाभागश्चकार सुमहानृषिः ॥12॥ |
महाभाग महर्षि स्थूलकेशने क्रमशः उस बालिकाके जात-कर्मादि सब संस्कार विधिपूर्वक सम्पन्न किये ॥12॥ | The great sage Sthulakesha duly performed all the rituals like Jata-karma (birth ceremony) for that girl. ॥ 12 ॥ |
| प्रमदाभ्यो वरा सा तु सत्त्वरूपगुणान्विता । ततः प्रमद्वरेत्यस्या नाम चक्रे महानृषिः ॥13॥ |
वह बुद्धि, रूप और सब उत्तम गुणोंसे सुशोभित हो संसारकी समस्त प्रमदाओं (सुन्दरी स्त्रियों)-से श्रेष्ठ जान पड़ती थी; इसलिये महर्षिने उसका नाम 'प्रमद्वरा' रख दिया ॥13॥ | She was adorned with intelligence, beauty, and all excellent qualities, and appeared superior to all the Pramadas (beautiful women) in the world; therefore, the sage named her ‘Pramadvara’. ॥ 13 ॥ |
| तामाश्रमपदे तस्य रुरुर्दष्ट्वा प्रमद्वराम् । बभूव किल धर्मात्मा मदनोपहतस्तदा ॥14॥ |
एक दिन धर्मात्मा रुरुने महर्षिके आश्रममें उस प्रमद्वराको देखा। उसे देखते ही उनका हृदय तत्काल कामदेवके वशीभूत हो गया ॥14॥ | One day, the righteous Ruru saw that Pramadvara in the sage’s hermitage. Upon seeing her, his heart was immediately captivated by the god of love, Kamadeva. ॥ 14 ॥ |
| पितरं सखिभिः सोऽथ श्रावयामास भार्गवम् । प्रमतिश्चाभ्ययाचत् तां स्थूलकेशं यशस्विनम् ॥15॥ |
तब उन्होने मित्रोंद्वारा अपने पिता भृगुवंशी प्रमतिको अपनी अवस्था कहलायी। तदनन्तर प्रमतिने यशस्वी स्थूलकेश मुनिसे (अपने पुत्रके लिये) उनकी वह कन्या माँगी ॥15॥ | Then, through his friends, he conveyed his condition to his father, Pramati of the Bhrigu lineage. Thereafter, Pramati asked the illustrious sage Sthulakesha for his daughter (for his son). ॥ 15 ॥ |
| ततः प्रादात् पिता कन्यां रुरवे तां प्रमद्वराम् । विवाहं स्थापयित्वाग्रे नक्षत्रे भगदैवते ॥16॥ |
तब पिताने अपनी कन्या प्रमद्वराका रुरुके लिये वाग्दान कर दिया और आगामी उत्तरफाल्गुनी नक्षत्रमें विवाहका मुहूर्त निश्चित किया ॥16॥ | Then the father betrothed his daughter Pramadvara to Ruru and fixed the auspicious time for the wedding in the upcoming Uttara Phalguni Nakshatra. ॥ 16 ॥ |
| ततः कतिपयाहस्य विवाहे समुपस्थिते । सखीभिः क्रीडती सार्ध सा कन्या वरवर्णिनी ॥17॥ |
तदनन्तर जब विवाहका मुहूर्त निकट आ गया, उसी समय वह सुन्दरी कन्या सखियोंके साथ क्रीड़ा करती हुई वनमें घूमने लगी ॥17॥ | Thereafter, when the wedding time was near, that beautiful girl, playing with her friends, went for a walk in the forest. ॥ 17 ॥ |
| नापश्यत् सम्प्रसुप्तं वै भुजङ्गं तिर्यगायतम् । पदा चैनं समाक्रामन्मुमूर्षुः कालचोदिता ॥18॥ |
मार्गमें एक साँप चौड़ी जगह घेरकर तिरछा सो रहा था। प्रमद्वराने उसे नहीं देखा। वह कालसे प्रेरित होकर मरना चाहती थी, इसलिये सर्पको पैरसे कुचलती हुई आगे निकल गयी ॥18॥ | On the path, a snake was lying diagonally, blocking a wide space. Pramadvara did not see it. She was destined to die, so she stepped on the snake and moved forward. ॥ 18 ॥ |
| स तस्याः सम्प्रमत्तायाश्चोदितः कालधर्मणा । विषोपलिप्तान् दशनान् भूशमङ्गे न्यपातयत् ॥19॥ |
उस समय कालधर्मसे प्रेरित हुए उस सर्पने उस असावधान कन्याके अंगमें बड़े जोरसे अपने विषभरे दाँत गड़ा दिये ॥19॥ | At that time, that snake, driven by fate, forcefully sank its venomous fangs into the body of that unsuspecting girl. ॥ 19 ॥ |
| सा दष्टा तेन सर्पेण पपात सहसा भुवि । विवर्णा विगतश्रीका भ्रष्टाभरणचेतना ॥20॥ निरानन्दकरी तेषां बन्धूनां मुक्तमूर्धजा । व्यसुरप्रेक्षणीया सा प्रेक्षणीयतमाभवत् ॥21॥ |
उस सर्पके डँस लेनेपर वह सहसा पृथ्वीपर गिर पड़ी। उसके शरीरका रंग उड़ गया, शोभा नष्ट हो गयी, आभूषण इधर-उधर बिखर गये और चेतना लुप्त हो गयी। उसके बाल खुले हुए थे। अब वह अपने उन बन्धुजनोंके हृदयमें विषाद उत्पन्न कर रही थी। जो कुछ ही क्षण पहले अत्यन्त सुन्दरी एवं दर्शनीय थी, वही प्राणशून्य होनेके कारण अब देखनेयोग्य नहीं रह गयी ॥ 20-21॥ | When that snake bit her, she suddenly fell to the ground. The color of her body faded, her beauty was lost, her ornaments were scattered here and there, and her consciousness vanished. Her hair was disheveled. She, who was extremely beautiful and pleasing to the eye just a moment ago, was now causing sorrow in the hearts of her relatives because she was lifeless and no longer worth seeing. ॥ 20-21 ॥ |
| प्रसुप्ते वाभवच्चापि भुवि सर्पविषार्दिता । भूयो मनोहरतरा बभूव तनुमध्यमा ॥22॥ |
वह सर्पके विषसे पीड़ित होकर गाढ़ निद्रामें सोयी हुईकी भाँति भूमिपर पड़ी थी। उसके शरीरका मध्यभाग अत्यन्त कृश था। वह उस अचेतनावस्थामें भी अत्यन्त मनोहारिणी जान पड़ती थी ॥22॥ | Afflicted by the snake’s poison, she lay on the ground as if asleep in a deep slumber. The middle part of her body was very slender. Even in that unconscious state, she appeared extremely charming. ॥ 22 ॥ |
| ददर्श तां पिता चैव ये चैवान्ये तपस्विनः । विचेष्टमानां पतितां भूतले पद्मवर्चसम् ॥23॥ |
उसके पिता स्थूलकेशने तथा अन्य तपस्वी महात्माओंने भी आकर उसे देखा। वह कमलकी-सी कान्तिवाली किशोरी धरतीपर चेष्टारहित पड़ी थी ॥23॥ | Her father Sthulakesha and other ascetic Mahatmas also came and saw her. That lotus-complexioned maiden lay motionless on the earth. ॥ 23 ॥ |
| ततः सर्वे द्विजवराः समाजग्मुः कृपान्विताः । स्वस्त्यात्रेयो महाजानुः कुशिकः शङ्खमेखलः ॥24॥ उद्दालकः कठश्चैव श्वेतश्चैव महायशाः । भरद्वाजः कौणकुत्स्य आर््टिषेणोऽथ गौतमः ॥25॥ प्रमतिः सह पुत्रेण तथान्ये वनवासिनः । |
तदनन्तर स्वस्त्यात्रेय, महाजानु, कुशिक, शंखमेखल, उद्दालक, कठ, महायशस्वी श्वेत, भरद्वाज, कौणकुत्स्य, आर््टिषेण, गौतम, अपने पुत्र रुरुसहित प्रमति तथा अन्य सभी वनवासी श्रेष्ठ द्विज दयासे द्रवित होकर वहाँ आये ॥ 24-25॥ | Thereafter, Swastyatreya, Mahajanu, Kushika, Shankhamekhala, Uddalaka, Katha, the highly illustrious Shveta, Bharadvaja, Kaunakutsya, Artishana, Gautama, Pramati with his son Ruru, and all the other best of the forest-dwelling twice-born came there, filled with compassion. ॥ 24-25 ॥ |
| तां ते कन्यां व्यसुं दृष्ट्वा भुजङ्गस्य विषार्दिताम् ॥26॥ रुरुदुः कृपयाविष्टा रुरुस्त्वार्तो बहिर्ययौ । ते च सर्वे द्विजभ्रेष्ठास्तत्रैवोपाविशंस्तदा ॥27॥ |
वे सब लोग उस कन्याको सर्पके विषसे पीड़ित हो प्राणशून्य हुई देख करुणावश रोने लगे। रुरु तो अत्यन्त आर्त होकर वहाँसे बाहर चला गया और शेष सभी द्विज उस समय वहीं बैठे रहे ॥ 26-27॥ | Seeing that girl lifeless, afflicted by the snake’s poison, they all wept out of compassion. Ruru, extremely distressed, went away from there, and all the other twice-born remained sitting there at that time. ॥ 26-27 ॥ |
| इति श्रीमहाभारते आदिपर्वणि पौलोमपर्वणि प्रमद्धरासर्पदशेऽष्टमोऽध्यायः ॥8॥ | इस प्रकार श्रीमहाभारत आादिपर्वके अन्तर्गत पौलोगपर्वमें प्रमद्वराके सर्पदंशनसे सम्बन्ध रखनेवाला आठवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥8॥ | Thus ends the eighth chapter related to Pramadvara’s snakebite in the Pauloma Parva of the Adi Parva of the Shri Mahabharata. ॥ 8 ॥ |
| नवमोऽध्यायः | नर्व अध्याय | Chapter Nine |
| रुरुकी आधी आयुसे प्रमद्धराका जीवित होना, रुरुके साथ उसका विवाह, रुरुका सर्पोको मारनेका निश्चय तथा रुरु- डुण्डुभ-सवाद | रुरुकी आधी आयुसे प्रमद्धराका जीवित होना, रुरुके साथ उसका विवाह, रुरुका सर्पोको मारनेका निश्चय तथा रुरु- डुण्डुभ-सवाद | Pramadvara’s Revival with Half of Ruru’s Life, Her Marriage with Ruru, Ruru’s Determination to Kill Snakes, and the Dialogue between Ruru and Dundubha |
| सौतिरुवाच तेषु तत्रोपविष्टेषु ब्राह्मणेषु महात्मसु । रुरुश्चुक्रोश गहनं वनं गत्वातिदुःखितः ॥1॥ शोकेनाभिहतः सोऽथ विलपन् करुणं बहु । अब्रवीद् वचनं शोचन् प्रियां स्मृत्वा प्रमद्वराम् ॥2॥ शेते सा भुवि तन्वङ्गी मम शोकविवर्धिनी । बान्धवानां च सर्वेषां किं नु दुःखमतः परम् ॥3॥ |
उग्रश्रवाजी कहते हैं-शौनकजी! वे ब्राह्मण प्रमद्वराके चारों ओर वहाँ बैठे थे, उसी समय रुरु अत्यन्त दुःखित हो गहन वनमें जाकर जोर-जोरसे रुदन करने लगा। शोकसे पीड़ित होकर उसने बहुत करुणाजनक विलाप किया और अपनी प्रियतमा प्रमद्वराका स्मरण करके शोकमग्न हो इस प्रकार बोला--'हाय! वह कृशांगी बाला मेरा तथा समस्त बान्धवोंका शोक बढ़ाती हुई भूमिपर सो रही है; इससे बढ़कर दुःख और क्या हो सकता है? ॥ 1-3॥ | Ugrashrava said: O Shaunaka! While those Brahmins were sitting around Pramadvara there, Ruru, extremely distressed, went into the dense forest and began to weep loudly. Afflicted with grief, he lamented very sorrowfully and, remembering his beloved Pramadvara, spoke in this way, overwhelmed with sorrow: “Alas! That slender-bodied girl is lying on the ground, increasing the sorrow of myself and all my relatives; what could be a greater sorrow than this?” ॥ 1-3 ॥ |
| यदि दत्तं तपस्तप्तं गुरवो वा मया यदि । सम्यगाराधितास्तेन संजीवतु मम प्रिया ॥4॥ |
“यदि मैंने दान दिया हो, तपस्या की हो अथवा गुरुजनोंकी भलीभाँति आराधना की हो तो उसके पुण्यसे मेरी प्रिया जीवित हो जाय ॥4॥ | “If I have given charity, performed penance, or properly served my elders, then by the merit of that, may my beloved come back to life.” ॥ 4 ॥ |
| यथा च जन्मप्रभृति यतात्माहं धृतव्रतः । प्रमद्वरा तथा ह्योषा समुत्तिष्ठतु भामिनी ॥5॥ |
"यदि मैंने जन्मसे लेकर अबतक मन और इन्द्रियोंपर संयम रखा हो और ब्रह्मचर्य आदि व्रतोंका दृढठृतापूर्वक पालन किया हो तो यह मेरी प्रिया प्रमद्वरा अभी जी उठे” ॥5॥ | “If I have restrained my mind and senses from birth until now and have firmly observed vows like Brahmacharya (celibacy), then may this beloved Pramadvara of mine revive now.” ॥ 5 ॥ |
| (कृष्णे विष्णौ हृषीकेशे लोकेशेऽसुरविद्विषि । यदि मे निश्चला भक्तिर्मम जीवतु सा प्रिया ॥) |
"यदि पापी असुरोंका नाश करनेवाले, इन्द्रियोंके स्वामी जगदीश्वर एवं सर्वव्यापी भगवान् श्रीकृष्णमें मेरी अविचल भक्ति हो तो यह कल्याणी प्रमद्वरा जी उठे'। | "If I have unwavering devotion to Lord Krishna, the destroyer of sinful demons, the Lord of the senses and the omnipresent Lord, let this auspicious woman live." |
एवं लालप्यतस्तस्य भार्यार्थे दुःखितस्य च । देवदूतस्तदाभ्येत्य वाक्यमाह रुरु वने ॥6॥ |
इस प्रकार जब रुरु पत्नीके लिये दुःखित हो अत्यन्त विलाप कर रहा था, उस समय एक देवदूत उसके पास आया ओर वनमें रुरुसे बोला ॥6॥ | While Ruru was lamenting greatly in sorrow for his wife, a divine messenger came to him and spoke to Ruru in the forest. ॥ 6 ॥ |
| देवदूत उवाच अभिधत्से ह यद् वाचा रुरो दुःखेन तन्मृषा । यतो मर्त्यस्य धर्मात्मन् नायुरस्ति गतायुषः ॥7॥ गतायुरेषा कृपणा गन्धर्वाप्सरसोः सुता । तस्माच्छोके मनस्तात मा कृथास्त्वं कथंचन ॥8॥ |
देवदूतने कहा--धर्मात्मा रुरु! तुम दुःखसे व्याकुल हो अपनी वाणीद्वारा जो कुछ कहते हो, वह सब व्यर्थ है; क्योंकि जिस मनुष्यकी आयु समाप्त हो गयी है, उसे फिर आयु नहीं मिल सकती। यह बेचारी प्रमद्वरा गन्धर्व और अप्सराकी पुत्री थी। इसे जितनी आयु मिली थी, वह पूरी हो चुकी है। अतः तात! तुम किसी तरह भी मनको शोकमें न डालो ॥ 7-8॥ | The divine messenger said: O righteous Ruru! All that you say with your words, distressed by sorrow, is in vain; because a person whose lifespan is over cannot get life again. This poor Pramadvara was the daughter of a Gandharva and an Apsara. The lifespan she was allotted has been completed. Therefore, O son! Do not burden your mind with grief in any way. ॥ 7-8 ॥ |
| उपायश्चात्र विहितः पूर्व देवैर्महात्मभिः । तं यदीच्छसि कर्तु त्वं प्राप्स्यसीह प्रमद्वराम् ॥9॥ |
इस विषयमे महात्मा देवताओंने एक उपाय निश्चित किया है। यदि तुम उसे करना चाहो तो इस लोकमें प्रमद्वराको पा सकोगे ॥9॥ | In this matter, the great-souled gods have determined a solution. If you wish to do it, you can obtain Pramadvara in this world. ॥ 9 ॥ |
| रुरुरुवाच क उपायः कृतो देवैर्हि तत्त्वेन खेचर । करिष्येऽहं तथा श्रुत्वा त्रातुमर्हति मां भवान् ॥10॥ |
रुरु बोला-आकाशचारी देवदूत! देवताओंने कौन-सा उपाय निश्चित किया है, उसे ठीक-ठीक बताओ? उसे सुनकर मैं अवश्य वैसा ही करूगा। तुम मुझे इस दुःखसे बचाओ ॥10॥ | Ruru said: O celestial messenger! Tell me exactly what solution the gods have determined? Hearing it, I will surely do the same. Save me from this sorrow. ॥ 10 ॥ |
| देवदूत उवाच आयुषोउर्ध प्रयच्छ त्वं कन्यायै भृगुनन्दन । एवमुत्थास्यति रुरो तव भार्या प्रमद्वरा ॥11॥ |
देवदूतने कहा--भृगुनन्दन रुरु! तुम उस कन्याके लिये अपनी आधी आयु दे दो। ऐसा करनेसे तुम्हारी भार्या प्रमद्वरा जी उठेगी ॥11॥ | The divine messenger said: O descendant of Bhrigu, Ruru! Give half of your life for that girl. By doing so, your wife Pramadvara will come back to life. ॥ 11 ॥ |
| रुरुरुवाच आयुषोऽर्धं प्रयच्छामि कन्यायै खेचरोत्तम । शृङ्गाररूपाभरणा समुत्तिष्ठतु मे प्रिया ॥12॥ |
रुरु बोला-देवश्रेष्ठ! मैं उस कन्याको अपनी आधी आयु देता हूँ। मेरी प्रिया अपने शृंगार, सुन्दर रूप और आभूषणोंके साथ जीवित हो उठे ॥12॥ | Ruru said: O best of gods! I give half of my life to that girl. May my beloved revive with her adornments, beautiful form, and ornaments. ॥ 12 ॥ |
| सौतिरुवाच ततो गन्धर्वराजश्च देवदूतश्च सत्तमौ । धर्मराजमुपेत्येदं वचनं प्रत्यभाषताम् ॥13॥ |
उग्रश्रवाजी कहते हैं-तब गन्धर्वराज विश्वावसु और देवदूत दोनों सत्पुरुषोंने धर्मराजके पास जाकर कहा-- ॥13॥ | Ugrashrava says: Then the Gandharva king Vishvavasu and the divine messenger, both virtuous beings, went to Dharmaraja (Yama, the god of death) and said— ॥ 13 ॥ |
| धर्मराजायुषोऽर्धेन रुरोर्भार्या प्रमद्धरा । समुत्तिष्ठतु कल्याणी मृतैवं यदि मन्यसे ॥14॥ |
'धर्मराज! रुरुकी भार्या कल्याणी प्रमद्वरा मर चुकी है। यदि आप मान लें तो वह रुरुकी आधी आयुसे जीवित हो जाय” ॥14॥ | “O Dharmaraja! Ruru’s wife, the auspicious Pramadvara, has died. If you agree, she can come back to life with half of Ruru’s life.” ॥ 14 ॥ |
| धर्मराज उवाच प्रमद्वरां रुरोर्भार्या देवदूत यदीच्छसि । उत्तिष्ठत्वायुषोऽर्धेन रुरोरेव समन्विता ॥15॥ |
धर्मराज बोले--देवदूत! यदि तुम रुरुकी भार्या प्रमद्वराको जिलाना चाहते हो तो वह रुरुकी ही आधी आयुसे संयुक्त होकर जीवित हो उठे ॥15॥ | Dharmaraja said: O divine messenger! If you want to revive Ruru’s wife Pramadvara, then let her come back to life joined with half of Ruru’s life. ॥ 15 ॥ |
| सौतिरुवाच एवमुक्ते ततः कन्या सोदतिष्ठत् प्रमद्वरा । रुरोस्तस्यायुषोऽर्थन सुप्तेव वरवर्णिनी ॥16॥ |
उग्रश्रवाजी कहते है--धर्मराजके ऐसा कहते ही वह सुन्दरी मुनिकन्या प्रमद्वरा रुरुकी आधी आयुसे संयुक्त हो सोयी हुईकी भाँति जाग उठी ॥16॥ | Ugrashrava says: As soon as Dharmaraja said this, that beautiful daughter of the sage, Pramadvara, joined with half of Ruru’s life, woke up as if from sleep. ॥ 16 ॥ |
| एतद् दृष्टं भविष्ये हि रुरोरुत्तमतेजसः । आयुषोऽतिप्रवृद्धस्य भार्यार्थेऽर्धमलुप्यत ॥17॥ तत इष्टेऽहनि तयोः पितरौ चक्रतुर्मुदा । विवाहं तौ च रेमाते परस्परहितैषिणौ ॥18॥ |
उत्तम तेजस्वी रुरुके भाग्यमें ऐसी बात देखी गयी थी। उनकी आयु बहुत बढ़ी-चढ़ी थी। जब उन्होंने भार्याके लिये अपनी आधी आयु दे दी, तब दोनोंके पिताओंने निश्चित दिनमें प्रसन्रतापूर्वक उनका विवाह कर दिया। वे दोनों दम्पति एक-दूसरेके हितैषी होकर आनन्दपूर्वक रहने लगे ॥ 17-18॥ | Such a thing was seen in the fate of the highly radiant Ruru. His lifespan was very long. When he gave half of his life for his wife, then the fathers of both of them happily arranged their marriage on the appointed day. Those two couples, wishing each other’s welfare, began to live happily. ॥ 17-18 ॥ |