| Verse | Hindi | English |
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| Story of King Nala and Damayanthi. | ||
| बृहदश्च उवाच शृणू राजन्नवहितः सह भ्रातृभिरच्युत । यस्त्वत्तो दुःखिततरो राजाऽऽसीत् पृथिवीपते ॥54॥ |
बृहदश्चने कहा-राजन्! अपने धर्मसे कभी च्युत न होनेवाले भूपाल! तुम भाइयोंसहित सावधान होकर सुनो। इस पृथ्वीपर जो तुमसे भी अधिक दुःखी राजा था, उसका परिचय देता हूँ ॥54॥ | Brihadashva said: O king! O king who never deviates from dharma! Listen carefully along with your brothers. I will introduce you to a king who was even more sorrowful than you on this earth. |
| निषधेषु महीपालो वीरसेन इति श्रुतः । तस्य पुत्रोऽभवन्नाम्ना नलो धर्मार्थकोविदः ॥55॥ |
निषधदेशमें वीरसेन नामे प्रसिद्ध एक भूपाल हो गये हैं। उन्हींके पुत्रका नाम नल था। जो धर्म और अर्थके तत्त्वज्ञ थे ॥55॥ | There was a king named Virasena in the kingdom of Nishadha. His son's name was Nala, who was knowledgeable in dharma and artha. |
| स निकृत्या जितो राजा पुष्करेणेति नः श्रुतम् । वनवासं सुदुःखार्तो भार्यया न्यवसत् सह ॥56॥ |
हमने सुना है कि राजा नलको उनके भाई पुष्करने छलसे ही जूएके द्वारा जीत लिया था और वे अत्यन्त दुःखसे आतुर हो अपनी पत्नीके साथ वनवासका दुःख भोगने लगे थे ॥56॥ | We have heard that King Nala was deceitfully defeated in gambling by his brother Pushkara, and he, extremely distressed by sorrow, began to endure the suffering of exile with his wife. |
| न तस्य दासा न रथो न भ्राता न च बान्धवाः । वने निवसतो राजञ्छिष्यन्ते स्म कदाचन ॥57॥ |
राजन्! उनके साथ न सेवक थे न रथ, न भाई थे न बान्धव। वनमें रहते समय उनके पास ये वस्तुएँ कदापि शेष नहीं थीं ॥57॥ | O king! He had neither servants nor chariots, neither brothers nor relatives with him. While living in the forest, he had none of these things remaining. |
| भवान् हि संवृतो वीरेभ्रतृभिर्देवसम्मितैः । ब्रह्मकल्पैर्विजाग्रयैश्च तस्मान्नार्हसि शोचितुम् ॥58॥ |
तुम तो देवतुल्य पराक्रमी वीर भाइयोंसे घिरे हुए हो। ब्रह्माजीके समान तेजस्वी श्रेष्ठ ब्राह्मण तुम्हारे चारों ओर बैठे हुए हैं। | You are surrounded by your godlike, powerful, heroic brothers. Excellent brahmins, radiant like Brahma, are seated all around you. |
| अतः तुम्हें शोक नहीं करना चाहिये ॥ युधिषिर उवाच विस्तरेणाहमिच्छामि नलस्य सुमहात्मनः । चरितं वदतां श्रेष्ठ तन्ममाख्यातुमर्हसि ॥59॥ |
युधिष्ठिर बोले--वक्ताओंमें श्रेष्ठ मुने! मैं उत्तम महामना राजा नलका चरित्र विस्तारके साथ सुनना चाहता हूँ। आप मुझे बतानेकी कृपा करें ॥59॥ | Yudhishthira said: O best among speakers, sage! I wish to hear the story of the noble, great-minded King Nala in detail. Please do tell me. |
| इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि नलोपाख्यानपर्वणि द्विपञ्चाशत्तमोऽध्यायः ॥52॥ | इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत नलोपाख्यानपर्वमें बुहदश्चयुधििरसंवादविषयक बावनवाँ अध्याय पुरा हुआ ॥52॥ | Thus ends the fifty-second chapter entitled 'Conversation between Brihadashva and Yudhishthira' in the Nalopakhyana Parva of the Vana Parva of the Mahabharata. |
| त्रिपञ्चाशत्तमोऽध्यायः | तिरपनवाँ अध्याय | Chapter 53 |
| नल-दमयन्तीके गुणोंका वर्णन, उनका परस्पर अनुराग राग और हंसका दमयन्ती और नलको एक-दूसरेके संदेश सुनाना | नल-दमयन्तीके गुणोंका वर्णन, उनका परस्पर अनुराग राग और हंसका दमयन्ती और नलको एक-दूसरेके संदेश सुनाना | Describing the qualities of Nala-Damayanti, their mutual affection, melody and Hansa's Damayanti and Nala's narration of each other's messages |
| बृहदश्च उवाच आसीद् राजा नलो नाम वीरसेनसुतो बली । उपपन्नो गुणैरिष्टै रूपवानश्वकोविदः ॥1॥ |
बृहदश्चने कहा--धर्मराज! निषधदेशमें वीरसेनके पुत्र नल नामसे प्रसिद्ध एक बलवान् राजा हो गये हैं। वे उत्तम गुणोंसे सम्पन्न, रूपवान् और अश्वसंचालनकी कलामें कुशल थे ॥1॥ | Brihadashcha said, "Dharmaraja! In the Nishadhdesha, the son of Veerasena has become a powerful king known as Nala. He was endowed with excellent qualities, handsome and skilled in the art of horse riding. 1॥ |
| अतिष्ठन्मनुजेन्द्राणां मूर्ध्नि देवपतिर्यथा
। उपर्युपरि सर्वेषामादित्य इव तेजसा ॥2॥ ब्रह्मण्यो वेदविच्छूरो निषधेषु महीपतिः । अक्षप्रियः सत्यवादी महानक्षौहिणीपतिः ॥3॥ |
जैसे देवराज इन्द्र सम्पूर्ण देवताओंके शिरमौर हैं, उसी प्रकार राजा नलका स्थान समस्त राजाओंके ऊपर था। वे तेजमें भगवान् सूर्यके समान सर्वोपरि थे। निषधदेशके महाराज नल बड़े ब्राह्मणभक्त, वेदवेत्ता, शूरवीर, झूत-क्रीड़ाके प्रेमी, सत्यवादी, महान् और एक अक्षौहिणी सेनाके स्वामी थे ॥ 2-3॥ | Just as Devraj Indra is the head of all the gods, similarly King Nal's place was above all the kings. He was supreme like the sun in radiance. King Nala of Nishadhdesh was a great Brahmin, a Veda-scholar, a valiant, a lover of lies, a truth-teller, a great man, and the master of an Akshauhini army. 2-3॥ |
| ईप्सितो वरनारीणामुदारः संयतेन्द्रियः । रक्षिता धन्विनां श्रेष्ठः साक्षादिव मनुः स्वयम् ॥4॥ |
वे श्रेष्ठ स्त्रियोंको प्रिय थे और उदार, जितेन्द्रिय, प्रजाजनोंके रक्षक तथा साक्षात् मनुके समान धनुर्धरोमें उत्तम थे ॥4॥ | He was beloved by the best of women, and generous, of great senses, protector of the people, and the best of archers like the real man. 4॥ |
| तथैवासीद् विदर्भेषु भीमो भीमपराक्रमः । शूरः सर्वगुणैर्युक्तः प्रजाकामः स चाप्रजः ॥5॥ |
इसी प्रकार उन दिनों विदर्भदेशमें भयानक पराक्रमी भीम नामक राजा राज्य करते थे। वे शूरवीर और सर्व-सदगुणसम्पन्न थे। उन्हें कोई संतान नहीं थी। | Similarly, in those days, a king named Bhima used to rule in Vidarbhadesh. They were brave and virtuous. They had no children. |
| अतः संतानप्राप्तिकी कामना उनके हृदयमें सदा बनी रहती थी
॥ स प्रजार्थे परं यत्नमकरोत् सुसमाहितः । तमभ्यगच्छद् ब्रह्मर्षिर्दमनो नाम भारत ॥6॥ |
भारत! राजा भीमने अत्यन्त एकाग्रचित्त होकर संतानप्राप्तिके लिये महान् प्रयत्न किया। उन्हीं दिनों उनके यहाँ दमन नामक ब्रह्मर्षि पधारे ॥6॥ | India! King Bhima was very concentrated and made a great effort to get children. In those days a Brahmarishi named Daman came to him. 6॥ |
| तं स भीम: प्रजाकामस्तोषयामास धर्मवित्
। महिष्या सह राजेन्द्र सत्कारेण सुवर्चसम् ॥7॥ तस्मै प्रसन्नो दमनः सभार्याय वरं ददौ । कन्यारत्नं कुमारांश्च त्रीनुदारान् महायशाः ॥8॥ |
राजेन्द्र! धर्मज्ञ तथा संतानकी इच्छावाले उस भीमने अपनी रानीसहित उन महातेजस्वी मुनिको पूर्ण सत्कार करके संतुष्ट किया। महायशस्वी दमन मुनिने प्रसन्न होकर पत्नीसहित राजा भीमको एक कन्या और तीन उदार पुत्र प्रदान किये ॥ 7-8॥ | Rajendra! The Bhima, who had a desire for a religious and a child, satisfied the great sage with full hospitality along with his queen. The great Emperor Daman was pleased and gave King Bhima a daughter and three generous sons along with his wife. 7-8॥ |
| दमयन्तीं दमं दान्तं दमनं च सुवर्चसम् । उपपन्नान् गुणैः सर्वैर्भीमान् भीमपराक्रमान् ॥9॥ |
कन्याका नाम था दमयन्ती और पुत्रोंके नाम थे-दम, दान्त तथा दमन। ये सभी बड़े तेजस्वी थे। राजाके तीनों पुत्र गुणसम्पन्न, भयंकर वीर और भयानक पराक्रमी थे ॥9॥ | The girl's name was Damayanti and the sons' names were Dam, Danta and Daman. They were all very stunning. The three sons of the king were virtuous, fiercely valiant, and terribly mighty. 9॥ |
| दमयन्ती तु रूपेण तेजसा यशसा श्रिया । सौभाग्येन च लोकेषु यशः प्राप सुमध्यमा ॥10॥ |
सुन्दर कटिप्रदेशवाली दमयन्ती रूप, तेज, यश, श्री और सौभाग्यके द्वारा तीनों लोकोंमें विख्यात यशस्विनी हुई ॥10॥ | Damayanti, who was beautifully cut, became famous in the three worlds by her form, Tej, Yashas, Sri, and Saubhagya. 10॥ |
| अथ तां वयसि प्राप्ते दासीनां समलंकृताम् । शतं शतं सखीनां च पर्युपासच्छचीमिव ॥11॥ |
जब उसने युवावस्थामें प्रवेश किया, उस समय सौ दासियाँ और सौ सखियाँ वस्त्राभूषणोंसे अलंकृत हो सदा उसकी सेवामें उपस्थित रहती थीं। मानो देवांगनाएँ शचीकी उपासना करती हों ॥11॥ | When she entered her youth, a hundred maids and a hundred friends, adorned with robes, were always at her service. It is as if the gods worship Shachiki. 11॥ |
| तत्र स्म राजते भैमी सर्वाभरणभूषिता । सखीमध्येऽनवद्याङ्गी विद्युत्सौदामनी यथा ॥12॥ |
अनिन्ह सुन्दर अंगोंवाली भीमकुमारी दमयन्ती सब प्रकारके आभूषणोंसे विभूषित हो सखियोंकी मण्डलीमें वैसी ही शोभा पाती थी, जैसे मेघमालाके बीच विद्युत् प्रकाशित हो रही हो ॥12॥ | Bhimakumari Damayanti, with her beautiful limbs, adorned with all kinds of ornaments, adorned with all kinds of ornaments, was adorned with the beauty of a group of friends, like a lightning light in the midst of a garland of clouds. 12॥ |
| अतीव रूपसम्पन्ना श्रीरिवायतलोचना । न देवेषु न यक्षेषु तादृग् रूपवती क्वचित् ॥13॥ |
वह लक्ष्मीके समान अत्यन्त सुन्दर रूपसे सुशोभित थी। उसके नेत्र विशाल थे। देवताओं और यक्षम भी वैसी सुन्दरी कन्या कहीं देखनेमें नहीं आती थी ॥13॥ | She was very beautifully adorned like Lakshmi. His eyes were huge. Even the gods and Yakshams were nowhere to be seen such a beautiful girl. 13॥ |
| मानुषेष्वपि चान्येषु दृष्टपूर्वाथवा श्रुता । चित्तप्रसादनी बाला देवानामपि सुन्दरी ॥14॥ |
मनुष्यों तथा अन्य वर्गके लोगोंमें भी वैसी सुन्दरी पहले न तो कभी देखी गयी थी और न सुननेमें ही आयी थी। उस बालाको देखते ही चित्त प्रसन्न हो जाता था। वह देववर्गमें भी श्रेष्ठ सुन्दरी समझी जाती थी ॥14॥ | Such beauty had never been seen or heard before in men and other classes of people. On seeing that child, the mind was happy. She was considered to be the best beauty even among the gods. 14॥ |
| नलश्च नरशार्दूलो लोकेष्वप्रतिमो भुवि । कन्दर्प इव रूपेण मूर्तिमानभवत् स्वयम् ॥15॥ |
नरश्रेष्ठ नल भी इस भूतलके मनुष्योमे अनुपम सुन्दर थे। उनका रूप देखकर ऐसा जान पड़ता था, मानो नलके आकारमें स्वयं मूर्तिमान् कामदेव ही उत्पन्न हुआ हो ॥15॥ | The best of the human beings on this ground floor were also unparalleled and beautiful. His appearance looked as if the idol Kamadeva himself had been born in the form of a tap. 15॥ |
| तस्याः समीपे तु नलं प्रशशंसुः कुतूहलात् । नैषधस्य समीपे तु दमयन्तीं पुनः पुनः ॥16॥ |
लोग कौतूहलवश दमयन्तीके समीप नलकी प्रशंसा करते थे और निषधराज नलके निकट बार-बार दमयन्तीके सौन्दर्यकी सराहना किया करते थे ॥16॥ | Out of curiosity the people used to admire the Nal near Damayanti and the Nishadharja used to admire Damayanti's beauty again and again near Nala. 16॥ |
| तयोरदृष्टः कामोऽभूच्छ्ण्वतोः सततं गुणान् । अन्योन्यं प्रति कौन्तेय स व्यवर्धत हृच्छयः ॥17॥ |
कुन्तीनन्दन! इस प्रकार निरन्तर एक-दूसरेके गुणोंको सुनते-सुनते उन दोनोंमें बिना देखे ही परस्पर काम (अनुराग) उत्पन्न हो गया। उनकी वह कामना दिन-दिन बढ़ती ही चली गयी ॥17॥ | Kuntinandan! In this way, continually listening to each other's virtues, they arose in each other's lust without even looking at them. That desire of theirs increased day by day. 17॥ |
| अशक्नुवन् नलः कामं तदा धारयितुं हृदा । अन्तःपुरसमीपस्थे वन आस्ते रहोगतः ॥18॥ |
जब राजा नल उस कामवेदनाको हृदयके भीतर छिपाये रखनेमें असमर्थ हो गये, तब वे अन्तःपुरके समीपवर्ती उपवनमें जाकर एकान्तमें बैठ गये ॥18॥ | When King Nala was unable to conceal the sexual anguish in his heart, he went to the grove near the inner city and sat down in solitude. 18॥ |
| स ददर्श ततो हंसान् जातरूपपरिष्कृतान् । वने विचरतां तेषामेकं जग्राह पक्षिणम् ॥19॥ |
इतनेहीमें उनकी दृष्टि कुछ हंसोंपर पड़ी, जो सुवर्णमय पंखोंसे विभूषित थे। वे उसी उपवनमें विचर रहे थे। राजाने उनमेंसे एक हंसको पकड़ लिया ॥19॥ | At this moment his eyes fell on some swans, adorned with golden feathers. They were wandering in the same garden. The king caught one of the swans. 19॥ |
| ततोऽन्तरिक्षगो वाचं व्याजहार नलं तदा । हन्तव्योऽस्मि न ते राजन् करिष्यामि तव प्रियम् ॥20॥ |
तब आकाशचारी हंसने उस समय नलसे कहा--'राजन्! आप मुझे न मारें। मैं आपका प्रिय कार्य करूँगा ॥ | Then Akashachari laughed and said to Nala, 'O king! Don't kill me. I will do your dear work. |
| नि दमयन्तीसकाशे त्वां कथयिष्यामि नैषध । यथा त्वदन्यं पुरुषं न सा मंस्यति कर्हिचित् ॥21॥ |
'निषधनरेश! मैं दमयन्तीके निकट आपकी ऐसी प्रशंसा करूंगा, जिससे वह आपके सिवा दूसरे किसी पुरुषको मनमें कभी स्थान न देगी” ॥21॥ | 'Nishdhanresh! I will praise you in such a way that she will never give place to any man except you." 21॥ |
| एवमुक्तस्ततो हंसमुत्ससर्ज महीपतिः । ते तु हंसाः समुत्पत्य विदर्भानगमंस्ततः ॥22॥ |
हंसके ऐसा कहनेपर राजा नलने उसे छोड़ दिया। फिर वे हंस वहाँसे उड़कर विदर्भदेशमें गये ॥22॥ | When he laughed and said this, King Nal left him. Then the swans flew away from there to Vidarbhadesh. 22॥ |
| विदर्भनगरीं गत्वा दमयन्त्यास्तदान्तिके । निपेतुस्ते गरुत्मन्तः सा ददर्श च तान् खगान् ॥23॥ |
तब विदर्भनगरीमें जाकर वे सभी हंस दमयन्तीके निकट उतरे। दमयन्तीने भी उन अद्भूत पक्षियोंको देखा ॥23॥ | Then they went to the city of Vidarbha and descended near Hans Damayanti. Damayanti also saw those wonderful birds. 23॥ |
| सा तानद्भुतरूपान् वै दृष्ट्वा सखिगणावृता । हृष्टा ग्रहीतुं खगमांस्त्वरमाणोपचक्रमे ॥24॥ |
सखियोंसे घिरी हुई राजकुमारी दमयन्ती उन अपूर्व पक्षियोंको देखकर बहुत प्रसन्न हुई और तुरंत ही उन्हें पकड़नेकी चेष्टा करने लगी ॥24॥ | Princess Damayanti, surrounded by her friends, was very pleased to see those extraordinary birds and immediately started trying to catch them. 24॥ |
| अथ हंसा विससृपुः सर्वतः प्रमदावने । एकैकशस्तदा कन्यास्तान् हंसान् समुपाद्रवन् ॥25॥ |
तब हंस उस प्रमदावनमें सब ओर विचरण करने लगे। उस समय सभी राजकन्याओंने एक-एक करके उन सभी हंसोंका पीछा किया ॥25॥ | Then the swans began to wander everywhere in that Pramadavana. At that time all the princesses chased all the swans one by one. 25॥ |
| दमयन्ती तु यं हंसं समुपाधावदन्तिके । स मानुषीं गिरं कृत्वा दमयन्तीमथाब्रवीत् ॥26॥ |
दमयन्ती जिस हंसके निकट दौड़ रही थी, उसने उससे मानवी वाणीमें कहा -- ॥26॥ | Damayanti said to the swan near whom she was running in a human voice :. 26॥ |
| दमयन्ति नलो नाम निषधेषु महीपतिः । अश्विनोः सदृशो रूपे न समास्तस्य मानुषाः ॥27॥ |
“राजकुमारी दमयन्ती! सुनो, निषधदेशमें नल नामसे प्रसिद्ध एक राजा हैं, जो अश्चिनीकुमारोंके समान सुन्दर हैं। मनुष्योंमें तो कोई उनके समान है ही नहीं ॥27॥ | "Princess Damayanti! Listen, there is a king famous in the Nishadhadesh by the name of Nala, who is as handsome as the Ashchinikumaras. Among men, there is no one like him. 27॥ |
| कन्दर्प इव रूपेण मूर्तिमानभवत् स्वयम्
। तस्य वै यदि भार्या त्वं भवेथा वरवर्णिनि ॥28॥ सफलं ते भवेज्जन्म रूपं चेदं सुमध्यमे । वयं हि देवगन्धर्वमनुष्योरगराक्षसान् ॥29॥ दृष्टवन्तो न चास्माभिर्दष्टपूर्वस्तथाविधः । त्वं चापि रत्नं नारीणां नरेषु च नलो वरः ॥30॥ विशिष्टया विशिष्टेन संगमो गुणवान् भवेत् । |
“सुन्दरि! रूपकी दृष्टिसे तो वे मानो स्वयं मूर्तिमान् कामदेव-से ही प्रतीत होते हैं। सुमध्यमे! यदि तुम उनकी पत्नी हो जाओ तो तुम्हारा जन्म और यह मनोहर रूप सफल हो जाय। हमलोगोंने देवता, गन्धर्व, मनुष्य, नाग तथा राक्षसोंको भी देखा है; परंतु हमारी दृष्टिमें अबतक उनके-जैसा कोई भी पुरुष पहले कभी नहीं आया है। तुम रमणियोंमें रत्नस्वरूपा हो और नल पुरुषोंके मुकुटमणि हैं। यदि किसी विशिष्ट नारीका विशिष्ट पुरुषके साथ संयोग हो तो वह विशेष गुणकारी होता है" ॥ 28-30॥ | "Beautiful! Metamorphosically, he appeared to be the idol of Kamadeva himself. Good-natured! If you become his wife, your birth and this beautiful form will be successful. We have also seen gods, gandharvas, human beings, serpents and demons; But we have never seen a man like him before. You are the jewel of the delights, and you are the crown jewel of the male soul. If a particular woman is in combination with a particular man, she is particularly virtuous." 28-30॥ |
| एवमुक्ता तु हंसेन दमयन्ती विशाम्पते ॥31॥ अब्रवीत् तत्र तं हंसं त्वमप्येवं नले वद । तथेत्युक्त्वाण्डजः कन्यां विदर्भस्य विशाम्पते । पुनरागम्य निषधान् नले सर्व न्यवेदयत् ॥32॥ |
राजन्! हंसके इस प्रकार कहनेपर दमयन्तीने उससे कहा--'पक्षिराज! तुम नलके निकट भी ऐसी ही बातें कहना'। राजन्! विदर्भराजकुमारी दमयन्तीसे 'तथास्तु' कहकर वह हंस पुनः निषधदेशमें आया और उसने नलसे सब बातें निवेदन कीं ॥ 31-32॥ | O King! When he laughed and said this, Damayanti said to him, 'Pakshiraj! You say the same things near the tap." O King! Having said 'Tathastu' to the princess Damayanti, the swan came back to the Nishadhadesh and asked Nala for all things. 31-32॥ |
| इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि नलोपाख्यानपर्वणि हंसदमयन्तीसंवादे त्रिपञ्चाशत्तमोऽध्यायः ॥53॥ | इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत नलोपाख्यानपर्वमें हंसदमयन्तीसंवादविषयक तिरपनवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥53॥ | Thus was the fifty-third chapter of the Hansdamyanti Samvada in the Nalopakhyanaparva under the Mahabharata Vanaparva. 53॥ |
| चतुष्पञ्चाशत्तमोऽध्यायः | चौवनवाँ अध्याय | **Chapter 54:** |
| स्वर्गमें नारद और इन्द्रकी बातचीत, दमयन्तीके स्वयंवरके लिये राजाओं तथा लोकपालोंका प्रस्थान | स्वर्गमें नारद और इन्द्रकी बातचीत, दमयन्तीके स्वयंवरके लिये राजाओं तथा लोकपालोंका प्रस्थान | **Conversation between Narada and Indra in Heaven, and the Departure of Kings and Lokapalas for Damayanti's Swayamvara:** |
| बृहदश्च उवाच दमयन्ती तु तच्छुत्वा वचो हंसस्य भारत । ततः प्रभृति न स्वस्था नलं प्रति बभूव सा ॥1॥ |
बृहदश्च मुनि कहते हैं--भारत! दमयन्तीने जबसे हंसकी बातें सुनीं, तबसे राजा नलके प्रति अनुरक्त हो जानेके कारण वह अस्वस्थ रहने लगी ॥1॥ | Brihadashva Muni says: O Bharata! Ever since Damayanti heard the swan's words, she became unwell due to her attachment to King Nala. |
| ततश्चिन्तापरा दीना विवर्णवदना कृशा । बभूव दमयन्ती तु निःश्वासपरमा तदा ॥2॥ |
तदनन्तर उसके मनमें सदा चिन्ता बनी रहती थी। स्वभावमें दैन्य आ गया। चेहरेका रंग फीका पड़ गया और दमयन्ती दिन-दिन दुबली होने लगी। उस समय वह प्रायः लंबी ससं खींचती रहती थी ॥2॥ | After that, worry constantly occupied her mind. Sadness entered her nature. The color of her face faded, and Damayanti grew thinner day by day. She would often sigh deeply. |
| ऊर्ध्वदृष्टि्ध्यानपरा बभूवोन्मत्तदर्शना । पाण्डुवर्णा क्षणेनाथ हूच्छयाविष्टचेतना ॥3॥ |
ऊपरकी ओर निहारती हुई सदा नलके ध्यानमें परायण रहती थी। देखनेमें उन्मत्त-सी जान पड़ती थी। उसका शरीर पाण्डुवर्णका हो गया। कामवेदनाकी अधिकतासे उसकी चेतना क्षण-क्षणमें विलुप्त-सी हो जाती थी ॥3॥ | Gazing upwards, she remained absorbed in thoughts of Nala. She appeared almost insane. Her body turned pale. Due to excessive passion, her consciousness would momentarily fade away. |
| न शय्यासनभोगेषु रतिं विन्दति कर्हिचित् । न नक्तं न दिवा शेते हाहेति रुदती पुनः ॥4॥ |
उसकी शय्या, आसन तथा भोग-सामग्रियोमे कहीं भी प्रीति नहीं होती थी। वह न तो रातमें सोती और न दिनमें ही। बारंबार 'हाय-हाय' करके रोती ही रहती थी ॥4॥ | She found no joy in her bed, seat, or objects of pleasure. She would neither sleep at night nor during the day. She would keep crying, repeatedly saying "Alas! Alas!" |
| तामस्वस्थां तदाकारां सख्यस्ता जज्ञुरिङ्गितैः
। ततो विदर्भपतये दमयन्त्याः सखीजनः ॥5॥ न्यवेदयत् तामस्वस्थां दमयन्तीं नरेश्वरे । तच्छुत्वा नृपतिर्भीमो दमयन्तीं सखीगणात् ॥6॥ चिन्तयामास तत् कार्य सुमहत् स्वां सुतां प्रति । किमर्थ दुहिता मेऽद्य नातिस्वस्थेव लक्ष्यते ॥7॥ |
उसकी वैसी आकृति और अस्वस्थ-अवस्थाका क्या कारण है, यह सखियोंने संकेतसे जान लिया। तदनन्तर दमयन्तीकी सखियोंने विदर्भनरेशको उसकी उस अस्वस्थ-अवस्थाके विषयमे सूचना दी। सखियोंके मुखसे दमयन्तीके विषयमें वैसी बात सुनकर राजा भीमने बहुत सोचा-विचारा, परंतु अपनी पुत्रीके लिये कोई विशेष महत्त्वपूर्ण कार्य उन्हें नहीं सूझ पड़ा। वे सोचने लगे कि “क्यों मेरी पुत्री आजकल स्वस्थ नहीं दिखायी देती है?” ॥ 5-7॥ | Her companions understood the reason for her appearance and ill health through her gestures. Then, Damayanti's companions informed the king of Vidarbha about her condition. Hearing such things about Damayanti from her companions, King Bhima thought deeply, but he could not think of any significant action to take for his daughter. He wondered, "Why does my daughter not appear healthy these days?" |
| स समीक्ष्य महीपालः स्वां सुतां प्राप्तयौवनाम् । अपश्यदात्मना कार्य दमयन्त्याः स्वयंवरम् ॥8॥ |
राजाने बहुत सोचने-विचारनेके बाद यह निश्चय किया कि मेरी पुत्री अब युवावस्थामें प्रवेश कर चुकी, अतः दमयन्तीके लिये स्वयंवर रचाना ही उन्हें अपना विशेष कर्तव्य दिखायी दिया ॥8॥ | After much contemplation, the king concluded that his daughter had now entered marriageable age, and therefore, arranging a swayamvara for Damayanti seemed to be his most important duty. |
| स संनिमन्त्रयामास महीपालान् विशाम्पतिः । एषोऽनुभूयतां वीराः स्वयंवर इति प्रभो ॥9॥ |
राजन्! विदर्भनरेशने सब राजाओंको इस प्रकार निमन्त्रित किया-'वीरो! मेरे यहाँ कन्याका स्वयंवर है। आपलोग पधारकर इस उत्सवका आनन्द लें” ॥9॥ | O king! The king of Vidarbha invited all the kings, saying: "O heroes! There is a swayamvara for my daughter. Please come and enjoy this celebration." |
| श्रुत्वा तु पार्थिवाः सर्वे दमयन्त्याः स्वयंवरम्
। अभिजग्मुस्ततो भीमं राजानो भीमशासनात् ॥10॥ हस्त्यश्वरथघोषेण पूरयन्तो वसुन्धराम् । विचित्रमाल्याभरणैर्बलैर्दश्यैः स्वलंकृतैः ॥11॥ |
दमयन्तीका स्वयंवर होने जा रहा है, यह सुनकर सभी नरेश विदर्भराज भीमके आदेशसे हाथी, घोड़ों तथा रथोंकी तुमुल ध्वनिसे पृथ्वीको गुँजाते हुए उनकी राजधानीमें गये। उस समय उनके साथ विचित्र माला एवं आभूषणोंसे विभूषित बहुत-से सैनिक देखे जा रहे थे ॥ 10-11॥ | Hearing that Damayanti's swayamvara was going to take place, all the kings, following the command of King Bhima of Vidarbha, went to his capital, filling the earth with the tumultuous sounds of elephants, horses, and chariots. They were accompanied by numerous soldiers adorned with various garlands and ornaments. |
| तेषां भीमो महाबाहुः पार्थिवानां महात्मनाम् । यथार्हमकरोत् पूजां तेऽवसंस्तत्र पूजिताः ॥12॥ |
महाबाहु राजा भीमने वहाँ पधारे हुए उन महामना नरेशोंका यथायोग्य पूजन किया। तत्पश्चात् वे उनसे पूजित हो वहीं रहने लगे ॥12॥ | The mighty-armed King Bhima duly honored those great-minded kings who had arrived. Afterwards, being honored by them, he stayed there. |
| एतस्मिन्नेव काले तु सुराणामृषिसत्तमौ
। अटमानौ महात्मानाविन्द्रलोकमितो गतौ ॥13॥ नारदः पर्वतश्चैव महाप्राज्ञौ महाव्रतौ । देवराजस्य भवनं विविशाते सुपूजितौ ॥14॥ |
इसी समय देवर्षिप्रवर महान् व्रतधारी महाप्राज्ञ नारद और पर्वत दोनों महात्मा इधरसे घूमते हुए इन्द्रलोके गये। वहाँ उन्होंने देवराजके भवनमें प्रवेश किया। उस भवनमें उनका विशेष आदर-सत्कार एवं पूजन किया गया ॥ 13-14॥ | At this time, the best among divine sages, the great ascetic and wise Narada, and Parvata, both great souls, were wandering around and went to Indraloka. There they entered the abode of Devraj Indra. They were greatly honored and worshipped in that abode. |
| तावर्चयित्वा मघवा ततः कुशलमव्ययम् । पप्रच्छानामयं चापि तयोः सर्वगतं विभुः ॥15॥ |
उन दोनोंकी पूजा करके भगवान् इन्द्रने उनसे उन दोनोंके तथा सम्पूर्ण जगत्के कुशल- मंगल एवं स्वस्थताका समाचार पूछा ॥15॥ | After worshipping them, Lord Indra inquired about their well-being and the well-being of the entire world. |
| नारद उवाच आवयोः कुशलं देव सर्वत्रगतमीश्वर । लोके च मघवन् कृत्स्ने नृपाः कुशलिनो विभो ॥16॥ |
तब नारदजीने कहा-प्रभो! देवेश्वर! हमलोगोंकी सर्वत्र कुशल है और समस्त लोकमें भी राजालोग सकुशल हैं ॥16॥ | Then Narada said: "O lord! O lord of gods! We are well everywhere, and the kings in all the worlds are also doing well." |
| बृहदश्च उवाच नारदस्य वचः श्रुत्वा पप्रच्छ बलवृत्रहा
। धर्मज्ञाः पृथिवीपालास्त्यक्तजीवितयोधिनः ॥17॥ शस्त्रेण निधनं काले ये गच्छन्त्यपराङ्मुखाः । अयं लोकोऽक्षयस्तेषां यथैव मम कामधुक् ॥18॥ |
बृहदश्च कहते हैं-राजन्! नारदकी बात सुनकर बल और वृत्रासुरका वध करनेवाले इन्द्रने उनसे पूछा-'मुने! जो धर्मज्ञ भूपाल अपने प्राणोंका मोह छोड़कर युद्ध करते हैं और पीठ न दिखाकर लड़ते समय किसी शस्त्रके आघातसे मृत्युको प्राप्त होते हैं, उनके लिये हमारा यह स्वर्गलोक अक्षय हो जाता है और मेरी ही तरह उन्हें भी यह मनोवांछित भोग प्रदान करता है ॥ 17-18॥ | Brihadashva says: O king! Hearing Narada's words, Indra, the slayer of Bala and Vritrasura, asked him: "O sage! This Svargaloka of ours becomes eternal for those righteous kings who fight without attachment to their lives and meet death from the blow of a weapon while fighting without showing their backs. Like me, they also enjoy all desirable pleasures. |
| क्व नु ते क्षत्रियाः शूरा न हि पश्यामि तानहम्
। आगच्छतो महीपालान् दयितानतिथीन् मम ॥19॥ एवमुक्तस्तु शक्रेण नारदः प्रत्यभाषत । |
'वे शूरवीर क्षत्रिय कहाँ हैं? अपने उन प्रिय अतिथियोंको आजकल मैं यहाँ आते नहीं देख रहा हूँ इन्द्रके ऐसा पूछनेपर नारदजीने उत्तर दिया ॥193॥ | Where are those brave Kshatriya kings? I do not see those dear guests of mine coming here these days." When Indra asked this, Narada replied. |
| नारद उवाच शृणु मे मघवन् येन न दृश्यन्ते महीक्षितः
॥20॥ विदर्भराज्ञो दुहिता दमयन्तीति विश्रुता । रूपेण समतिक्रान्ता पृथिव्यां सर्वयोषितः ॥21॥ |
नारदजी बोले-मघवन्! मैं वह कारण बताता हूँ, जिससे राजालोग आजकल यहाँ नहीं दिखायी देते, सुनिये। विदर्भनरेश भीमके यहाँ दमयन्ती नामसे प्रसिद्ध एक कन्या उत्पन्न हुई है, जो मनोहर रूप-सौन्दर्यमें पृथ्वीकी सम्पूर्ण युवतियोंको लाँध गयी है ॥ 20-21॥ | Narada said: "O Maghavan! I will tell you the reason why kings are not seen here these days, listen. A girl named Damayanti has been born to the king of Vidarbha, Bhima, who has surpassed all the young women on earth in her beautiful appearance. |
| तस्याः स्वयंवरः शक्र भविता न चिरादिव । तत्र गच्छन्ति राजानो राजपुत्राश्च सर्वशः ॥22॥ |
इन्द्र! अब शीघ्र ही उसका स्वयंवर होनेवाला है, उसीमें सब राजा तथा राजकुमार जा रहे हैं ॥22॥ | O Indra! Her swayamvara is going to take place soon, and all the kings and princes are going there. |
| तां रत्नभूतां लोकस्य प्रार्थयन्तो महीक्षितः । काङ्क्षन्ति स्म विशेषेण बलवृत्रनिषूदन ॥23॥ |
बल और वृत्रासुरके नाशक इन्द्र! दमयन्ती सम्पूर्ण जगतूका एक अद्भुत रत्न है। इसलिये सब राजा उसे पानेकी विशेष अभिलाषा रखते हैं ॥23॥ | O Indra, destroyer of Bala and Vritrasura! Damayanti is a unique jewel of the entire world. Therefore, all the kings greatly desire to obtain her." |
| एतस्मिन् कथ्यमाने तु लोकपालाश्च साग्निकाः । आजग्मुर्देवराजस्य समीपममरोत्तमाः ॥24॥ |
यह बात हो ही रही थी कि देवश्रेष्ठ लोकपालगण अग्निसहित देवराजके समीप आये ॥24॥ | While this conversation was happening, the best among gods, the Lokapalas, along with Agni, arrived near Devraj Indra. |
| ततस्ते शुश्रुवुः सर्वे नारदस्य वचो महत् । श्रुत्वैव चाब्रुवन् हृष्टा गच्छामो वयमप्युत ॥25॥ |
तदनन्तर उन सबने नारदजीकी ये विशिष्ट बातें सुनीं। सुनते ही वे सब-के-सब हर्षोल्लाससे परिपूर्ण हो बोले--“हमलोग भी उस स्वयंवरमें चलें” ॥25॥ | Then, they all heard these special words of Narada. As soon as they heard, they all said with joy and enthusiasm: "Let us also go to that swayamvara." |
| ततः सर्वे महाराज सगणाः सहवाहनाः । विदर्भानभिजग्मुस्ते यतः सर्वे महीक्षितः ॥26॥ |
महाराज! तदनन्तर वे सब देवता अपने सेवकगणों और वाहनोंके साथ विदर्भदेशमें गये, जहाँ समस्त भूपाल एकत्र हुए थे ॥26॥ | O great king! After that, all those gods went to the kingdom of Vidarbha with their servants and vehicles, where all the kings had gathered. |
| नलोऽपि राजा कौन्तेय श्रुत्वा राज्ञां समागमम् । अभ्यगच्छददीनात्मा दमयन्तीमनुव्रतः ॥27॥ |
कुन्तीनन्दन! उदारहृदय राजा नल भी विदर्भनगरमें समस्त राजाओंका समागम सुनकर दमयन्तीमे अनुरक्त हो वहाँ गये ॥27॥ | O son of Kunti! The generous-hearted King Nala, hearing about the gathering of all the kings in the city of Vidarbha, also went there, being attached to Damayanti. |
| अथ देवाः पथि नलं ददृशुर्भूतले स्थितम् । साक्षादिव स्थितं मूर्त्या मन्मथं रूपसम्पदा ॥28॥ |
उस समय देवताओंने पृथ्वीपर मार्गमे खड़े हुए राजा नलको देखा। रूप-सम्पत्तिकी दृष्टिसे वे साक्षात् मूर्तिमान् कामदेव-से जान पड़ते थे ॥28॥ | At that time, the gods saw King Nala standing on the way to earth. In terms of his handsome appearance, he seemed like Kamadeva himself in human form. |
| तं दृष्ट्वा लोकपालास्ते भ्राजमानं यथा रविम् । तस्थुर्विगतसंकल्पा विस्मिता रूपसम्पदा ॥29॥ |
सूर्यके समान प्रकाशित होनेवाले महाराज नलको देखकर वे लोकपाल उनके रूप- वैभवसे चकित हो दमयन्तीको पानेका संकल्प छोड़ बैठे ॥29॥ | Seeing King Nala, shining like the sun, those Lokapalas were amazed by his beauty and splendor and abandoned their intention of obtaining Damayanti. |
| ततोऽन्तरिक्षे विष्टभ्य विमानानि दिवौकसः । अब्रुवन् नैषधं राजन्नवतीर्य नभस्तलात् ॥30॥ |
राजन्! तब उन देवताओंने अपने विमानोंको आकाशम रोक दिया और वहाँसे नीचे उतरकर निषधनरेशसे कहा-- ॥30॥ | O king! Then, those gods stopped their celestial chariots in the sky and, descending from there, said to the king of Nishadha: |
| भो भो निषधराजेन्द्र नल सत्यव्रतो भवान् । अस्माकं कुरु साहाय्यं दूतो भव नरोत्तम ॥31॥ |
'निषधदेशके महाराज नरश्रेष्ठ नल! आप सत्य-व्रती हैं, हमलोगोंकी सहायता कीजिये। हमारे दूत बन जाइये" ॥31॥ | "O king of Nishadha, O best among men, Nala! You are truthful and virtuous, please help us. Become our messenger." |
| इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि नलोपाख्यानपर्वणि इन्द्रनारदसंवादे चतुष्पञ्चाशत्तमोऽध्यायः ॥54॥ | इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत नलोपाख्यानपर्वमें इन्द्रनारदसंवादविषयक चौवनवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥54॥ | Thus ends the fifty-fourth chapter entitled 'Conversation between Indra and Narada' in the Nalopakhyana Parva of the Vana Parva of the Mahabharata. |
| पञ्चपञ्चाशत्तमोऽध्यायः | पचपनवाँ अध्याय | **Chapter 55:** |
| नलका दूत बनकर राजमहलमें जाना और दमयन्तीको देवताओंका संदेश सुनाना | नलका दूत बनकर राजमहलमें जाना और दमयन्तीको देवताओंका संदेश सुनाना | **Nala's Entry into the Palace as a Messenger and His Conveyance of the Gods' Message to Damayanti:** |
| बृहदश्च उवाच तेभ्यः प्रतिज्ञाय नलः करिष्य इति भारत
। अथैतान् परिपप्रच्छ कृताञ्जलिरुपस्थितः ॥1॥ के वै भवन्तः कश्चासौ यस्याहं दूत ईप्सितः । किं च तद् वो मया कार्य कथयध्वं यथातथम् ॥2॥ |
बृहदश्च मुनि कहते हैं-भारत! देवताओंसे उनकी सहायता करनेकी प्रतिज्ञा करके राजा नलने हाथ जोड़ पास जाकर उनसे पूछा--“आपलोग कौन हैं? और वह कौन व्यक्ति है, जिसके पास जानेके लिये आपने मुझे दूत बनानेकी इच्छा की है तथा आपलोगोंका वह कौन-सा कार्य है, जो मेरे द्वारा सम्पन्न होनेयोग्य है, यह ठीक-ठीक बताइये” ॥ 1-2॥ | Brihadashva Muni says: O Bharata! Having promised the gods to help them, King Nala, with folded hands, approached them and asked: "Who are you? And who is the person you wish me to go to as a messenger? What is your task that you want me to accomplish? Please tell me everything clearly." |
| एवमुक्तो नैषधेन मघवानभ्यभाषत । अमरान् वै निबोधास्मान् दमयन्त्यर्थमागतान् ॥3॥ |
निषधराज नलके इस प्रकार पूछनेपर इन्द्रने कहा--“भूपाल! तुम हमें देवता समझो, हम दमयन्तीको प्राप्त करनेके लिये यहाँ आये हैं” ॥3॥ | When the king of Nishadha asked this, Indra replied: "O king! Consider us gods. We have come here to obtain Damayanti." |
| अहमिन्द्रोऽयमग्निश्च तथैवायमपां पतिः
। शरीरान्तकरो नृणां यमोऽयमपि पार्थिव ॥4॥ त्वं वै समागतानस्मान् दमयन्त्यै निवेदय । लोकपाला महेन्द्राद्याः समायान्ति दिदृक्षवः ॥5॥ |
“मै इन्द्र हूँ, ये अग्निदेव हैं, ये जलके स्वामी वरुण और ये प्राणियोंके शरीरका नाश करनेवाले साक्षात् यमराज हैं। आप दमयन्तीके पास जाकर उसे हमारे आगमनकी सूचना दे दीजिये और कहिये-महेन्द्र आदि लोकपाल तुम्हें देखनेके लिये आ रहे हैं ॥ 4-5॥ | "I am Indra, this is Agni, the fire god, this is Varuna, the lord of waters, and this is Yama, the god of death, who destroys the bodies of beings. Go to Damayanti and inform her of our arrival, and say, 'Mahendra and other Lokapalas are coming to see you.' |
| प्राप्तुमिच्छन्ति देवास्त्वां शक्रोऽग्निर्वरुणो यम: । तेषामन्यतमं देवं पतित्वे वरयस्व ह ॥6॥ |
“इन्द्र, अग्नि, वरूण और यम--ये देवतालोग तुम्हें प्राप्त करना चाहते है। तुम उनमेंसे किसी एक देवताको पतिरूपमे चुन लो" ॥6॥ | 'Indra, Agni, Varuna, and Yama—these gods desire to have you. Choose one of them as your husband.'" |
| एवमुक्तः स शक्रेण नलः प्राञ्जलिरब्रवीत् । एकार्थ समुपेतं मां न प्रेषयितुमर्हथ ॥7॥ |
इन्द्रके ऐसा कहनेपर नल हाथ जोड़कर बोले--'देवताओ! मेरा भी एकमात्र यही प्रयोजन है, जो आपलोगोंका है; अतः एक ही प्रयोजनके लिये आये हुए मुझे दूत बनाकर न भेजिये' ॥7॥ | Hearing these words of Indra, Nala said with folded hands: "O gods! My purpose is the same as yours; therefore, please do not send me as a messenger for the same purpose." |
| कथं तु जातसंकल्पः स्त्रियमुत्सृजते पुमान् । परार्थमीदृशं वक्तुं तत् क्षमन्तु महेश्चराः ॥8॥ |
“देवेश्वरो! जिसके मनमें किसी स्त्रीको प्राप्त करनेका संकल्प हो गया है, वह पुरुष उसी स्त्रीको दूसरेके लिये कैसे छोड़ सकता है? अतः आपलोग ऐसी बात कहनेके लिये मुझे क्षमा करें! ॥8॥ | "O lords of gods! How can a man who has resolved to obtain a woman give her up for someone else? Therefore, please forgive me for saying such a thing!" |
| देवा ऊचुः करिष्य इति संश्रुत्य पूर्वमस्मासु नैषध । न करिष्यसि कस्मात् त्वं व्रज नैषध मा चिरम् ॥9॥ |
देवता ओने कहा-निषधनरेश! तुम पहले हमलोगोंसे हमारा कार्य सिद्ध करनेके लिये प्रतिज्ञा कर चुके हो, फिर तुम उस प्रतिज्ञाका पालन कैसे नहीं करोगे? इसलिये निषधराज! तुम शीघ्र जाओ; देर न करो ॥9॥ | The gods said: "O king of Nishadha! You have already promised us to fulfill our task, so how can you not keep that promise? Therefore, O king of Nishadha! Go quickly; do not delay." |
| बृहदश्च उवाच एवमुक्तः स देवैस्तैर्नैषधः पुनरब्रवीत् । सुरक्षितानि वेश्मानि प्रवेष्टं कथमुत्सहे ॥10॥ |
बृहदश्च मुनि कहते हैं--राजन्! उन देवताओंके ऐसा कहनेपर निषधनरेशने पुनः उनसे पूछा-'विदर्भराजके सभी भवन (पहरेदारोंसे) सुरक्षित हैं। मैं उनमें कैसे प्रवेश कर सकता हूँ?” ॥10॥ | Brihadashva Muni says: O king! When those gods said this, the king of Nishadha again asked them: "All the palaces of the king of Vidarbha are guarded (by guards). How can I enter them?" |
| प्रवेक्ष्यसीति तं शक्रः पुनरेवाभ्यभाषत । जगाम स तथेत्युक्त्वा दमयन्त्या निवेशनम् ॥11॥ |
तब इन्द्रने पुनः उत्तर दिया--'तुम वहाँ प्रवेश कर सकोगे।' तत्पश्चात् राजा नल "तथास्तु" कहकर दमयन्तीके महलमें गये ॥11॥ | Then Indra replied: "You will be able to enter." After that, King Nala said, "So be it" and went to Damayanti's palace. |
| ददर्श तत्र वैदर्भी सखीगणसमावृताम् । देदीप्यमानां वपुषा श्रिया च वरवर्णिनीम् ॥12॥ |
वहाँ उन्होंने देखा, सखियोंसे घिरी हुई परम सुन्दरी विदर्भराजकुमारी दमयन्ती अपने सुन्दर शरीर और दिव्य कान्तिसे अत्यन्त उद्भासित हो रही है ॥12॥ | There he saw the extremely beautiful princess of Vidarbha, Damayanti, surrounded by her companions, her beautiful body and divine radiance illuminating everything. |
| अतीवसुकुमाराङ्गीं तनुमध्यां सुलोचनाम् । आक्षिपन्तीमिव प्रभां शशिनः स्वेन तेजसा ॥13॥ |
उसके अंग परम सुकुमार हैं, कटिके ऊपरका भाग अत्यन्त पतला है और नेत्र बड़े सुन्दर हैं एवं वह अपने तेजसे चन्द्रमाकी प्रभाको भी तिरस्कृत-सी कर रही है ॥13॥ | Her limbs were extremely delicate, her waist slender, and her eyes very beautiful. Her radiance seemed to diminish even the moonlight. |
| तस्य दृष्ट्वैव ववृधे कामस्तां चारुहासिनीम् । सत्यं चिकीर्षमाणस्तु धारयामास हृच्छयम् ॥14॥ |
उस मनोहर मुसकानवाली राजकुमारीको देखते ही नलके हृदयमें कामाग्नि प्रज्वलित हो उठी; तथापि अपनी प्रतिज्ञाको सत्य करनेकी इच्छासे उन्होंने उस कामवेदनाको मनमें ही रोक लिया ॥14॥ | Seeing that beautiful princess with a charming smile, the fire of passion ignited in Nala's heart. However, desiring to fulfill his promise, he suppressed that passion within himself. |
| ततस्ता नैषधं दृष्ट्वा सम्भ्रान्ताः परमाङ्गनाः । आसनेभ्यः समुत्पेतुस्तेजसा तस्य धर्षिताः ॥15॥ |
निषधराजको वहाँ आये देख अन्तःपुरकी सारी सुन्दरी स्त्रियाँ चकित हो गयीं और उनके तेजसे तिरस्कृत हो अपने आसनोंसे उठकर खड़ी हो गयीं ॥15॥ | Seeing the king of Nishadha arrive there, all the beautiful women in the inner chambers were astonished. Overwhelmed by his radiance, they rose from their seats and stood. |
| प्रशशंसुश्च सुप्रीता नलं ता विस्मयान्विताः । न चैनमभ्यभाषन्त मनोभिस्त्वभ्यपूजयन् ॥16॥ |
अत्यन्त प्रसन्न और आश्चर्यचकित होकर उन सबने राजा नलके सौन्दर्यकी प्रशंसा की। उन्होंने उनसे वार्तालाप नहीं किया; परंतु मन-ही-मन उनका बड़ा आदर किया ॥16॥ | Extremely pleased and amazed, they all praised King Nala's beauty. They did not speak to him but honored him greatly in their minds. |
| अहो रूपमहो कान्तिरहो धैर्य महात्मनः । कोऽयं देवोऽथवा यक्षो गन्धर्वो वा भविष्यति ॥17॥ |
वे सोचने लगीं-'अहो! इनका रूप अद्भुत है, कान्ति बड़ी मनोहर है तथा इन महात्माका धैर्य भी अनूठा है। न जाने ये हैं कौन? सम्भव है, देवता, यक्ष अथवा गन्धर्व हों! ॥17॥ | They thought: "Oh! His appearance is extraordinary, his radiance is very attractive, and the composure of this noble soul is unique. Who could he be? Perhaps a god, a Yaksha, or a Gandharva!" |
| न तास्तं शक्नुवन्ति स्म व्याहर्तुमपि किंचन । तेजसा धर्षितास्तस्य लज्जावत्यो वराङ्गना ॥18॥ |
नलके तेजसे प्रतिहत हुई वे लजीली सुन्दरियाँ उनसे कुछ बोल भी न सकीं ॥18॥ | Those shy, beautiful women, overwhelmed by Nala's radiance, could not even speak to him. |
| अथैनं स्मयमानं तु स्मितपूर्वाभिभाषिणी । दमयन्ती नलं वीरमभ्यभाषत विस्मिता ॥19॥ |
तब मुसकराकर बातचीत करनेवाली दमयन्तीने विस्मित होकर मुसकराते हुए वीर नलसे इस प्रकार पूछा-- ॥19॥ | Then, Damayanti, with a smile on her face, asked the heroic Nala in amazement: |
| कस्त्वं सर्वानवद्याङ्ग मम हृच्छयवर्धन
। प्राप्तोऽस्यमरवद् वीर ज्ञातुमिच्छामि तेऽनघ ॥20॥ कथमागमनं चेह कथं चासि न लक्षितः । सुरक्षितं हि मे वेश्म राजा चैवोग्रशासनः ॥21॥ |
एवमुक्तस्तु वैदर्भ्या नलस्तां प्रत्युवाच ह । “आप कौन हैं? आपके सम्पूर्ण अंग निर्दोष एवं परम सुन्दर हैं। आप मेरे हृदयकी कामाग्निको बढ़ा रहे हैं। निष्पाप वीर! आप देवताओंके समान यहाँ आ पहुँचे हैं। मैं आपका परिचय पाना चाहती हूँ। आपका इस रनिवासमें आना कैसे सम्भव हुआ? आपको किसीने देखा कैसे नहीं? मेरा यह महल अत्यन्त सुरक्षित है और यहाँके राजाका शासन बड़ा कठोर है--वे अपराधियोंको बड़ा कठोर दण्ड देते हैं।” विदर्भराजकुमारीके ऐसा पूछनेपर नलने इस प्रकार उत्तर दिया ॥ 20-21॥ | "Who are you? All your limbs are flawless and extremely beautiful. You are increasing the fire of passion in my heart. O sinless hero! You have arrived here like a god. I wish to know your identity. How was it possible for you to enter this inner chamber? How did no one see you? My palace is heavily guarded, and the king here rules with an iron fist—he severely punishes offenders." When the princess of Vidarbha asked this, Nala replied. |
| नल उवाच नलं मां विद्धि कल्याणि देवदूतमिहागतम् ॥22॥ देवास्त्वां प्राप्तुमिच्छन्ति शक्रोऽग्निर्वरुणो यमः । तेषामन्यतमं देवं पतिं वरय शोभने ॥23॥ |
नलने कहा-कल्याणि! तुम मुझे नल समझो। मैं देवताओंका दूत बनकर यहाँ आया हूँ। इन्द्र, अग्नि, वरुण और यम देवता तुम्हें प्राप्त करना चाहते हैं। शोभने! तुम उनमेंसे किसी एकको अपना पति चुन लो ॥ 22-23॥ | Nala said: "O auspicious one! Consider me Nala. I have come here as a messenger of the gods. Indra, Agni, Varuna, and Yama desire to have you. O beautiful one! Choose one of them as your husband." |
| तेषामेव प्रभावेण प्रविष्टोऽहमलक्षितः । प्रविशन्तं न मां कश्चिदपश्यन्नाप्यवारयत् ॥24॥ |
उन्हीं देवताओंके प्रभावसे मैं इस महलके भीतर आया हूँ और मुझे कोई देख न सका है। भीतर प्रवेश करते समय न तो किसीने मुझे देखा है और न रोका ही है ॥24॥ | "By the influence of those gods, I have entered this palace, and no one could see me. While entering, no one saw or stopped me." |
| एतदर्थमहं भत्रे प्रेषितः सुरसत्तमैः । एतच्छुत्वा शुभे बुद्धिं प्रकुरुष्व यथेच्छसि ॥25॥ |
भद्रे! इसीलिये श्रेष्ठ देवताओंने मुझे यहाँ भेजा है। शुभे! इसे सुनकर तुम्हारी जैसी इच्छा हो, वैसा निश्चय करो ॥25॥ | "O auspicious one! This is why the great gods have sent me here. O fortunate one! Make your decision as you wish after hearing this." |
| इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि नलोपाख्यानपर्वणि नलस्य देवदौत्ये पञ्चपञ्चाशत्तमोऽध्यायः ॥55॥ | इय प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत नलोपाख्यानपर्वमें नलके देवदूत बनकर दमयन्तीके पास जानेसे सम्बन्ध रखनेवाला पचपनवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥55॥ | Thus ends the fifty-fifth chapter describing Nala's arrival as a messenger of the gods to Damayanti in the Nalopakhyana Parva of the Vana Parva of the Mahabharata. |
| षट्पञ्चाशत्तमौऽध्यायः | छप्पनवाँ अध्याय | ## Chapter 56: |
| नलका दमयन्तीसे वार्तालाप करना और लौटकर देवताओंको उसका संदेश सुनाना | नलका दमयन्तीसे वार्तालाप करना और लौटकर देवताओंको उसका संदेश सुनाना | Nala's Conversation with Damayanti and His Return to the Gods |
| बृहदश्च उवाच सा नमस्कृत्य देवेभ्यः प्रहस्य नलमब्रवीत् । प्रणयस्व यथाश्रद्धं राजन् कि करवाणि ते ॥1॥ |
बृहदश्च मुनि कहते हैं--राजन्! दमयन्तीने अपनी श्रद्धाके अनुसार देवताओंको नमस्कार करके नलसे हँसकर कहा-'महाराज! आप ही मेरा पाणिग्रहण कीजिये और बताइये, मैं आपकी क्या सेवा करूँ ॥1॥ | **Brihadaswa Muni continues:** O King! Damayanti, having paid her respects to the gods according to her devotion, said to Nala with a smile, "O King! Please accept my hand in marriage and tell me how I may serve you. (1) |
| अहं चैव हि यच्चान्यन्ममास्ति वसु किंचन । तत् सर्व तव विश्रब्धं कुरु प्रणयमीश्वर ॥2॥ |
“नरेश्वर! मैं तथा मेरा जो कुछ दूसरा धन है, वह सब आपका है। आप पूर्ण विश्वस्त होकर मेरे साथ विवाह कीजिये ॥2॥ | "O King of Kings! I and all my wealth belong to you. Please marry me with complete trust. (2) |
| हंसानां वचनं यत् तु तन्मां दहति पार्थिव । त्वत्कृते हि मया वीर राजानः संनिपातिताः ॥3॥ |
'भूपाल! हंसोंकी जो बात मैंने सुनी" वह (मेरे हृदयमें कामाग्नि प्रज्वलित करके सदा) मुझे दग्ध करती रहती है। वीर! आपहीको पानेके लिये मैंने यहाँ समस्त राजाओंका सम्मेलन कराया है ॥3॥ | "O King! The words I heard from the swans (igniting the fire of love within me) constantly consume me. O valiant one! I have arranged this assembly of kings solely to obtain you. (3) |
| यदि त्वं भजमानां मां प्रत्याख्यास्यसि मानद । विषमग्निं जलं रज्जुमास्थास्ये तव कारणात् ॥4॥ |
'मानद! आपके चरणोंमें भक्ति रखनेवाली मुझ दासीको यदि आप स्वीकार नहीं करेंगे तो मैं आपके ही कारण विष, अग्नि, जल अथवा फाँसीको निमित्त बनाकर अपना प्राण त्याग दूँगी” ॥4॥ | "O honorable one! If you do not accept me, your devoted servant, then I shall, for your sake, give up my life by poison, fire, water, or hanging." (4) |
| एवमुक्तस्तु वैदर्भ्या नलस्तां प्रत्युवाच ह । तिष्ठत्सु लोकपालेषु कथं मानुषमिच्छसि ॥5॥ |
दमयन्तीके ऐसा कहनेपर राजा नलने उससे पूछा--'(तुम्हें पानेके लिये उत्सुक) लोकपालोंके होते हुए तुम एक साधारण मनुष्यको कैसे पति बनाना चाहती हो? ॥5॥ | Hearing Damayanti's words, King Nala asked her, "With the guardians of the world (eager to have you) how do you wish to marry a mere mortal like me? (5) |
| येषामहं लोककृतामीश्चराणां महात्मनाम् । न पादरजसा तुल्यो मनस्ते तेषु वर्तताम् ॥6॥ |
“जिन लोकस्रष्टा महामना ईश्वरोंके चरणोंकी धूलके समान भी मैं नहीं हूँ, उन्हीकी ओर तुम्हें मन लगाना चाहिये ॥6॥ | "You should set your heart on those great-minded gods, the creators of the world, to whom I am not even equal to the dust of their feet. (6) |
| विप्रियं ह्याचरन् मर्त्यो देवानां मृत्युमृच्छति । त्राहि मामनवद्याङ्गि वरयस्व सुरोत्तमान् ॥7॥ |
“निर्दोष अंगोंवाली सुन्दरी! देवताओंके विरुद्ध चेष्टा करनेवाला मानव मृत्युको प्राप्त हो जाता है; अतः तुम मुझे बचाओ और उन श्रेष्ठ देवताओंका ही वरण करो ॥ | "O beautiful one with flawless limbs! A human who acts against the gods meets death; therefore, save me and choose those noble gods. (7) |
| विरजांसि च वासांसि दिव्याश्चित्राः स्रजस्तथा । भूषणानि तु मुख्यानि देवान् प्राप्य तु भुङ्क्ष्व वै ॥8॥ |
“तथा देवताओंको ही पाकर निर्मल वस्त्र, दिव्य एवं विचित्र पुष्पहार तथा मुख्य-मुख्य आभूषणोंका सुख भोगो ॥8॥ | "And by obtaining the gods, enjoy the pleasures of immaculate garments, divine and wondrous garlands, and exquisite ornaments. (8) |
| य इमां पृथिवीं कृत्स्नां संक्षिप्य ग्रसते पुनः । हुताशमीशं देवानां का तं न वरयेत् पतिम् ॥9॥ |
'जो इस सारी पृथ्वीको संक्षिप्त करके पुनः अपना ग्रास बना लेते हैं, उन देवेश्वर अग्निको कौन नारी अपना पति न चुनेगी? ॥9॥ | "Who among women would not choose as her husband the lord of the gods, Agni, who consumes this entire earth and makes it his food? (9) |
| यस्य दण्डभयात् सर्वे भूतग्रामाः समागताः । धर्ममेवानुरुध्यन्ति का तं न वरयेत् पतिम् ॥10॥ |
“जिनके दण्डके भयसे संसारमें आये हुए समस्त प्राणिसमुदाय धर्मका ही पालन करते हैं, उन यमराजको कौन अपना पति नहीं वरेगी? ॥10॥ | "Who would not choose as her husband Yama, the god of justice, whose fear of punishment makes all creatures in the world adhere to righteousness? (10) |
| धर्मात्मानं महात्मानं दैत्यदानवमर्दनम् । महेन्द्रं सर्वदेवानां का तं न वरयेत् पतिम् ॥11॥ |
“दैत्यों और दानवोंका मर्दन करनेवाले धर्मात्मा महामना सर्वदेवेश्वर महेन्द्रका कौन नारी पतिरूपमें वरण न करेगी? ॥11॥ | "Who among women would not choose as her husband the great-minded Indra, the lord of all gods, the slayer of demons and danavas? (11) |
| क्रियतामविशङ्केन मनसा यदि मन्यसे । वरुणं लोकपालानां सुहृद्धाक्यमिदं शृणु ॥12॥ |
“यदि तुम ठीक समझती हो तो लोकपालोमं प्रसिद्ध वरुणको निःशंक होकर अपना पति बनाओ। यह एक हितैषी सुहृदका वचन है, इसे सुनो” ॥12॥ | "If you deem it fit, then choose Varuna, renowned among the guardians of the world, as your husband without any hesitation. This is the advice of a well-wishing friend, listen to it." (12) |
| नैषधेनैवमुक्ता सा दमयन्ती वचोऽब्रवीत् । समाप्लुताभ्यां नेत्राभ्यां शोकजेनाथ वारिणा ॥13॥ |
तदनन्तर निषधराज नलके ऐसा कहनेपर दमयन्ती शोकाश्रुओंसे भरे हुए नेत्रोंद्वारा देखती हुई इस प्रकार बोली-- ॥13॥ | After Nala, the king of Nishadha, spoke thus, Damayanti, with tears of sorrow filling her eyes, said, (13) |
| देवेभ्योऽहें नमस्कृत्य सर्वेभ्यः पृथिवीपते । वृणे त्वामेव भर्तारं सत्यमेतद् ब्रवीमि ते ॥14॥ |
'पृथ्वीपते! मैं सम्पूर्ण देवताओंको नमस्कार करके आपहीको अपना पति चुनती हूँ। यह मैंने आपसे सच्ची बात कही है" ॥14॥ | "O King! I bow to all the gods and choose you as my husband. This is the truth I speak to you." (14) |
| तामुवाच ततो राजा वेपमानां कृताञ्जलिम् । दौत्येनागत्य कल्याणि तथा भद्रे विधीयताम् ॥15॥ |
ऐसा कहकर दमयन्ती दोनों हाथ जोड़े थर-थर काँपने लगी। उस अवस्थामें राजा नलने उससे कहा-'कल्याणि! मैं इस समय दूतका कार्य करनेके लिये आया हूँ; अतः भद्रे! इस समय वही करो जो मेरे स्वरूपके अनुरूप हो ॥15॥ | Saying this, Damayanti, with her hands folded, began to tremble. Seeing her in this state, King Nala said, "O auspicious one! I have come here as a messenger; therefore, O noble one! Do now what is befitting my role. (15) |
| कथं ह्यहं प्रतिश्रुत्य देवतानां विशेषतः । परार्थे यत्नमारभ्य कथं स्वार्थमिहोत्सहे ॥16॥ |
“मै देवताओंके सामने प्रतिज्ञा करके विशेषतः परोपकारके लिये प्रयत्न आरम्भ करके अब यहाँ स्वार्थ-साधनके लिये कैसे उत्साहित हो सकता हूँ? ॥16॥ | "Having pledged to the gods, and especially having begun this endeavor for the benefit of others, how can I now be motivated by self-interest? (16) |
| एष धर्मो यदि स्वार्थो ममापि भविता ततः: । एवं स्वार्थ करिष्यामि तथा भद्रे विधीयताम् ॥17॥ |
"यदि यह धर्म सुरक्षित रहे तो उससे मेरे स्वार्थकी भी सिद्धि हो सकती है। भद्रे! तुम ऐसा प्रयत्न करो, जिससे मैं इस प्रकार धर्मयुक्त स्वार्थकी सिद्धि करूँ” ॥17॥ | "If righteousness is preserved, then my own purpose may also be fulfilled. O noble one! Strive in such a way that I may achieve my righteous goal." (17) |
| ततो बाष्पाकुलां वाचं दमयन्ती शुचिस्मिता
। प्रत्याहरन्ती शनकैर्नलं राजानमब्रवीत् ॥18॥ उपायोऽयं मया दृष्टो निरपायो नरेश्वर । येन दोषो न भविता तव राजन् कथंचन ॥19॥ |
यह सुनकर पवित्र मुसकानवाली दमयन्ती राजा नलसे धीरे-धीरे अश्रुगदगदवाणीमें बोली-'नरेश्वर! मैंने उस निर्दोष उपायको ढूँढ़ निकाला है, राजन्! जिससे आपको किसी प्रकार दोष नहीं लगेगा ॥ 18-19॥ | Hearing this, Damayanti, with a gentle smile, spoke to King Nala in a voice choked with tears, "O King! I have found that blameless way, O King! By which you will not incur any blame. (18-19) |
| त्वं चैव हि नरश्रेष्ठ देवाश्चेन्द्रपुरोगमाः । आयान्तु सहिताः सर्वे मम यत्र स्वयंवरः ॥20॥ |
'नरश्रेष्ठ! आप और इन्द्र आदि सब देवता एक ही साथ उस रंगमण्डपमें पधारें, जहाँ मेरा स्वयंवर होनेवाला है ॥20॥ | "O best of men! You and Indra, along with all the other gods, should come together to the pavilion where my swayamvara is to be held. (20) |
| ततोऽहं लोकपालानां संनिधौ त्वां नरेश्वर । वरयिष्ये नरव्याघ्र नैवं दोषो भविष्यति ॥21॥ |
“नरेश्वर! नरव्याघ्र! तदनन्तर मैं उन लोकपालोंके समीप ही आपका वरण कर लूँगी। ऐसा करनेसे (आपको कोई) दोष नहीं लगेगा” ॥21॥ | "O King! O tiger among men! Then, in the presence of those guardians of the world, I shall choose you. By doing so, (you will not incur) any blame." (21) |
| एवमुक्तस्तु वैदर्भ्या नलो राजा विशाम्पते । आजगाम पुनस्तत्र यत्र देवाः समागताः ॥22॥ |
युधिष्ठिर! विदर्भराजकुमारीके ऐसा कहनेपर राजा नल पुनः वहीं लौट आये, जहाँ देवताओंसे उनकी भेंट हुई थी ॥22॥ | O Yudhishthira! Upon hearing these words of the princess of Vidarbha, King Nala returned to the place where he had met the gods. (22) |
| तमपश्यंस्तथाऽऽयान्तं लोकपाला महेश्वराः । दृष्ट्वा चैनं ततोऽपृच्छन् वृत्तान्तं सर्वमेव तम् ॥23॥ |
महान् शक्तिशाली लोकपालोंने इस प्रकार राजा नलको लौटते देखा और उन्हें देखकर उनसे सारा वृत्तान्त पूछा- ॥23॥ | The mighty guardians of the world saw King Nala returning and, upon seeing him, inquired about the whole affair. (23) |
| कच्चिद् दृष्टा त्वया राजन् दमयन्ती शुचिस्मिता । किमब्रवीच्च नः सर्वान् वद भूमिप तेऽनघ ॥24॥ |
'राजन्! क्या तुमने पवित्र मुसकानवाली दमयन्तीको देखा है? पापरहित भूपाल! हम सब लोगोंको उसने क्या संदेश दिया, बताओ” ॥24॥ | "O King! Have you seen Damayanti, the one with a gentle smile? O sinless king! Tell us what message she has given to all of us." (24) |
| नल उवाच भवद्भिरहमादिष्टो दमयन्त्या निवेशनम् । प्रविष्टः सुमहाकक्षं दण्डिभिः स्थविरैर्वृतम् ॥25॥ |
नलने कहा-देवताओ! आपकी आज्ञा पाकर मैं दमयन्तीके महलमें गया। उसकी ड्योढ़ी विशाल थी और दण्डधारी बूढ़े रक्षक उसे घेरकर पहरा दे रहे थे ॥25॥ | Nala said, "O gods! Having received your command, I went to Damayanti's palace. Its entrance was grand, and old guards with staffs surrounded and guarded it. (25) |
| प्रविशन्तं च मां तत्र न कश्चिद् दृष्टवान् नरः । ऋते तां पार्थिवसुतां भवतामेव तेजसा ॥26॥ |
आपलोगोंके प्रभावसे उसमें प्रवेश करते समय मुझे वहाँ उस राजकन्या दमयन्तीके सिवा दूसरे किसी मनुष्यने नहीं देखा ॥26॥ | By your grace, while entering, no one except the princess Damayanti saw me there. (26) |
| सख्यश्चास्या मया दृष्टास्ताभिश्चाप्युपलक्षितः । विस्मिताश्चा भवन् सर्वा दृष्ट्वा मां विबुधेश्वराः ॥27॥ |
दमयन्तीकी सखियोंको भी मैंने देखा और उन सखियोंने भी मुझे देखा। देवेश्वरो! वे सब मुझे देखकर आश्चर्यचकित हो गयीं ॥27॥ | I saw Damayanti's companions, and they also saw me. O gods! They were all astonished to see me. (27) |
| वर्ण्यमानेषु च मया भवत्सु रुचिरानना । मामेव गतसंकल्पा वृणीते सा सुरोत्तमाः ॥28॥ |
श्रेष्ठ देवताओ! जब मैं आपलोगोंके प्रभावका वर्णन करने लगा, उस समय सुमुखी दमयन्तीने मुझमें ही अपना मानसिक संकल्प रखकर मेरा ही वरण किया ॥28॥ | O noble gods! When I began to describe your glories, the beautiful Damayanti, having set her heart on me, chose me. (28) |
| अब्रवीच्चैव मां बाला आयान्तु सहिताः सुराः । त्वया सह नरव्याघ्र मम यत्र स्वयंवरः ॥29॥ |
उस बालाने मुझसे यह भी कहा कि 'नरव्याघ्र! सब देवता आपके साथ उस स्थानपर पधारें, जहाँ मेरा स्वयंवर होनेवाला है ॥29॥ | That maiden also said to me, 'O tiger among men! All the gods should come with you to the place where my swayamvara is to be held. (29) |
| तेषामहं संनिधौ त्वां वरयिष्यामि नैषध । एवं तव महाबाहो दोषो न भवितेति ह ॥30॥ |
“निषधराज! मै उन देवताओंके समीप ही आपका वरण कर लूँगी। महाबाहो! ऐसा होनेपर आपको दोष नहीं लगेगा" ॥30॥ | 'O king of Nishadha! I shall choose you in the presence of those gods. O mighty-armed one! By doing so, you will not incur any blame.' (30) |
| एतावदेव विबुधा यथावृत्तमुपाहृतम् । मयाऽशेषे प्रमाणं तु भवन्तस्त्रिदशेश्चराः ॥31॥ |
देवताओ! दमयन्तीके महलका इतना ही वृत्तान्त है, जिसे मैने ठीक-ठीक निवेदन कर दिया। देवेश्वरगण! अब इस सम्पूर्ण विषयमें आप सब देवतालोग ही प्रमाण हैं, अर्थात् आप ही साक्षी हैं ॥31॥ | O gods! This is the account of Damayanti's palace, which I have duly presented. O gods! Now, in this whole matter, you all are the witnesses. (31) |
| इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि नलोपाख्यानपर्वणि नलकर्तकदेवदौत्ये षट्पञ्चाशत्तमोऽध्यायः ॥56॥ | इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत नलोपाख्यानपर्वमें नलकर्तूक देवदौत्यविषयक छप्पनवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥56॥ | Thus ends the fifty-sixth chapter in the Nalopakhyana Parva of the Vana Parva in the Mahabharata, describing Nala's mission as a messenger to the gods. (56) |
| सप्तपञ्चाशत्तमोऽध्यायः | सत्तावनवाँ अध्याय | ## Chapter 57: |
| स्वयंवरमें दमयन्तीद्धारा नलका वरण, देवताओंका नलको वर देना, देवताओं और राजा ओका प्रस्थान, नल- दमयन्तीका विवाह एवं नलका यज्ञानुष्ठान और संतानोत्पादन | स्वयंवरमें दमयन्तीद्धारा नलका वरण, देवताओंका नलको वर देना, देवताओं और राजा ओका प्रस्थान, नल- दमयन्तीका विवाह एवं नलका यज्ञानुष्ठान और संतानोत्पादन | Damayanti's Choice in the Swayamvara, the Gods' Blessings to Nala, Departure of the Gods and Kings, Nala and Damayanti's Marriage, Nala's Performance of Yajnas, and the Birth of their Children |
| बृहदश्च उवाच अथ काले शुभे प्राप्ते तिथौ पुण्ये क्षणे तथा । आजुहाव महीपालान् भीमो राजा स्वयंवरे ॥1॥ |
बृहदश्च मुनि कहते हैं—राजन्! तदनन्तर शुभ समय, उत्तम तिथि तथा पुण्यदायक अवसर आनेपर राजा भीमने समस्त भूपालोंको स्वयंवरके लिये बुलाया ॥1॥ | **Brihadaswa Muni continues:** O King! Then, at an auspicious time, on a favorable date, and on a meritorious occasion, King Bhima invited all the kings to the swayamvara. (1) |
| तच्छुत्वा पृथिवीपालाः सर्वे हृच्छयपीडिताः । त्वरिताः समुपाजम्मुर्दमयन्तीमभीप्सवः ॥2॥ |
यह सुनकर सब भूपाल कामपीड़ित हो दमयन्तीको पानेकी इच्छासे तुरंत चल दिये ॥2॥ | Hearing this, all the kings, afflicted by desire, immediately set out, eager to obtain Damayanti. (2) |
| कनकस्तम्भरुचिरं तोरणेन विराजितम् । विविशुस्ते नृपा रङ्गं महासिंहा इवाचलम् ॥3॥ |
रंगमण्डप सोनेके खम्भोंसे सुशोभित था। तोरणसे उसकी शोभा और बढ़ गयी थी। जैसे बड़े-बड़े सिंह पर्वतकी गुफामें प्रवेश करते हैं, उसी प्रकार उन नरेशोंने रंगमण्डपमें प्रवेश किया ॥3॥ | The pavilion was adorned with golden pillars. Its beauty was further enhanced by the arches. Like great lions entering a mountain cave, the kings entered the pavilion. (3) |
| सुरभिस्रग्धराः सर्वे प्रमृष्टमणिकुण्डलाः ॥4॥ | वहाँ सब भूपाल भिन्न-भिन्न आसनोंपर बैठ गये। सबने सुगन्धित फूलोंकी माला धारण कर रखी थी और सबके कानोंमें विशुद्ध मणिमय कुण्डल झिलमिला रहे थे ॥4॥ | There, all the kings sat on various seats. They all wore garlands of fragrant flowers, and pure jeweled earrings gleamed in their ears. (4) |
| तां राजसमितिं पुण्यां नागैर्भोगवतीमिव । सम्पूर्णा पुरुषव्याघ्रैव्यध्चिर्गिरिगुहामिव ॥5॥ |
व्याघ्रोंसे भरी हुई पर्वतकी गुफा तथा नागोंसे सुशोभित भोगवती पुरीकी भाँति वह पुण्यमयी राजसभा नरश्रेष्ठ भूपालोंसे भरी दिखायी देती थी ॥5॥ | That virtuous assembly hall appeared filled with the best of kings, like a mountain cave filled with tigers or the city of Bhogavati adorned with serpents. (5) |
| तत्र स्म पीना दृश्यन्ते बाहवः परिघोपमाः । आकारवर्णसुश्लक्ष्णा: पञ्चशीर्षा इवोरगाः ॥6॥ |
वहाँ भूमिपालोंकी (पाँच अँगुलियोंसे युक्त) परिघ-जैसी मोटी भुजाएँ आकार-प्रकार और रंगमें अत्यन्त सुन्दर तथा पाँच मस्तकवाले सर्पके समान दिखायी देती थीं ॥6॥ | The thick arms of the kings, like maces (with five fingers), appeared extremely beautiful in shape, form, and color, resembling five-headed serpents. (6) |
| सुकेशान्तानि चारूणि सुनासाक्षिभ्रुवाणि च । मुखानि राज्ञां शोभन्ते नक्षत्राणि यथा दिवि ॥7॥ |
जैसे आकाशमें तारे प्रकाशित होते हैं, उसी प्रकार सुन्दर केशान्तभागसे विभूषित एवं रुचिर नासिका, नेत्र और भौंहोंसे युक्त राजाओंके मनोहर मुख सुशोभित हो रहे थे ॥7॥ | Just as stars shine in the sky, so did the handsome faces of the kings, adorned with beautiful hairlines and possessing charming noses, eyes, and eyebrows. (7) |
| दमयन्ती ततो रङ्गं प्रविवेश शुभानना । मुष्णन्ती प्रभया राज्ञां चक्षूंषि च मनांसि च ॥8॥ |
तदनन्तर अपनी प्रभासे राजाओंके नयनोंको लुभाती और चित्तको चुराती हुई सुन्दर मुखवाली दमयन्तीने रंगभूमिमें प्रवेश किया ॥8॥ | Then, Damayanti, with her beautiful face, entered the arena, captivating the eyes and stealing the hearts of the kings with her radiance. (8) |
| तस्या गात्रेषु पतिता तेषां दृष्टिर्महात्मनाम् । तत्र तत्रैव सक्ताऽभून्न चचाल च पश्यताम् ॥9॥ |
वहाँ आते ही दमयन्तीके अंगोंपर उन महामना नरेशोंकी दृष्टि पड़ी। उसे देखनेवाले राजाओमेंसे जिसकी दृष्टि दमयन्तीके जिस अंगपर पड़ी, वहीं लग गयी, वहाँसे हट न सकी ॥9॥ | As soon as she arrived, the eyes of those great-minded kings fell upon Damayanti's limbs. The gaze of each king, upon whichever part of Damayanti it fell, remained fixed there, unable to move. (9) |
| ततः संकीर्त्यमानेषु राज्ञां नामसु भारत । ददर्श भैमी पुरुषान् पञ्चतुल्याकृतीनिह ॥10॥ |
भारत! तत्पश्चात् राजाओंके नाम, रूप, यश और पराक्रम आदिका परिचय दिया जाने लगा। भीमकुमारी दमयन्तीने आगे बढ़कर देखा, यहाँ तो एक जगह पाँच पुरुष एक ही आकृतिके बैठे हुए हैं ॥10॥ | O Bharata! Then, the names, forms, fame, and valor of the kings were announced. Damayanti, the princess of Bhima, stepped forward and saw five men sitting in one place, all with the same appearance. (10) |
| तान् समीक्ष्य ततः सर्वान् निर्विशेषाकृतीन् स्थितान् । संदेहादथ वैदर्भी नाभ्यजानान्नलं नृपम् ॥11॥ |
उन सबके रूप-रंग आदिमें कोई अन्तर नहीं था। वे पाँचों नलके ही समान दिखायी देते थे। उन्हें एक जगह स्थित देखकर संदेह उत्पन्न हो जानेसे विदर्भराजकुमारी वास्तविक राजा नलको पहचान न सकी ॥11॥ | There was no difference in their form, complexion, etc. All five appeared identical to Nala. Seeing them together in one place, doubt arose, and the princess of Vidarbha could not recognize the real King Nala. (11) |
| यं यं हि ददृशे तेषां तं तं मेने नलं नृपम् । सा चिन्तयन्ती बुद्धयाथ तर्कयामास भाविनी ॥12॥ |
वह उनमेंसे जिस-जिस व्यक्तिपर दृष्टि डालती, उसी-उसीको राजा नल समझने लगती थी। वह भाविनी राजकन्या बुद्धिसे सोच-विचारकर मन-ही-मन तर्क करने लगी ॥12॥ | Upon whomever she cast her eyes, she would take him to be King Nala. The wise princess, using her intellect, began to reason within her mind. (12) |
| कथं हि देवाञ्जानीयां कथं विद्यां नलं नृपम् । एवं संचिन्तयन्ती सा वैदर्भी भृशदुःखिता ॥13॥ |
अहो! मैं कैसे देवताओंको जानूँ और किस प्रकार राजा नलको पहिचानूँ।' इस चिन्तामें पड़कर विदर्भराजकुमारी दमयन्तीको बड़ा दुःख हुआ ॥13॥ | "Alas! How can I recognize the gods and how can I identify King Nala?" Distressed by this worry, Damayanti, the princess of Vidarbha, felt great sorrow. (13) |
| श्रुतानि देवलिङ्गानि तर्कयामास भारत
। देवानां यानि लिङ्गानि स्थविरेभ्यः श्रुतानि मे ॥14॥ तानीह तिष्ठतां भूमावेकस्यापि न लक्षये । सा विनिश्चित्य बहुधा विचार्य च पुनः पुनः ॥15॥ शरणं प्रति देवानां प्राप्तकालममन्यत । |
भारत! उसने अपने सुने हुए देवचिल्लॉंपर भी विचार किया। वह मन-ही-मन कहने लगी “मैंने बड़े-बूढ़े पुरुषोंसे देवताओंकी पहचान करानेवाले जो लक्षण या चिल्ल सुन रखे हैं, उन्हें यहाँ भूमिपर बैठे हुए इन पाँच पुरुषोंमेंसे किसी एकमें भी नहीं देख पाती हूँ।' उसने अनेक प्रकारसे निश्चय और बार-बार विचार करके देवताओंकी शरणमें जाना ही समयोचित कर्तव्य समझा ॥ 14-15॥ | O Bharata! She also reflected on the divine signs she had heard about. She thought to herself, "I do not see any of the signs or marks that I have heard from elders, which distinguish the gods, in any of these five men sitting here on the ground." Having ascertained in many ways and deliberated repeatedly, she considered seeking refuge in the gods as the appropriate action at that time. (14-15) |
| वाचा च मनसा चैव नमस्कारं प्रयुज्य सा ॥16॥ देवेभ्यः प्राञ्जलिर्भूत्वा वेपमानेदमब्रवीत् । हंसानां वचनं श्रुत्वा यथा मे नैषधो वृतः । पतित्वे तेन सत्येन देवास्तं प्रदिशन्तु मे ॥17॥ |
तत्पश्चात् मन एवं वाणीद्वारा देवताओंको नमस्कार करके दोनों हाथ जोड़कर काँपती हुई वह इस प्रकार बोली--'मैंने हंसोंकी बात सुनकर निषधनरेश नलका पतिरूपमें वरण कर लिया है। इस सत्यके प्रभावसे देवतालोग स्वयं ही मुझे राजा नलकी पहचान करा दें ॥ | Then, after saluting the gods with her mind and speech, she spoke with folded hands and a trembling voice, "Having heard the words of the swans, I have chosen King Nala of Nishadha as my husband. By the power of this truth, may the gods themselves reveal King Nala to me. (16-17) |
| मनसा वचसा चैव यथा नाभिचराम्यहम् । तेन सत्येन विबुधास्तमेव प्रदिशन्तु मे ॥18॥ |
यदि मैं मन, वाणी एवं क्रियाद्वारा कभी सदाचारसे च्युत नहीं हुई हूँ तो उस सत्यके प्रभावसे देवतालोग मुझे राजा नलकी ही प्राप्ति करावें ॥18॥ | If I have never deviated from virtue in thought, word, and deed, then by the power of that truth, may the gods grant me the attainment of King Nala. (18) |
| यथा देवैः स मे भर्ता विहितो निषधाधिपः । तेन सत्येन मे देवास्तमेव प्रदिशन्तु मे ॥19॥ |
“यदि देवताओंने उन निषधनरेश नलको ही मेरा पति निश्चित किया हो तो उस सत्यके प्रभावसे देवता-लोग मुझे उन्हींको बतला दें ॥19॥ | If the gods have indeed destined Nala, the king of Nishadha, to be my husband, then by the power of that truth, may the gods reveal him to me. (19) |
| यथेदं व्रतमारब्धं नलस्याराधने मया । तेन सत्येन मे देवास्तमेव प्रदिशन्तु मे ॥20॥ |
'यदि मैंने नलकी आराधनाके लिये ही यह व्रत आरम्भ किया हो तो उस सत्यके प्रभावसे देवता मुझे उन्हीको बतला दे ॥20॥ | If I have undertaken this vow solely for the sake of worshipping Nala, then by the power of that truth, may the gods reveal him to me. (20) |
| स्वं चैव रूपं कुर्वन्तु लोकपाला महेश्वराः । यथाहमभिजानीयां पुण्यश्लोकं नराधिपम् ॥21॥ |
महेश्वर लोकपालगण अपना रूप प्रकट कर दें, जिससे मैं पुण्यश्लोक महाराज नलको पहचान सूँ” ॥21॥ | May the great lords, the guardians of the world, reveal their true forms so that I may recognize the glorious King Nala." (21) |
| निशम्य दमयन्त्यास्तत् करुणं प्रतिदेवितम्
। निश्चयं परमं तथ्यमनुरागं च नैषधे ॥22॥ मनोविशुद्धिं बुद्धिं च भक्ति रागं च नैषधे । यथोक्तं चक्रिरे देवाः सामर्थ्य लिङ्गधारणे ॥23॥ |
दमयन्तीका वह करुण विलाप सुनकर तथा उसके अन्तिम निश्चय, नलविषयक वास्तविक अनुराग, विशुद्ध हृदय, उत्तम बुद्धि तथा नलके प्रति भक्ति एवं प्रेम देखकर देवताओंने दमयन्तीके भीतर वह यथार्थ शक्ति उत्पन्न कर दी, जिससे उसे देवसूचक लक्षणोंका निश्चय हो सके ॥ 22-23॥ | Hearing Damayanti's sorrowful lament, and observing her firm resolve, genuine affection for Nala, pure heart, excellent intellect, and devotion and love for Nala, the gods bestowed upon Damayanti the true power to discern the divine signs. (22-23) |
| सापश्यद् विबुधान् सर्वानस्वेदान् स्तब्धलोचनान् । हृषितस्रग्रजोहीनान् स्थितानस्पृशतः क्षितिम् ॥24॥ |
अब दमयन्तीने देखा-सम्पूर्ण देवता स्वेदरहित हैं--उनके किसी अंगमें पसीनेकी बूँद नहीं दिखायी देती, उनकी आँखोंकी पलक नहीं गिरती हैं। उन्होने जो पुष्पमालाएँ पहन रखी हैं, वे नूतन विकाससे युक्त हैं-कुम्हलाती नहीं हैं। उनपर धूल-कण नहीं पड़ रहे हैं। वे सिंहासनोंपर बैठे हैं, किंतु अपने पैरोंसे पृथ्वीतलका स्पर्श नहीं करते हैं और उनकी परछाई नहीं पड़ती है ॥24॥ | Now Damayanti saw that all the gods were free from sweat—not a drop of perspiration was visible on any part of their bodies, their eyelids did not blink. The garlands they wore were fresh and unwilted. No dust particles settled on them. They sat on thrones but did not touch the ground with their feet, and they cast no shadows. (24) |
| छायाद्वितीयो म्लानस्रग्रज:स्वेदसमन्वितः । भूमिष्ठो नैषधश्चैव निमेषेण च सूचितः ॥25॥ |
उन पाँचोंमें एक पुरुष ऐसे हैं, जिनकी परछाई पड़ रही है। उनके गलेकी पुष्पमाला कुम्हला गयी है। उनके अंगोंमें धूल-कण और पसीनेकी बूँदै भी दिखायी पड़ती हैं। वे पृथ्वीका स्पर्श किये बैठे हैं और उनके नेत्रोंकी पलकें गिरती हैं। इन लक्षणोंसे दमयन्तीने निषधराज नलको पहचान लिया ॥25॥ | Among those five, there was one man who cast a shadow. The garland around his neck had wilted. Dust particles and drops of sweat were visible on his body. He sat touching the earth, and his eyelids blinked. By these signs, Damayanti recognized Nala, the king of Nishadha. (25) |
| सा समीक्ष्य तु तान् देवान् पुण्यश्लोकं च भारत । नैषधं वरयामास भैमी धर्मेण पाण्डव ॥26॥ |
भरतकुलभूषण पाण्डुनन्दन! राजकुमारी दमयन्तीने उन देवताओं तथा पुण्यश्लोक नलकी ओर पुनः दृष्टिपात करके धर्मके अनुसार निषधराज नलका ही वरण किया ॥26॥ | O descendant of Bharata, delight of the Pandavas! Princess Damayanti, after looking again at those gods and the glorious Nala, chose Nala, the king of Nishadha, in accordance with righteousness. (26) |
| विलज्जमाना वस्त्रान्तं जग्राहायतलोचना
। स्कन्ध देशेऽसृजत् तस्य स्रजं परमशोभनाम् ॥27॥ वरयामास चैवैनं पतित्वे वरवर्णिनी । |
विशाल नेत्रोंवाली दमयन्तीने लजाते-लजाते नलके वस्त्रका छोर पकड़ लिया और उनके गलेमें परम सुन्दर फूलोंका हार डाल दिया। इस प्रकार वरवर्णिनी दमयन्तीने राजा नलका पतिरूपमें वरण कर लिया ॥27॥ | Damayanti, with her large eyes, shyly grasped the edge of Nala's garment and placed a garland of most beautiful flowers around his neck. Thus, the beautiful Damayanti chose King Nala as her husband. (27) |
| ततो हाहेति सहसा मुक्तः शब्दो नराधिपैः ॥28॥ | फिर तो दूसरे राजाओंके मुखसे सहसा 'हाहाकार'-का शब्द निकल पड़ा ॥28॥ | Suddenly, cries of "Alas!" and "Oh!" arose from the other kings. (28) |
| देवैर्महर्षिभिस्तत्र साधु साध्विति भारत । विस्मितैरीरितः शब्दः प्रशंसद्धिर्नलं नृपम् ॥29॥ |
भारत! देवता और महर्षि वहाँ साधुवाद देने लगे। सबने विस्मित होकर राजा नलकी प्रशंसा करते हुए इनके सौभाग्यको सराहा ॥29॥ | O Bharata! The gods and great sages expressed their approval. Everyone, amazed, praised King Nala and lauded his good fortune. (29) |
| दमयन्तीं तु कौरव्य वीरसेनसुतो नृपः । आश्वासयद् वरारोहां प्रह्ृष्टेनान्तरात्मना ॥30॥ |
कुरुनन्दन! वीरसेनकुमार नलने उल्लसित हृदयसे सुन्दरी दमयन्तीको आश्वासन देते हुए कहा ॥30॥ | O delight of the Kurus! Nala, the son of Virasena, with a joyful heart, reassured the beautiful Damayanti, saying, (30) |
| यत् त्वं भजसि कल्याणि पुमांसं देवसंनिधौ । तस्मान्मां विद्धि भर्तारमेवं ते वचने रतम् ॥31॥ |
'कल्याणी! तुम देवताओंके समीप जो मुझ-जैसे पुरुषका वरण कर रही हो, इस अलौकिक अनुरागके कारण अपने इस पतिको तुम सदा अपनी प्रत्येक आज्ञाके पालनमें तत्पर समझो ॥31॥ | "O auspicious one! Because of this extraordinary affection, by which you choose a man like me in the presence of the gods, consider your husband ever ready to obey your every command. (31) |
| यावच्च मे धरिष्यन्ति प्राणा देहे शुचिस्मिते । तावत् त्वयि भविष्यामि सत्यमेतद् ब्रवीमि ते ॥32॥ |
“पवित्र मुसकानवाली देवि! मेरे इस शरीरमें जबतक प्राण रहेंगे, तबतक तुममें मेरा अनन्य अनुराग बना रहेगा, यह मैं तुमसे सच्ची प्रतिज्ञा करके कहता हूँ” ॥32॥ | "O goddess with a gentle smile! I swear to you truthfully that as long as there is life in this body of mine, my unwavering love for you will remain." (32) |
| दमयन्ती तथा वाग्भिरभिनन्द्य कृताञ्जलिः । तौ परस्परतः प्रीतौ दृष्ट्वा त्वग्निपुरोगमान् ॥33॥ |
तानेव शरणं देवाञ्जग्मतुर्मनसा तदा । इसी प्रकार दमयन्तीने भी हाथ जोड़कर विनीत वचनोंद्वारा महाराज नलका अभिनन्दन किया। वे दोनों एक-दूसरेको पाकर बड़े प्रसन्न हुए। उन्होने सामने अग्नि आदि देवताओंको देखकर मन-ही-मन उनकी ही शरण ली ॥336॥ | In this way, Damayanti also, with folded hands and humble words, honored King Nala. They were both overjoyed to have found each other. Seeing the gods like Agni before them, they mentally sought refuge in them. (33) |
| वृते तु नैषधे भैम्या लोकपाला महौजसः ॥34॥ प्रहृष्टमनसः सर्वे नलायाष्टौ वरान् ददुः । |
दमयन्तीने जब नलका वरण कर लिया, तब उन सब महातेजस्वी लोकपालोंने प्रसन्नचित्त होकर नलको आठ वरदान दिये ॥34॥ | When Damayanti chose Nala, all those glorious guardians of the world, with joyful hearts, granted eight boons to Nala. (34) |
| प्रत्यक्षदर्शनं यज्ञे गतिं चानुत्तमां शुभाम् ॥35॥ नैषधाय ददौ शक्रः प्रीयमाणः शचीपतिः । |
शचीपति इन्द्रने प्रसन्न होकर निषधराज नलको यह वर दिया कि “मैं यज्ञमें तुम्हें प्रत्यक्ष दर्शन दूँगा और अन्तमें सर्वोत्तम शुभ गति प्रदान करूँगा” ॥35॥ | Indra, the lord of Sachi, pleased, granted this boon to Nala, the king of Nishadha: "I shall grant you my direct vision in the yajna and, in the end, bestow upon you the most auspicious and ultimate destination." (35) |
| न अग्निरात्मभवं प्रादाद् यत्र वाञ्छति नैषधः ॥36॥ लोकानात्मप्रभांश्चैव ददौ तस्मै हुताशनः । |
हविष्यभोक्ता अग्निदेवने नलको अपने ही समान तेजस्वी लोक प्रदान किये और यह भी कहा कि "राजा नल जहाँ चाहेंगे, वहीं मैं प्रकट हो जाऊँगा" ॥36॥ | Agni, the consumer of oblations, granted Nala realms as radiant as his own and also said, "King Nala, I shall appear wherever you desire." (36) |
| यमस्त्वन्नरसं प्रादाद् धर्मे च परमां स्थितिम् ॥37॥ | यमराजने यह कहा कि 'राजा नलकी बनायी हुई रसोईमें उत्तमोत्तम रस एवं स्वाद उपलब्ध होगा और धर्ममें इनकी दृढ़ निष्ठा बनी रहेगी” ॥37॥ | Yama said, "The food prepared in King Nala's kitchen will possess the finest flavors and tastes, and his steadfast devotion to righteousness will remain." (37) |
| अपां पतिरपां भावं यत्र वाञ्छति नैषधः । स्रजश्चोत्तमगन्धाढ्याः सर्वे च मिथुनं ददुः ॥38॥ |
जलके स्वामी वरुणने नलकी इच्छाके अनुसार जल प्रकट होनेका वर दिया और यह भी कहा कि “तुम्हारी पुष्पमालाएँ सदा उत्तम गन्धसे सम्पन्न होंगी।' इस प्रकार सब देवताओंने दो-दो वर दिये ॥38॥ | Varuna, the lord of waters, granted Nala the boon of having water appear according to his will and also said, "Your garlands will always be filled with the finest fragrance." Thus, all the gods granted two boons each. (38) |
| वरानेवं प्रदायास्य देवास्ते त्रिदिवं गताः
। पार्थिवाश्चानुभूयास्य विवाहं विस्मयान्विताः ॥39॥ दमयन्त्याश्च मुदिताः प्रतिजग्मुर्यथागतम् । |
इस प्रकार राजा नलको वरदान देकर वे देवता-लोग स्वर्गलोकको चले गये। स्वयंवरमें आये हुए राजा भी विस्मयविमुग्ध हो नल और दमयन्तीके विवाहोत्सवका-सा अनुभव करते हुए प्रसन्नतापूर्वक जैसे आये थे, वैसे लौट गये ॥396॥ | Having thus bestowed boons upon King Nala, those gods departed for the celestial realm. The kings who had come to the swayamvara, astonished and feeling as if they had witnessed the marriage festival of Nala and Damayanti, returned happily, just as they had come. (39) |
| गतेषु पार्थिवेन्द्रेषु भीमः प्रीतो महामनाः ॥40॥ विवाहं कारयामास दमयन्त्या नलस्य च । |
सब नरेशोंके विदा हो जानेपर महामना भीमने बड़ी प्रसन्रताके साथ नल-दमयन्तीका शास्त्रविधिके अनुसार विवाह कराया ॥403॥ | After all the kings had departed, the magnanimous Bhima, with great joy, arranged the marriage of Nala and Damayanti according to the scriptures. (40) |
| उष्य तत्र यथाकामं नैषधो द्विपदां वरः ॥41॥ भीमेन समनुज्ञातो जगाम नगरं स्वकम् । |
मनुष्योमं श्रेष्ठ निषधनरेश नल अपनी इच्छाके अनुसार कुछ दिनोंतक ससुरालमे रहे, फिर विदर्भनरेश भीमकी आज्ञा ले (दमयन्तीसहित) अपनी राजधानीको चले गये ॥41॥ | Nala, the king of Nishadha, the best among men, stayed in his father-in-law's house for some time according to his wish, and then, taking leave of Bhima, the king of Vidarbha, departed for his own capital (with Damayanti). (41) |
| अवाप्य नारीरत्नं तु पुण्यश्लोकोऽपि पार्थिवः ॥42॥ रेमे सह तया राजञ्छच्येव बलवृत्रहा । |
राजन्! पुण्यश्लोक महाराज नलने भी उस रमणीरत्नको पाकर उसके साथ उसी प्रकार विहार किया, जैसे शचीके साथ इन्द्र करते हैं ॥42॥ | O King! The glorious King Nala, having obtained that jewel among women, sported with her just as Indra does with Sachi. (42) |
| अतीव मुदितो राजा भ्राजमानोंऽशुमानिव ॥43॥ अरञ्जयत् प्रजा वीरो धर्मेण परिपालयन्। ईजे चाप्यश्वमेधेन ययातिरिव नाहुषः ॥44॥ अन्यैश्च बहुभिर्धीमान् क्रतुभिश्चाप्तदक्षिणैः । |
राजा नल सूर्यके समान प्रकाशित होते थे। वीरवर नल अत्यन्त प्रसन्न रहकर अपनी प्रजाका धर्मपूर्वक पालन करते हुए उसे प्रसन्न रखते थे ॥ 43 ॥ उन बुद्धिमान् नरेशने नहुषनन्दन ययातिकी भाँति अश्वमेध तथा पर्याप्त दक्षिणावाले दूसरे बहुत-से यज्ञोंका भी अनुष्ठान किया ॥ 44॥ |
King Nala shone like the Sun. The brave Nala remained very happy and kept his subjects happy by taking care of them righteously. (43) That wise king performed the Ashwamedha yajna, like Nahusha's son Yayati, and many other yajnas with abundant offerings. (44) |
| पुनश्च रमणीयेषु वनेषूपवनेषु च ॥45॥ दमयन्त्या सह नलो विजहारामरोपमः । |
तदनन्तर देवतुल्य राजा नलने दमयन्तीके साथ रमणीय वनों और उपवनोंमें विहार किया ॥45॥ | Thereafter, King Nala, like a god, sported with Damayanti in delightful forests and gardens. (45) |
| जनयामास च ततो दमयन्त्यां महामनाः । इन्द्रसेनं सुतं चापि इन्द्रसेनां च कन्यकाम् ॥46॥ |
महामना नलने दमयन्तीके गर्भसे इन्द्रसेन नामक एक पुत्र और इन्द्रसेना नामवाली एक कन्याको जन्म दिया ॥46॥ | The magnanimous Nala begot a son named Indrasena and a daughter named Indrasena through Damayanti. (46) |
| एवं स यजमानश्च विहरंश्च नराधिपः । ररक्ष वसुसम्पूर्णा वसुधां वसुधाधिपः ॥47॥ |
इस प्रकार यज्ञोंका अनुष्ठान तथा सुखपूर्वक विहार करते हुए महाराज नलने धन- धान्यसे सम्पन्न वसुन्धराका पालन किया ॥47॥ | Thus, performing yajnas and enjoying himself, King Nala ruled over the earth, rich in wealth and grain. (47) |
| इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि नलोपाख्यानपर्वणि दमयन्तीस्वयंवरे सप्तपञ्चाशत्तमोऽध्यायः ॥57॥ | इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत दमयन्ती-स्वयवरविषयक सत्तावनवाँ अध्याय पुरा हुआ ॥57॥ | Thus ends the fifty-seventh chapter in the Nalopakhyana Parva of the Vana Parva in the Mahabharata, describing Damayanti's swayamvara. (57) |
| अष्टपञ्चाशत्तमोऽध्यायः | अट्वावनव अध्याय | ## Chapter 58: |
| देवता ओके द्वारा नलके पका गान और उनके निषेध करनेपर भी नलके कलियुगका कोप | देवता ओके द्वारा नलके पका गान और उनके निषेध करनेपर भी नलके कलियुगका कोप | The Gods' Encounter with Kali and His Anger Towards Nala |
| बृहदश्च उवाच वृते तु नैषधे भैम्या लोकपाला महौजसः । यान्तो ददृशुरायान्तं द्वापरं कलिना सह ॥1॥ |
बृहदश्च मुनि कहते हैं-राजन्! भीमकुमारी दमयन्तीद्वारा निषधनरेश नलका वरण हो जानेपर जब महातेजस्वी लोकपालगण स्वर्गलोकको जा रहे थे, उस समय मार्गमे उन्होने देखा कि कलियुगके साथ द्वापर आ रहा है ॥1॥ | **Brihadaswa Muni continues:** O King! When the glorious guardians of the world were returning to the celestial realm after the Nishadha king Nala was chosen by Damayanti, the daughter of Bhima, they saw Kali coming along with Dwapara on their way. (1) |
| अथाब्रवीत् कलिं शक्रः सम्प्रेक्ष्य बलवृत्रहा । द्वापरेण सहायेन कले ब्रूहि क्व यास्यसि ॥2॥ |
कलियुगको देखकर बल और वृत्रासुरका नाश करनेवाले इन्द्रने पूछा--“कले! बताओ तो सही द्वापरके साथ कहाँ जा रहे हो?” ॥2॥ | Seeing Kali, Indra, the destroyer of Bala and Vritrasura, asked, "O Kali! Tell me, where are you going with Dwapara?" (2) |
| ततोऽब्रवीत् कलिः शक्रं दमयन्त्याः स्वयंवरम् । गत्वा हि वरयिष्ये तां मनो हि मम तां गतम् ॥3॥ |
तब कलिने इन्द्रसे कहा--'देवराज! मैं दमयन्तीके स्वयंवरमें जाकर उसका वरण करूँगा; क्योकि मेरा मन उसके प्रति आसक्त हो गया है" ॥3॥ | Then Kali said to Indra, "O King of Gods! I am going to Damayanti's swayamvara to choose her, for my heart is attached to her." (3) |
| तमब्रवीत् प्रहस्येन्द्रो निर्वृत्तः स स्वयंवरः । वृतस्तया नलो राजा पतिरस्मत्समीपतः ॥4॥ |
तब इन्द्रने हसकर कहा--“वह स्वयंवर तो हो गया। हमारे समीप ही दमयन्तीने राजा नलको अपना पति चुन लिया ॥4॥ | Indra laughed and said, "That swayamvara is already over. Damayanti has chosen King Nala as her husband in our presence." (4) |
| एवमुक्तस्तु शक्रेण कलिः कोपसमन्वितः । देवानामन्त्र्य तान् सर्वानुवाचेदं वचस्तदा ॥5॥ |
इन्द्रके ऐसा कहनेपर कलियुगको क्रोध चढ़ आया और उसी समय उसने उन सब देवताओंको सम्बोधित करके यह बात कही- ॥5॥ | Hearing this, Kali became enraged and immediately addressed all the gods, saying, (5) |
| देवानां मानुषं मध्ये यत् सा पतिमविन्दत । ततस्तस्या भवेन्न्याय्यं विपुलं दण्डधारणम् ॥6॥ |
'दमयन्तीने देवताओंके बीचमें मनुष्यका पतिरूपमें वरण किया है। अतः उसे बड़ा भारी दण्ड देना उचित प्रतीत होता है” ॥6॥ | "Damayanti has chosen a human as her husband in the presence of the gods. Therefore, it seems appropriate to give her a severe punishment." (6) |
| एवमुक्ते तु कलिना प्रत्यूचुस्ते दिवौकसः । अस्माभिः समनुज्ञाते दमयन्त्या नलो वृतः ॥7॥ |
कलियुगके ऐसा कहनेपर देवताओंने उत्तर दिया-'दमयन्तीने हमारी आज्ञा लेकर नलका वरण किया है | | The gods replied to Kali, "Damayanti has chosen Nala with our permission. (7) |
| का च सर्वगुणोपेतं नाश्रयेत नलं नृपम्
। यो वेद धर्मानखिलान् यथावच्चरितव्रतः ॥8॥ योऽधीते चतुरो वेदान् सर्वानाख्यानपञ्चमान् । नित्यं तृप्ता गृहे यस्य देवा यज्ञेषु धर्मतः । अहिंसानिरतो यश्च सत्यवादी दृढव्रतः ॥9॥ यस्मिन् दाक्ष्यं धृतिर्ज्ञानं तपः शौचं दमः शमः । ध्रुवाणि पुरुषव्याघ्रे लोकपालसमे नृपे ॥10॥ एवंरूपं नलं यो वै कामयेच्छपितुं कले । आत्मानं स शपेन्मूढो हन्यादात्मानमात्मना ॥11॥ |
'राजा नल सर्वगुणसम्पन्न हैं। कौन स्त्री उनका वरण नहीं करेगी? जिन्होंने भलीभाँति ब्रह्मचर्यव्रतका पालन करके चारों वेदों तथा पंचम वेद समस्त इतिहास-पुराणका भी अध्ययन किया है, जो सब धर्मोको जानते हैं, जिनके घरपर पंचयज्ञोंमें धर्मके अनुसार सम्पूर्ण देवता नित्य तृप्त होते हैं, जो अहिंसा-परायण, सत्यवादी तथा दृढ़तापूर्वक व्रतका पालन करनेवाले है, जिन नरश्रेष्ठ लोकपाल-सदृश तेजस्वी नलमें दक्षता, धैर्य, ज्ञान, तप, शौच, शम और दम आदि गुण नित्य निवास करते हैं। कले! ऐसे राजा नलको जो मूढ़ शाप देनेकी इच्छा रखता है, वह मानो अपनेको ही शाप देता है। अपने द्वारा अपना ही विनाश करता है ॥ 8-11॥ | "King Nala is endowed with all virtues. Which woman would not choose him? He has diligently observed the vow of celibacy, studied all four Vedas, the fifth Veda, and all the Itihasas and Puranas. He knows all the dharmas, and in his house, all the gods are perpetually satisfied through the five daily sacrifices performed according to dharma. He is non-violent, truthful, and steadfast in observing vows. O Kali! Such is King Nala, radiant like the guardians of the world, in whom virtues like skill, courage, knowledge, penance, purity, tranquility, and self-control constantly reside. One who foolishly desires to curse such a king is essentially cursing oneself and inviting self-destruction. (8-11) |
| एवंगुणं नलं यो वै कामयेच्छपितुं कले । कृच्छ्रे स नरके मज्जेदगाधे विपुले हदे । एवमुक्त्वा कलिं देवा द्वापरं च दिवं ययुः ॥12॥ |
'ऐसे सदगुणसम्पन्न महाराज नलको जो शाप देनेकी कामना करेगा, वह कष्टसे भरे हुए अगाध एवं विशाल नरककुण्डमें निमग्न होगा।' कलियुग और द्वापरसे ऐसा कहकर देवतालोग स्वर्गमें चले गये ॥12॥ | "One who wishes to curse such a virtuous King Nala will be plunged into a deep and vast hell filled with suffering." Having said this to Kali and Dwapara, the gods departed for heaven. (12) |
| ततो गतेषु देवेषु कलिर्द्धापरमब्रवीत्
। संहर्तुं नोत्सहे कोपं नले वत्स्यामि द्वापर ॥13॥ भ्रंशयिष्यामि तं राज्यान्न भैम्या सह रंस्यते । त्वमप्यक्षान् समाविश्य साहाय्यं कर्तुमर्हसि ॥14॥ |
तदनन्तर देवताओंके चले जानेपर कलियुगने द्वापरसे कहा--'द्वापर! मैं अपने क्रोधका उपसंहार नहीं कर सकता। नलके भीतर निवास करूँगा और उन्हें राज्यसे वंचित कर दूँगा। जिससे वे दमयन्तीसे रमण नहीं कर सकेंगे। तुम्हें भी जूएके पासोंमें प्रवेश करके मेरी सहायता करनी चाहिये" ॥ 13-14॥ | After the gods had left, Kali said to Dwapara, "O Dwapara! I cannot contain my anger. I will dwell within Nala and deprive him of his kingdom, so that he will not be able to enjoy Damayanti. You should also help me by entering the dice." (13-14) |
| इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि नलोपाख्यानपर्वणि कलिदेवसंवादे अष्टपञ्चाशत्तमोऽध्यायः ॥58॥ | इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत नलोपाख्यानपर्वमें कलि-देवता-संवादविषयक अट्वावनव अध्याय पूरा हुआ ॥58॥ | Thus ends the fifty-eighth chapter in the Nalopakhyana Parva of the Vana Parva in the Mahabharata, describing the conversation between Kali and the gods. (58) |
| एकोनषष्टितमोऽध्यायः | उनसठवाँ अध्याय | ## Chapter 59: |
| नलमें कलियुगका प्रवेश एवं नल और पुष्करकी द्यूतक्रीडा, प्रजा और दमयन्तीके निवारण करनेपर भी राजाका झूतसे निवृत्त नहीं होना | नलमें कलियुगका प्रवेश एवं नल और पुष्करकी द्यूतक्रीडा, प्रजा और दमयन्तीके निवारण करनेपर भी राजाका झूतसे निवृत्त नहीं होना | Kali's Entry into Nala and the Dice Game with Pushkara |
| बृहदश्च उवाच एवं स समयं कृत्वा द्वापरेण कलिः सह । आजगाम ततस्तत्र यत्र राजा स नैषधः ॥1॥ |
बृहदश्च मुनि कहते हैं--राजन्! इस प्रकार द्वापरके साथ संकेत करके कलियुग उस स्थानपर आया, जहाँ निषधराज नल रहते थे ॥1॥ | **Brihadaswa Muni continues:** O King! Having thus conspired with Dwapara, Kali arrived at the place where Nala, the king of Nishadha, resided. (1) |
| स नित्यमन्तरप्रेप्सुर्निषधेष्ववसच्चिरम् । अथास्य द्वादशे वर्षे ददर्श कलिरन्तरम् ॥2॥ |
वह प्रतिदिन राजा नलका छिद्र देखता हुआ निषधदेशमें दीर्घकालतक टिका रहा। बारह वर्षोके बाद एक दिन कलिको एक छिद्र दिखायी दिया ॥2॥ | Every day, he searched for a flaw in King Nala and remained in the land of Nishadha for a long time. After twelve years, one day, Kali found a flaw. (2) |
| कृत्वा मूत्रमुपस्पृश्य संध्यामन्वास्त नैषधः । अकृत्वा पादयोः शौचं तत्रैनं कलिराविशत् ॥3॥ |
राजा नल उस दिन लघुशंका करके आये और हाथ-मुँह धोकर आचमन करनेके पश्चात् संध्योपासना करने बैठ गये; पैरोंको नहीं धोया। यह छिद्र देखकर कलियुग उनके भीतर प्रविष्ट हो गया ॥3॥ | That day, King Nala had relieved himself, washed his hands and mouth, and sipped water, but he sat down to perform his evening prayers without washing his feet. Seeing this flaw, Kali entered into him. (3) |
| स समाविश्य च नलं समीपं पुष्करस्य च । गत्वा पुष्करमाहेदमेहि दीव्य नलेन वै ॥4॥ |
नलमें आविष्ट होकर कलियुगने दूसरा रूप धारण करके पुष्करके पास जाकर कहा --“चलो, राजा नलके साथ जूआ खेलो ॥4॥ | Having possessed Nala, Kali, assuming a different form, went to Pushkara and said, "Come, let's play dice with King Nala. (4) |
| अक्षद्यूते नलं जेता भवान् हि सहितो मया । निषधान् प्रतिपद्यस्व जित्वा राज्यं नलं नृपम् ॥5॥ |
मेरे साथ रहकर तुम जूएमें अवश्य राजा नलको जीत लोगे। इस प्रकार महाराज नलको उनके राज्यसहित जीतकर निषधदेशको अपने अधिकारमें कर लो" ॥5॥ | By staying with me, you will surely defeat King Nala in the game of dice. Thus, win over King Nala along with his kingdom and take control of the land of Nishadha." (5) |
| एवमुक्तस्तु कलिना पुष्करो नलमभ्ययात् । कलिश्चैव वृषो भूत्वा गवां पुष्करमभ्ययात् ॥6॥ |
कलिके ऐसा कहनेपर पुष्कर राजा नलके पास गया। कलि भी साँड़ बनकर पुष्करके साथ हो लिया ॥6॥ | Upon hearing Kali's words, Pushkara went to King Nala. Kali also accompanied him, disguised as a bull. (6) |
| आसाद्य तु नलं वीरं पुष्करः परवीरहा । दीव्यावेत्यब्रवीद् भ्राता वृषेणेति मुहुर्मुहुः ॥7॥ |
शत्रुवीरोंका संहार करनेवाले पुष्करने वीरवर नलके पास जाकर उनसे बार-बार कहा --हम दोनों धर्मपूर्वक जूआ खेलें।' पुष्कर राजा नलका भाई लगता था ॥7॥ | Pushkara, the slayer of enemy heroes, went to the valiant Nala and repeatedly urged him, "Let us play a game of dice according to dharma." Pushkara was like a brother to King Nala. (7) |
| न चक्षमे ततो राजा समाह्वानं महामनाः । वैदर्भ्याः प्रेक्षमाणायाः पणकालममन्यत ॥8॥ |
महामना राजा नल द्यूतके लिये पुष्करके आह्वानको न सह सके। विदर्भराजकुमारी दमयन्तीके देखते-देखते उसी क्षण जूआ खेलनेका उपयुक्त अवसर समझ लिया ॥8॥ | The magnanimous King Nala could not resist Pushkara's invitation for the game of dice. Right then, in the presence of Damayanti, the princess of Vidarbha, he considered it an opportune moment to play. (8) |
| हिरण्यस्य सुवर्णस्य यानयुग्यस्य वाससाम्
। आविष्टः कलिना द्यूते जीयते स्म नलस्तदा ॥9॥ तमक्षमदसम्मत्तं सुहृदां न तु कश्चन । निवारणेऽभवच्छक्तो दीव्यमानमरिंदमम् ॥10॥ |
तब कलियुगसे आविष्ट होकर राजा नल हिरण्य, सुवर्ण, रथ आदि वाहन और बहुमूल्य वस्त्र दाँवपर लगाते तथा हार जाते थे। सुहृदोंमें कोई भी ऐसा नहीं था, जो ह्यूतक्रीडाके मदसे उन्मत्त शत्रुदमन नलको उस समय जूआ खेलनेसे रोक सके ॥ 9-10॥ | Then, possessed by Kali, King Nala began wagering and losing gold, silver, chariots, other vehicles, and precious garments. There was no one among his friends who could stop the enemy-subduing Nala, intoxicated by the game of dice, from playing at that time. (9-10) |
| ततः पौरजनाः सर्वे मन्त्रिभिः सह भारत । राजानं द्रष्टमागच्छन् निवारयितुमातुरम् ॥11॥ |
भारत! तदनन्तर समस्त पुरवासी मनुष्य मन्त्रियोंके साथ राजासे मिलने तथा उन आतुर नरेशको ह्यूतक्रीडासे रोकनेके लिये वहाँ आये ॥11॥ | O Bharata! Then, all the citizens, along with the ministers, came to meet the king and dissuade the distressed king from gambling. (11) |
| ततः सूत उपागम्य दमयन्त्यै न्यवेदयत् । एष पौरजनो देवि द्वारि तिष्ठति कार्यवान् ॥12॥ |
इसी समय सारथिने महलमें जाकर महारानी दमयन्तीसे निवेदन किया--'देवि! ये पुरवासीलोग कार्यवश राजद्वारपर खड़े हैं ॥12॥ | At that very moment, the charioteer went to the palace and informed Queen Damayanti, "O Queen! The citizens are waiting at the royal gate for some work. (12) |
| निवेद्यतां नैषधाय सर्वाः प्रकृतयः स्थिताः । अमृष्यमाणा व्यसनं राज्ञो धर्मार्थदर्शिनः ॥13॥ |
“आप निषधराजसे निवेदन कर दें। धर्म-अर्थका तत्त्व जाननेवाले महाराजके भावी संकटको सहन न कर सकनेके कारण मन्त्रियोंसहित सारी प्रजा द्वारपर खड़ी है” ॥13॥ | "Please inform King Nala. The subjects, along with the ministers, are standing at the gate, unable to bear the impending crisis of the king who knows the essence of dharma and artha." (13) |
| ततः सा बाष्पकलया वाचा दुःखेन कर्शिता । उवाच नैषधं भैमी शोकोपहतचेतना ॥14॥ |
यह सुनकर दुःखसे दुर्बल हुई दमयन्तीने शोकसे अचेत-सी होकर आँसू बहाते हुए गद्गदवाणीमें निषध-नरेशसे कहा-- ॥14॥ | Hearing this, Damayanti, weakened by grief, with tears flowing and her voice choked with emotion, said to the king of Nishadha, (14) |
| भत राजन् पौरजनो द्वारि त्वां दिदृक्षुरवस्थितः
। मन्त्रिभिः सहितः सर्वै राजभक्तिपुरस्कृतः ॥15॥ तं द्रष्टुमर्हसीत्येवं पुनः पुनरभाषत । तं तथा रुचिरापाङ्गीं विलपन्तीं तथाविधाम् ॥16॥ आविष्टः कलिना राजा नाभ्यभाषत किंचन । ततस्ते मन्त्रिणः सर्वे ते चैव पुरवासिनः ॥17॥ नायमस्तीति दुःखार्ता व्रीडिता जग्मुरालयान् । तथा तदभवद् द्यूतं पुष्करस्य नलस्य च । युधिष्ठिर बहून् मासान् पुण्यश्लोकस्त्वजीयत ॥18॥ |
“महाराज! पुरवासी प्रजा राजभक्तिपूर्वक आपसे मिलनेके लिये समस्त मन्त्रियोंके साथ द्वारपर खड़ी है। आप उन्हें दर्शन दें।' दमयन्तीने इन वाक्योंको बार-बार दुहराया। मनोहर नयनप्रान्तवाली विदर्भ-कुमारी इस प्रकार विलाप करती रह गयी, परंतु कलियुगसे आविष्ट हुए राजाने उससे कोई बाततक न की। तब वे सब मन्त्री और पुरवासी दुःखसे आतुर और लज्जित हो यह कहते हुए अपने-अपने घर चले गये कि “यह राजा नल अब राज्यपर अधिक समयतक रहनेवाला नहीं है।' युधिष्ठिर! पुष्कर और नलकी वह द्यूतक्रीडा कई महीनोंतक चलती रही। पुण्यश्लोक महाराज नल उसमें हारते ही जा रहे थे ॥ 15-18॥ | "O King! The citizens, with all the ministers, are standing at the gate, devotedly waiting to see you. Please grant them an audience." Damayanti repeated these words again and again. The princess of Vidarbha, with beautiful eyes, continued to lament in this way, but the king, possessed by Kali, did not even speak to her. Then, all the ministers and citizens, distressed and ashamed, returned to their homes, saying, "This King Nala will not rule the kingdom for much longer." O Yudhishthira! That game of dice between Pushkara and Nala continued for many months. The glorious King Nala kept losing. (15-18) |
| इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि नलोपाख्यानपर्वणि नलद्यूते एकोनषष्टितमोऽध्यायः ॥59॥ | इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत नलोपाख्यानपर्वमें नलह्यूतविषयक उनसठवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥59॥ | Thus ends the fifty-ninth chapter in the Nalopakhyana Parva of the Vana Parva in the Mahabharata, describing Nala's gambling. (59) |
| षष्टितमोऽध्यायः | साठवाँ अध्याय | ## Chapter 60: |
| दुःखित दमयन्तीका वार्ष्णेयके द्वारा कुमार-कुमारीको कुण्डिनपुर भेजना | दुःखित दमयन्तीका वार्ष्णेयके द्वारा कुमार-कुमारीको कुण्डिनपुर भेजना | The Distressed Damayanti Sends Her Children to Kundinapura with Varshneya |
| बृहदश्च उवाच दमयन्ती ततो दुष्ट्वा पुण्यश्लोकं नराधिपम्
। उन्मत्तवदनुन्मत्ता देवने गतचेतसम् ॥1॥ भयशोकसमाविष्टा राजन् भीमसुता ततः । चिन्तयामास तत् कार्य सुमहत् पार्थिवं प्रति ॥2॥ |
बृहदश्च मुनि कहते हैं—राजन्! तदनन्तर दमयन्तीने देखा कि पुण्यश्लोक महाराज नल उन्मत्तकी भाँति द्यूतक्रीडामें आसक्त हैं। वह स्वयं सावधान थी। उनकी वैसी अवस्था देख भीमकुमारी भय और शोकसे व्याकुल हो गयी और महाराजके हितके लिये किसी महत्त्वपूर्ण कार्यका चिन्तन करने लगी ॥ 1-2॥ | **Brihadaswa Muni continues:** O King! Then, Damayanti observed that the glorious King Nala was engrossed in gambling like a madman. She herself was cautious. Seeing his condition, the daughter of Bhima became overwhelmed with fear and sorrow and started thinking about some important action for the king's welfare. (1-2) |
| सा शङ्कमाना तत् पापं चिकीर्षन्ती च तत्प्रियम् । नलं च हृतसर्वस्वमुपलभ्येदमब्रवीत् ॥3॥ |
उसके मनमें यह आशंका हो गयी कि राजापर बहुत बड़ा कष्ट आनेवाला है। वह उनका प्रिय एवं हित करना चाहती थी। अतः महाराजके सर्वस्वका अपहरण होता जान धायको बुलाकर (इस प्रकार बोली) ॥3॥ | She feared that a great calamity was about to befall the king. She wished to do what was dear and beneficial for him. Therefore, seeing that the king was losing all his possessions, she summoned her nursemaid and (spoke thus). (3) |
| बृहत्सेनामतियशां तां धात्रीं परिचारिकाम् । हितां सर्वार्थकुशलामनुरक्तां सुभाषिताम् ॥4॥ |
उसकी धायका नाम बृहत्सेना था। वह अत्यन्त यशस्विनी और परिचयकि कार्यमें निपुण थी। समस्त कार्योके साधनमें कुशल, हितैषिणी, अनुरागिणी और मधुरभाषिणी थी ॥4॥ | Her nursemaid's name was Brihatsena. She was very renowned and skilled in the work of a confidante. She was adept at accomplishing all tasks, benevolent, affectionate, and sweet-spoken. (4) |
| बृहत्सेने व्रजामात्यानानाय्य नलशासनात् । आचक्ष्व यद्धृतं द्रव्यमवशिष्टं च यद् वसु ॥5॥ |
(दमयन्तीने उससे कहा)-'बृहत्सेने! तुम मन्त्रियोंके पास जाओ तथा राजा नलकी आज्ञासे उन्हें बुला लाओ। फिर उन्हें यह बताओ कि अमुक-अमुक द्रव्य हारा जा चुका है और अमुक धन अभी अवशिष्ट है” ॥5॥ | (Damayanti said to her,) "O Brihatsena! Go to the ministers and summon them by King Nala's command. Then tell them that such and such possessions have been lost and such and such wealth still remains." (5) |
| ततस्ते मन्त्रिणः सर्वे विज्ञाय नलशासनम् । अपि नो भागधेयं स्यादित्युक्त्वा नलमाव्रजन् ॥6॥ |
तब वे सब मन्त्री राजा नलका आदेश जानकर “हमारा अहोभाग्य है', ऐसा कहते हुए नलके पास आये ॥ | Then, all the ministers, learning of King Nala's order, came to him, saying, "We are fortunate!" (6) |
| तास्तु सर्वाः प्रकृतयो द्वितीयं समुपस्थिताः । न्यवेदयद् भीमसुता न च तत् प्रत्यनन्दत ॥7॥ |
वे सारी (मन्त्री आदि) प्रकृतियाँ दूसरी बार राजद्वारपर उपस्थित हुईं। दमयन्तीने इसकी सूचना महाराज नलको दी, परन्तु उन्होंने इस बातका अभिनन्दन नहीं किया ॥7॥ | All those (ministers, etc.) appeared at the royal gate for the second time. Damayanti informed King Nala about this, but he did not acknowledge it. (7) |
| वाक्यमप्रतिनन्दन्तं भर्तारमभिवीक्ष्य सा
। दमयन्ती पुनर्वेश्म व्रीडिता प्रविवेश ह ॥8॥ निशम्य सततं चाक्षान् पुण्यश्लोकपराङ्मुखान् । नलं च हृतसर्वस्वं धात्रीं पुनरुवाच ह ॥9॥ बृहत्सेने पुनर्गच्छ वार्ष्णेयं नलशासनात् । सूतमानय कल्याणि महत् कार्यमुपस्थितम् ॥10॥ |
पतिको अपनी बातका प्रसन्नतापूर्वक उत्तर देते न देख दमयन्ती लज्जित हो पुनः महलके भीतर चली गयी। वहाँ फिर उसने सुना कि सारे पासे लगातार पुण्यश्लोक राजा नलके विपरीत पड़ रहे हैं और उनका सर्वस्व अपहृत हो रहा है। तब उसने पुनः धायसे कहा -'बृहत्सेने! फिर राजा नलकी आज्ञासे जाओ और वार्ष्णेय सूतको बुला लाओ। कल्याणि! एक बहुत बड़ा कार्य उपस्थित हुआ है” ॥ 8-10॥ | Seeing that her husband did not respond to her words with joy, Damayanti felt ashamed and returned to the inner chambers of the palace. There, she heard that all the dice were continuously falling against the glorious King Nala, and he was losing all his possessions. Then, she again said to her nursemaid, "O Brihatsena! Go again by King Nala's command and summon Varshneya, the charioteer. O auspicious one! A very serious matter has arisen." (8-10) |
| बृहत्सेना तु सा श्रुत्वा दमयन्त्याः प्रभाषितम्
। वार्ष्णेयमानयामास पुरुषैराप्तकारिभिः ॥11॥ वार्ष्णेयं तु ततो भैमी सान्त्वयञ्श्लक्ष्णया गिरा । उवाच देशकालज्ञा प्राप्तकालमनिन्दिता ॥12॥ |
बृहत्सेनाने दमयन्तीकी बात सुनकर विश्वसनीय पुरुषोंद्वारा वार्ष्णेयको बुलाया। तब अनिन्द्य स्वभाववाली और देश-कालको जाननेवाली भीमकुमारी दमयन्तीने वार्ष्णेयको मधुर वाणीमें सान्त्वना देते हुए यह समयोचित बात कही- ॥ 11-12॥ | Brihatsena, hearing Damayanti's words, summoned Varshneya through trustworthy men. Then, Damayanti, the daughter of Bhima, with her impeccable nature and awareness of time and place, consoled Varshneya with sweet words and spoke these timely words: (11-12) |
| जानीषे त्वं यथा राजा सम्यग् वृत्तः सदा त्वयि । तस्य त्वं विषमस्थस्य साहाय्यं कर्तुमर्हसि ॥13॥ |
'सूत! तुम जानते हो कि महाराज तुम्हारे प्रति कैसा अच्छा बर्ताव करते थे। आज वे विषम संकटमें पड़ गये हैं, अतः तुम्हें भी उनकी सहायता करनी चाहिये ॥13॥ | "O charioteer! You know how well the king used to treat you. Today, he has fallen into a grave crisis, so you should also help him. (13) |
| यथा यथा हि नृपतिः पुष्करेणैव जीयते । तथा तथास्य वै द्यूते रागो भूयोऽभिवर्धते ॥14॥ |
'राजा जैसे-जैसे पुष्करसे पराजित हो रहे हैं, वैसे-ही-वैसे जूएमें उनकी आसक्ति बढ़ती जा रही है ॥ | "As the king is losing to Pushkara, his attachment to gambling is increasing. (14) |
| यथा च पुष्करस्याक्षाः पतन्ति वशवर्तिनः । तथा विपर्ययश्चापि नलस्याक्षेषु दृश्यते ॥15॥ |
'जैसे पुष्करके पासे उसकी इच्छाके अनुसार पड़ रहे हैं, वैसे ही नलके पासे विपरीत पड़ते देखे जा रहे हैं ॥15॥ | "Just as Pushkara's dice are falling according to his wish, Nala's dice are seen falling against him. (15) |
| सुहृत्स्वजनवाक्यानि यथावन्न शृणोति च
। ममापि च तथा वाक्यं नाभिनन्दति मोहितः ॥16॥ नूनं मन्ये न दोषोऽस्ति नैषधस्य महात्मनः । यत् तु मे वचनं राजा नाभिनन्दति मोहितः ॥17॥ |
“वे सुहृदां और स्वजनोंके वचन अच्छी तरह नहीं सुनते हैं। जूएने उन्हें ऐसा मोहित कर रखा है कि इस समय वे मेरी बातका भी आदर नहीं कर रहे हैं। मैं इसमें महामना नैषधका निश्चय ही कोई दोष नहीं मानती। जूएसे मोहित होनेके कारण ही राजा मेरी बातका अभिनन्दन नहीं कर रहे हैं ॥ 16-17॥ | "He does not listen properly to the words of his friends and relatives. Gambling has so captivated him that he is not even respecting my words at this time. I certainly do not see any fault of the magnanimous king of Nishadha in this. It is only due to being infatuated with gambling that the king is not acknowledging my words. (16-17) |
| शरणं त्वां प्रपन्नास्मि सारथे कुरु मद्वचः । न हि मे शुध्यते भाव: कदाचित् विनशेदपि ॥18॥ |
‘सारथे! मैं तुम्हारी शरणमे आयी हूँ, मेरी बात मानो। मेरे मनमें अशुभ विचार आते हैं, इससे अनुमान होता है कि राजा नलका राज्यसे च्युत होना सम्भव है ॥18॥ | "O charioteer! I have come to you for refuge, listen to me. Inauspicious thoughts are coming to my mind, which suggests that King Nala's loss of kingdom is possible. (18) |
| नलस्य दयितानश्चान् योजयित्वा मनोजवान् । इदमारोप्य मिथुनं कुण्डिनं यातुमर्हसि ॥19॥ |
“तुम महाराजके प्रिय, मनके समान वेगशाली अश्वोंको रथमें जोतकर उसपर इन दोनों बच्चोंको बिठा लो और कुण्डिनपुरको चले जाओ' ॥19॥ | "Yoke the king's beloved, swift horses to the chariot, place these two children on it, and depart for Kundinapura. (19) |
| मम ज्ञातिषु निक्षिप्य दारकौ स्यन्दनं तथा । अश्चांश्चेमान् यथाकामं वस वान्यत्र गच्छ वा ॥20॥ |
“वहाँ इन दोनों बालकोंको, इस रथको और इन घोड़ोंको भी मेरे भाई-बन्धुओंकी देख- रेखमें सौंपकर तुम्हारी इच्छा हो तो वहीं रह जाना या अन्यत्र कहीं चले जाना' ॥20॥ | "Entrust these two children, this chariot, and these horses to the care of my relatives there, and if you wish, stay there or go elsewhere." (20) |
| दमयन्त्यास्तु तद् वाक्यं वार्ष्णेयो नलसारथिः । न्यवेदयदशेषेण नलामात्येषु मुख्यशः ॥21॥ |
दमयन्तीकी यह बात सुनकर नलके सारथि वार्ष्णेयने नलके मुख्य-मुख्य मन्त्रियोंसे यह सारा वृत्तान्त निवेदित किया ॥21॥ | Hearing these words of Damayanti, Varshneya, the charioteer of Nala, reported the entire matter to the chief ministers of Nala. (21) |
| तैः समेत्य विनिश्चित्य सोऽनुज्ञातो महीपते । ययौ मिथुनमारोप्य विदर्भास्तेन वाहिना ॥22॥ |
राजन्! उनसे मिलकर इस विषयपर भलीभाँति विचार करके उन मन्त्रियोंकी आज्ञा ले सारथि वार्ष्णेयने दोनों बालकोंको रथपर बैठाकर विदर्भ देशको प्रस्थान किया ॥22॥ | O King! After meeting them and deliberating on this matter, with the permission of those ministers, Varshneya, the charioteer, placed the two children on the chariot and departed for the kingdom of Vidarbha. (22) |
| हयांस्तत्र विनिक्षिप्य सूतो रथवरं च तम्
। इन्द्रसेनां च तां कन्यामिन्द्रसेनं च बालकम् ॥23॥ आमन्त्र्य भीमं राजानमार्तः शोचन् नलं नृपम् । अटमानस्ततोऽयोध्यां जगाम नगरीं तदा ॥24॥ |
वहाँ पहुँचकर उसने घोड़ोंको, उस श्रेष्ठ रथ-को तथा उस बालिका इन्द्रसेनाको एवं राजकुमार इन्द्रसेनको वहीं रख दिया तथा राजा भीमसे विदा ले आर्तभावसे राजा नलकी दुर्दशाके लिये शोक करता हुआ घूमता-घामता अयोध्या नगरीमें चला गया ॥ 23-24॥ | Upon reaching there, he left the horses, that excellent chariot, the girl Indrasena, and the prince Indrasena, and after taking leave of King Bhima, wandered around, grieving for the plight of King Nala, and went to the city of Ayodhya. (23-24) |
| ऋतुपर्ण स राजानमुपतस्थे सुदुःखितः । भृतिं चोपययौ तस्य सारथ्येन महीपते ॥25॥ |
युधिष्ठिर! वह अत्यन्त दुःखी हो राजा ऋतुपर्णकी सेवामें उपस्थित हुआ और उनका सारथि बनकर जीविका चलाने लगा ॥25॥ | O Yudhishthira! He, extremely saddened, presented himself to King Rituparna and started earning his livelihood by becoming his charioteer. (25) |
| इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि नलोपाख्यानपर्वणि कुण्डिनं प्रति कुमारयोः प्रस्थापने षष्टितमोऽध्यायः ॥60॥ | इय प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत नलोपाख्यानपर्वमें नलकी कन्या और पुत्रको कुण्डिनपुर भेजनेसे सम्बन्ध रखनेवाला साठवाँ अध्याय पुरा हुआ ॥60॥ | Thus ends the sixtieth chapter in the Nalopakhyana Parva of the Vana Parva in the Mahabharata, concerning the sending of Nala's daughter and son to Kundinapura. (60) |
| एकषष्टितमोऽध्यायः | इकसठवाँ अध्याय | ## Chapter 61: |
| नलका जूएमें हारकर दमयन्तीके साथ वनको जाना और पक्षियोंद्धारा आपद्ग्रस्त नलके वस्त्रका अपहरण | नलका जूएमें हारकर दमयन्तीके साथ वनको जाना और पक्षियोंद्धारा आपद्ग्रस्त नलके वस्त्रका अपहरण | Nala Goes to the Forest with Damayanti After Losing in Gambling, and Birds Steal Nala's Clothes |
| बृहदश्च उवाच ततस्तु याते वार्ष्णेये पुण्यश्लोकस्य दीव्यतः । पुष्करेण हतं राज्यं यच्चान्यद् वसु किंचन ॥1॥ |
बृहदश्च मुनि कहते हैं-युधिष्ठिर! तदनन्तर वार्ष्णेयके चले जानेपर जूआ खेलनेवाले पुण्यश्लोक महाराज नलके सारे राज्य और जो कुछ धन था, उन सबका जूएमें पुष्करने अपहरण कर लिया ॥1॥ | **Brihadaswa Muni continues:** O Yudhishthira! After Varshneya's departure, Pushkara won over in gambling all of the glorious King Nala's kingdom and whatever wealth he had. (1) |
| हृतराज्यं नलं राजन् प्रहसन् पुष्करोऽब्रवीत् । द्यूतं प्रवर्ततां भूयः प्रतिपाणोऽस्ति कस्तव ॥2॥ |
राजन्! राज्य हार जानेपर नलसे पुष्करने हँसते हुए कहा कि "क्या फिर जूआ आरम्भ हो? अब तुम्हारे पास दाँवपर लगानेके लिये क्या है?” ॥2॥ | O King! After losing the kingdom, Pushkara said to Nala with a laugh, "Shall we start the game again? What do you have left to wager?" (2) |
| शिष्टा ते दमयन्त्येका सर्वमन्यज्जितं मया । दमयन्त्याः पणः साधु वर्ततां यदि मन्यसे ॥3॥ |
“तुम्हारे पास केवल दमयन्ती शेष रह गयी है और सब वस्तुएँ तो मैंने जीत ली हैं, यदि तुम्हारी राय हो तो दमयन्तीको दाँवपर रखकर एक बार फिर जूआ खेला जाय” ॥3॥ | "Only Damayanti remains with you; I have won everything else. If you agree, let's play dice once more with Damayanti as the stake." (3) |
| पुष्करेणैवमुक्तस्य पुण्यश्लोकस्य मन्युना । व्यदीर्यतेव हृदयं न चैनं किंचिदब्रवीत् ॥4॥ |
पुष्करके ऐसा कहनेपर पुण्यश्लोक महाराज नलका हृदय शोकसे विदीर्ण-सा हो गया, परंतु उन्होंने उससे कुछ कहा नहीं ॥4॥ | Hearing these words of Pushkara, the glorious King Nala's heart was torn with sorrow, but he did not say anything to him. (4) |
| ततः पुष्करमालोक्य नलः परममन्युमान्
। उत्सृज्य सर्वगात्रेभ्यो भूषणानि महायशाः ॥5॥ एकवासा ह्यासंवीतः सुहच्छोकविवर्धनः । निश्चक्राम ततो राजा त्यक्त्वा सुविपुलां श्रियम् ॥6॥ |
तदनन्तर महायशस्वी नलने अत्यन्त दुःखित हो पुष्करकी ओर देखकर अपने सब अंगोंके आभूषण उतार दिये और केवल एक अधोवस्त्र धारण करके चादर ओढ़े बिना ही अपनी विशाल सम्पत्तिको त्यागकर सुहृदोंका शोक बढ़ाते हुए वे राजभवनसे निकल पड़े ॥ 5-6॥ | Then, the illustrious Nala, deeply saddened, looked at Pushkara and removed all the ornaments from his body. Wearing only a single garment, without even a shawl, he left the royal palace, abandoning his vast wealth and increasing the sorrow of his friends. (5-6) |
| दमयन्त्येकवस्त्राथ गच्छन्तं पृष्ठतोऽन्वगात् । स तया बाह्यतः सार्धे त्रिरात्रं नैषधोऽवसत् ॥7॥ |
दमयन्तीके शरीरपर भी एक ही वस्त्र था। वह जाते हुए राजा नलके पीछे हो ली। वे उसके साथ नगरसे बाहर तीन राततक टिके रहे ॥7॥ | Damayanti also had only one garment on her body. She followed King Nala as he left. They stayed outside the city with him for three nights. (7) |
| पुष्करस्तु महाराज घोषयामास वै पुरे । नले यः सम्यगातिष्ठेत् स गच्छेद् वध्यतां मम ॥8॥ |
महाराज! पुष्करने उस नगरमे यह घोषणा करा दी-डुग्गी पिटवा दी कि “जो नलके साथ अच्छा बर्ताव करेगा, वह मेरा वध्य होगा" ॥8॥ | O King! Pushkara had this announcement made in the city - he had the drums beaten - proclaiming, "Whoever treats Nala well will be killed by me." (8) |
| पुष्करस्य तु वाक्येन तस्य विद्वेषणेन च । पौरा न तस्य सत्कारं कृतवन्तो युधिष्ठिर ॥9॥ |
युधिष्ठिर! पुष्करके उस वचनसे और नलके प्रति पुष्करका द्वेष होनेसे पुरवासियोंने राजा नलका कोई सत्कार नहीं किया ॥9॥ | O Yudhishthira! Due to this statement of Pushkara and his hatred towards Nala, the citizens did not show any hospitality to King Nala. (9) |
| स तथा नगराभ्याशे सत्कारार्हो न सस्कृत: । त्रिरात्रमुषितो राजा जलमात्रेण वर्तयन् ॥10॥ |
इस प्रकार राजा नल अपने नगरके समीप तीन राततक केवल जलमात्रका आहार करके टिके रहे। वे सर्वथा सत्कारके योग्य थे तो भी उनका सत्कार नहीं किया गया ॥10॥ | Thus, King Nala stayed near his city for three nights, subsisting only on water. Although he was entirely worthy of hospitality, he was not shown any. (10) |
| पीड्यमानः क्षुधा तत्र फलमूलानि कर्षयन् । प्रातिष्ठत ततो राजा दमयन्ती तमन्वगात् ॥11॥ |
वहाँ भूखसे पीड़ित हो फल-मूल आदि जुटाते हुए राजा नल वहाँसे अन्यत्र चले गये। केवल दमयन्ती उनके पीछे-पीछे गयी ॥11॥ | Tormented by hunger, gathering fruits and roots, King Nala left that place for another. Only Damayanti followed him. (11) |
| क्षुधया पीड्यमानस्तु नलो बहुतिथेऽहनि । अपश्यच्छकुनान् कांश्चिद्धिरण्यसदृशच्छदान् ॥12॥ |
इसी प्रकार नल बहुत दिनोंतक क्षुधासे पीड़ित रहे। एक दिन उन्होंने कुछ ऐसे पक्षी देखे, जिनकी पाँखें सोनेकी-सी थीं ॥12॥ | In this way, Nala suffered from hunger for many days. One day, he saw some birds with wings that seemed to be made of gold. (12) |
| स चिन्तयामास तदा निषधाधिपतिर्बली । अस्ति भक्ष्यो ममाद्यायं वसु चेदं भविष्यति ॥13॥ |
उन्हें देखकर (क्षुधातुर और आपत्तिग्रस्त होनेके कारण) बलवान् निषधनरेशके मनमें यह बात आयी कि 'यह पक्षियोंका समुदाय ही आज मेरा भक्ष्य हो सकता है और इनकी ये पाँखें मेरे लिये धन हो जायगी ॥13॥ | Seeing them, the thought came to the mind of the strong king of Nishadha (distressed by hunger and adversity), "This flock of birds can be my food today, and their wings will become wealth for me." (13) |
| ततस्तान् परिधानेन वाससा स समावृणोत् । तस्य तद् वस्त्रमादाय सर्वे जग्मुर्विहायसा ॥14॥ |
तदनन्तर उन्होंने अपने अधोवस्त्रसे उन पक्षियोंको टंक दिया। किंतु वे सब पक्षी उनका वह वस्त्र लेकर आकाशमें उड़ गये ॥14॥ | Then, he cast his garment over those birds. But all those birds flew away into the sky, taking his garment with them. (14) |
| उत्पतन्तः खगा वाक्यमेतदाहुस्ततो नलम् । दृष्ट्वा दिग्वाससं भूमौ स्थितं दीनमधोमुखम् ॥15॥ |
उड़ते हुए उन पक्षियोंने राजा नलको दीनभावसे नीचे मुँह किये धरतीपर नग्न खड़ा देख उनसे कहा ॥ | Seeing King Nala standing naked on the ground with his head bowed down in a pitiful state, those birds flying in the sky said to him, (15) |
| वयमक्षाः सुदुर्बुद्धे तव वासो जिहीर्षवः । आगता न हि नः प्रीतिः सवाससि गते त्वयि ॥16॥ |
'ओ खोटी बुद्धिवाले नरेश! हम (पक्षी नहीं,) पासे हैं और तुम्हारा वस्त्र अपहरण करनेकी इच्छासे ही यहाँ आये थे। तुम वस्त्र पहने हुए ही वहाँसे चले आये थे, इससे हमें प्रसन्नता नहीं हुई थी” ॥16॥ | "O king of wicked intellect! We are not (birds, but) dice, and we came here with the intention of stealing your garment. We were not pleased that you came away from there still wearing clothes." (16) |
| तान् समीपगतानक्षानात्मानं च विवाससम्
। पुण्यश्लोकस्तदा राजन् दमयन्तीमथाब्रवीत् ॥17॥ येषां प्रकोपादैश्चर्यात् प्रच्युतोऽहमनिन्दिते । प्राणयात्रां न विन्देयं दुःखितः क्षुधयान्वितः ॥18॥ येषां कृते न सत्कारमकुर्वन् मयि नैषधाः । इमे ते शकुना भूत्वा वासो भीरु हरन्ति मे ॥19॥ |
राजन्! उन पासोंको नजदीकसे जाते देख और अपने-आपको नग्नावस्थामें पाकर पुण्यश्लोक नलने उस समय दमयन्तीसे कहा-'सती साध्वी रानी! जिनके क्रोधसे मेरा ऐश्वर्य छिन गया, मैं क्षुधापीड़ित एवं दुःखित होकर जीवन-निर्वाहके लिये अन्नतक नहीं पा रहा हूँ और जिनके कारण निषधदेशकी प्रजाने मेरा सत्कार नहीं किया, भीरु! वे ही ये पासे हैं, जो पक्षी होकर मेरा वस्त्र लिये जा रहे हैं ॥ 17-19॥ | O King! Seeing those dice approaching and finding himself naked, the glorious Nala said to Damayanti, "O virtuous queen! Due to whose anger my prosperity has been snatched away, I am suffering from hunger and sorrow, unable to find even food for survival, and because of whom the people of Nishadha did not show me hospitality, O timid one! Those are the dice, disguised as birds, taking away my garment. (17-19) |
| वैषम्यं परमं प्राप्तो दुःखितो गतचेतनः । भर्ता तेऽहं निबोधेदं वचनं हितमात्मनः ॥20॥ |
“म बड़ी विषम परिस्थितिमें पड़ गया हूँ। दुःखके मारे मेरी चेतना लुप्त-सी हो रही है। मैं तुम्हारा पति हूँ, अतः तुम्हारे हितकी बात बता रहा हूँ, इसे सुनो- ॥20॥ | "I have fallen into a very difficult situation. My consciousness is fading due to grief. I am your husband, so I am telling you what is beneficial for you, listen: (20) |
| एते गच्छन्ति बहवः पन्थानो दक्षिणापथम् । अवन्तीमृक्षवन्तं च समतिक्रम्य पर्वतम् ॥21॥ |
“ये बहुत-से मार्ग हैं, जो दक्षिण दिशाकी ओर जाते हैं। यह मार्ग ऋक्षवान् पर्वतको लाँघकर अवन्ती-देशको जाता है ॥21॥ | "These are many paths leading towards the south. This path crosses the Rikshavat mountain and goes to the land of Avanti. (21) |
| एष विन्ध्यो महाशैलः पयोष्णी च समुद्रगा
। आश्रमाश्च महर्षीणां बहुमूलफलान्विताः ॥22॥ एष पन्था विदर्भाणामसौ गच्छति कोसलान् । अतः परं च देशोऽयं दक्षिणे दक्षिणापथः ॥23॥ |
'यह महान् पर्वत विन्ध्य दिखायी दे रहा है और यह समुद्रगामिनी पयोष्णी नदी है। यहाँ महर्षियोंके बहुत-से आश्रम हैं, जहाँ प्रचुर मात्रामें फल-मूल उपलब्ध हो सकते हैं। यह विदर्भदेशका मार्ग है और वह कोसलदेशको जाता है। दक्षिण दिशामें इसके बादका देश दक्षिणापथ कहलाता है" ॥ 22-23॥ | "This great Vindhya mountain is visible, and this is the Payoshni river flowing towards the ocean. There are many hermitages of sages here, where abundant fruits and roots can be found. This is the path to Vidarbha, and that one leads to Kosala. The region after this in the south is called Dakshinapatha." (22-23) |
| एतद् वाक्यं नलो राजा दमयन्तीं समाहितः । उवाचासकृदार्तो हि भैमीमुद्दिश्य भारत ॥24॥ |
भारत! राजा नलने एकाग्रचित्त होकर बड़ी आतुरताके साथ दमयन्तीसे उपर्युक्त बातें बार-बार कहीं ॥24॥ | O Bharata! King Nala, with a focused mind and great anxiety, repeatedly said these things to Damayanti. (24) |
| ततः सा बाष्पकलया वाचा दुःखेन कर्शिता । उवाच दमयन्ती तं नैषधं करुणं वचः ॥25॥ |
तब दमयन्ती अत्यन्त दुःखसे दुर्बल हो नेत्रोंसे आँसू बहाती हुई गद्गद वाणीमें राजा नलसे यह करुण वचन बोली-- ॥25॥ | Then, Damayanti, weakened by extreme sorrow, with tears flowing from her eyes, spoke these pitiful words to King Nala in a choked voice: (25) |
| उद्वेजते मे हृदयं सीदन्त्यङ्गानि सर्वशः
। तव पार्थिव संकल्पं चिन्तयन्त्याः पुनः पुनः ॥26॥ हृतराज्यं हृतद्रव्यं विवस्त्रं क्षुच्छ्मान्वितम् । कथमुत्सृज्य गच्छेयमहं त्वां निर्जने वने ॥27॥ |
“महाराज! आपका मानसिक संकल्प क्या है, इसपर जब मैं बार-बार विचार करती हूँ तब मेरा हृदय उद्विग्न हो उठता है और सारे अंग शिथिल हो उठते हैं। आपका राज्य छिन गया। धन नष्ट हो गया। आपके शरीरपर वस्त्रतक नहीं रह गया तथा आप भूख और परिश्रमसे कष्ट पा रहे हैं। ऐसी अवस्थामें इस निर्जन वनमें आपको असहाय छोड़कर मैं कैसे जा सकती हूँ? ॥ | "O King! When I repeatedly think about your mental state, my heart becomes anxious, and all my limbs weaken. Your kingdom is lost, your wealth is gone, you don't even have clothes on your body, and you are suffering from hunger and exhaustion. In such a condition, how can I leave you helpless in this desolate forest? (26-27) |
| श्रान्तस्य ते क्षुधार्तस्य चिन्तयानस्य तत् सुखम् । वने घोरे महाराज नाशयिष्याम्यहं क्लमम् ॥28॥ |
“महाराज! जब आप भयंकर वनमें थके-मोदे भूखसे पीड़ित हो अपने पूर्व सुखका चिन्तन करते हुए अत्यन्त दुःखी होने लगेंगे, उस समय मैं सान्त्वनाद्वारा आपके संतापका निवारण करूँगी ॥28॥ | "O King! When you become extremely saddened in this dreadful forest, tired and tormented by hunger, thinking about your past happiness, then I will alleviate your suffering with consolation. (28) |
| न च भार्यासमं किंचिद् विद्यते भिषजां मतम् । औषधं सर्वदुःखेषु सत्यमेतद् ब्रवीमि ते ॥29॥ |
'चिकित्सकोंका मत है कि समस्त दुःखोंकी शान्तिके लिये पत्नीके समान दूसरी कोई औषध नहीं है; यह गैं आपसे सत्य कहती हूँ” ॥29॥ | "Physicians believe that there is no medicine like a wife for the relief of all sorrows; this I tell you truly." (29) |
| नल उवाच एवमेतद् यथाऽऽत्थ त्वं दमयन्ति सुमध्यमे । नास्ति भार्यासमं मित्रं नरस्यार्तस्य भेषजम् ॥30॥ |
नलने कहा-सुमध्यमा दमयन्ती! तुम जैसा कहती हो वह ठीक है। दुःखी मनुष्यके लिये पत्नीके समान दूसरा कोई मित्र या औषध नहीं है ॥30॥ | Nala said, "O slender-waisted Damayanti! What you say is right. There is no friend or medicine like a wife for a grieving man. (30) |
| न चाहं त्यक्तकामस्त्वां किमलं भीरु शङ्कसे । त्यजेयमहमात्मानं न चैव त्वामनिन्दिते ॥31॥ |
भीरु! मैं तुम्हें त्यागना नहीं चाहता, तुम इतनी अधिक शंका वयों करती हो? अनिन्दिते! मैं अपने शरीरका त्याग कर सकता हूँ, पर तुम्हें नहीं छोड़ सकता ॥31॥ | "O timid one! I do not want to abandon you, why do you doubt so much? O blameless one! I can give up my own body, but I cannot leave you." (31) |
| दमयन्त्युवाच यदि मां त्वं महाराज न विहातुमिहेच्छसि । तत् किमर्थ विदर्भाणां पन्थाः समुपदिश्यते ॥32॥ |
दमयन्तीने कहा-—महाराज! यदि आप मुझे त्यागना नहीं चाहते तो विदर्भदेशका मार्ग क्यों बता रहे हैं? ॥32॥ | Damayanti said, "O King! If you do not want to abandon me, then why are you telling me the way to Vidarbha? (32) |
| अवैमि चाह नृपते न तु मां त्यक्तुमर्हसि । चेतसा त्वपकृष्टेन मां त्यजेथा महीपते ॥33॥ |
राजन्! मैं जानती हूँ कि आप स्वयं मुझे नहीं त्याग सकते, परंतु महीपते! इस घोर आपत्तिने आपके चित्तको आकर्षित कर लिया है, इस कारण आप मेरा त्याग भी कर सकते हैं ॥33॥ | "O King! I know that you yourself cannot abandon me, but O king! This terrible adversity has afflicted your mind, and because of this, you might even abandon me. (33) |
| पन्थानं हि ममाभीक्ष्णमाख्यासि च नरोत्तम । अतो निमित्तं शोकं मे वर्धयस्यमरोपम ॥34॥ |
नरश्रेष्ठ! आप बार-बार जो मुझे विदर्भदेशका मार्ग बता रहे हैं। देवोपम आर्यपुत्र! इसके कारण आप मेरा शोक ही बढ़ा रहे हैं ॥34॥ | "O best of men! By repeatedly telling me the way to Vidarbha, O noble one, like a god! You are only increasing my sorrow. (34) |
| यदि चायमभिप्रायस्तव ज्ञातीन् व्रजेदिति । सहितावेव गच्छावो विदर्भान् यदि मन्यसे ॥35॥ |
यदि आपका यह अभिप्राय हो कि दमयन्ती अपने बन्धु-बान्धवोंके यहाँ चली जाय तो आपकी सम्मति हो तो हम दोनों साथ ही विदर्भदेशको चलें ॥35॥ | "If your intention is that Damayanti should go to her relatives, then if you agree, let us both go to Vidarbha together. (35) |
| विदर्भराजस्तत्र त्वां पूजयिष्यति मानद । तेन त्वं पूजितो राजन् सुखं वत्स्यसि नो गृहे ॥36॥ |
मानद! वहाँ विदर्भनरेश आपका पूरा आदर-सत्कार करेंगे। राजन्! उनसे पूजित होकर आप हमारे घरमें सुखपूर्वक निवास कीजियेगा ॥36॥ | "O honorable one! There, the king of Vidarbha will show you full respect and honor. O King! Honored by him, you will live happily in our home." (36) |
| इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि नलोपाख्यानपर्वणि नलवनयात्रायामेकषष्टितमोऽध्यायः ॥61॥ | इस प्रकार श्रीमह्ञा भारत वनपर्वके अन्तर्गत नलोपाख्यानपर्वमें नलकी वनयात्राविषयक इकसठवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥61॥ | Thus ends the sixty-first chapter in the Nalopakhyana Parva of the Vana Parva in the Mahabharata, describing Nala's journey to the forest. (61) |
| द्विषष्टितमोऽध्यायः | बासठवाँ अध्याय | ## Chapter 62: |
| राजा नलकी चिन्ता और दमयन्तीको अकेली सोती छोड़कर उनका अन्यत्र प्रस्थान | राजा नलकी चिन्ता और दमयन्तीको अकेली सोती छोड़कर उनका अन्यत्र प्रस्थान | King Nala's Anxiety and His Departure, Leaving Damayanti Sleeping Alone |
| नल उवाच यथा राज्यं तव पितुस्तथा मम न संशयः । न तु तत्र गमिष्यामि विषमस्थः कथंचन ॥1॥ |
नलने कहा--प्रिये! इसमें संदेह नहीं कि विदर्भराज्य जैसे तुम्हारे पिताका है, वैसे मेरा भी है, तथापि आपत्तिमें पड़ा हुआ मैं किसी तरह वहाँ नहीं जाऊँगा ॥1॥ | **Nala said:** "My beloved! There is no doubt that the kingdom of Vidarbha is as much yours as your father's, yet, fallen into adversity, I will not go there. (1) |
| कथं समृद्धो गत्वाहं तव हर्षविवर्धनः । परिच्युतो गमिष्यामि तव शोकविवर्धनः ॥2॥ |
एक दिन मैं भी समृद्धिशाली राजा था। उस अवस्थामें वहाँ जाकर मैंने तुम्हारे हर्षको बढ़ाया था और आज उस राज्यसे वंचित होकर केवल तुम्हारे शोककी वृद्धि कर रहा हूँ, ऐसी दशामें वहाँ कैसे जाऊँगा? ॥2॥ | "Once I was a prosperous king. In that state, I went there and increased your joy, but today, deprived of that kingdom, I am only increasing your sorrow. In such a condition, how can I go there?" (2) |
| बृहदश्च उवाच इति ब्रुवन् नलो राजा दमयन्तीं पुनः पुनः
। सान्त्वयामास कल्याणीं वाससोऽर्धेन संवृताम् ॥3॥ तावेकवस्त्रसंवीतावटमानावितस्ततः । क्षुत्पिपासापरिश्रान्तौ सभां कांचिदुपेयतुः ॥4॥ |
बृहदश्च मुनि कहते हैं राजन्! आधे वस्त्रसे ढकी हुई कल्याणमयी दमयन्तीसे बार- बार ऐसा कहकर राजा नलने उसे सान्त्वना दी; क्योंकि वे दोनों एक ही वस्त्रसे अपने अंगोंको ढककर इधर-उधर घूम रहे थे। भूख और प्याससे थके-माँदे वे दोनों दम्पति किसी सभाभवन (धर्मशाला)-में जा पहुँचे ॥ 3-4॥ | **Brihadaswa Muni continues:** O King! Having said this repeatedly to the auspicious Damayanti, who was half-covered with the garment, King Nala consoled her, for both of them were wandering here and there, covering their bodies with a single piece of cloth. Tired from hunger and thirst, the couple reached a guesthouse (dharmshala). (3-4) |
| तां सभामुपसम्प्राप्य तदा स निषधाधिपः । वैदर्भ्या सहितो राजा निषसाद महीतले ॥5॥ |
तब उस धर्मशालामें पहुंचकर निषधनरेश राजा नल वैदर्भीके साथ भूतलपर बैठे ॥5॥ | Reaching that guesthouse, King Nala, the king of Nishadha, sat on the ground with the princess of Vidarbha. (5) |
| स वै विवस्त्रो विकटो मलिनः पांसुगुण्ठितः । दमयन्त्या सह श्रान्तः सुष्वाप धरणीतले ॥6॥ |
वे वस्त्रहीन, चटाई आदिसे रहित, मलिन एवं धूलि-धूसरित हो रहे थे। दमयन्तीके साथ थककर भूमिपर ही सो गये ॥6॥ | They were without clothes, without a mat, and were becoming dirty and covered in dust. Exhausted, they fell asleep on the ground with Damayanti. (6) |
| दमयन्त्यपि कल्याणी निद्रयापहृता ततः । सहसा दुःखमासाद्य सुकुमारी तपस्विनी ॥7॥ |
सुकुमारी तपस्विनी कल्याणमयी दमयन्ती भी सहसा दुःखमें पड़ गयी थी। वहाँ आनेपर उसे भी निद्राने घेर लिया ॥7॥ | The delicate, ascetic, and auspicious Damayanti had also suddenly fallen into distress. Upon arriving there, sleep overtook her as well. (7) |
| सुप्तायां दमयन्त्यां तु नलो राजा विशाम्पते । शोकोन्मथितचित्तात्मा न स्म शेते तथा पुरा ॥8॥ |
राजन्! राजा नलका चित्त शोकसे मथा जा रहा था। वे दमयन्तीके सो जानेपर भी स्वयं पहलेकी भाँति सो न सके ॥8॥ | O King! King Nala's mind was troubled by sorrow. Even after Damayanti fell asleep, he himself could not sleep as before. (8) |
| स तद् राज्यापहरणं सुहृत्त्यागं च सर्वशः । वने च तं परिध्वंसं प्रेक्ष्य चिन्तामुपेयिवान् ॥9॥ |
राज्यका अपहरण, सुहृदोंका त्याग और वनमें प्राप्त होनेवाले नाना प्रकारके क्लेशपर विचार करते हुए वे चिन्ताको प्राप्त हो गये ॥9॥ | He became anxious, thinking about the loss of his kingdom, the abandonment of his friends, and the various hardships encountered in the forest. (9) |
| किं नु मे स्यादिदं कृत्वा किं नु मे स्यादकुर्वतः । किं नु मे मरणं श्रेयः परित्यागो जनस्य वा ॥10॥ |
वे सोचने लगे "एसा करनेसे मेरा क्या होगा और यह कार्य न करनेसे भी क्या होगा। मेरा मर जाना अच्छा है कि अपनी आत्मीया दमयन्तीको त्याग देना ॥10॥ | He thought, "What will happen to me by doing this, and what will happen by not doing it? It is better for me to die than to abandon my beloved Damayanti. (10) |
| मामियं ह्यानुरक्तैवं दुःखमाप्रोति मत्कृते । मद्विहीना त्वियं गच्छेत् कदाचित् स्वजनं प्रति ॥11॥ |
“यह मुझसे इस प्रकार अनुरक्त होकर मेरे ही लिये दुःख उठा रही है। यदि मुझसे अलग हो जाय तो यह कदाचित् अपने स्वजनोंके पास जा सकती है ॥11॥ | "She is so devoted to me and is suffering for my sake. If she separates from me, she might be able to go to her relatives. (11) |
| मयि निःसंशयं दुःखमियं प्राप्स्यत्यनुत्रता । उत्सर्गे संशयः स्यात् तु विन्देतापि सुखं क्वचित् ॥12॥ |
“मेरे पास रहकर तो यह पतिव्रता नारी निश्चय ही केवल दुःख भोगेगी। यद्यपि इसे त्याग देनेपर एक संशय बना रहेगा तो भी यह सम्भव है कि इसे कभी सुख मिल जाय” ॥12॥ | "By staying with me, this devoted wife will surely only experience sorrow. Although there will be some doubt if I abandon her, it is possible that she may find happiness someday." (12) |
| स विनिश्चित्य बहुधा विचार्य च पुनः पुनः । उत्सर्ग मन्यते श्रेयो दमयन्त्या नराधिप ॥13॥ |
राजन्! नल अनेक प्रकारसे बार-बार विचार करके एक निश्चयपर पहुँच गये और दमयन्तीका परित्याग कर देनेमें ही उसकी भलाई मानने लगे ॥13॥ | O King! Nala, after repeatedly considering various aspects, came to a decision and believed that abandoning Damayanti was in her best interest. (13) |
| न चैषा तेजसा शक्या कैश्चिद् धर्षयितुं पथि । यशस्विनी महाभागा मद्भक्तेयं पतिव्रता ॥14॥ |
'यह महाभागा यशस्विनी दमयन्ती मेरी भक्त और पतिव्रता है। पातिव्रत-तेजके कारण मार्गमे कोई इसका सतीत्व नष्ट नहीं कर सकता” ॥14॥ | "This fortunate and glorious Damayanti is devoted to me and is a faithful wife. Due to the power of her chastity, no one can violate her on the way." (14) |
| एवं तस्य तदा बुद्धिर्दमयन्त्यां न्यवर्तत । कलिना दुष्टभावेन दमयन्त्या विसर्जने ॥15॥ |
ऐसा सोचकर उनकी बुद्धि दमयन्तीको अपने साथ रखनेके विचारसे निवृत्त हो गयी। बल्कि दुष्ट स्वभाववाले कलियुगसे प्रभावित होनेके कारण दमयन्तीको त्याग देनेमें ही उनकी बुद्धि प्रवृत्त हुई ॥15॥ | Thinking thus, his mind turned away from the idea of keeping Damayanti with him. Rather, influenced by the wicked Kali, his mind inclined towards abandoning Damayanti. (15) |
| सोऽवस्त्रतामात्मनश्च तस्याश्चाप्येकवस्त्रताम् । चिन्तयित्वाध्यगाद् राजा वस्त्रार्धस्यावकर्तनम् ॥16॥ |
तदनन्तर राजाने अपनी वस्त्रहीनता और दमयन्तीकी एकवस्त्रताका विचार करके उसके आधे वस्त्रको फाड लेना ही उचित समझा ॥16॥ | Then, the king, considering his lack of clothes and Damayanti's single garment, thought it appropriate to tear off half of her garment. (16) |
| कथं वासो विकर्तेयं न च बुध्येत मे प्रिया । विचिन्त्यैवं नलो राजा सभां पर्यचरत्तदा ॥17॥ |
फिर यह सोचकर कि “मैं कैसे वस्त्रको काट, जिससे मेरी प्रियाकी नीद न टूटे।' राजा नल धर्मशालामे (नंगे ही) इधर-उधर घूमने लगे ॥17॥ | Then, thinking, "How can I cut the cloth without disturbing my beloved's sleep?" King Nala started pacing back and forth in the guesthouse (naked). (17) |
| परिधावन्नथ नल इतश्चेतश्च भारत । आससाद सभोद्देशे विकोशं खड्गमुत्तमम् ॥18॥ |
भारत! इधर-उधर दौड़-धूप करनेपर राजा नलको उस सभाभवनमें एक अच्छी-सी नंगी तलवार मिल गयी ॥18॥ | O Bharata! While running around, King Nala found a good, unsheathed sword in that guesthouse. (18) |
| तेनार्ध वाससश्छित्त्वा निवस्य च परंतपः । सुप्तामुत्सृज्य वैदर्भी प्राद्रवद् गतचेतनाम् ॥19॥ |
उसीसे दमयन्तीका आधा वस्त्र काटकर परंतप नलने उसके द्वारा अपना शरीर ढँक लिया और अचेत सोती हुई विदर्भराजकुमारी दमयन्तीको वहीं छोड़कर वे शीघ्रतासे चले गये ॥19॥ | With that, he cut off half of Damayanti's garment, covered his own body with it, and quickly left, leaving the unconscious, sleeping princess of Vidarbha, Damayanti, there. (19) |
| ततो निवृत्तह्ृदयः पुनरागम्य तां सभाम् | दमयन्तीं तदा दृष्ट्वा रुरोद निषधाधिपः ॥20॥ |
कुछ दूर जानेपर उनके हृदयका विचार पलट गया और वे पुनः उसी सभाभवनमे लौट आये। वहाँ उस समय दमयन्तीको देखकर निषधनरेश नल फूट-फूटकर रोने लगे ॥20॥ | After going some distance, his heart changed, and he returned to the same guesthouse. Seeing Damayanti there at that time, Nala, the king of Nishadha, burst into tears. (20) |
| यां न वायुर्न चादित्यः पुरा पश्यति मे प्रियाम् । सेयमद्य सभामध्ये शेते भूमावनाथवत् ॥21॥ |
(वे विलाप करते हुए कहने लगे) “पहले जिस मेरी प्रियतमा दमयन्तीको वायु तथा सूर्य देवता भी नहीं देख पाते थे, वही आज इस धर्मशालामें भूमिपर अनाथकी भाँति सो रही है ॥21॥ | (He lamented,) "My beloved Damayanti, whom even the wind and the sun god could not see before, is today sleeping on the ground in this guesthouse like an orphan. (21) |
| इयं वस्त्रावकर्तेन संवीता चारुहासिनी । उन्मत्तेव वरारोहा कथं बुद्ध्वा भविष्यति ॥22॥ |
"यह मनोहर हास्यवाली सुन्दरी वस्त्रके आधे टुकड़ेसे लिपटी हुई सो रही है। जब इसकी नींद खुलेगी, तब पगली-सी होकर न जाने यह कैसी दशाको पहुँच जायगी ॥22॥ | "This beautiful woman with a charming smile is sleeping, wrapped in half a piece of cloth. When she wakes up, who knows what state this poor woman will find herself in? (22) |
| कथमेका सती भैमी मया विरहिता शुभा । चरिष्यति वने घोरे मृगव्यालनिषेविते ॥23॥ |
“यह भयंकर वन हिंसक पशुओं और सपाँसे भरा है। मुझसे बिछुड़कर शुभलक्षणा सती दमयन्ती अकेली इस वनमें कैसे विचरण करेगी? ॥23॥ | "This dreadful forest is filled with ferocious animals and snakes. Separated from me, how will the auspicious and virtuous Damayanti wander alone in this forest? (23) |
| आदित्या वसवो रुद्रा अश्विनौ समरुद्रणौ । रक्षन्तु त्वां महाभागे धर्मेणासि समावृता ॥24॥ |
"महाभागे! तुम धर्मसे आवृत हो, आदित्य, वसु, रुद्र, अश्विनीकुमार और मरुद्रण-ये सब देवता तुम्हारी रक्षा करें! ॥24॥ | "O fortunate one! May you be protected by dharma, and may Aditya, Vasu, Rudra, Ashwini Kumaras, and Marudgana - all these gods protect you!" (24) |
| एवमुक्त्वा प्रियां भार्या रूपेणाप्रतिमां भुवि । कलिनापहूतज्ञानो नलः प्रातिष्ठदुद्यतः ॥25॥ |
इस भूतलपर रूप-सौन्दर्यमे जिसकी समानता करनेवाली दूसरी कोई स्त्री नहीं थी, उसी अपनी प्यारी पत्नी दमयन्तीके प्रति इस प्रकार कहकर राजा नल वहाँसे उठे और चल दिये। उस समय कलिने इनकी विवेकशक्ति हर ली थी ॥25॥ | Having spoken thus to his beloved wife Damayanti, whose beauty was unmatched on this earth, King Nala got up and left. At that time, Kali had taken away his power of discrimination. (25) |
| गत्वा गत्वा नलो राजा पुनरेति सभां मुहुः । आकृष्यमाणः कलिना सौहृदेनावकृष्यते ॥26॥ |
राजा नलको एक ओर कलियुग खींच रहा था और दूसरी ओर दमयन्तीका सौहार्द। अतः वे बार-बार जाकर फिर उस धर्मशालामें ही लौट आते थे ॥26॥ | On one hand, Kali was pulling him, and on the other hand, was Damayanti's affection. Therefore, he would go and then return to the guesthouse again and again. (26) |
| द्विधेव हृदयं तस्य दुःखितस्याभवत् तदा । दोलेव मुहुरायाति याति चैव सभां प्रति ॥27॥ |
उस समय दुःखी राजा नलका हृदय मानो दुविधामें पड़ गया था। जैसे झूला बार-बार नीचे-ऊपर आता-जाता रहता है, उसी प्रकार उनका हृदय कभी बाहर जाता, कभी सभाभवनमे लौट आता था ॥27॥ | At that time, the heart of the grieving King Nala was caught in a dilemma. Just as a swing repeatedly goes up and down, his heart would sometimes go out and sometimes return to the guesthouse. (27) |
| अवकृष्टस्तु कलिना मोहितः प्राद्रवन्नलः । सुप्तामुत्सृज्य तां भार्या विलप्य करुणं बहु ॥28॥ |
अन्तमें कलियुगने प्रबल आकर्षण किया, जिससे मोहित होकर राजा नल बहुत देरतक करुण विलाप करके अपनी सोती हुई पत्नीको छोड़कर शीघ्रतासे चले गये ॥28॥ | Finally, Kali exerted a strong pull, and captivated by it, King Nala, after lamenting for a long time, left his sleeping wife and quickly departed. (28) |
| नष्टात्मा कलिना स्पृष्टस्तत् तद् विगणयन् नृपः । जगामैकां वने शून्ये भार्यामुत्सृज्य दुःखितः ॥29॥ |
कलियुगके स्पर्शसे उनकी बुद्धि भ्रष्ट हो गयी थी; अतः वे अत्यन्त दुःखी हो विभिन्न बातोंका विचार करते हुए उस सूने वनमें अपनी पत्नीको अकेली छोड़कर चल दिये ॥29॥ | His intellect was corrupted by Kali's touch; therefore, deeply saddened, he left his wife alone in that desolate forest, pondering various things. (29) |
| इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि नलोपाख्यानपर्वणि दमयन्तीपरित्यागे द्विषष्टितमोऽध्यायः ॥62॥ | इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत नलोपाख्यानपर्वमें दमयन्तीपरित्यागविषयक बासठवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥62॥ | Thus ends the sixty-second chapter in the Nalopakhyana Parva of the Vana Parva in the Mahabharata, describing the abandonment of Damayanti. (62) |
| त्रिषषितमोऽध्यायः | तिरसठवाँ अध्याय | ## Chapter 63: |
| दमयन्तीका विलाप तथा अजगर एवं व्याधसे उसके प्राण एवं सतीत्वकी रक्षा तथा दमयन्तीके पातिव्रत्यधर्मके प्रभावसे व्याधका विनाश | दमयन्तीका विलाप तथा अजगर एवं व्याधसे उसके प्राण एवं सतीत्वकी रक्षा तथा दमयन्तीके पातिव्रत्यधर्मके प्रभावसे व्याधका विनाश | Damayanti's Lament, Her Rescue from the Python and Hunter, and the Hunter's Destruction Due to the Power of Damayanti's Chastity |
| बृहदश्च उवाच अपक्रान्ते नले राजन् दमयन्ती गतक्लमा
। अबुध्यत वरारोहा संत्रस्ता विजने वने ॥1॥ अपश्यमाना भर्तारं शोकदुःखसमन्विता । प्राक्रोशदुच्चैः संत्रस्ता महाराजेति नैषधम् ॥2॥ |
बृहदश्च मुनि कहते हैं—राजन्! नलके चले जानेपर जब दमयन्तीकी थकावट दूर हो गयी, तब उसकी आँख खुली। उस निर्जन वनमें अपने स्वामीको न देखकर सुन्दरी दमयन्ती भयातुर और दुःख-शोकसे व्याकुल हो गयी। उसने भयभीत होकर निषधनरेश नलको “महाराज! आप कहाँ है?" यह कहकर बड़े जोरसे पुकारा ॥ 1-2॥ | **Brihadaswa Muni continues:** O King! When Nala had left, and Damayanti's fatigue subsided, she opened her eyes. Not seeing her husband in that desolate forest, the beautiful Damayanti became terrified and overwhelmed with grief and sorrow. Frightened, she cried out loudly for Nala, the king of Nishadha, "O King! Where are you?" (1-2) |
| हा नाथ हा महाराज हा स्वामिन् किं जहासि माम् । हा हतास्मि विनष्टास्मि भीतास्मि विजने वने ॥3॥ |
“हा नाथ! हा महाराज! हा स्वामिन्! आप मुझे क्यों त्याग रहे हैं? हाय! मैं मारी गयी, नष्ट हो गयी, इस जनशून्य वनमें मुझे बड़ा भय लग रहा है ॥3॥ | "Oh my lord! Oh King! Oh my husband! Why are you abandoning me? Alas! I am ruined, destroyed, I am very afraid in this deserted forest! (3) |
| ननु नाम महाराज धर्मज्ञः सत्यवागसि । कथमुक्त्वा तथा सत्यं सुप्तामुत्सृज्य कानने ॥4॥ |
“महाराज! आप तो धर्मज्ञ और सत्यवादी हैं; फिर वैसी सच्ची प्रतिज्ञा करके आज आप इस जंगलमें मुझे सोती छोड़कर कैसे चले गये? ॥4॥ | "O King! You are knowledgeable in dharma and truthful; then, having made such a true promise, how could you leave me sleeping in this forest today? (4) |
| कथमुत्सृज्य गन्तासि दक्षां भार्यामनुव्रताम् । विशेषतोऽनपकृते परेणापकृते सति ॥5॥ |
“मैं आपकी सेवामें कुशल और अनुरक्त भार्या हूँ। विशेषतः मेरे द्वारा आपका कोई अपराध भी नहीं हुआ है। यदि कोई अपराध हुआ है, तो वह दूसरेके ही द्वारा, मुझसे नहीं; तो भी आप मुझे त्यागकर क्यों चले जा रहे हैं? ॥5॥ | "I am your devoted and loving wife, skilled in serving you. Especially since I have not committed any offense against you. If any offense has been committed, it is by someone else, not by me; then why are you abandoning me? (5) |
| शक्यसे ता गिर: सम्यक् कर्तु मयि नरेश्वर । यास्तेषां लोकपालानां संनिधौ कथिताः पुरा ॥6॥ |
“नरेश्वर! आपने पहले स्वयंवरसभामें उन लोकपालोंके निकट जो बातें कहीं थी, क्या आप उन्हें आज मेरे प्रति सत्य सिद्ध कर सकेंगे? ॥6॥ | "O King! Will you be able to prove true today the words you spoke before in the swayamvara assembly in the presence of those guardians of the world? (6) |
| नाकाले विहितो मृत्युर्मर्त्यानां पुरुषर्षभ । तत्र कान्ता त्वयोत्सृष्टा मुहूर्तमपि जीवति ॥7॥ |
'पुरुषशिरोमणे! मनुष्योंकी मृत्यु असमयमें नहीं होती, तभी तो आपकी यह प्रियतमा आपसे परित्यक्त होकर दो घड़ी भी जी रही है ॥7॥ | "O foremost among men! Humans do not die untimely deaths, that is why your beloved is still alive for a short while, even after being abandoned by you. (7) |
| पर्याप्तः परिहासोऽयमेतावान् पुरुषर्षभ । भीताहमतिदुर्धर्ष दर्शयात्मानमीश्चर ॥8॥ |
“पुरुषश्रेष्ठ! यहाँ इतना ही परिहास बहुत है। अत्यन्त दुर्धर्ष वीर! मैं बहुत डर गयी हूँ। प्राणेश्वर! अब मुझे अपना दर्शन दीजिये ॥8॥ | "O best among men! This much mockery is enough. O invincible hero! I am very scared. O lord of my life! Please show yourself to me now. (8) |
| दृश्यसे दृश्यसे राजन्नेष दृष्टोऽसि नैषध । आवार्य गुल्मैरात्मानं कि मां न प्रतिभाषसे ॥9॥ |
"राजन्! निषधनरेश! आप दीख रहे है, दीख रहे हैं, यह दिखायी दिये। लताओंद्वारा अपनेको छिपाकर आप मुझसे बात क्यों नहीं कर रहे हैं? ॥9॥ | "O King! O king of Nishadha! You are visible, visible, you have appeared. Why are you not talking to me, hiding yourself behind the creepers? (9) |
| नृशंसं बत राजेन्द्र यन्मामेवंगतामिह । विलपन्तीं समागम्य नाश्वासयसि पार्थिव ॥10॥ |
“राजेन्द्र! मैं इस प्रकार भय और चिन्तामें पड़कर यहाँ विलाप कर रही हूँ और आप आकर आश्वासन भी नहीं देते! भूपाल! यह तो आपकी बड़ी निर्दयता है ॥10॥ | "O King! I am lamenting here in such fear and anxiety, and you do not even come to reassure me! O King! This is your great cruelty. (10) |
| न शोचाम्यहमात्मानं न चान्यदपि किंचन । कथं नु भवितास्येक इति त्वां नृप शोचिमि ॥11॥ |
“नरेश्वर! मैं अपने लिये शोक नहीं करती। मुझे दूसरी किसी बातका भी शोक नहीं है। मैं केवल आपके लिये शोक कर रही हूँ कि आप अकेले कैसी शोचनीय दशामें पड़ जायेगे! ॥11॥ | "O King! I do not grieve for myself. I do not grieve for anything else. I only grieve for you, thinking what a miserable state you will fall into alone! (11) |
| कथं नु राजंस्तृषितः क्षुधितः श्रमकर्षितः । सायाहे वृक्षमूलेषु मामपश्यन् भविष्यसि ॥12॥ |
“राजन! आप भूखे-प्यासे और परिश्रमसे थके-माँदे होकर जब सायंकाल किसी वृक्षके नीचे आकर विश्राम करेंगे, उस समय मुझे अपने पास न देखकर आपकी कैसी दशा हो जायगी?" ॥12॥ | "O King! When you, hungry, thirsty, and tired from exhaustion, rest under a tree in the evening, what will become of you when you do not see me by your side?" (12) |
| ततः सा तीव्रशोकार्ता प्रदीप्तेव च मन्युना । इतश्चेतश्च रुदती पर्यधावत दुःखिता ॥13॥ |
तदनन्तर प्रचण्ड शोकसे पीड़ित हो क्रोधाग्निसे दग्ध होती हुई-सी दमयन्ती अत्यन्त दुःखी हो रोने और इधर-उधर दौड़ने लगी ॥13॥ | Then, afflicted by intense sorrow, as if burning with the fire of anger, Damayanti became extremely sad and started weeping and running around. (13) |
| मुहुरुत्पतते बाला मुहुः पतति विह्वला । मुहुरालीयते भीता मुहुः क्रोशति रोदिति ॥14॥ |
दमयन्ती बार-बार उठती और बार-बार विह्वल होकर गिर पड़ती थी। वह कभी भयभीत होकर छिपती और कभी जोर-जोरसे रोने-चिल्लाने लगती थी ॥14॥ | Damayanti would repeatedly get up and fall down in distress. Sometimes she would hide in fear, and sometimes she would cry and scream loudly. (14) |
| अतीव शोकसंतप्ता मुहुर्निःश्वस्य विह्वला । उवाच भैमी निःश्वस्य रुदत्यथ पतिव्रता ॥15॥ |
अत्यन्त शोकसंतप्त हो बार-बार लंबी साँसें खींचती हुई व्याकुल पतिव्रता दमयन्ती दीर्घ निःश्वास लेकर रोती हुई बोली ॥15॥ | Extremely distressed by grief, repeatedly sighing deeply, the distraught and virtuous Damayanti, taking a long breath, cried out: (15) |
| यस्याभिशापाद् दुःखार्तो दुःखं विन्दति नैषधः । तस्य भूतस्य नो दुःखाद् दुःखमप्यधिकं भवेत् ॥16॥ |
“जिसके अभिशापसे निषधनरेश नल दुःखसे पीड़ित हो क्लेश-पर-क्लेश उठाते जा रहे हैं, उस प्राणीको हमलोगोंके दु:खसे भी अधिक दु:ख प्राप्त हो ॥16॥ | "May that creature, by whose curse the king of Nishadha, Nala, is suffering and enduring hardship after hardship, experience even more sorrow than ours! (16) |
| अपापचेतसं पापो य एवं कृतवान् नलम् । तस्माद् दुःखतरं प्राप्य जीवत्वसुखजीविकाम् ॥17॥ |
“जिस पापीने पुण्यात्मा राजा नलको इस दशाम पहुंचाया है, वह उनसे भी भारी दुःखमें पड़कर दुःखकी ही जिंदगी बितावे' ॥17॥ | "May that sinner, who has brought the righteous King Nala to this state, fall into even greater sorrow than him and live a life of misery!" (17) |
| एवं तु विलपन्ती सा राज्ञो भार्या महात्मनः
। अन्वेषमाणा भर्तारं वने श्वापदसेविते ॥18॥ उन्मत्तवद् भीमसुता विलपन्ती इतस्ततः । हा हा राजन्निति मुहुरितश्चेतश्च धावति ॥19॥ |
इस प्रकार विलाप करती तथा हिंस्र जन्तुओंसे भरे हुए वनम अपने पतिको ढूँढ़ृती हुई महामना राजा नलकी पत्नी भीमकुमारी दमयन्ती उन्मत्त हुई रोती-बिलखती और “हा राजन्! हा महाराज' ऐसा बार-बार कहती हुई इधर-उधर दौड़ने लगी ॥ 18-19॥ | Lamenting in this way and searching for her husband in the forest filled with ferocious animals, Damayanti, the daughter of Bhima, the wife of the magnanimous King Nala, became distraught and ran around, crying and wailing, repeatedly saying, "Oh King! Oh my lord!" (18-19) |
| तां क्रन्दमानामत्यर्थ कुररीमिव वाशतीम्
। करुणं बहु शोचन्तीं विलपन्तीं मुहुर्मुहुः ॥20॥ सहसाभ्यागतां भैमीमभ्याशपरिवर्तिनीम् । जग्राहाजगरो ग्राहो महाकायः क्षुधान्वितः ॥21॥ |
वह कुररी पक्षीकी भाँति जोर-जोरसे करुण क्रन्दन कर रही थी और अत्यन्त शोक करती हुई बार-बार विलाप कर रही थी। वहाँसे थोड़ी ही दूरपर एक विशालकाय भूखा अजगर बैठा था। उसने बार-बार चक्कर लगाती सहसा निकट आयी हुई भीमकुमारी दमयन्तीको (पैरोंकी ओरसे) निगलना आरम्भ कर दिया ॥ 20-21॥ | She was crying out loudly and pitifully like a kurari bird and repeatedly lamenting in extreme sorrow. Not far from there, a huge, hungry python was lurking. It started to swallow Damayanti, the daughter of Bhima, who had suddenly come near while wandering around (from her feet). (20-21) |
| सा ग्रस्यमाना ग्राहेण शोकेन च परिप्लुता । नात्मानं शोचति तथा यथा शोचति नैषधम् ॥22॥ |
शोकमें डूबी हुई वैदर्भीको अजगर निगल रहा था, तो भी वह अपने लिये उतना शोक नहीं कर रही थी, जितना शोक उसे निषधनरेश नलके लिये था ॥22॥ | Although the python was swallowing the grief-stricken princess of Vidarbha, she did not grieve for herself as much as she grieved for Nala, the king of Nishadha. (22) |
| हा नाथ मामिह वने ग्रस्यमानामनाथवत् । ग्राहेणानेन विजने किमर्थ नानुधावसि ॥23॥ |
(वह विलाप करती हुई कहने लगी--) 'हा नाथ! इस निर्जन वनमें यह अजगर सर्प मुझे अनाथकी भाँति निगल रहा है। आप मेरी रक्षाके लिये दौड़कर आते क्यों नहीं हैं? ॥23॥ | (She lamented,) "Oh my lord! This python is swallowing me like an orphan in this desolate forest. Why are you not rushing to my rescue? (23) |
| कथं भविष्यसि पुनर्मामनुस्मृत्य नैषध । कथं भवाञ्जगामाद्य मामुत्सृज्य वने प्रभो ॥24॥ |
'निषधनरेश! यदि मैं मर गयी, तो मुझे बार-बार याद करके आपकी कैसी दशा हो जायगी? प्रभो! आज मुझे वनमें छोड़कर आप क्यों चले गये? ॥24॥ | "O king of Nishadha! If I die, what will become of you, remembering me repeatedly? O lord! Why did you leave me in the forest today? (24) |
| पापान्मुक्तः पुनर्लब्ध्वा बुद्धि चेतो धनानि च
। श्रान्तस्य ते क्षुधार्तस्य परिग्लानस्य नैषध । कः श्रमं राजशार्दूल नाशयिष्यति तेऽनघ ॥25॥ |
“निष्पाप निषधनरेश! इस संकटसे मुक्त होनेपर जब आपको पुनः शुद्ध बुद्धि, चेतना और धन आदिकी प्राप्ति होगी, उस समय मेरे बिना आपकी क्या दशा होगी? नृपप्रवर! जब आप भूखसे पीड़ित हो थके-माँदे एवं अत्यन्त खिन्न होंगे, उस समय आपकी उस थकावटको कौन दूर करेगा?” ॥25॥ | "O sinless king of Nishadha! When you regain your pure intellect, consciousness, and wealth after being freed from this calamity, what will become of you without me? O best of kings! When you are hungry, tired, and extremely distressed, who will relieve your fatigue?" (25) |
| ततः कश्चिन्मृगव्याधो विचरन् गहने वने । आक्रन्दमानां संश्रुत्य जवेनाभिससार ह ॥26॥ |
इसी समय कोई व्याध उस गहन वनमें विचर रहा था। वह दमयन्तीका करुण क्रन्दन सुनकर बड़े वेगसे उधर आया ॥26॥ | At that very moment, a hunter was wandering in that dense forest. Hearing Damayanti's pitiful cries, he quickly came towards that direction. (26) |
| तां तु दृष्ट्वा तथा ग्रस्तामुरगेणायतेक्षणाम्
। त्वरमाणो मृगव्याधः समभिक्रम्य वेगतः ॥27॥ मुखतः पाटयामास शस्त्रेण निशितेन च । निर्विचेष्टं भुजङ्गं तं विशस्य मृगजीवनः ॥28॥ मोक्षयित्वा स तां व्याधः प्रक्षाल्य सलिलेन ह । समाश्चास्य कृताहारामथ पप्रच्छ भारत ॥29॥ |
उस विशाल नयनोंवाली युवतीको अजगरके द्वारा उस प्रकार निगली जाती हुई देख व्याधने बड़ी उतावलीके साथ वेगसे दौड़कर तीखे शस्त्रसे शीघ्र ही उस अजगरका मुख फाड़ दिया। वह अजगर छटपटाकर चेष्टारहित हो गया। मृगोंको मारकर जीविका चलानेवाले उस व्याधने सर्पके टुकड़े-टुकड़े करके दमयन्तीको छुड़ाया। फिर जलसे उसके सर्पग्रस्त शरीरको धोकर उसे आश्वासन दे उसके लिये भोजनकी व्यवस्था कर दी। भारत! जब वह भोजन कर चुकी, तब व्याधने उससे पूछा- ॥ 27-29॥ | Seeing that young woman with large eyes being swallowed by the python, the hunter, with great haste, rushed forward and quickly tore apart the python's mouth with his sharp weapon. The python convulsed and became motionless. The hunter, who made his living by killing animals, cut the serpent into pieces and rescued Damayanti. Then, he washed her serpent-afflicted body with water, consoled her, and arranged food for her. O Bharata! When she had finished eating, the hunter asked her: (27-29) |
| कस्य त्वं मृगशावाक्षि कथं चाभ्यागता वनम् । कथं चेदं महत् कृच्छं प्राप्तवत्यसि भाविनि ॥30॥ |
'मृगलोचने! तुम किसकी स्त्री हो और कैसे वनमें चली आयी हो? भामिनि! किस प्रकार तुम्हें यह महान् कष्ट प्राप्त हुआ है?” ॥30॥ | "O doe-eyed one! Whose wife are you, and how did you come to be in the forest? O beautiful lady! How did you encounter this great suffering?" (30) |
| दमयन्ती तथा तेन पृच्छ्यमाना विशाम्पते । सर्वमेतद् यथावृत्तमाचचक्षेऽस्य भारत ॥31॥ |
भरतवंशी नरेश युधिष्ठिर! व्याधके पूछनेपर दमयन्तीने उसे सारा वृत्तान्त यथार्थरूपसे कह सुनाया ॥31॥ | O Yudhishthira, descendant of Bharata! When the hunter asked, Damayanti truthfully narrated the entire story to him. (31) |
| तामर्धवस्त्रसंवीतां पीनश्रोणिपयोधराम्
। सुकुमारानवद्याङ्गीं पूर्णचन्द्रनिभाननाम् ॥32॥ अरालपक्ष्मनयनां तथा मधुरभाषिणीम् । लक्षयित्वा मृगव्याधः कामस्य वशमीयिवान् ॥33॥ |
स्थूल नितम्ब और स्तनोंवाली विदर्भकुमारीने आधे वस्त्रसे ही अपने अंगोंको टक रखा था। पूर्ण चन्द्रमाके समान मनोहर मुखवाली दमयन्तीका एक-एक अंग सुकुमार एवं निर्दोष था। उसकी आँखें तिरछी बरौनियोंसे सुशोभित थीं और वह बड़े मधुर स्वरमें बोल रही थी। इन सब बातोंकी ओर लक्ष्य करके वह व्याध कामके अधीन हो गया ॥ 32-33॥ | The princess of Vidarbha, with full hips and breasts, had covered her body with only half a garment. Every limb of Damayanti, with a face as beautiful as the full moon, was delicate and flawless. Her eyes were adorned with long eyelashes, and she was speaking in a very sweet voice. Observing all this, the hunter fell prey to lust. (32-33) |
| तामेवं श्लक्ष्णया वाचा लुब्धको मृदुपूर्वया । सान्त्वयामास कामार्तस्तदबुध्यत भाविनी ॥34॥ |
वह मधुर एवं कोमल वाणीसे उसे अपने अनुकूल बनानेके लिये भाँति-भाँतिके आश्वासन देने लगा। वह व्याध उस समय कामवेदनासे पीड़ित हो रहा था। सती दमयन्तीने उसके दूषित मनोभावको समझ लिया ॥34॥ | He started giving her various assurances in a sweet and gentle voice to win her over. The hunter was at that time afflicted by lustful desires. The virtuous Damayanti understood his wicked intentions. (34) |
| दमयन्त्यपि तं दुष्टमुपलभ्य पतिव्रता । तीव्ररोषसमाविष्टा प्रजज्वालेव मन्युना ॥35॥ |
पतिव्रता दमयन्ती भी उसकी दुष्टताको समझकर तीव्र क्रोधके वशीभूत हो मानो रोषाग्निसे प्रज्वलित हो उठी ॥35॥ | The chaste Damayanti, understanding his evil intentions, became overwhelmed with intense anger, as if ignited by the fire of fury. (35) |
| सती दमयन्तीके तेजसे पापी व्याधका विनाश स तु पापमतिः क्षुद्रः प्रधर्षयितुमातुरः । दुर्धर्षा तर्कयामास दीप्तामग्निशिखामिव ॥36॥ |
यद्यपि वह नीच पापात्मा व्याध उसपर बलात्कार करनेके लिये व्याकुल हो गया था, परंतु दमयन्ती अग्निशिखाकी भाँति उद्दीप्त हो रही थी; अतः उसका स्पर्श करना उसको अत्यन्त दुष्कर प्रतीत हुआ ॥36॥ | Although that vile and sinful hunter was eager to force himself upon her, Damayanti was blazing like a flame; therefore, it seemed extremely difficult for him to touch her. (36) |
| दमयन्ती तु दुःखार्ता पतिराज्यविनाकृता । अतीतवाक्पथे काले शशापैनं रुषान्विता ॥37॥ |
पति तथा राज्य दोनोंसे वंचित होनेके कारण दमयन्ती अत्यन्त दुःखसे आतुर हो रही थी। इधर व्याधकी कुचेष्टा वाणीद्वारा रोकनेपर रुक सके, ऐसी प्रतीत नहीं होती थी। तब (उस व्याधपर अत्यन्त रुष्ट हो) उसने उसे शाप दे दिया- ॥37॥ | Having lost both her husband and her kingdom, Damayanti was suffering from immense sorrow. It did not seem that the hunter's wicked attempt could be stopped by words. Then, (extremely angry with the hunter), she cursed him: (37) |
| यद्यहं नैषधादन्यं मनसापि न चिन्तये । तथायं पततां क्षुद्रो परासुर्मृगजीवनः ॥38॥ |
"यदि मैं निषधराज नलके सिवा दूसरे किसी पुरुषका मनसे भी चिन्तन नहीं करती होऊ, तो इसके प्रभावसे यह तुच्छ व्याध प्राणशून्य होकर गिर पड़े” ॥38॥ | "If I have not even mentally thought of any man other than Nala, the king of Nishadha, then by the power of this truth, may this vile hunter fall down lifeless!" (38) |
| उक्तमात्रे तु वचने तथा स मृगजीवनः । व्यसुः पपात मेदिन्यामग्निदग्ध इव द्रुमः ॥39॥ |
दमयन्तीके इतना कहते ही वह व्याध आगसे जले हुए वृक्षकी भाँति प्राणशून्य होकर पृथ्वीपर गिर पड़ा ॥39॥ | As soon as Damayanti said this, the hunter fell lifeless on the ground like a tree burnt by fire. (39) |
| इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि नलोपाख्यानपर्वणि अजगरग्रस्तदमयन्तीमोचने त्रिषष्टितमोऽध्यायः ॥63॥ | इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत नलोपाख्यानपर्वमें अजगरग्रस्तदमयन्तीमोचनविषयक तिरसठवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥63॥ | Thus ends the sixty-third chapter in the Nalopakhyana Parva of the Vana Parva in the Mahabharata, describing the rescue of Damayanti from the python. (63) |
| चतुःषष्टितमोऽध्यायः | चौंसठवाँ अध्याय | **Chapter Sixty-Fourth: |
| दमयन्तीका विलाप और प्रलाप, तपस्वियोद्वारा दमयन्तीको आश्वासन तथा उसकी व्यापारियोंके दलसे भेंट | दमयन्तीका विलाप और प्रलाप, तपस्वियोद्वारा दमयन्तीको आश्वासन तथा उसकी व्यापारियोंके दलसे भेंट | Damayanti's Lamentations, Consolation by Ascetics, and Her Encounter with a Caravan of Merchants** |
| बृहदश्च उवाच सा निहत्य मृगव्याधं प्रतस्थे कमलेक्षणा । वनं प्रतिभयं शून्यं झिल्लिकागणनादितम् ॥1॥ |
बृहदश्च मुनि कहते हैं—राजन्! व्याधका विनाश करके वह कमलनयनी राजकुमारी झिल्लियोंकी झंकारसे गूँजते हुए निर्जन एवं भयंकर वनमें आगे बढ़ी ॥1॥ | Sage Brihadasva narrates: "O King, having slain the hunter, the lotus-eyed princess moved further into the desolate and terrifying forest, echoing with the sounds of crickets." (1) |
| सिंहद्वीपिरुरुव्याघ्रमहिषर्क्षगणैर्युतम् । नानापक्षिगणाकीर्ण म्लेच्छतस्करसेवितम् ॥2॥ |
वह वन सिंह, चीतों, रुरुमृग, व्याघ्र, भैंसों तथा रीछ आदि पशुओंसे युक्त एवं भाँति- भाँतिके पक्षि-समुदायसे व्याप्त था। वहाँ म्लेच्छ और तस्करोंका निवास था ॥2॥ | "The forest was filled with animals such as lions, tigers, ruru deer, buffaloes, bears, and various kinds of birds. It was inhabited by barbarians and thieves." (2) |
| शालवेणुधवाश्वत्थतिन्दुकेड्गुदकिंशुकैः
। अर्जुनारिष्टसंछन्नं स्यन्दनैश्च सशाल्मलैः ॥3॥ जम्ब्वाम्रलोध्रखदिरसालवेत्रसमाकुलम् । पद्मकामलकप्लक्षकदम्बोदुम्बरावृतम् ॥4॥ बदरीबिल्वसंछन्नं न्यग्रोधैश्च समाकुलम् । प्रियालतालखर्जूरहरीतकबिभीतकैः ॥5॥ |
शाल, वेणु, धव, पीपल, तिन्दुक, इंगुद, पलाश, अर्जुन, अरिष्ट, स्यन्दन (तिनिश), सेमल, जामुन, आम, लोध, खैर, साखू, बैत, पद्मक, आँवला, पाकर, कदम्ब, गूलर, बेर, बेल, बरगद, प्रियाल, ताल, खजूर, ह्रे तथा बहेड़े आदि वृक्षोंसे वह विशाल वन परिपूर्ण हो रहा था ॥ 3-5 ॥ | "The vast forest was replete with trees like sal, bamboo, dhava, peepal, tinduka, inguda, palasha, arjuna, arishta, syandana (tinisha), semal, jamun, mango, lodh, khair, teak, cane, padmaka, amla, pakar, kadamba, gular, ber, bel, banyan, priyal, palm, date, hree, and baheda." (3-5) |
| नानाधातुशतैर्नद्धान् विविधानपि चाचलान् । निकुञ्जान् परिसंधुष्टान् दरीश्चाद्भुतदर्शनाः ॥6॥ |
दमयन्तीने वहाँ सैकड़ों धातुओंसे संयुक्त नाना प्रकारके पर्वत, पक्षियोंके कलरवोंसे गुंजायमान कितने ही निकुंज और अद्भूत कन्दराएँ देखीं ॥6॥ | "Damayanti saw numerous mountains with various minerals, many groves resounding with the chirping of birds, and wondrous caves." (6) |
| नदीः सरांसि वापीश्च विविधांश्च मृगद्विजान्
। सा बहून् भीमरूपांश्च पिशाचोरगराक्षसान् ॥7॥ पल्वलानि तडागानि गिरिकूटानि सर्वशः । सरितो निर्झराश्चैव ददर्शाद्भुतदर्शनान् ॥8॥ |
कितनी ही नदियों, सरोवरों, बावलियों तथा नाना प्रकारके मृगों और पक्षियोंको देखा। उसने बहुत-से भयानक रूपवाले पिशाच, नाग तथा राक्षस देखे। कितने ही गड्ढों, पोखरों और पर्वतशिखरोंका अवलोकन किया। सरिताओं और अद्भुत झरनोंको देखा ॥ 7-8॥ | "She saw many rivers, lakes, ponds, and various kinds of deer and birds. She saw many terrifying ghosts, snakes, and demons. She observed many pits, ponds, and mountain peaks. She saw streams and extraordinary waterfalls." (7-8) |
| यूथशो ददृशे चात्र विदर्भाधिपनन्दिनी
। महिषांश्च वराहांश्च अक्षांश्च वनपन्नगान् ॥9॥ तेजसा यशसा लक्ष्म्या स्थित्या च परया युता । वैदर्भी विचरत्येका नलमन्वेषती तदा ॥10॥ |
विदर्भराजनन्दिनीने उस वनमें झुंड-के-झुंड भैंसे, सूअर, रीछ और जंगली साँप देखे। तेज, यश, शोभा और परम धैर्यसे युक्त विदर्भकुमारी उस समय अकेली विचरती और नलको ढूँढ़ती थी ॥ 9-10॥ | "The princess of Vidarbha saw herds of buffaloes, pigs, bears, and wild snakes in that forest. The Vidarbha princess, endowed with radiance, fame, beauty, and immense patience, wandered alone, searching for Nala." (9-10) |
| नाबिभ्यत् सा नृपसुता भैमी तत्राथ कस्यचित् । दारुणामटवीं प्राप्य भर्तृव्यसनपीडिता ॥11॥ |
वह पतिके विरहरूपी संकटसे संतप्त थी। अतः राजकुमारी दमयन्ती उस भयंकर वनम प्रवेश करके भी किसी जीव-जन्तुसे भयभीत नहीं हुई ॥11॥ | "Distressed by the agony of separation from her husband, Princess Damayanti, even upon entering that dreadful forest, was not afraid of any living creature." (11) |
| विदर्भतनया राजन् विललाप सुदुःखिता । भर्तृशोकपरीताङ्गी शिलातलमथाश्रिता ॥12॥ |
राजन्! विदर्भकुमारी दमयन्तीके अंग-अंगमें पतिके वियोगका शोक व्याप्त हो गया था, इसलिये वह अत्यन्त दुःखित हो एक शिलाके नीचे भागमें बैठकर बहुत विलाप करने लगी-- ॥12॥ | "O King, as the grief of separation from her husband pervaded every part of Damayanti's body, she, extremely distressed, sat under a rock and lamented bitterly..." (12) |
| दमयन्त्युवाच व्यूढोरस्क महाबाहो नैषधानां जनाधिप
। क्व नु राजन् गतोऽस्यद्य विसृज्य विजने वने ॥13॥ अश्व॒मेधादिभिर्वीर क्रतुभिर्भूरिदक्षिणैः । कथमिष्ट्वा नरव्याघ्र मयि मिथ्या प्रवर्तसे ॥14॥ |
दमयन्ती बोली-चौड़ी छातीवाले महाबाहु निषधनरेश महाराज! आज इस निर्जन वनमें (मुझ अकेलीको) छोड़कर आप कहाँ चले गये? नरश्रेष्ठ! वीरशिरोमणे! प्रचुर दक्षिणावाले अश्वमेध आदि यज्ञोंका अनुष्ठान करके भी आप मेरे साथ मिथ्या बर्ताव क्यों कर रहे हैं? ॥ 13-14॥ | Damayanti said, "O broad-chested, mighty-armed King of Nishadha! Where have you gone, leaving me alone in this desolate forest? O best of men! O jewel among warriors! Why do you treat me falsely despite performing sacrifices like the Ashvamedha, which offer abundant gifts?" (13-14) |
| यत् त्वयोक्तं नरश्रेष्ठ तत् समक्षं महाद्युते । स्मर्तुमर्हसि कल्याण वचनं पार्थिवर्षभ ॥15॥ |
महातेजस्वी कल्याणमय राजाओंमें उत्तम नरश्रेष्ठ! आपने मेरे सामने जो बात कही थी, अपनी उस बातका स्मरण करना उचित है ॥15॥ | "O most radiant, auspicious, and best of kings! It is proper for you to remember the words you spoke to me." (15) |
| यच्चोक्तं विहगैर्हसैः समीपे तव भूमिप । मत्समक्षं यदुक्तं च तदवेक्षितुमर्हसि ॥16॥ |
भूमिपाल! आकाशचारी हंसोंने आपके समीप तथा मेरे सामने जो बातें कही थीं, उनपर विचार कीजिये ॥16॥ | "O lord of the earth! Reflect on the words spoken by the sky-wandering swans near you and me." (16) |
| चत्वार एकतो वेदाः साङ्गोपाङ्गाः सविस्तराः । स्वधीता मनुजव्याघ्र सत्यमेकं किलैकतः ॥17॥ |
नरसिंह! एक ओर अंग और उपांगोंसहित विस्तारपूर्वक चारों वेदोंका स्वाध्याय हो और दूसरी ओर केवल सत्यभाषण हो तो वह निश्चय ही उससे बढ़कर है ॥17॥ | "O lion among men! On one side, there is the detailed study of the four Vedas with their limbs and supplementary texts, and on the other, there is mere speaking of the truth, which is certainly superior." (17) |
| तस्मादर्हसि शत्रुघ्न सत्यं कर्तुं नरेश्वर । उक्तवानसि यद् वीर मत्सकाशे पुरा वचः ॥18॥ |
अतः शत्रुहन्ता नरेश्वर! वीर! आपने पहले मेरे समीप जो बातें कही हैं, उन्हें सत्य करना चाहिये ॥18॥ | "Therefore, O slayer of enemies, O king, O hero! You should fulfill the words you spoke to me earlier." (18) |
| हा वीर नल नामाहं नष्टा किल तवानघ । अस्यामटव्यां घोरायां किं मां न प्रतिभाषसे ॥19॥ |
हा निष्पाप वीर नल! आपकी मैं दमयन्ती इस भयंकर वनमे नष्ट हो रही हूँ, आप मेरी बातका उत्तर क्यों नहीं देते? ॥19॥ | "Alas, O sinless hero Nala! I, your Damayanti, am perishing in this dreadful forest. Why do you not answer me?" (19) |
| कर्षयत्येष मां रौद्रो व्यात्तास्यो दारुणाकृतिः । अरण्यराट् क्षुधाविष्टः किं मां न त्रातुमर्हसि ॥20॥ |
यह भयानक आकृतिवाला क्रूर सिंह भूखसे पीड़ित हो मुँह बाये खड़ा है और मुझपर आक्रमण करना चाहता है, क्या आप मेरी रक्षा नहीं कर सकते? ॥20॥ | "This cruel lion with a terrifying form, tormented by hunger, stands with its mouth wide open, about to attack me. Can you not protect me?" (20) |
| न मे त्वदन्या काचिद्धि प्रियास्तीत्यब्रवीः सदा । तामृतां कुरु कल्याण पुरोक्तां भारतीं नृप ॥21॥ |
कल्याणमय नरेश! आप पहले जो सदा यह कहते थे कि तुम्हारे सिवा दूसरी कोई भी स्त्री मुझे प्रिय नहीं है, अपनी उस बातको सत्य कीजिये ॥21॥ | "O auspicious king! You used to say that no other woman was dear to you except me. Please make your words come true." (21) |
| उन्मत्तां विलपन्तीं मां भार्यामिष्टां नराधिप । ईप्सितामीप्सितोऽसि त्वं किं मां न प्रतिभाषसे ॥22॥ |
महाराज! मैं आपकी प्रिय पत्नी हूँ और आप मेरे प्रियतम पति हैं, ऐसी दशामें भी मैं यहाँ उन्मत्त विलाप कर रही हूँ तो भी आप मेरी बातका उत्तर क्यों नहीं देते? ॥22॥ | "O King! I am your beloved wife, and you are my beloved husband. Yet, I am wailing here like a madwoman, and you still do not answer me?" (22) |
| कृशां दीनां विवर्णा च मलिनां वसुधाधिप
। वस्त्रार्धप्रावृतामेकां विलपन्तीमनाथवत् ॥23॥ यूथभ्रष्टामिवैकां मां हरिणीं पृथुलोचन । न मानयसि मामार्य रुदन्तीमरिकर्शन ॥24॥ |
पृथ्वीनाथ! मैं दीन, दुर्बल, कान्तिहीन और मलिन होकर आधे वस्त्रसे अपने अंगोंको ढककर अकेली अनाथ-सी विलाप कर रही हूँ। विशाल नेत्रोंवाले शत्रुसूदन आर्य! मेरी दशा अपने झुंडसे बिछुड़ी हुई हरिणीकी-सी हो रही है। मैं यहाँ अकेली रो रही हूँ। परंतु आप मेरा मान नहीं रखते हैं ॥ 23-24॥ | "O lord of the earth! I am poor, weak, lusterless, and disheveled, covering myself with half a garment, wailing alone like an orphan. O wide-eyed slayer of enemies! My condition is like that of a doe separated from its herd. I am crying here alone, but you do not heed me." (23-24) |
| महाराज महारण्ये अहमेकाकिनी सती । दमयन्त्यभिभाषे त्वां किं मां न प्रतिभाषसे ॥25॥ |
महाराज! इस महान् वनमें मैं सती दमयन्ती अकेली आपको पुकार रही हूँ, आप मुझे उत्तर क्यों नहीं देते? ॥25॥ | "O King! I, the virtuous Damayanti, am calling out to you alone in this vast forest. Why do you not answer me?" (25) |
| कुलशीलोपसम्पन्न चारुसर्वाङ्ग शोभन । नाद्य त्वां प्रतिपश्यामि गिरावस्मिन् नरोत्तम ॥26॥ |
नरश्रेष्ठ! आप उत्तम कुल और श्रेष्ठ शीलस्वभावसे सम्पन्न हैं। आप अपने सम्पूर्ण मनोहर अंगोंसे सुशोभित होते हैं। आज इस पर्वतशिखरपर मैं आपको नहीं देख पाती हूँ ॥26॥ | "O best of men! You are endowed with noble lineage and excellent character. You are adorned with all your beautiful limbs. Today, I cannot see you on this mountain peak." (26) |
| वने चास्मिन् महाघोरे सिंहव्याघ्रनिषेविते । शयानमुपविष्टं वा स्थितं वा निषधाधिप ॥27॥ |
निषधनरेश! इस महाभयंकर वनमें, जहाँ सिंह-व्याघ्र रहते हैं, आप कहीं सोये है, बैठे हैं अथवा खड़े हैं? ॥27॥ | "O King of Nishadha! Are you sleeping, sitting, or standing somewhere in this terrifying forest where lions and tigers dwell?" (27) |
| प्रस्थितं वा नरश्रेष्ठ मम शोकविवर्धन । कं नु पृच्छामि दुःखार्ता त्वदर्थे शोककर्शिता ॥28॥ |
मेरे शोकको बढ़ानेवाले नरश्रेष्ठ! आप यहीं हैं या कहीं अन्यत्र चल दिये, यह मैं किससे पू? आपके लिये शोकसे दुर्बल होकर मैं अत्यन्त दुःखसे आतुर हो रही हूँ ॥28॥ | "O best of men, who intensifies my sorrow! Where can I ask if you are here or have gone elsewhere? Weakened by sorrow for you, I am greatly agitated." (28) |
| कच्चिद् दृष्टस्त्वयारण्ये संगत्येह नलो नृपः । को नु मे वाथ प्रष्टव्यो वनेऽस्मिन् प्रस्थितं नलम् ॥29॥ |
“क्या तुमने इस वनमें राजा नलसे मिलकर उन्हें देखा है?" ऐसा प्रश्न अब मैं इस वनमें प्रस्थान करनेवाले नलके विषयमे किससे करूं? ॥29॥ | "Whom should I ask now in this forest, 'Have you met and seen King Nala on his way?'" (29) |
| अभिरूपं महात्मानं परव्यूहविनाशनम्
। यमन्वेषसि राजानं नलं पद्मनिभेक्षणम् ॥30॥ अयं स इति कस्याद्य श्रोष्यामि मधुरां गिरम्। |
'शत्रुओंके व्यूहका नाश करनेवाले जिन परम सुन्दर कमलनयन महात्मा राजा नलको तू खोज रही है, वे यही तो हैं, ऐसी मधुर वाणी आज मैं किसके मुखसे सुनूँगी?” ॥30॥ | "Whose sweet voice will I hear today saying, 'Here is the most beautiful lotus-eyed noble King Nala, the destroyer of enemy formations, whom you seek?'" (30) |
| अरण्यराडयं श्रीमांश्चृतुर्दष्रो महाहनुः ॥31॥ शार्दूलो ऽभिमुखोऽभ्येति व्रजाम्येनमशङ्किता । भवान् मृगाणामधिपस्त्वमस्मिन् कानने प्रभुः ॥32॥ |
वह वनका राजा कान्तिमान् सिंह मेरे सामने चला आ रहा है, इसके चार दाढ़ें और विशाल ठोड़ी है। मैं निःशंक होकर इसके सामने जा रही हूँ और कहती हूँ, “आप मृगोंके राजा और इस वनके स्वामी हैं ॥ 31-32॥ | "The radiant king of the forest, the lion, is approaching me, with four tusks and a large jaw. I am going fearlessly towards him, saying, 'You are the king of deer and the lord of this forest.'" (31-32) |
| विदर्भराजतनयां दमयन्तीति विद्धि माम् । निषधाधिपतेर्भार्या नलस्यामित्रघातिनः ॥33॥ |
“मै विदर्भराजकुमारी दमयन्ती हूँ। मुझे शत्रुघाती निषधनरेश नलकी पत्नी समझिये ॥33॥ | "'Know me as Damayanti, the princess of Vidarbha, the wife of King Nala of Nishadha, the slayer of enemies.'" (33) |
| पतिमन्वेषतीमेकां कृपणां शोककर्षिताम् । आश्वासय मृगेन्द्रेह यदि दृष्टस्त्वया नलः ॥34॥ |
'मृगेन्द्र! मैं इस वनमें अकेली पतिकी खोजमें भटक रही हूँ तथा शोकसे पीड़ित एवं दीन हो रही हूँ। यदि आपने नलको यहाँ कहीं देखा हो तो उनका कुशल-समाचार बताकर मुझे आश्वासन दीजिये ॥34॥ | "'O king of beasts! I am wandering alone in this forest, searching for my husband, distressed and miserable. If you have seen Nala anywhere here, please console me by giving me news of his well-being.'" (34) |
| अथवा त्वं वनपते नलं यदि न शंससि । मां खादय मृगश्रेष्ठ दुःखादस्माद् विमोचय ॥35॥ |
“अथवा वनराज मृगश्रेष्ठ! यदि आप नलके विषयमें कुछ नहीं बताते हैं तो मुझे खा जायँ और इस दुःखसे छुटकारा दे दें” ॥35॥ | "'Or, O best of forest deer! If you cannot tell me anything about Nala, then devour me and relieve me of this sorrow.'" (35) |
| श्रुत्वारण्ये विलपितं न मामाश्चासयत्ययम् । यात्येतां स्वादुसलिलामापगां सागरंगमाम् ॥36॥ |
अहो! इस घोर वनमें मेरा विलाप सुनकर भी यह सिंह मुझे सान्त्वना नहीं देता। यह तो स्वादिष्ट जलसे भरी हुई इस समुद्रगामिनी नदीकी ओर जा रहा है ॥ | "Alas! Even after hearing my lamentations in this dreadful forest, this lion does not console me. Instead, it is heading towards the river filled with sweet water flowing towards the ocean." (36) |
| इमं शिलोच्चयं पुण्यं शृङ्गैर्बहुभिरुच्छ्रितैः । विरार्जाद्भिरिवानेकैर्नेकवर्णैर्मनोरमैः ॥37॥ |
अच्छा, इस पवित्र पर्वतसे ही पूछती हूँ। यह बहुत-से ऊँचे-ऊँचे शोभाशाली बहुरंगे एवं मनोरम शिखरोंद्वारा सुशोभित है ॥37॥ | "Well then, I will ask this sacred mountain. It is adorned with many high, beautiful, colorful, and charming peaks." (37) |
| नानाधातुसमाकीर्ण विविधोपलभूषितम् । अस्यारण्यस्य महतः केतु भूतमिवोत्थितम् ॥38॥ |
अनेक प्रकारके धातुओंसे व्याप्त और भाँति-भाँतिके शिला-खण्डोंसे विभूषित है। यह पर्वत इस महान् वनकी ऊपर उठी हुई पताकाके समान जान पड़ता है ॥38॥ | "It is filled with various minerals and adorned with different kinds of rocks. This mountain appears like a raised banner of this vast forest." (38) |
| सिंहशार्दूलमातङ्गवराहरक्षमृगायुतम् । पतत्त्रिभिर्बहुविधैः समन्तादनुनादितम् ॥39॥ |
यह सिंह, व्याघ्र, हाथी, सूअर, रीछ और मृगोंसे परिपूर्ण है। इसके चारों ओर अनेक प्रकारके पक्षी कलरव कर रहे हैं ॥39॥ | "It is teeming with lions, tigers, elephants, pigs, bears, and deer. Various kinds of birds are chirping all around it." (39) |
| किंशुकाशोकबकुलपुन्नागैरुपशोभितम् । कर्णिकारधवप्लक्षैः सुपुष्पैरुपशोभितम् ॥40॥ |
पलाश, अशोक, बकुल, पुन्नाग, कनेर, धव तथा प्लक्ष आदि सुन्दर फूलोंवाले वृक्षोंसे वह पर्वत सुशोभित हो रहा है ॥40॥ | "The mountain is adorned with beautiful flowering trees like palasha, ashoka, bakul, punnaga, kaner, dhava, and plaksha." (40) |
| सरिद्भिः सविहङ्गाभिः शिखरैश्च समाकुलम् । गिरिराजमिमं तावत् पृच्छामि नृपतिं प्रति ॥41॥ |
यह पर्वत अनेक सरिताओं, सुन्दर पक्षियों और शिखरोंसे परिपूर्ण है। अब मैं इसी गिरिराजसे महाराज नलका समाचार पूछती हूँ ॥41॥ | "This mountain is replete with many streams, beautiful birds, and peaks. Now I will ask this king of mountains about King Nala." (41) |
| भगवन्नचलश्रेष्ठ दिव्यदर्शन विश्रुत । शरण्य बहुकल्याण नमस्तेऽस्तु महीधर ॥42॥ |
"भगवन्! अचलप्रवर! दिव्य दृष्टिवाले! विख्यात! सबको शरण देनेवाले परम कल्याणमय महीधर! आपको नमस्कार है ॥42॥ | "'O Lord, best of mountains! O divine-sighted one! O renowned one! O refuge of all! O most auspicious upholder of the earth! I bow to you.'" (42) |
| प्रणमाम्यभिगम्याहं राजपुत्रीं निबोध माम् । राज्ञः स्नुषां राजभार्यां दमयन्तीति विश्रुताम् ॥43॥ |
“मै निकट आकर आपके चरणोंमें प्रणाम करती हूँ। आप मेरा परिचय इस प्रकार जानें, मैं राजाकी पुत्री, राजाकी पुत्रवधू तथा राजाकी ही पत्नी हूँ। मेरी 'दमयन्ती' नामसे प्रसिद्धि है ॥43॥ | "'I come near and bow at your feet. Know my introduction thus: I am a king's daughter, a king's daughter-in-law, and a king's wife. My name is Damayanti.'" (43) |
| राजा विदर्भाधिपतिः पिता मम महारथः । भीमो नाम क्षितिपतिश्चातुर्वर्ण्यस्य रक्षिता ॥44॥ |
'विदर्भदेशके स्वामी महारथी भीम नामक राजा मेरे पिता हैं। वे पृथ्वीके पालक तथा चारों वर्णोके रक्षक हैं ॥44॥ | "'My father is King Bhima, the lord of Vidarbha, a great warrior. He is the protector of the earth and the guardian of all four castes.'" (44) |
| राजसूयाश्वमेधानां क्रतूनां दक्षिणावताम् । आहर्ता पार्थिवश्रेष्ठः पृथुचार्वञ्चितेक्षणः ॥45॥ |
“उन्होंने (प्रचुर) दक्षिणावाले राजसूय तथा अश्वमेध नामक यज्ञोंका अनुष्ठान किया है। वे भूमिपालोंमे श्रेष्ठ हैं। उनके नेत्र बड़े, चंचल और सुन्दर हैं ॥45॥ | "'He has performed sacrifices like the Rajasuya and Ashvamedha, which offer abundant gifts. He is the best among kings. His eyes are large, restless, and beautiful.'" (45) |
| ब्रह्मण्यः साधुवृत्तश्च सत्यवागनसूयकः । शीलवान् वीर्यसम्पन्नः पृथुश्रीर्धर्मविच्छुचिः ॥46॥ |
“वे ब्राह्मणभक्त, सदाचारी, सत्यवादी, किसीके दोषको न देखनेवाले, शीलवान्, पराक्रमी, प्रचुर सम्पत्तिके स्वामी, धर्मज्ञ तथा पवित्र हैं ॥46॥ | "'He is devoted to Brahmins, righteous, truthful, impartial, virtuous, valiant, wealthy, knowledgeable in dharma, and pure.'" (46) |
| सम्यग् गोप्ता विदर्भाणां निर्जितारिगणः प्रभुः । तस्य मां विद्धि तनयां भगवंस्त्वामुपस्थिताम् ॥47॥ |
“वे विदर्भदेशकी जनताका अच्छी तरह पालन करनेवाले हैं। उन्होने समस्त शत्रुओंको जीत लिया है, वे बड़े शक्तिशाली हैं। भगवन्! मुझे उन्हीकी पुत्री जानिये। मैं आपकी सेवामें (एक जिज्ञासा लेकर) उपस्थित हुई हूँ ॥47॥ | "'He takes good care of the people of Vidarbha. He has conquered all his enemies and is very powerful. O Lord! Know me as his daughter. I have come to you with a question.'" (47) |
| निषधेषु महाराजः श्वशुरो मे नरोत्तमः । गृहीतनामा विख्यातो वीरसेन इति स्म ह ॥48॥ |
'निषधदेशके महाराज मेरे श्वशुर थे, वे प्रातः-स्मरणीय नरश्रेष्ठ वीरसेनके नामसे विख्यात थे ॥48॥ | "'My father-in-law was the Maharaja of Nishadha, the revered hero Virasena.'" (48) |
| तस्य राज्ञः सुतो वीरः श्रीमान् सत्यपराक्रमः । क्रमप्राप्तं पितुः स्वं यो राज्यं समनुशास्ति ह ॥49॥ |
उन्हीं महाराज वीरसेनके एक वीर पुत्र हैं, जो बड़े ही सुन्दर और सत्यपराक्रमी हैं। वे वंशपरम्परासे प्राप्त अपने पिताके राज्यका पालन करते हैं ॥49॥ | "'King Virasena had a heroic and handsome son, truthful and valiant. He rules the kingdom inherited from his father.'" (49) |
| नलो नामारिहा श्यामः पुण्यश्लोक इति श्रुतः । ब्रह्मण्यो वेदविद् वाग्मी पुण्यकृत् सोमपोऽग्निमान् ॥50॥ |
“उनका नाम नल है। शत्रुदमन, श्यामसुन्दर राजा नल पुण्यश्लोक कहे जाते हैं। वे बड़े ब्राह्मणभक्त, वेदवेत्ता, वक्ता, पुण्यात्मा, सोमपान करनेवाले और अग्निहोत्री हैं ॥50॥ | "'His name is Nala. The subduer of enemies, the dark-complexioned King Nala, is known for his virtuous deeds. He is devoted to Brahmins, knowledgeable in the Vedas, eloquent, pious, a soma drinker, and an agnihotri.'" (50) |
| यष्टा दाता च योद्धा च सम्यकू चैव प्रशासिता
। तस्य मामबलां श्रेष्ठां विद्धि भार्यामिहागताम् ॥51॥ त्यक्तश्रियं भर्तृहीनामनाथां व्यसनान्विताम् । अन्वेषमाणां भर्तरि त्वं मां पर्वतसत्तम ॥52॥ |
'वे एक अच्छे यज्ञकर्ता, उत्तम दाता, शूरवीर योद्धा और श्रेष्ठ शासक हैं, आप मुझे उन्हींकी श्रेष्ठ पत्नी समझ लीजिये। मैं अबला नारी आपके निकट यहाँ उन्हींकी कुशल पूछनेके लिये आयी हूँ। गिरिराज! (मेरे स्वामी मुझे छोड़कर कहीं चले गये हैं।) मैं धन- सम्पत्तिसे वंचित, पतिदेवसे रहित, अनाथ और संकटोंकी मारी हुई हूँ। इस वनमें अपने पतिकी ही खोज कर रही हूँ ॥ 51-52॥ | "'He is a great sacrificer, an excellent donor, a brave warrior, and a noble ruler. Know me as his noble wife. I have come to you to inquire about his well-being. O king of mountains! (My lord has left me.) I am devoid of wealth and my husband, orphaned and beset by troubles. I am searching for my husband in this forest.'" (51-52) |
| समुल्लिखद्धिरेतेर्हि त्वया शृङ्गशतैर्नृपः । कच्चिद् दृष्टोऽचलश्रेष्ठ वनेऽस्मिन् दारुणे नलः ॥53॥ |
“पर्वतश्रेष्ठ! क्या आपने इन सैकड़ों गगनचुम्बी शिखरोंद्वारा इस भयानक वनमें कहीं राजा नलको देखा है? ॥53॥ | "'O best of mountains! Have you seen King Nala anywhere in this dreadful forest with its hundreds of sky-kissing peaks?'" (53) |
| गजेन्द्रविक्रमो धीमान् दीर्घबाहुरमर्षणः
। विक्रान्तः सत्त्ववान् वीरो भर्ता मम महायशाः ॥54॥ निषधानामधिपतिः कच्चिद् दृष्टस्त्वया नलः । विलपतीं किमेकां मां पर्वतश्रेष्ठ विह्वलाम् ॥55॥ |
गिरा नाश्वासयस्यद्य स्वां सुतामिव दुःखिताम् । 'मेरे महायशस्वी स्वामी निषधराज नल गजराजकी-सी चालसे चलते हैं। वे बड़े बुद्धिमान, महाबाहु, अमर्षशील (दुःखको न सह सकनेवाले), पराक्रमी, धैर्यवान् तथा वीर हैं। क्या आपने कहीं उन्हें देखा है? गिरिश्रेष्ठ! मैं आपकी पुत्रीके समान हूँ और (पतिके वियोगसे बहुत ही) दुःखी हूँ। क्या आप व्याकुल होकर अकेली विलाप करती हुई मुझ अबलाको आज अपनी वाणीद्वारा आश्वासन न देंगे?” ॥ 54-55॥ | "O mountain chief! My greatly glorious lord, King Nala of Nishadha, walks with the gait of a lordly elephant. He is very intelligent, mighty-armed, intolerant of injustice, valiant, patient, and heroic. Have you seen him anywhere? O best of mountains! I am like your daughter and am greatly distressed by separation from my husband. Will you not console me, a helpless woman weeping alone in despair, with your words today?" (54-55) |
| वीर विक्रान्त धर्मज्ञ सत्यसंध महीपते ॥56॥ यद्यस्यस्मिन् वने राजन् दर्शयात्मानमात्मना । |
वीर! धर्मज्ञ! सत्यप्रतिज्ञ और पराक्रमी महीपाल! यदि आप इसी वनमे हैं तो राजन्! अपने-आपको प्रकट करके मुझे दर्शन दीजिये ॥56॥ | "O hero! O knower of dharma! O truthful and valiant protector of the earth! If you are in this forest, O king! reveal yourself and grant me your sight." (56) |
| कदा सुस्निग्धगम्भीरां जीमूतस्वनसंनिभाम् ॥57॥ श्रोष्यामि नैषधस्याहं वाचं ताममृतोपमाम् । वैदर्भीत्येव विस्पष्टां शुभां राज्ञो महात्मनः ॥58॥ आम्नायसारिणीमृद्धां मम शोकविनाशिनीम् । |
मैं कब निषधराज नलकी मेघ-गर्जनाके समान स्निग्ध, गम्भीर, अमृतोपम वह मधुर वाणी सुनूँगी। उन महामना राजाके मुखसे वैदर्भि!“ इस सम्बोधनसे युक्त शुभ, स्पष्ट, वेदके अनुकूल, सुन्दर पद और अर्थसे युक्त तथा मेरे शोकका विनाश करनेवाली वाणी मुझे कब सुनायी देगी ॥ 57-58 ॥ | "When will I hear the sweet voice of King Nala of Nishadha, smooth, deep, and nectar-like, resembling the roar of thunder? When will I hear the words 'Vaidarbhi!' spoken by that noble-minded king, auspicious, clear, in accordance with the Vedas, beautiful in sound and meaning, and dispelling my sorrow?" (57-58) |
| भीतामाश्चासयत मां नृपते धर्मवत्सल ॥59॥ | धर्मवत्सल नरेश्वर! मुझ भयभीत अबलाको आश्वासन दीजिये ॥59॥ | "O compassionate king! Please console me, a frightened and helpless woman." (59) |
| इति सा तं गिरिश्रेष्ठमुक्त्वा पार्थिवनन्दिनी । दमयन्ती ततो भूयो जगाम दिशमुत्तराम् ॥60॥ |
इस प्रकार उस श्रेष्ठ पर्वतसे कहकर वह राजकुमारी दमयन्ती फिर वहाँसे उत्तर दिशाकी ओर चल दी ॥60॥ | "Having spoken thus to the great mountain, Princess Damayanti proceeded northward." (60) |
| सा गत्वा त्रीनहोरात्रान् ददर्श परमाङ्गना । तापसारण्यमतुलं दिव्यकाननशोभितम् ॥61॥ |
लगातार तीन दिन और तीन रात चलनेके पश्चात् उस श्रेष्ठ नारीने तपस्वियोंसे युक्त एक वन देखा, जो अनुपम तथा दिव्य वनसे सुशोभित था ॥61॥ | "After continuously walking for three days and three nights, that noble woman saw a forest inhabited by ascetics, adorned with unparalleled and divine beauty." (61) |
| वसिष्ठभृग्वत्रिसमैस्तापसैरुपशोभितम् । नियतैः संयताहारैर्दमशैचसमन्वितैः ॥62॥ |
तथा वसिष्ठ, भृगु और अत्रिके समान नियम-परायण, मिताहारी तथा (शम,) दम, शौच आदिसे सम्पन्न तपस्वियोंसे वह शोभायमान हो रहा था ॥62॥ | "It was graced by ascetics who were disciplined, moderate in their diet, and endowed with self-control, tranquility, and purity, like Vasishtha, Bhrigu, and Atri." (62) |
| अब्भक्षेर्वायुभक्षैश्च पत्राहारैस्तथैव च । जितेन््रियैर्महा भागैः स्वर्गमार्गदिदृक्षुभिः ॥63॥ |
वहाँ कुछ तपस्वीलोग केवल जल पीकर रहते थे और कुछ लोग वायु पीकर। कितने ही केवल पत्ते चबाकर रहते थे। वे जितेन्द्रिय महाभाग स्वर्गलोकके मार्गका दर्शन करना चाहते थे ॥63॥ | "Some ascetics there lived only on water, some on air, and some only by chewing leaves. These self-controlled, great souls sought to attain the path to heaven." (63) |
| वल्कलाजिनसंवीतैर्मुनिभिः संयतेन्द्रियैः । तापसाध्युषितं रम्यं ददर्शाश्रममण्डलम् ॥64॥ |
वल्कल और मृगचर्म धारण करनेवाले उन जितेन्द्रिय मुनियोंसे सेवित एक रमणीय आश्रममण्डल दिखायी दिया, जिसमें प्रायः तपस्वीलोग ही निवास करते थे ॥64॥ | "A delightful hermitage, served by those self-controlled sages wearing bark garments and deerskins, came into view, where mostly ascetics resided." (64) |
| नानामृगगणैर्जुष्टं शाखामृगगणायुतम् । तापसैः समुपेतं च सा दृष्ट्वैव समाश्वसत् ॥65॥ |
उस आश्रममे नाना प्रकारके मृगौ और वानरोंके समुदाय भी विचरते रहते थे। तपस्वी महात्मा ओंसे भरे हुए उस आश्रमको देखते ही दमयन्तीको बड़ी सान्त्वना मिली ॥65॥ | "Various kinds of deer and monkeys also roamed in that hermitage. Seeing that ashrama filled with ascetic great souls, Damayanti felt greatly comforted." (65) |
| सुभ्रूः सुकेशी सुश्रोणी सुकुचा सुद्विजानना । वर्चस्विनी सुप्रतिष्ठा स्वसितायतलोचना ॥66॥ |
उसकी भौहं बड़ी सुन्दर थीं। केश मनोहर जान पड़ते थे। नितम्बभाग, स्तन, दन्तपंक्ति और मुख सभी सुन्दर थे। उसके मनोहर कजरारे नेत्र विशाल थे। वह तेजस्विनी और प्रतिष्ठित थी ॥66॥ | "Her eyebrows were very beautiful, her hair appeared charming, her hips, breasts, teeth, and face were all lovely. Her captivating, kohl-rimmed eyes were large. She was radiant and dignified." (66) |
| सा विवेशाश्रमपदं वीरसेनसुतप्रिया । योषिद्रत्नं महाभागा दमयन्ती तपस्विनी ॥67॥ |
महाराज वीरसेनकी पुत्रवधू रमणीशिरोमणि महाभागा तपस्विनी उस दमयन्तीने आश्रमके भीतर प्रवेश किया ॥67॥ | "Damayanti, the daughter-in-law of King Virasena, the jewel among women, the blessed ascetic, entered the ashrama." (67) |
| साभिवाद्य तपोवृद्धान् विनयावनता स्थिता । स्वागतं त इति प्रोक्ता तैः सर्वैस्तापसोत्तमैः ॥68॥ |
वहाँ तपोवृद्ध महात्माओंको प्रणाम करके वह उनके समीप विनीतभावसे खड़ी हो गयी। तब वहाँके सभी श्रेष्ठ तपस्वीजनोंने उससे कहा--'देवि! तुम्हारा स्वागत है” ॥68॥ | "Bowing to the venerable great souls, she stood before them with humility. Then all the noble ascetics there said to her, 'Welcome, O Devi!'" (68) |
| पूजां चास्या यथान्यायं कृत्वा तत्र तपोधनाः । आस्यतामित्यथोचुस्ते ब्रूहि किं करवामहे ॥69॥ |
तदनन्तर वहाँ दमयन्तीका यथोचित आदर-सत्कार करके उन तपोधनोंने कहा--'शुभे! बैठो, बताओ, हम तुम्हारा कौन-सा कार्य सिद्ध करें! ॥69॥ | "Afterward, honoring Damayanti appropriately, those ascetics said, 'O auspicious one! Please be seated. Tell us, what can we do for you?'" (69) |
| तानुवाच वरारोहा कच्चिद् भगवतामिह
। तपःस्वग्निषु धर्मेषु मृगपक्षिषु चानघाः ॥70॥ कुशलं वो महाभागाः स्वधर्माचरणेषु च । तैरुक्ता कुशलं भद्रे सर्वत्रेति यशस्विनि ॥71॥ |
उस समय सुन्दर अंगोंवाली दमयन्तीने उनसे कहा--“भगवन्! निष्पाप महाभागगण! यहाँ तप, अग्निहोत्र, धर्म, मृग और पक्षियोंके पालन तथा अपने धर्मके आचरण आदि विषयोंमें आपलोग सकुशल हैं न?” तब उन महात्माओंने कहा-'भद्रे! यशस्विनि! सर्वत्र कुशल है ॥ 70-71॥ | "Then, Damayanti, with her beautiful limbs, said to them, 'O blessed ones! O sinless, great souls! Are you all well here, engaged in austerities, fire sacrifices, dharma, protecting deer and birds, and practicing your duties?' Then those great souls said, 'O blessed one! O glorious one! All is well.'" (70-71) |
| ब्रूहि सर्वानवद्याङ्गि का त्वं किं च चिकीर्षसि
। दृष्ट्वैव ते परं रूपं द्युतिं च परमामिह ॥72॥ विस्मयो नः समुत्पन्नः समाश्वसिहि मा शुचः । अस्यारण्यस्य देवी त्वमुताहोऽस्य महीभृतः ॥73॥ |
'सर्वागसुन्दरी! बताओ, तुम कौन हो और क्या करना चाहती हो? तुम्हारे उत्तम रूप और परम सुन्दर कान्तिको यहाँ देखकर हमें बड़ा विस्मय हो रहा है। धैर्य धारण करो, शोक न करो। तुम इस वनकी देवी हो या इस पर्वतकी अधिदेवता ॥ 72-73॥ | "'O most beautiful one! Tell us who you are and what you wish to do. Seeing your exquisite form and most beautiful radiance here, we are amazed. Be patient, do not grieve. Are you the goddess of this forest, or the presiding deity of this mountain?'" (72-73) |
| अस्याश्च नद्याः कल्याणि वद सत्यमनिन्दिते
। साब्रवीत् तानृषीन् नाहमरण्यस्यास्य देवता ॥74॥ न चाप्यस्य गिरेर्विप्रा नैव नद्याश्च देवता । मानुषीं मां विजानीत यूयं सर्वे तपोधनाः ॥75॥ |
“अनिन्दिते! कल्याणि! अथवा तुम इस नदीकी अधिष्ठात्री देवी हो, सच-सच बताओ।' दमयन्तीने उन ऋषियोंसे कहा-'तपस्याके धनी ब्राह्मणो! न तो मैं इस वनकी देवी हूँ, न पर्वतकी अधिदेवता और न इस नदीकी ही देवी हूँ। आप सब लोग मुझे मानवी समझें ॥ 74-75॥ | "'O blameless one! O auspicious one! Or are you the presiding deity of this river? Tell us truthfully.' Damayanti said to those sages, 'O Brahmins, rich in austerities! I am neither the goddess of this forest, nor the deity of the mountain, nor the goddess of this river. Consider me a human.'" (74-75) |
| विस्तरेणाभिधास्यामि तन्मे शृणुत सर्वशः । विदर्भेषु महीपालो भीमो नाम महीपतिः ॥76॥ |
“मै विस्तारपूर्वक अपना परिचय दे रही हूँ, आपलोग सुनें। विदर्भदेशमें भीम नामसे प्रसिद्ध एक भूमिपाल हैं ॥76॥ | "'I will introduce myself in detail, please listen. There is a king in Vidarbha known as Bhima.'" (76) |
| तस्य मां तनयां सर्वे जानीत द्विजसत्तमा:
। निषधाधिपतिर्धीमान् नलो नाम महायशाः ॥77॥ वीरः संग्रामजिद् विद्वान् मम भर्ता विशाम्पतिः । देवताभ्यर्चनपरो द्विजातिजनवत्सलः ॥78॥ |
'द्विजवरो! आप सब महात्मा जान लें, मैं उन्हीं महाराजकी पुत्री हूँ। निषधदेशके स्वामी, संग्रामविजयी, वीर, विद्वान्, बुद्धिमान्, प्रजापालक महायशस्वी राजा नल मेरे पति हैं। वे देवताओंके पूजनमें संलग्न रहते हैं और ब्राह्मणोंके प्रति उनके हृदयमें बड़ा स्नेह है ॥ 77-78॥ | "'O best of Brahmins! Know that I am his daughter. The lord of Nishadha, victorious in battle, heroic, learned, wise, protector of his people, and glorious King Nala, is my husband. He is devoted to worshipping the gods and has great affection for Brahmins.'" (77-78) |
| गोप्ता निषधवंशस्य महातेजा महाबलः
। सत्यवान् धर्मवित् प्राज्ञः सत्यसंधोऽरिमर्दनः ॥79॥ ब्रह्मण्यो दैवतपरः श्रीमान् परपुरंजयः । नलो नाम नृपश्रेष्ठो देवराजसमद्युतिः ॥80॥ मम भर्ता विशालाक्षः पूर्णेन्दुवदनोऽरिहा । आहर्ता क्रतुमुख्यानां वेदवेदाङ्गपारगः ॥81॥ |
“वे निषधकुलके रक्षक, महातेजस्वी, महाबली, सत्यवादी, धर्मज्ञ, विद्धान्, सत्यप्रतिज्ञ, शत्रुमर्दन, ब्राह्मणभक्त, देवोपासक, शोभा और सम्पत्तिसे युक्त तथा शत्रुओंकी राजधानीपर विजय पानेवाले हैं। मेरे स्वामी नृपश्रेष्ठ नल देवराज इन्द्रके समान तेजस्वी हैं। उनके नेत्र विशाल हैं, उनका मुख पूर्ण चन्द्रमाके समान सुन्दर है, वे शत्रुओंका संहार करनेवाले, बड़े- बड़े यज्ञोके आयोजक और वेद-वेदांगोंके पारंगत विद्धान् हैं ॥ 79-81॥ | "'He is the protector of the Nishadha lineage, immensely radiant, mighty, truthful, righteous, learned, true to his word, slayer of enemies, devoted to Brahmins, worshipper of gods, endowed with beauty and wealth, and conqueror of enemy capitals. My lord, the best of kings, Nala, is as radiant as Indra, king of gods. His eyes are large, his face is beautiful like the full moon, he is the destroyer of enemies, the organizer of great sacrifices, and a scholar well-versed in the Vedas and their auxiliary sciences.'" (79-81) |
| सपत्नानां मृधे हन्ता रविसोमसमप्रभः
। स कैश्चिन्निकृतिप्रज्ञैरनार्यैरकृतात्मभिः ॥82॥ आहूय पृथिवीपालः सत्यधर्मपरायणः । देवने कुशलैर्जिह्यौरहतं राज्यं वसूनि च ॥83॥ |
'युद्धमें उन्होंने कितने ही शत्रुओंका संहार किया है। वे सूर्य और चन्द्रमाके समान तेजस्वी और कान्तिमान् हैं। एक दिन कुछ कपटकुशल, अजितेन्द्रिय, अनार्य, कुटिल तथा द्यूतनिपुण जुआरिओंने उन सत्य-धर्मपरायण महाराज नलको जूएके लिये आवाहन करके उनके सारे राज्य और धनका अपहरण कर लिया ॥ | "'He has slain many enemies in battle. He is radiant and lustrous like the sun and moon. One day, some deceitful, uncontrolled, unrighteous, cunning, and skilled gamblers challenged that truthful and righteous King Nala to a game and robbed him of his entire kingdom and wealth.'" (82-83) |
| तस्य मामवगच्छध्वं भार्या राजर्षभस्य वै । दमयन्तीति विख्यातां भर्तुर्दर्शनलालसाम् ॥84॥ |
“आप दमयन्ती नामसे विख्यात मुझे उन्हीं नृपश्रेष्ठ नलकी पत्नी जानें। मैं अपने स्वामीके दर्शनके लिये उत्सुक हो रही हूँ ॥84॥ | "'Know me as Damayanti, the wife of that best of kings, Nala. I am eager to see my lord.'" (84) |
| सा वनानि गिरींश्चैव सरांसि सरितस्तथा
। पल्वलानि च सर्वाणि तथारण्यानि सर्वशः ॥85॥ अन्वेषमाणा भर्तारं नलं रणविशारदम् । महात्मानं कृतास्त्रं च विचरामीह दुःखिता ॥86॥ |
“मेरे पति महामना नल युद्धकलामें कुशल और सम्पूर्ण अस्त्र-शस्त्रोंके विद्वान् हैं। मैं उन्हींकी खोज करती हुई वन, पर्वत, सरोवर, नदी, गड्ढे और सभी जंगलोंमें दुःखी होकर घूमती हूँ ॥ 85-86॥ | "'My husband, the great-minded Nala, is skilled in warfare and knowledgeable in all weapons. I wander through forests, mountains, lakes, rivers, pits, and all the wilderness, searching for him, filled with sorrow.'" (85-86) |
| कच्चिद् भगवतां रम्यं तपोवनमिदं नृपः
। भवेत् प्राप्तो नलो नाम निषधानां जनाधिपः ॥87॥ यत्कृतेऽहमिदं ब्रह्मन् प्रपन्ना भृशदारुणम् । वनं प्रतिभयं घोरं शार्दूलमृगसेवितम् ॥88॥ |
"भगवन्! क्या आपके इस रमणीय तपोवनमें निषधनरेश नल आये थे? ब्रह्मन्! जिनके लिये मैं व्याघ्र, सिंह आदि पशुओंसे सेवित अत्यन्त दारुण, भयंकर, घोर वनमें आयी हूँ ॥ 87-88॥ | "'O blessed ones! Did King Nala of Nishadha come to this delightful hermitage of yours? O Brahmins! For whom I have come to this extremely harsh, terrifying, and dreadful forest inhabited by tigers, lions, and other animals.'" (87-88) |
| यदि कैश्चिदहोरात्रैर्न द्रक्ष्यामि नलं नृपम् । आत्मानं श्रेयसा योक्ष्ये देहस्यास्य विमोचनात् ॥89॥ |
"यदि कुछ ही दिन-रातमें मैं राजा नलको नहीं देखूँगी तो इस शरीरका परित्याग करके आत्माका कल्याण करूंगी ॥89॥ | "'If I do not see King Nala within a few days and nights, I will abandon this body and seek the well-being of my soul.'" (89) |
| को नु मे जीवितेनार्थस्तमृते पुरुषर्षभम् । कथं भविष्याम्यद्याहं भर्तृशोकाभिपीडिता ॥90॥ |
'उन पुरुषरत्न नलके बिना जीवन धारण करनेसे मेरा क्या प्रयोजन है? अब मैं पतिशोकसे पीड़ित होकर न जाने कैसी हो जाऊंगी? ॥90॥ | "'What is the use of me living without that jewel among men, Nala? Now, afflicted with grief for my husband, I do not know what will become of me.'" (90) |
| तथा विलपतीमेकामरण्ये भीमनन्दिनीम् । दमयन्तीमथोचुस्ते तापसाः सत्यदर्शिनः ॥91॥ |
इस प्रकार वनमें अकेली विलाप करती हुई भीमनन्दिनी दमयन्तीसे सत्यका दर्शन करनेवाले उन तपस्वियोंने कहा- ॥91॥ | "To Damayanti, the daughter of Bhima, lamenting alone in the forest, those ascetics who perceive the truth said..." (91) |
| उदर्कस्तव कल्याणि कल्याणो भविता शुभे । वयं पश्याम तपसा क्षिप्रं द्रक्ष्यसि नैषधम् ॥92॥ |
"कल्याणि! शुभे! हम अपने तपोबलसे देख रहे हैं, तुम्हारा भविष्य परम कल्याणमय होगा। तुम शीघ्र ही निषधनरेश नलका दर्शन प्राप्त करोगी ॥92॥ | "'O auspicious one! O blessed one! We see through our ascetic power that your future will be most auspicious. You will soon see King Nala of Nishadha.'" (92) |
| निषधानामधिपतिं नलं रिपुनिपातिनम् । भैमि धर्मभृतां श्रेष्ठं द्रक्ष्यसे विगतज्वरम् ॥93॥ |
'भीमकुमारी! तुम शत्रुओंका संहार करनेवाले निषधदेशके अधिपति और धर्मात्माओंमें शरेष्ठ राजा नलको सब प्रकारकी चिन्ताओंसे रहित देखोगी ॥93॥ | "'O daughter of Bhima! You will see the lord of Nishadha, the slayer of enemies, the best among the righteous, King Nala, free from all anxieties.'" (93) |
| विमुक्तं सर्वपापेभ्यः सर्वरत्नसमन्वितम्
। तदेव नगरं श्रेष्ठं प्रशासतमरिंदमम् ॥94॥ द्विषतां भयकर्तारं सुहृदां शोकनाशनम् । पति द्रक्ष्यसि कल्याणि कल्याणाभिजनं नृपम् ॥95॥ |
“तुम्हारे पति सब प्रकारके पापजनित दुखोंसे मुक्त और सम्पूर्ण रत्नोंसे सम्पन्न होंगे। शत्रुदमन राजा नल फिर उसी श्रेष्ठ नगरका शासन करेंगे। वे शत्रुओंके लिये भयदायक और सुहृदोंके लिये शोकका नाश करनेवाले होंगे। कल्याणि! इस प्रकार सत्कुलमें उत्पन्न अपने पतिको तुम (नरेशके पदपर प्रतिष्ठित) देखोगी" ॥ 94-95॥ | "'Your husband will be free from all sorrows born of sin and endowed with all kinds of jewels. King Nala, the subduer of enemies, will again rule that great city. He will be fearsome to his enemies and a destroyer of sorrow for his friends. O auspicious one! Thus, you will see your husband, born in a noble family, established as a king.'" (94-95) |
| एवमुक्त्वा नलस्येष्टां महिषीं पार्थिवात्मजाम् । अन्तर्हितास्तापसास्ते साग्निहोत्राश्रमास्तथा ॥96॥ |
नलकी प्रियतमा महारानी राजकुमारी दमयन्तीसे ऐसा कहकर वे सभी तपस्वी अग्निहोत्र और आश्रमसहित अदृश्य हो गये ॥96॥ | "Having spoken thus to Damayanti, the beloved queen and princess, all those ascetics, along with their fire sacrifices and hermitage, disappeared." (96) |
| सा दुष्ट्वा महदाश्चर्य विस्मिता ह्यभवत् तदा । दमयन्त्यनवद्याङ्गी वीरसेननृपस्नुषा ॥97॥ |
उस समय राजा वीरसेनकी पुत्रवधू सर्वागसुन्दरी दमयन्ती वह महान् आश्चर्यकी बात देखकर बड़े विस्मयमें पड़ गयी ॥97॥ | "At that moment, Damayanti, the daughter-in-law of King Virasena, the most beautiful woman, was greatly astonished to see that great wonder." (97) |
| किं नु स्वप्नो मया दृष्टः कोऽयं विधिरिहाभवत् । क्व नु ते तापसाः सर्वे क्व तदाश्रममण्डलम् ॥98॥ |
(उसने सोचा--) "क्या मैंने कोई स्वप्र देखा है? यहाँ यह कैसी अद्भुत घटना हो गयी? वे सब तपस्वी कहाँ चले गये और वह आश्रममण्डल कहाँ है?” ॥98॥ | "(She thought) 'Have I seen a dream? What wondrous event has occurred here? Where have all those ascetics gone, and where is that hermitage?'" (98) |
| क्व सा पुण्यजला रम्या नदी द्विजनिषेविता । क्व नु ते ह नगा हृद्याः फलपुष्पोपशोभिताः ॥99॥ |
'वह पुण्यसलिला रमणीय नदी, जिसपर पक्षी निवास कर रहे थे, कहाँ चली गयी? फल और फूलोंसे सुशोभित वे मनोरम वृक्ष कहाँ विलीन हो गये!” ॥99॥ | "'Where has that beautiful river with sacred water, where birds were dwelling, gone? Where have those delightful trees, adorned with fruits and flowers, vanished?'" (99) |
| ध्यात्वा चिरं भीमसुता दमयन्ती शुचिस्मिता । भर्तृशोकपरा दीना विवर्णवदनाभवत् ॥100॥ |
पवित्र मुसकानवाली भीमपुत्री दमयन्ती बहुत देरतक इन सब बातोंपर विचार करती रही। तत्पश्चात् वह पतिशोकपरायण और दीन हो गयी तथा उसके मुखपर उदासी छा गयी ॥100॥ | "Damayanti, the daughter of Bhima, with a pure smile, pondered over all these things for a long time. Afterward, she became overwhelmed with grief for her husband, and sadness clouded her face." (100) |
| सा गत्वाथापरां भूमिं बाष्पसंदिग्धया गिरा
। विललापाश्रुपूर्णाक्षी दृष्ट्वाशोकतरुं ततः ॥101॥ उपगम्य तरुश्रेष्ठमशोकं पुष्पितं वने । पल्लवापीडितं हद्यं विहङ्गैरनुनादितम् ॥102॥ |
तदनन्तर वह दूसरे स्थानपर जाकर अश्रुगद्रद वाणीसे विलाप करने लगी। उसने आँसू भरे नेत्रोंसे देखा, वहाँसे कुछ ही दूरपर एक अशोकका वृक्ष था। दमयन्ती उसके पास गयी। वह तरुवर अशोक-फूलोंसे भरा था। उस वनमें पल्लवोंसे लदा हुआ और पक्षियोंके कलरवोंसे गुंजायमान वह वृक्ष बड़ा ही मनोरम जान पड़ता था ॥ 101-102॥ | "Then, going to another place, she started lamenting in a tearful voice. With tear-filled eyes, she saw an Ashoka tree not far from there. Damayanti went near it. The tree was laden with Ashoka flowers. In that forest, adorned with new leaves and resounding with the chirping of birds, that tree appeared very delightful." (101-102) |
| अहो बतायमगमः श्रीमानस्मिन् वनान्तरे । आपीडर्बहुभिर्भाति श्रीमान् पर्वतराडिव ॥103॥ |
(उसे देखकर वह मन-ही-मन कहने लगी--) 'अहो! इस वनके भीतर यह अशोक बड़ा ही सुन्दर है। यह अनेक प्रकारके फल, फूल आदि अलंकारोंसे अलंकृत सुन्दर गिरिराजकी भाँति सुशोभित हो रहा है” ॥103॥ | "(Seeing it, she thought to herself) 'Oh, this Ashoka tree is very beautiful within this forest. It is adorned with various fruits, flowers, and other ornaments, appearing like a beautiful king of mountains.'" (103) |
| विशोकां कुरु मां क्षिप्रमशोक प्रियदर्शन
। वीतशोकभयाबाधं कच्चित् त्वं दृष्टवान् नृपम् ॥104॥ नलं नामारिदमनं दमयन्त्याः प्रियं पतिम् । निषधानामधिपतिं दृष्टवानसि मे प्रियम् ॥105॥ |
(अब उसने अशोकसे कहा) 'प्रियदर्शन अशोक! तुम शीघ्र ही मेरा शोक दूर कर दो। क्या तुमने शोक, भय और बाधासे रहित शत्रुदमन राजा नलको देखा है? क्या मेरे प्रियतम, दमयन्तीके प्राणवल्लभ, निषधनरेश नलपर तुम्हारी दृष्टि पड़ी है? ॥ 104-105॥ | "(Now she said to the Ashoka tree) 'O lovely Ashoka! Quickly dispel my sorrow. Have you seen King Nala, the subduer of enemies, free from sorrow, fear, and obstacles? Have you seen my beloved, the lord of Damayanti's life, King Nala of Nishadha?'" (104-105) |
| एकवस्त्रार्धसंवीतं सुकुमारतनुत्वचम् । व्यसनेनार्दितं वीरमरण्यमिदमागतम् ॥106॥ |
“उन्होंने एक साड़ीके आधे टुकड़ेसे अपने शरीरको ढँक रखा है, उनके अंगोंकी त्वचा बड़ी सुकुमार है। वे वीरवर नल भारी संकटसे पीड़ित होकर इस वनमें आये हैं ॥106॥ | "'He has covered his body with half a piece of cloth, his skin is very delicate. That valiant Nala has come to this forest, afflicted with great distress.'" (106) |
| यथा विशोका गच्छेयमशोकनग तत् कुरु । सत्यनामा भवाशोक अशोकः शोकनाशनः ॥107॥ |
'अशोकवृक्ष! तुम ऐसा करो, जिससे मैं यहाँसे शोकरहित होकर जाऊँ। अशोक उसे कहते हैं, जो शोकका नाश करनेवाला हो, अतः अशोक! तुम अपने नामको सत्य एवं सार्थक करो” ॥107॥ | "'O Ashoka tree! Do something so that I may leave this place free from sorrow. Ashoka means 'remover of sorrow,' therefore, O Ashoka! Make your name true and meaningful.'" (107) |
| एवं साशोकवृक्षं तमार्ता वै परिगम्य ह । जगाम दारुणतरं देशं भैमी वराङ्गना ॥108॥ |
इस प्रकार शोकार्त हुई सुन्दरी दमयन्ती उस अशोकवृक्षकी परिक्रमा करके वहाँसे अत्यन्त भयंकर स्थानकी ओर गयी ॥108॥ | "Thus, the beautiful Damayanti, overwhelmed with sorrow, circumambulated the Ashoka tree and proceeded towards an extremely terrifying place." (108) |
| सा ददर्श नगान् नैकान् नैकाश्च सरितस्तथा
। नैकांश्च पर्वतान् रम्यान् नैकांश्च मृगपक्षिणः ॥109॥ कन्दरांश्च नितम्बांश्च नदीश्चाद्भुतदर्शनाः । ददर्श तान् भीमसुता पतिमन्वेषती तदा ॥110॥ गत्वा प्रकृष्टमध्वानं दमयन्ती शुचिस्मिता । ददर्शाथ महासार्थं हस्त्यश्वरथसंकुलम् ॥111॥ उत्तरन्तं नदीं रम्यां प्रसन्नसलिलां शुभाम् । सुशीततोयां विस्तीर्णा हदिनीं वेतसैर्वृताम् ॥112॥ |
उसने अनेक प्रकारके वृक्ष, अनेकानेक सरिताओं, बहुसंख्यक रमणीय पर्वतों, अनेक मृग-पक्षियों, पर्वतकी कन्दराओं तथा उनके मध्यभागों और अद्भुत नदियोंको देखा। पतिका अन्वेषण करनेवाली दमयन्तीने उस समय पूर्वोक्त सभी वस्तुओंको देखा। इस तरह बहुत दूरतकका मार्ग तय कर लेनेके बाद पवित्र मुसकानवाली दमयन्तीने एक बहुत बड़े सार्थ (व्यापारियोंके दल)-को देखा, जो हाथी, घोड़े तथा रथसे व्याप्त था। वह व्यापारियोंका समूह स्वच्छ जलसे सुशोभित एक सुन्दर रमणीय नदीको पार कर रहा था। नदीका जल बहुत ठंडा था। उसका पाट चौड़ा था। उसमें कई कुण्ड थे और वह किनारेपर उगे हुए बेंतके वृक्षोंसे आच्छादित हो रही थी ॥ 109-112॥ | "She saw various kinds of trees, numerous rivers, many beautiful mountains, numerous deer and birds, mountain caves and their interiors, and extraordinary rivers. Damayanti, searching for her husband, saw all these things at that time. After covering a long distance, Damayanti, with a pure smile, saw a very large caravan of merchants, filled with elephants, horses, and chariots. That group of merchants was crossing a beautiful river adorned with clear water. The water of the river was very cold, its course was wide, it had several pools, and it was covered with cane trees growing on its banks." (109-112) |
| प्रोदघुष्टां क्रौञ्चकुररैश्चक्रवाकोपकूजिताम् । कूर्मग्राहझषाकीर्णा विपुलद्वीपशोभिताम् ॥113॥ |
उसके तटपर क्रौंच, कुरर और चक्रवाक आदि पक्षी कूज रहे थे। कछुए, मगर ओर मछलियोंसे भरी हुई वह नदी विस्तृत टापूसे सुशोभित हो रही थी ॥113॥ | "On its banks, birds like cranes, ospreys, and ruddy shelducks were singing. Filled with turtles, crocodiles, and fish, that river was adorned with vast islands." (113) |
| सा दृष्ट्वैव महासार्थं नलपत्नी यशस्विनी । उपसर्प्य वरारोहा जनमध्यं विवेश ह ॥114॥ |
उस बहुत बड़े समूहको देखते ही यशस्विनी नलपत्नी सुन्दरी दमयन्ती उसके पास पहुँच कर लोगोंकी भीड़में घुस गयी ॥114॥ | "Seeing that large group, the glorious wife of Nala, the beautiful Damayanti, approached it and entered the crowd of people." (114) |
| उन्मत्तरूपा शोकार्ता तथा वस्त्रार्धसंवृता । कृशा विवर्णा मलिना पांसुध्वस्तशिरोरुहा ॥115॥ |
उसका रूप उन्मत्त स्त्रीका-सा जान पड़ता था, वह शोकसे पीड़ित, दुर्बल, उदास और मलिन हो रही थी। उसने आधे वस्त्रसे अपने शरीरको ढक रखा था और उसके केशोंपर धूल जम गयी थी ॥115॥ | "Her appearance resembled that of a distraught woman, she was afflicted with sorrow, weak, sad, and disheveled. She had covered her body with half a garment, and her hair was covered in dust." (115) |
| तां दुष्ट्वा तत्र मनुजाः केचिद् भीताः प्रदुद्रुवुः । केचिच्चिन्तापरा जग्मुः केचित् तत्र विचुक्रुशुः ॥116॥ |
वहाँ दमयन्तीको सहसा देखकर कितने ही मनुष्य भयसे भाग खड़े हुए। कोई-कोई भारी चिन्तामें पड़ गये और कुछ लोग तो चीखने-चिल्लाने लगे ॥116॥ | "Suddenly seeing Damayanti there, many people fled in fear. Some became deeply worried, and some even screamed." (116) |
| प्रहसन्ति स्म तां केचिदभ्यसूयन्ति चापरे । अकुर्वत दयां केचित् पप्रच्छुश्चापि भारत ॥117॥ |
कुछ लोग उसकी हँसी उड़ाते थे और कुछ उसमें दोष देख रहे थे। भारत! उन्हींमें कुछ लोग ऐसे भी थे, जिन्हें उसपर दया आ गयी और उन्होंने उसका समाचार पूछा -- ॥117॥ | "Some mocked her, and some found fault with her. O descendant of Bharata! There were also some who felt compassion for her and inquired about her..." (117) |
| कासि कस्यासि कल्याणि किं वा मृगयसे वने । त्वां दृष्ट्वा व्यथिताः स्मेह कच्चित् त्वमसि मानुषी ॥118॥ |
'कल्याणि! तुम कौन हो? किसकी स्त्री हो और इस वनमें क्या खोज रही हो? तुम्हें देखकर हम बहुत दु:खी हैं। क्या तुम मानवी हो? ॥118॥ | "'O auspicious one! Who are you? Whose wife are you, and what are you searching for in this forest? We are very saddened to see you. Are you a human?'" (118) |
| वद सत्यं वनस्यास्य पर्वतस्याथवा दिशः । देवता त्वं हि कल्याणि त्वां वयं शरणं गताः ॥119॥ |
"कल्याणि! सच बताओ, तुम इस वन, पर्वत अथवा दिशाकी अधिष्ठात्री देवी तो नहीं हो? हम सब लोग तुम्हारी शरणमे आये हैं ॥119॥ | "'O auspicious one! Tell us truthfully, are you not the presiding deity of this forest, mountain, or direction? We all seek your refuge.'" (119) |
| यक्षी वा राक्षसी वा त्वमुताहोऽसि वराङ्गना
। सर्वथा कुरु नः स्वस्ति रक्ष वास्माननिन्दिते ॥120॥ यथायं सर्वथा सार्थः क्षेमी शीघ्रमितो व्रजेत् । तथा विधत्स्व कल्याणि यथा श्रेयो हि नो भवेत् ॥121॥ |
“तुम यक्षी हो या राक्षसी अथवा कोई श्रेष्ठ देवांगना हो? अनिन्दिते! सर्वथा हमारा कल्याण एवं संरक्षण करो। कल्याणि! यह हमारा समूह शीघ्र कुशलपूर्वक यहाँसे चला जाय और हमलोगोंका सब प्रकारसे भला हो, ऐसी कृपा करो" ॥ 120-121॥ | "'Are you a yakshi, a demoness, or some celestial woman? O blameless one! Protect us in every way. O auspicious one! Please grant us your grace so that our group may quickly and safely depart from here, and we may be well in all respects.'" (120-121) |
| तथोक्ता तेन सार्थेन दमयन्ती नृपात्मजा । प्रत्युवाच ततः साध्वी भर्तृव्यसनपीडिता ॥122॥ |
उस यात्रीदलके द्वारा जब ऐसी बात कही गयी, तब पतिके वियोगजनित दुःखसे पीड़ित साध्वी राजकुमारी दमयन्तीने उन सबको इस प्रकार उत्तर दिया ॥122॥ | "When the travelers spoke thus, the virtuous Princess Damayanti, afflicted with sorrow due to separation from her husband, replied to them all..." (122) |
| सार्थवाहं च सार्थ च जना ये चात्र केचन
। युवस्थविरबालाश्च सार्थस्य च पुरोगमाः ॥123॥ मानुषीं मां विजानीत मनुजाधिपतेः सुताम् । नृपस्नुषां राजभार्यां भर्तृदर्शनलालसाम् ॥124॥ |
'इस जनसमुदायके जो सरदार हों, उनसे, इस जनसमूहसे तथा इसके (भीतर रहनेवाले और) आगे चलनेवाले जो बाल-वृद्ध और युवक मनुष्य हों, उन सबसे मेरा यह कहना है कि आप सब लोग मुझे मानवी समझें। मैं एक नरेशपुत्री, महाराजकी पुत्रवधू तथा राजपत्नी हूँ। अपने स्वामीके दर्शनकी इच्छासे इस वनमें भटक रही हूँ ॥ 123-124॥ | "'To the leaders of this group, to this entire assembly, and to all the young, old, and middle-aged men within it, I say, consider me a human. I am a king's daughter, a king's daughter-in-law, and a king's wife. I am wandering in this forest, desiring to see my lord.'" (123-124) |
| विदर्भराण्मम पिता भर्ता राजा च नैषधः । नलो नाम महाभागस्तं मृग्याम्यपराजितम् ॥125॥ |
'विदर्भराज भीम मेरे पिता हैं, निषधनरेश महाभाग राजा नल मेरे पति हैं। मैं उन्हीं अपराजित वीर नलकी खोज कर रही हूँ ॥125॥ | "'King Bhima of Vidarbha is my father, and the glorious King Nala of Nishadha is my husband. I am searching for that unconquered hero Nala.'" (125) |
| यदि जानीत नृपतिं क्षिप्रं शंसत मे प्रियम् । नलं पुरुषशार्दूलममित्रगणसूदनम् ॥126॥ |
“यदि आपलोग शत्रुसमूहका संहार करनेवाले मेरे प्रियतम पुरुषसिंह महाराज नलके विषयमे कुछ जानते हों तो शीघ्र बतावें' ॥126॥ | "'If you know anything about my beloved, the lion among men, King Nala, the destroyer of enemy forces, please tell me quickly.'" (126) |
| तामुवाचानवद्याङ्गीं सार्थस्य महतः प्रभुः । सार्थवाहः शुचिर्नाम शृणु कल्याणि मद्वचः ॥127॥ |
उस महान् समूहका मालिक और समस्त यात्रीदलका संचालक (वणिक्) शुचिनामसे प्रसिद्ध था। उसने उस सुन्दरीसे कहा-'कल्याणि! मेरी बात सुनो-- ॥127॥ | "The leader of that great caravan and the chief of all the travelers was known as Suchi. He said to that beautiful woman, 'O auspicious one! Listen to me...'" (127) |
| अहं सार्थस्य नेता वै सार्थवाहः शुचिस्मिते । मनुष्यं नलनामानं न पश्यामि यशस्विनि ॥128॥ |
“शुचिस्मिते! मैं इस दलका नेता और संचालक हूँ। यशस्विनि! मैंने नल नामधारी किसी मनुष्यको इस वनमे नहीं देखा है ॥128॥ | "'O one with a pure smile! I am the leader and guide of this caravan. O glorious one! I have not seen any man named Nala in this forest.'" (128) |
| कुञ्जरद्वीपिमहिषशार्दूलक्षमृगानपि । पश्याम्यस्मिन् वने कृत्स्ने ह्यमनुष्यनिषेविते ॥129॥ |
“यह सम्पूर्ण वन मनुष्येतर प्राणियोंसे भरा है। इसके भीतर हाथियों, चीतों, भैंसों सिंहों, रीछों और मृगोंको ही मैं देखता आ रहा हूँ ॥129॥ | "'This entire forest is filled with non-human creatures. I have only seen elephants, tigers, buffaloes, lions, bears, and deer within it.'" (129) |
| ऋते त्वां मानुषीं मर्त्यं न पश्यामि महावने । तथा नो यक्षराडद्य मणिभद्रः प्रसीदतु ॥130॥ |
'तुम-जैसी मानव-कन्याके सिवा और किसी मनुष्यको मैं इस विशाल वनमें नहीं देख रहा हूँ। इसलिये यक्षराज मणिभद्र आज हमपर प्रसन्न हो" ॥130॥ | "'Except for a human maiden like you, I do not see any other human in this vast forest. Therefore, may the king of Yakshas, Manibhadra, be pleased with us today.'" (130) |
| साब्रवीद् वणिजः सर्वान् सार्थवाहं च तं ततः । क्व नु यास्यति सार्थोऽयमेतदाख्यातुमर्हसि ॥131॥ |
तब दमयन्तीने उन सब व्यापारियों तथा दलके संचालकसे कहा-'आपका यह दल कहाँ जायगा? यह मुझे बताइये” ॥131॥ | "Then Damayanti said to all those merchants and the leader of the caravan, 'Tell me, where is your caravan going?'" (131) |
| सार्थवाह उवाच सार्थोऽयं चेदिराजस्य सुबाहोः सत्यदर्शिनः । क्षिप्रं जनपदं गन्ता लाभाय मनुजात्मजे ॥132॥ |
सार्थवाहने कहा-राजकुमारी! हमारा यह दल शीघ्र ही सत्यदर्शी चेदिराज सुबाहुके जनपद (नगर)-में विशेष लाभके उद्देश्यसे जायगा ॥132॥ | "The caravan leader said, 'O princess! Our caravan will soon go to the kingdom of the truthful King Subahu of Chedi, seeking great profit.'" (132) |
| इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि नलोपाख्यानपर्वणि दमयन्तीसार्थवाहसंगमे चतुःषष्टितमोऽध्यायः ॥64॥ | इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत नलोपाख्यानपर्वमें दमयन्तीकी सार्थवाहसे भेटविषयक चौंसठवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥64॥ | "Thus ends the sixty-fourth chapter in the Nalopakhyana Parva of the Vana Parva in the Sri Mahabharata, describing Damayanti's encounter with the caravan leader." (64) |
| पञ्चषष्टितमोऽध्यायः | पैंसठवाँ अध्याय | **Chapter Sixty-Fifth: |
| जंगली हाथियोंद्धारा व्यापारियोंके दलका सर्वनाश तथा दुःखित दमयन्तीका चेदिराजके भवनमें सुखपूर्वक निवास | जंगली हाथियोंद्धारा व्यापारियोंके दलका सर्वनाश तथा दुःखित दमयन्तीका चेदिराजके भवनमें सुखपूर्वक निवास | Destruction of the Caravan by Wild Elephants and Damayanti's Peaceful Stay at the Palace of the Chedi King** |
| बृहदश्च उवाच सा तच्छुत्वानवद्याङ्गी सार्थवाहवचस्तदा । जगाम सह तेनैव सार्थेन पतिलालसा ॥1॥ |
बृहदश्च मुनि कहते है-राजन्! दलके संचालककी वह बात सुनकर निर्दोष एवं सुन्दर अंगोंवाली दमयन्ती पतिदेवके दर्शनके लिये उत्सुक हो व्यापारियोंके उस दलके साथ ही यात्रा करने लगी ॥1॥ | Sage Brihadasva continues: "O King, hearing the words of the caravan leader, the innocent Damayanti, with her beautiful limbs, eager to see her husband, started traveling with that caravan of merchants." (1) |
| अथ काले बहुतिथे वने महति दारुणे
। तडागं सर्वतोभद्रं पद्मसौगन्धिकं महत् ॥2॥ ददृशुर्वणिजो रम्यं प्रभूतयवसेन्धनम् । बहुपुष्पफलोपेतं नानापक्षिनिषेवितम् ॥3॥ |
तदनन्तर बहुत समयके बाद एक भयंकर विशाल वनमें पहुँचकर उन व्यापारियोंने एक महान् सरोवर देखा, जिसका नाम था, पद्मसौगन्धिक। वह सब ओरसे कल्याणप्रद जान पड़ता था। उस रमणीय सरोवरके पास घास और ईधनकी अधिकता थी, फूल और फल भी वहाँ प्रचुर मात्रामें उपलब्ध होते थे। उस तालाबपर बहुत-से पक्षी निवास करते थे ॥ 2-3॥ | "After a long time, reaching a terrifying and vast forest, those merchants saw a great lake named Padmasaugandika. It appeared auspicious from all sides. Near that delightful lake, there was an abundance of grass and firewood, and flowers and fruits were also available in plenty. Many birds resided on that lake." (2-3) |
| निर्मलस्वादुसलिलं मनोहारि सुशीतलम् । सुपरिश्रान्तवाहास्ते निवेशाय मनो दधुः ॥4॥ |
सरोवरका जल स्वच्छ और स्वादु था, वह देखनेमें बड़ा ही मनोहर और अत्यन्त शीतल था। व्यापारियोंके वाहन बहुत थक गये थे। इसलिये उन्होने वहीं पड़ाव डालनेका निश्चय किया ॥4॥ | "The water of the lake was clear and sweet, very pleasing to the eye, and extremely cool. The merchants' animals were very tired, so they decided to camp there." (4) |
| सम्मते सार्थवाहस्य विविशुर्वनमुत्तमम् । उवास सार्थः सुमहान् वेलामासाद्य पश्चिमाम् ॥5॥ |
समूहके अधिपतिसे अनुमति लेकर सब लोगोंने उस उत्तम वनमें प्रवेश किया और वह महान् जनसमुदाय सरोवरके पश्चिम तटपर ठहर गया ॥5॥ | "Taking permission from the leader of the group, everyone entered that excellent forest, and the large crowd settled on the western bank of the lake." (5) |
| अथार्धरात्रसमये निःशब्दस्तिमिते तदा
। सुप्ते सार्थे परिश्रान्ते हस्तियूथमुपागमत् ॥6॥ पानीयार्थं गिरिनदीं मदप्र्रवणाविलाम् । अथापश्यत सार्थ तं सार्थजान् सुबहून् गजान् ॥7॥ |
तत्पश्चात् आधी रातके समय जब कहींसे भी कोई शब्द सुनायी नहीं देता था और उस दलके सभी लोग थककर सो गये थे, उस समय गजराजोंके मदकी धारासे मलिन जलवाली पहाड़ी नदीमें पानी पीनेके लिये (जंगली) हाथियोंका एक झुंड आ निकला। उस झुंडने व्यापारियोंके सोये हुए दलको और उसके साथ आये हुए बहुत-से हाथियोंको भी देखा ॥ 6-7॥ | "Then, at midnight, when no sound could be heard from anywhere, and everyone in the caravan was tired and asleep, a herd of (wild) elephants came to drink water in the mountain river, its water muddied by the stream of rutting elephants. The herd saw the sleeping caravan of merchants and the many elephants that had accompanied them." (6-7) |
| ते तान् ग्राम्यगजान् दृष्ट्वा सर्वे वनगजास्तदा । समाद्रवन्त वेगेन जिघांसन्तो मदोत्कटाः ॥8॥ |
तब वनमें रहनेवाले उन सभी मदोन्मत्त गजोंने उन ग्रामीण हाथियोंको देखकर उन्हें मार डालनेकी इच्छासे उनपर वेगपूर्वक आक्रमण किया ॥8॥ | "Seeing those domesticated elephants, all those rutting elephants living in the forest swiftly attacked them with the intention of killing them." (8) |
| तेषामापततां वेग: करिणां दुःसहोऽभवत् | नगाग्रादिव शीर्णानां शृङ्गणां पततां क्षितौ ॥9॥ |
पर्वतकी चोटीसे टूटकर पृथ्वीपर गिरनेवाले बड़े-बड़े शिखरोंके समान उन आक्रमणकारी जंगली हाथियोंका वेग (उस यात्रीदलके लिये) अत्यन्त दुःसह था ॥9॥ | "The force of those attacking wild elephants was unbearable (for the travelers), like massive peaks breaking off from the mountaintop and falling to the earth." (9) |
| स्पन्दतामपि नागानां मार्गा नष्टा वनोद्धवाः । मार्ग संरुध्य संसुप्तं पदिन्याः सार्थमुत्तमम् ॥10॥ |
ग्रामीण हाथियोंपर आक्रमण करनेकी चेष्टावाले उन वनवासी गजराजोंके वन्य मार्ग अवरुद्ध हो गये थे। सरोवरके तटपर व्यापारियोंका महान् समुदाय उनका मार्ग रोककर सो रहा था ॥10॥ | "The wild paths of those forest-dwelling elephants, attempting to attack the domesticated elephants, were blocked. The large group of merchants, obstructing their way, was sleeping on the bank of the lake." (10) |
| ते तं ममर्दुः सहसा चेष्टमानं महीतले
। हाहाकारं प्रमुञ्चन्तः सार्थिकाः शरणार्थिनः ॥11॥ वनगुल्मांश्च धावन्तो निद्रान्धा बहवोऽभवन् । केचिद् दत्तैः करैः केचित् केचित् पद्भयां हता गजैः ॥12॥ |
उन हाथियोंने सहसा पहुँचकर समूचे दलको कुचल दिया। कितने ही मनुष्य धरतीपर पड़े-पड़े छटपटा रहे थे। उस दलके कितने ही पुरुष हाहाकार करते हुए बचावकी जगह खोजते हुए जंगलके पौधोंके समूहमें भाग गये। बहुत-से मनुष्य तो नींदके मारे अन्धे हो रहे थे। हाथियोंने किन्हीको दाँतोंसे, किन्हीको सूड़ोंसे और कितनोंको पैरोंसे घायल कर दिया ॥ 11-12॥ | "Suddenly arriving, those elephants crushed the entire caravan. Many people were writhing on the ground. Many men from the caravan, crying out in despair, fled into the thicket of forest plants, seeking refuge. Many were blinded by sleep. The elephants injured some with their tusks, some with their trunks, and others with their feet." (11-12) |
| निहतोष्टाश्वचहुला: पदातिजनसंकुलाः
। भयादाधावमानाश्च परस्परहतास्तदा ॥13॥ घोरान् नादान् विमुञ्चन्तो निपेतुर्धरणीतले । वृक्षेष्वारुह्य संरब्धाः पतिता विषमेषु च ॥14॥ |
उनके बहुत-से ऊँट और घोड़े मारे गये और उस समुदायमें बहुत-से पैदल लोग भी थे। वे सब लोग उस समय भयसे चारों ओर भागते हुए एक-दूसरेसे टकराकर चोट खा जाते थे। घोर आर्तनाद करते हुए सभी लोग धरतीपर गिरने लगे। कुछ लोग बड़े वेगसे वृक्षोंपर चढ़ते हुए नीचेकी विषम भूमियोंपर गिर पड़ते थे ॥ 13-14॥ | "Many of their camels and horses were killed, and there were also many people on foot in that group. At that time, they all ran around in fear, colliding with each other and getting hurt. Crying out in agony, everyone started falling to the ground. Some climbed trees with great speed but fell onto the uneven ground below." (13-14) |
| एवं प्रकारैर्बहुभिर्दैवेनाक्रम्य हस्तिभिः । राजन् विनिहतं सर्व समृद्धं सार्थमण्डलम् ॥15॥ |
राजन्! इस प्रकार दैववश बहुतेरे जंगली हाथियोंने आक्रमण करके (प्रायः) उस सम्पूर्ण समृद्धिशाली व्यापारियोंके समुदायको नष्ट कर दिया ॥15॥ | "O King, thus, by fate, many wild elephants attacked and destroyed (almost) the entire prosperous community of merchants." (15) |
| आरावः सुमहांश्चासीत् त्रैलोवयभयकारकः
। एषोऽग्निरुत्थितः कष्टस्त्रायध्वं धावताधुना ॥16॥ रत्नराशिर्विशीर्णोऽयं गृह्णीध्वं किं प्रधावत । |
उस समय वहाँ तीनों लोकोंको भयमें डालनेवाला महान् आर्तनाद एवं चीत्कार हो रहा था। कोई कहता--'अरे! इधर बड़े जोरकी आग प्रज्वलित हो उठी है। यह भारी संकट आ गया (अब) दौड़ो ओर बचाओ।' दूसरा कहता--“अरे! ये ढेर-के-ढेर रत्न बिखरे पड़े हैं, इन्हें सँभालकर रखो। इधर-उधर भागते क्यों हो?” ॥163॥ | "At that time, there was a great commotion and cries that could frighten the three worlds. Someone shouted, 'Oh no! A huge fire has erupted here! This is a grave danger, run and save yourselves!' Another said, 'Hey! There are heaps of jewels scattered here, collect them! Why are you running around?'" (16-17) |
| सामान्यमेतद् द्रविणं न मिथ्यावचनं मम ॥17॥ | तीसरा कहता था--'भाई! इस धनपर सबका समान अधिकार है, मेरी यह बात झूठी नहीं है” ॥17॥ | "A third one said, 'Brothers! Everyone has equal right to this wealth, my words are not false.'" (17) |
| एवमेवाभिभाषन्तो विद्रवन्ति भयात् तदा । पुनरेवाभिधास्यामि चिन्तयध्वं सुकातराः ॥18॥ |
कोई कहता--'ऐ कायरो! मैं फिर तुमसे बात करूंगा, अभी अपनी रक्षाकी चिन्ता करो।' इस तरहकी बातें करते हुए सब लोग भयसे भाग रहे थे ॥18॥ | "Someone said, 'O cowards! I will talk to you later, worry about saving yourselves now.' Speaking such things, everyone was fleeing in fear." (18) |
| तस्मिंस्तथा वर्तमाने दारुणे जनसंक्षये । दमयन्ती च बुबुधे भयसंत्रस्तमानसा ॥19॥ |
इस प्रकार जब वहाँ भयानक नरसंहार हो रहा था, उसी समय दमयन्ती भी जाग उठी। उसका हृदय भयसे संत्रस्त हो उठा ॥19॥ | "Thus, while that terrible massacre was happening, Damayanti also woke up. Her heart was terrified with fear." (19) |
| अपश्यद् वैशसं तत्र सर्वलोकभयंकरम्
। अदृष्टपूर्वं तद् दृष्ट्वा बाला पद्मनिभेक्षणा ॥20॥ संसक्तवदनाश्चासा उत्तस्थौ भयविह्वला । ये तु तत्र विनिर्मुक्ताः सार्थात् केचिदविक्षताः ॥21॥ तेऽब्रुवन् सहिताः सर्वे कस्येदं कर्मणः फलम् । नूनं न पूजितोऽस्माभिर्मणिभद्रो महायशाः ॥22॥ तथा यक्षाधिपः श्रीमान् न वै वैश्रवणः प्रभुः । न पूजा विघ्नकर्तृणामथवा प्रथमं कृता ॥23॥ शकुनानां फलं वाथ विपरीतमिदं ध्रुवम् । ग्रहा न विपरीतास्तु किमन्यदिदमागतम् ॥24॥ |
वहाँ उसने वह महासंहार अपनी आँखों देखा, जो सब लोगोंके लिये भयंकर था। उसने ऐसी दुर्घटना पहले कभी नहीं देखी थी। यह सब देखकर वह कमलनयनी बाला भयसे व्याकुल हो उठी। उसको कहींसे कोई सान्त्वना नहीं मिल रही थी। वह इस प्रकार स्तब्ध हो रही थी, मानो धरतीसे सट गयी हो। तदनन्तर वह किसी प्रकार उठकर खड़ी हुई। दलके जो लोग उस संकटसे मुक्त हो आघातसे बचे हुए थे, वे सब एकत्र हो कहने लगे कि “यह हमारे किस कर्मका फल है? निश्चय ही हमने महायशस्वी मणिभद्रका पूजन नहीं किया है। इसी प्रकार हमने श्रीमान् यक्षराज कुबेरकी भी पूजा नहीं की है अथवा विघ्नकर्ता विनायकोंकी भी पहले पूजा नहीं कर ली थी। अथवा हमने पहले जो-जो शकुन देखे थे, उसका यह विपरीत फल है। यदि हमारे ग्रह विपरीत न होते तो और किस हेतुसे यह संकट हमारे ऊपर कैसे आ सकता था?” ॥ 20-24॥ | "There, she witnessed that great destruction with her own eyes, which was horrifying for everyone. She had never seen such a calamity before. Seeing all this, the lotus-eyed girl became distraught with fear. She found no solace anywhere. She was stunned, as if rooted to the ground. Then, somehow, she got up and stood. Those who had survived that disaster, who were unharmed, gathered together and started saying, 'What is the fruit of our actions? Surely, we did not worship the glorious Manibhadra. Similarly, we did not worship the illustrious Yaksha king Kubera, nor did we worship the obstacle-removing Vinayakas beforehand. Or perhaps this is the opposite result of the omens we saw earlier. If our stars were not unfavorable, then why else would this calamity befall us?'" (20-24) |
| अपरे त्वब्रुवन् दीना ज्ञातिद्रव्यविनाकृताः
। यासावद्य महासार्थे नारी ह्युन्मत्तदर्शना ॥25॥ प्रविष्टा विकृताकारा कृत्वा रूपममानुषम् । तयेयं विहिता पूर्वं माया परमदारुणा ॥26॥ |
दूसरे लोग जो अपने कुटुम्बीजनों और धनके विनाशसे दीन हो रहे थे, वे इस प्रकार कहने लगे-"आज हमारे विशाल जनसमूहके साथ वह जो उन्मत्त-जैसी दिखायी देनेवाली नारी आ गयी थी, वह विकराल आकारवाली राक्षसी थी तो भी अलौकिक सुन्दर रूप धारण करके हमारे दलमें घुस गयी थी। उसीने पहलेसे ही यह अत्यन्त भयंकर माया फैला रखी थी ॥ 25-26॥ | "Others, who were distressed by the loss of their family members and wealth, started saying, 'That woman who appeared like a madwoman and joined our vast group today, she must have been a terrifying demoness who disguised herself with a supernatural beauty and entered our caravan. She had already spread this extremely dreadful illusion.'" (25-26) |
| राक्षसी वा ध्रुवं यक्षी पिशाची वा भयंकरी
। तस्याः सर्वमिदं पापं नात्र कार्या विचारणा ॥27॥ पश्यामो यदि तां पापां सार्थघ्नीं नैकदुःखदाम् । लोष्टभिः पांसुभिश्चैव तृणैः काष्ठैश्च मुष्टिभिः ॥28॥ अवश्यमेव हन्याम: सार्थस्य किल कृत्यकाम् । |
“निश्चय ही वह राक्षसी, यक्षी अथवा भयंकर पिशाची थी-इसमें विचार करनेकी कोई आवश्यकता नहीं कि यह सारा पापपूर्ण कृत्य उसीका किया हुआ है। उसने हमें अनेक प्रकारका दुःख दिया और प्रायः सारे दलका विनाश कर डाला। वह पापिनी समूचे सार्थके लिये अवश्य ही कृत्या बनकर आयी थी। यदि हम उसे देख लेंगे तो ढेलोंसे, धूल और तिनकोंसे, लकड़ियों और मुक्कोंसे भी अवश्य मार डालेंगे ॥ 27-28 ॥ | "'Surely, she was a demoness, a yakshi, or a fearsome ogress - there is no need to consider otherwise, this entire sinful act was done by her. She caused us immense suffering and destroyed almost the entire caravan. That sinner must have come as a Krtya (a malevolent spirit) for the entire caravan. If we see her, we will surely kill her with stones, dust, straw, wood, and even our fists.'" (27-28) |
| दमयन्ती तु तच्छुत्वा वाक्यं तेषां सुदारुणम्
॥29॥ हीता भीता च संविग्ना प्राद्रवद् यत्र काननम् । आशङ्कमाना तत्पापमात्मानं पर्यदेवयत् ॥30॥ |
'उनका वह अत्यन्त भयंकर वचन सुनकर दमयन्ती लज्जासे गड़ गयी और भयसे व्याकुल हो उठी। उनके पापपूर्ण संकल्पके संघटित होनेकी आशंका करके वह उसी ओर भाग गयी, जहाँ घना जंगल था। वहाँ जाकर अपनी इस परिस्थितिपर विचार करके वह विलाप करने लगी ॥ 29-30॥ | "Hearing their extremely dreadful words, Damayanti was overcome with shame and fear. Fearing the fulfillment of their sinful intentions, she fled towards the dense forest. Reaching there, reflecting on her situation, she started lamenting." (29-30) |
| अहो ममोपरि विधेः संरम्भो दारुणो महान् । नानुबध्नाति कुशलं कस्येदं कर्मणः फलम् ॥31॥ |
'अहो! मुझपर विधाताका अत्यन्त भयानक और महान् कोप है, जिससे मुझे कहीं भी कुशल-क्षेमकी प्राप्ति नहीं होती। न जाने, यह हमारे किस कर्मका फल है? ॥31॥ | "'Alas! The creator's wrath upon me is extremely terrifying and great, due to which I find no peace anywhere. I do not know, what is the fruit of my actions?'" (31) |
| न स्मराम्यशुभं किंचित् कृतं कस्यचिदण्वपि । कर्मणा मनसा वाचा कस्येदं कर्मणः फलम् ॥32॥ |
"मैने मन, वाणी और क्रियाद्वारा कभी किसीका थोडा-सा भी अमंगल किया हो, इसकी याद नहीं आती, फिर यह मेरे किस कर्मका फल मिल रहा है? ॥32॥ | "'I do not recall ever having done even the slightest harm to anyone through my mind, speech, or actions, then why am I receiving the fruit of such actions?'" (32) |
| नूनं जन्मान्तरकृतं पापमापतितं महत् । अपश्चिमामिमां कष्टामापदं प्राप्तवत्यहम् ॥33॥ |
“निश्चय ही यह मेरे दूसरे जन्मोंके किये हुए पापका महान् फल प्राप्त हुआ है, जिससे मैं इस अनन्त कष्टमें पड़ गयी हूँ ॥33॥ | "'Surely, this is the great fruit of sins committed in my past lives, due to which I have fallen into this endless suffering.'" (33) |
| भर्त्राज्यापहरणं स्वजनाच्च पराजयः । भर्त्रा सह वियोगश्च तनयाभ्यां च विच्युतिः ॥34॥ |
'मेरे स्वामीके राज्यका अपहरण हुआ, उन्हें आत्मीयजनसे ही पराजित होना पड़ा, मेरा अपने पतिदेवसे वियोग हुआ और अपनी संतानोंके दर्शनसे भी वंचित हो गयी हूँ ॥34॥ | "'My husband's kingdom was stolen, he was defeated by his own kin, I am separated from my husband, and I am deprived of seeing my children.'" (34) |
| निर्नाथता वने वासो बहुव्यालनिषेविते । |
“इतना ही नहीं, असंख्य सर्प आदि जन्तुओंसे भरे हुए इस वनमें मुझे अनाथकी-सी दशामें रहना पड़ता है ॥ | "'Not only this, I have to live like an orphan in this forest filled with countless snakes and other creatures.'" (35) |
| अथापरेद्युः सम्प्राप्ते हतशिष्टा जनास्तदा ॥35॥ देशात् तस्माद् विनिष्क्रम्य शोचन्ते वैशसं कृतम् । भ्रातरं पितरं पुत्रं सखायं च नराधिप ॥36॥ |
तदनन्तर दूसरा दिन प्रारम्भ होनेपर मरनेसे बचे हुए लोग उस स्थानसे निकलकर उस विकट संहारके लिये शोक करने लगे। राजन्! कोई भाईके लिये दुःखी था, कोई पिताके लिये; किसीको पुत्रका शोक था और किसीको मित्रका ॥ 35-36॥ | "Then, as the next day dawned, those who had survived the massacre left that place and started mourning for that terrible destruction. O King, some grieved for their brothers, some for their fathers, some for their sons, and some for their friends." (36-37) |
| अशोचत् तत्र वैदर्भी किं नु मे दुष्कृतं कृतम्
। योऽपि मे निर्जनेऽरण्ये सम्प्राप्तोऽयं जनार्णवः ॥37॥ स हतो हस्तियूथेन मन्दभाग्यान्ममैव तत् । प्राप्तव्यं सुचिरं दुःखं नूनमद्यापि वै मया ॥38॥ |
विदर्भराजकुमारी दमयन्ती भी इसके लिये शोक करने लगी कि “मैंने कौन-सा पाप किया है, जिससे इस निर्जन वनमें मुझे जो यह समुद्रके समान जनसमुदाय प्राप्त हो गया था, वह भी मेरे ही दुर्भाग्यसे हाथियोंके झुंडद्वारा मारा गया। निश्चय ही मुझे अभी दीर्घकालतक दुःख-ही-दुःख भोगना है ॥ 37-38॥ | "Damayanti, the princess of Vidarbha, also started grieving, 'What sin have I committed that this vast group of people, which I had found in this desolate forest like an ocean, was also killed by a herd of elephants due to my misfortune? Surely, I have to endure sorrow after sorrow for a long time.'" (37-38) |
| नाप्राप्तकालो स्रियते श्रुतं वृद्धानुशासनम् । या नाहमद्य मृदिता हस्तियूथेन दुःखिता ॥39॥ |
“जिसकी मृत्युका समय नहीं आया है, वह इच्छा होते हुए भी मर नहीं सकता। वृद्ध पुरुषोंका यह जो उपदेश मैंने सुन रखा है, यह ठीक ही जान पड़ता है, तभी तो आज मैं दुःखित होनेपर भी हाथियोंके झुंडसे कुचलकर मर न सकी ॥39॥ | "'One whose time of death has not come cannot die even if they wish to. This advice of old men that I have heard seems to be true, that is why even though I am distressed, I could not die being trampled by the herd of elephants.'" (39) |
| न ह्यदैवकृतं किंचिन्नराणामिह विद्यते
। न च मे बालभावेऽपि किंचित् पापकृतं कृतम् ॥40॥ कर्मणा मनसा वाचा यदिदं दु:खमागतम् । |
'मनुष्योंको इस जगतमें कोई भी सुख या दुःख ऐसा नहीं मिलता, जो विधाताका दिया हुआ न हो। मैंने बचपनमें भी मन, वाणी अथवा क्रियाद्वारा ऐसा पाप नहीं किया है, जिससे मुझे यह दुःख प्राप्त होता ॥40॥ | "'Humans do not experience any happiness or sorrow in this world that is not given by the creator. Even in my childhood, I have not committed any sin through my mind, speech, or actions that would cause me this sorrow.'" (40) |
| मन्ये स्वयंवरकृते लोकपालाः समागताः ॥41॥ प्रत्याख्याता मया तत्र नलस्यार्थाय देवता: । नूनं तेषां प्रभावेण वियोगं प्राप्तवत्यहम् ॥42॥ एवमादीनि दुःखार्ता सा विलप्य वराङ्गना । प्रलापानि तदा तानि दमयन्ती पतिव्रता ॥43॥ |
“मैं समझती हूँ, स्वयंवरके लिये जो लोकपाल देवगण पधारे थे, नलके कारण मैंने उनका तिरस्कार कर दिया था। अवश्य उन्हीं देवताओंके प्रभावसे आज मुझे वियोगका कष्ट प्राप्त हुआ है।' इस प्रकार दुःखसे आतुर हुई सुन्दरी पतिव्रता दमयन्तीने उस समय अनेक प्रकारसे विलाप एवं प्रलाप किये ॥ 41-43॥ | "'I think that I rejected the guardians of the world, the gods, who had come for my swayamvara, because of Nala. Surely, it is due to the influence of those gods that I am experiencing the pain of separation today.' Thus, the beautiful and virtuous Damayanti, distressed with sorrow, lamented and wailed in many ways at that time." (41-43) |
| हतशेषैः सह तदा ब्राह्मणैर्वेदपारगैः
। अगच्छद् राजशार्दूल चन्द्रलेखेव शारदी ॥44॥ गच्छन्ती साचिराद् बाला पुरमासादयन्महत् । सायाह्ने चेदिराजस्य सुबाहोः सत्यदर्शिनः ॥45॥ |
नृपश्रेष्ठ! तदनन्तर मरनेसे बचे हुए वेदोंके पारंगत विद्वान् ब्राह्मणोंके साथ यात्रा करती हुई शरत्कालके चन्द्रमाकी कलाके समान वह सुन्दरी युवती थोड़े ही समयमें संध्या होते- होते सत्यदर्शी चेदिराज सुबाहुकी राजधानीमें जा पहुँची ॥ 44-45॥ | "O best of kings, then, traveling with the surviving Brahmins who were well-versed in the Vedas, that beautiful young woman, radiant like the crescent moon of autumn, soon reached the capital of the truthful Chedi king Subahu by nightfall." (44-45) |
| अथ वस्त्रार्धसंवीता प्रविवेश पुरोत्तमम् । तं विह्वलां कृशां दीनां मुक्तकेशीममार्जिताम् ॥46॥ |
शरीरमें आधी साड़ीको लपेटे हुए ही उसने उस उत्तम नगरमें प्रवेश किया। वह विह्वल, दीन और दुर्बल हो रही थी। उसके सिरके बाल खुले हुए थे। उसने स्नान नहीं किया था ॥46॥ | "She entered that excellent city, her body wrapped in half a saree. She was distraught, miserable, and weak, her hair disheveled. She had not bathed." (46) |
| उन्मत्तामिव गच्छन्तीं ददृश: पुरवासिनः
। प्रविशन्तीं तु तां दृष्ट्वा चेदिराजपुरीं तदा ॥47॥ अनुजग्मुस्तत्र बाला ग्रामिपुत्राः कुतूहलात् । सा तैः परिवृतागच्छत् समीपं राजवेश्मनः ॥48॥ |
पुरवासियोंने उसे उन्मत्ताकी भाँति जाते देखा। चेदिनरेशकी राजधानीमें उसे प्रवेश करते देख उस समय बहुत-से ग्रामीण बालक कौतूहलवश उसके साथ हो लिये थे। उनसे घिरी हुई दमयन्ती राजमहलके समीप गयी ॥ 47-48॥ | "The city dwellers saw her passing by like a madwoman. Seeing her enter the capital of the Chedi king, many village children, out of curiosity, gathered around her. Surrounded by them, Damayanti reached near the royal palace." (47-48) |
| तां प्रासादगतापश्यद् राजमाता जनैर्वृताम् । धात्रीमुवाच गच्छैनामानयेह ममान्तिकम् ॥49॥ |
उस समय राजमाताने उसे महलपरसे देखा। वह जनसाधारणसे घिरी हुई थी। राजमाताने धायसे कहा-'जाओ, इस युवतीको मेरे पास ले आओ ॥49॥ | "At that time, the queen mother saw her from the palace. She was surrounded by ordinary people. The queen mother said to her nursemaid, 'Go, bring this young woman to me.'" (49) |
| जनेन क्लिश्यते बाला दुःखिता शरणार्थिनी । तादृग् रूपं च पश्यामि विद्योतयति मे गृहम् ॥50॥ |
“इसे लोग तंग कर रहे हैं। यह दुःखिनी युवती कोई आश्रय चाहती है। मुझे इसका रूप ऐसा दिखायी देता है, जो मेरे घरको प्रकाशित कर देगा ॥50॥ | "'People are bothering her. This distressed young woman seeks shelter. Her appearance seems to illuminate my house.'" (50) |
| उन्मत्तवेषा कल्याणी श्रीरिवायतलोचना
। सा जनं वारयित्वा तं प्रासादतलमुत्तमम् ॥51॥ आरोप्य विस्मिता राजन् दमयन्तीमपृच्छत । एवमप्यसुखाविष्टा बिभर्षि परमं वपुः ॥52॥ |
“इसका वेष तो उन्मत्तके समान है, परंतु यह विशाल नेत्रोंवाली युवती कल्याणमयी लक्ष्मीके समान जान पड़ती है।' धाय उन सब लोगोंको हटाकर उसे उत्तम राजमहलकी अट्टालिकापर चढ़ा ले आयी। राजन्! तत्पश्चात् विस्मित होकर राजमाताने दमयन्तीसे पूछा --'अहो! तुम इस प्रकार दुःखसे दबी होनेपर भी इतना सुन्दर रूप कैसे धारण करती हो? ॥ 51-52॥ | "'Her attire is like that of a madwoman, but this young woman with large eyes appears like the auspicious Lakshmi.' The nursemaid, removing all those people, brought her up to the terrace of the excellent royal palace. O King, then, astonished, the queen mother asked Damayanti, 'Oh, how do you possess such beauty even while being burdened with sorrow?'" (51-53) |
| भासि विद्युदिवाभ्रेषु शंस मे कासि कस्य वा
। न हि ते मानुषं रूपं भूषणैरपि वर्जितम् ॥53॥ असहाया नरेभ्यश्च नोद्धिजस्यमरप्रभे । |
'मेघमालामें प्रकाशित होनेवाली बिजलीकी भाँति तुम इस दुःखमें भी कैसी तेजस्विनी दिखायी देती हो। मुझसे बताओ, तुम कौन हो? किसकी स्त्री हो? यद्यपि तुम्हारे शरीरपर कोई आभूषण नहीं है तो भी तुम्हारा यह रूप मानव-जगत्का नहीं जान पड़ता। देवताकी- सी दिव्य कान्ति धारण करनेवाली वत्से! तुम असहाय-अवस्थामें होकर भी लोगोंसे डरती क्यों नहीं हो?” ॥ | "'Like lightning shining in a cloud, how do you appear so radiant even in this sorrow? Tell me, who are you? Whose wife are you? Although you wear no ornaments, your appearance does not seem human. O child, possessing a divine radiance like a goddess, why are you not afraid of people even in this helpless state?'" (53) |
| तच्छुत्वा वचनं तस्या भैमी वचनमव्रवीत् ॥54॥ | उसकी वह बात सुनकर भीमकुमारीने कहा-- ॥54॥ | "Hearing her words, the daughter of Bhima said..." (54) |
| मानुषीं मां विजानीहि भतरिं समनुव्रताम् । सैरन्भ्रीजातिसम्पन्नां भुजिष्यां कामवासिनीम् ॥55॥ |
“माताजी! आप मुझे मानव-कन्या ही समझिये। मैं अपने पतिके चरणोंमें अनुराग रखनेवाली एक नारी हूँ। मेरी अन्तःपुरमें काम करनेवाली सैरन्ध्री जाति है। मैं सेविका हूँ और जहाँ इच्छा होती है, वहीं रहती हूँ ॥ | "'Mother, consider me a human girl. I am a woman devoted to my husband's feet. My caste is that of a Sairandhri, who works in the inner chambers. I am a maidservant and live wherever I wish.'" (55) |
| फलमूलाशनामेकां यत्रसायंप्रतिश्रयाम् । असंख्येयगुणो भर्ता मां च नित्यमनुव्रतः ॥56॥ |
“मैं अकेली हूँ, फल-मूल खाकर जीवन-निर्वाह करती हूँ और जहाँ साँझ होती है, वहीं टिक जाती हूँ। मेरे स्वामीमें असंख्य गुण हैं, उनका मेरे प्रति सदा अत्यन्त अनुराग है ॥56॥ | "'I am alone, I sustain myself by eating fruits and roots, and I stay wherever evening falls. My husband has countless virtues, and he always has great affection for me.'" (56) |
| भक्ताहमपि तं वीरं छायेवानुगता पथि । तस्य दैवात् प्रसङ्गोऽभूदतिमात्रं सुदेवने ॥57॥ |
"जैसे छाया राह चलनेवाले पथिकके पीछे-पीछे चलती है, उसी प्रकार मैं भी अपने वीर पतिदेवमें भक्तिभाव रखकर सदा उन्हीका अनुसरण करती हूँ। दुर्भाग्यवश एक दिन मेरे पतिदेव जूआ खेलनेमे अत्यन्त आसक्त हो गये ॥57॥ | "'Just as a shadow follows a traveler on the road, similarly, I always follow my heroic husband with devotion. Unfortunately, one day, my husband became extremely addicted to gambling.'" (57) |
| द्यूते स निर्जितश्चैव वनमेक उपेयिवान्
। तमेकवसनं वीरमुन्मत्तमिव विह्वलम् ॥58॥ आश्वासयन्ती भर्तारमहमप्यगमं वनम् । स कदाचिद् वने वीरः कस्मिंश्चित् कारणान्तरे ॥59॥ |
'और उसीमें अपना सब कुछ हारकर वे अकेले ही वनकी ओर चल दिये। एक वस्त्र धारण किये उन्मत्त और विह्वल हुए अपने वीर स्वामीको सान्त्वना देती हुई मैं भी उनके साथ वनमें चली आयी। एक दिनकी बात है, मेरे वीर स्वामी किसी कारणवश वनमें गये ॥ 58-59॥ | "'And losing everything in it, he went alone towards the forest. I also followed him into the forest, consoling my heroic husband, who was wearing only one garment, distraught and insane. One day, my heroic husband went into the forest for some reason.'" (58-59) |
| क्षुत्परीतस्तु विमनास्तदप्येकं व्यसर्जयत्
। तमेकवसना नग्नमुन्मत्तवदचेतसम् ॥60॥ अनुव्रजन्ती बहुला न स्वपामि निशास्तदा । ततो बहुतिथे काले सुप्तामुत्सृज्य मां क्वचित् ॥61॥ वाससोऽर्धं परिच्छिद्य त्यक्तवान् मामनागसम् । तं मार्गमाणा भर्तरि दह्यामाना दिवानिशम् ॥62॥ |
'उस समय वे भूखसे पीड़ित और अनमने हो रहे थे। अतः उन्होंने अपने उस एक वस्त्रको भी कहीं वनमें ही छोड़ दिया। मेरे शरीरपर भी एक ही वस्त्र था। वे नग्न, उन्मत्त- जैसे और अचेत हो रहे थे। उसी दशामें सदा उनका अनुसरण करती हुई अनेक रात्रियोंतक कभी सो न सकी। तदनन्तर बहुत समयके पश्चात् एक दिन जब मैं सो गयी थी, उन्होने मेरी आधी साड़ी फाड़ ली और मुझ निरपराधिनी पत्नीको वहीं छोड़कर वे कहीं चल दिये। मैं दिन-रात वियोगाग्निमें जलती हुई निरन्तर उन्हीं पतिदेवको ढूँढ़ती फिरती हूँ ॥ 60-62॥ | "'At that time, he was suffering from hunger and was disheartened. Therefore, he left even that one garment somewhere in the forest. I also had only one garment on my body. He was naked, like a madman, and unconscious. Always following him in that condition, I could not sleep for many nights. Then, after a long time, one day, when I was asleep, he tore half of my saree and left me, his innocent wife, there and went somewhere. Day and night, burning in the fire of separation, I constantly search for that same husband.'" (60-62) |
| साहं कमलगर्भाभमपश्यन्ती हृदि प्रियम् । न विन्दाम्यमरप्रख्यं प्रियं प्राणेश्वरं प्रभुम् ॥63॥ |
“मेरे प्रियतमकी कान्ति कमलके भीतरी भागके समान है। वे देवताओंके समान तेजस्वी, मेरे प्राणोके स्वामी और शक्तिशाली हैं। बहुत खोजनेपर भी मैं अपने प्रियको न तो देख सकी हूँ और न उनका पता ही पा रही हूँ ॥63॥ | "'My beloved's complexion is like the inner part of a lotus. He is radiant like the gods, the lord of my life, and powerful. Despite searching a lot, I have neither seen my beloved nor found any trace of him.'" (63) |
| तामश्नुपरिपूर्णाक्षीं विलपन्तीं तथा बहु
। राजमाताब्रवीदार्ता भैमीमार्तस्वरां स्वयम् ॥64॥ वसस्व मयि कल्याणि प्रीतिर्मे परमा त्वयि । मृगयिष्यन्ति ते भद्रे भर्तारं पुरुषा मम ॥65॥ |
भीमकुमारी दमयन्तीके नेत्रोंमें आँसू भरे हुए थे एवं वह आर्तस्वरसे बहुत विलाप कर रही थी। राजमाता स्वयं भी उसके दुःखसे दुःखी हो बोली-'कल्याणि! तुम मेरे पास रहो। तुमपर मेरा बहुत प्रेम है। भद्रे! मेरे सेवक तुम्हारे पतिकी खोज करेंगे ॥ 64-65॥ | "Damayanti, the daughter of Bhima, had tears in her eyes and was lamenting in a sorrowful voice. The queen mother, herself saddened by her grief, said, 'O auspicious one, stay with me. I have great affection for you. O blessed one, my servants will search for your husband.'" (64-65) |
| अपि वा स्वयमागच्छेत् परिधावन्नितस्ततः । इहैव वसती भद्रे भर्तारमुपलप्स्यसे ॥66॥ |
'अथवा यह भी सम्भव है, वे इधर-उधर भटकते हुए स्वयं ही इधर आ निकलें। भद्रे! तुम यहीं रहकर अपने पतिको प्राप्त कर लोगी' ॥66॥ | "'Or it is also possible that he may wander here and there and come here himself. O blessed one, stay here and you will find your husband.'" (66) |
| राजमातुर्वचः श्रुत्वा दमयन्ती वचोऽब्रवीत् । समयेनोत्सहे वस्तुं त्वयि वीरप्रजायिनि ॥67॥ |
राजमाताकी यह बात सुनकर दमयन्तीने कहा-'वीरमातः! मैं एक नियमके साथ आपके यहाँ रह सकती हूँ ॥67॥ | "Hearing the queen mother's words, Damayanti said, 'O mother of heroes, I can stay with you under one condition.'" (67) |
| उच्छिष्टं नैव भुञ्जीयां न कुर्या पादधावनम् । न चाहं पुरुषानन्यान् प्रभाषेयं कथंचन ॥68॥ |
“मैं किसीका जूठा नहीं खाऊँगी, किसीके पैर नहीं धोऊँगी और किसी भी दूसरे पुरुषसे किसी तरह भी वार्तालाप नहीं करूंगी ॥68॥ | "'I will not eat food left by others, I will not wash anyone's feet, and I will not converse with any other man in any way.'" (68) |
| प्रार्थयेद् यदि मां कश्चिद् दण्ड्यस्ते स पुमान् भवेत् । वध्यश्च तेऽसकृन्मन्द इति मे व्रतमाहितम् ॥69॥ |
'यदि कोई पुरुष मुझे प्राप्त करना चाहे तो वह आपके द्वारा दण्डनीय हो और बार-बार ऐसे अपराध करनेवाले मूढ़को आप प्राणदण्ड भी दें, यही मेरा निश्चित व्रत है ॥69॥ | "'If any man tries to approach me, he should be punished by you, and you should even give the death penalty to a fool who repeatedly commits such offenses, this is my firm vow.'" (69) |
| भर्तुरन्वेषणार्थ तु पश्येयं ब्राह्मणानहम् । यद्येवमिह वत्स्यामि त्वत्सकाशे न संशयः ॥70॥ |
“मै अपने पतिकी खोजके लिये केवल ब्राह्मणोंसे मिल सकती हूँ। यदि यहाँ ऐसी व्यवस्था हो सके तो निश्चय ही आपके निकट निवास करूगी। इसमें संशय नहीं है ॥ | "'I can only meet with Brahmins to search for my husband. If such an arrangement can be made here, then I will definitely stay with you, there is no doubt about it.'" (70) |
| अतोऽन्यथा न मे वासो वर्तते हृदये क्वचित् । तां प्रहृष्टेन मनसा राजमातेदमब्रवीत् ॥71॥ |
“यदि इसके विपरीत कोई बात हो तो कहीं भी रहनेका मेरे मनमें संकल्प नहीं हो सकता।' यह सुनकर राजमाता प्रसन्नचित्त होकर उससे बोली ॥71॥ | "'If there is anything contrary to this, then I cannot resolve to stay anywhere.' Hearing this, the queen mother, pleased, said to her..." (71) |
| सर्वमेतत् करिष्यामि दिष्ट्या ते व्रतमीदृशम्
। एवमुक्त्वा ततो भैमीं राजमाता विशाम्पते ॥72॥ उवाचेदं दुहितरं सुनन्दां नाम भारत । सैरन्ध्रीमभिजानीष्व सुनन्दे देवरूपिणीम् ॥73॥ |
“बेटी! मैं यह सब करूगी। सौभाग्यकी बात है कि तुम्हारा व्रत ऐसा उत्तम है।' राजा युधिष्ठिर! दमयन्तीसे ऐसा कहकर राजमाता अपनी पुत्री सुनन्दासे बोली-'सुनन्दे! इस सैरन्ध्रीको तुम देवीस्वरूपा समझो ॥ 72-73॥ | "'Daughter, I will do all this. It is fortunate that your vow is so noble.' O King Yudhishthira, having said this to Damayanti, the queen mother said to her daughter Sunanda, 'Sunanda, consider this Sairandhri as a goddess.'" (72-73) |
| वयसा तुल्यतां प्राप्ता सखी तव भवत्वियम् । एतया सह मोदस्व निरुद्विग्नमनाः सदा ॥74॥ |
"यह अवस्थामें तुम्हारे समान है, अतः तुम्हारी सखी होकर रहे। तुम इसके साथ सदा प्रसन्रचित्त एवं आनन्दमग्न रहो” ॥74॥ | "'She is similar to you in age, so let her be your friend. Always be cheerful and joyful with her.'" (74) |
| ततः परमसंहृष्टा सुनन्दा गृहमागमत् । दमयन्तीमुपादाय सखीभिः परिवारिता ॥75॥ |
तब सखियोंसे घिरी हुई सुनन्दा अत्यन्त हर्षोल्लासमें भरकर दमयन्तीको साथ ले अपने भवनमें आयी ॥75॥ | "Then, Sunanda, surrounded by her friends, filled with great joy and enthusiasm, took Damayanti with her and came to her own chambers." (75) |
| स तत्र पूज्यमाना वै दमयन्ती व्यनन्दत । सर्वकामैः सुविहितैर्निरुद्वेगावसत् तदा ॥76॥ |
सुनन्दा दमयन्तीके इच्छानुसार सब प्रकारकी व्यवस्था करके उसे बड़े आदर-सत्कारके साथ रखने लगी। इससे दमयन्तीको बड़ी प्रसन्नता हुई और वह वहाँ उद्वेगरहित हो रहने लगी ॥76॥ | "Sunanda made all the arrangements according to Damayanti's wishes and kept her with great respect and honor. This pleased Damayanti greatly, and she stayed there without any anxiety." (76) |
| इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि नलोपाख्यानपर्वणि दमयन्तीचेदिराजगृहवासे पञ्चषष्टितमोऽध्यायः ॥65॥ | इस प्रकार श्रीमह्ञा भारत वनपर्वके अन्तर्गत नलोपाख्यानपर्वमें दमयन्तीका चेदिराजके भवनमें निवासविषयक पैंसठवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥65॥ | "Thus ends the sixty-fifth chapter in the Nalopakhyana Parva of the Vana Parva in the Sri Mahabharata, describing Damayanti's stay at the palace of the Chedi king." (65) |
| षट्षष्टितमोऽध्यायः | छाछठवाँ अध्याय | **Chapter Sixty-Sixth: |
| राजा नलके द्वारा दावानलसे कर्कोटक नागकी रक्षा तथा नागद्धारा नलको आश्वासन | राजा नलके द्वारा दावानलसे कर्कोटक नागकी रक्षा तथा नागद्धारा नलको आश्वासन | King Nala Saves Karkoṭaka the Naga from the Forest Fire and the Naga's Reassurance to Nala** |
| बृहदश्च उवाच उत्सृज्य दमयन्तीं तु नलो राजा विशाम्पते । ददर्श दावं दह्यन्तं, महान्तं गहने वने ॥1॥ |
बृहदश्च मुनि कहते है--युधिष्ठिर! दमयन्तीको छोड़कर जब राजा नल आगे बढ़ गये, तब एक गहन वनमें उन्होंने महान् दावानल प्रज्वलित होते देखा ॥1॥ | Sage Brihadasva narrates: "O Yudhishthira! When King Nala proceeded further, leaving Damayanti behind, he saw a great forest fire blazing in a dense forest." (1) |
| तत्र शुश्राव शब्दं वै मध्ये भूतस्य कस्यचित्
। अभिधाव नलेत्युच्चैः पुण्यश्लोकेति चासकृत् ॥2॥ मा भैरिति नलश्चोक्त्वा मध्यमग्नेः प्रविश्य तम् । ददर्श नागराजानं शयानं कुण्डलीकृतम् ॥3॥ |
उसीके बीचमें उन्हें किसी प्राणीका यह शब्द सुनायी पड़ा--'पुण्यश्लोक महाराज नल! दौड़िये, मुझे बचाइये।' उच्च स्वरसे बार-बार दुहरायी गयी इस वाणीको सुनकर राजा नलने कहा- “डरो मत'। इतना कहकर वे आगके भीतर घुस गये। वहाँ उन्होंने देखा, एक नागराज कुण्डलाकार पड़ा हुआ सो रहा है ॥ 2-3॥ | "In the midst of it, he heard a voice saying, 'O virtuous King Nala! Run and save me!' Hearing this voice, repeated in a loud tone, King Nala said, 'Fear not!' Saying this, he entered the fire. There he saw a Naga king lying curled up, asleep." (2-3) |
| स नागः प्राञ्जलिर्भूत्वा वेपमानो नलं तदा
। उवाच मां विद्धि राजन् नागं कर्कोटकं नृप ॥4॥ मया प्रलब्धो ब्रह्मर्षिर्नारदः सुमहातपाः । तेन मन्युपरीतेन शप्तोऽस्मि मनुजाधिप ॥5॥ तिष्ठ त्वं स्थावर इव यावदेव नलः क्वचित् । इतो नेता हि तत्र त्वं शापान्मोक्ष्यसि मत्कृतात् ॥6॥ |
उस नागने हाथ जोड़कर कॉपते हुए नलसे उस समय इस प्रकार कहा--'राजन्! मुझे कर्कोटक नाग समझिये। नरेश्वर! एक दिन मेरे द्वारा महातपस्वी ब्रह्मर्षि नारद ठगे गये, अतः मनुजेश्वर! उन्होंने क्रोधसे आविष्ट होकर मुझे शाप दे दिया--“तुम स्थावर वृक्षकी भाँति एक जगह पड़े रहो, जब कभी राजा नल आकर तुम्हें यहाँसे अन्यत्र ले जायेंगे, तभी तुम मेरे शापसे छुटकारा पा सकोगे' ॥ | "With folded hands and trembling, the Naga said to Nala, 'O King! Know me as Karkoṭaka Naga. O lord of men! One day, I deceived the great ascetic, the Brahmarishi Narada. Therefore, O lord of men, enraged, he cursed me, "Lie motionless like a tree in one place. Only when King Nala comes and takes you from here to another place will you be freed from my curse."'" (4-6) |
| तस्य शापान्न शक्तोऽस्मि पदाद् विचलितुं पदम् । उपदेक्ष्यामि ते श्रेयस्त्रातुमर्हति मां भवान् ॥7॥ |
"राजन्! नारदजीके उस शापसे मै एक पग भी चल नहीं सकता; आप मुझे बचाइये, मैं आपको कल्याणकारी उपदेश दूँगा ॥7॥ | "'O King! Due to that curse of Narada, I cannot move even a step. Please save me, and I will give you beneficial advice.'" (7) |
| सखा च ते भविष्यामि मत्समो नास्ति पन्नगः । लघुश्च ते भविष्यामि शीघ्रमादाय गच्छ माम् ॥8॥ |
'साथ ही मैं आपका मित्र हो जाऊँगा। सपॉमें मेरे-जेसा प्रभावशाली दूसरा कोई नहीं है। मैं आपके लिये हलका हो जाऊँगा। आप शीघ्र मुझे लेकर यहाँसे चल दीजिये” ॥8॥ | "'I will also become your friend. There is no other serpent as powerful as me. I will become light for you. Quickly take me and leave this place.'" (8) |
| एवमुक्त्वा स नागेन्द्रो बभूवाङ्गुष्ठमात्रकः । तं गृहीत्वा नलः प्रायाद् देशं दावविवर्जितम् ॥9॥ |
इतना कहकर नागराज कर्कोटक अँगूठेके बराबर हो गया। उसे लेकर राजा नल वनके उस प्रदेशकी ओर चले गये, जहाँ दावानल नहीं था ॥9॥ | "Saying this, Karkoṭaka Naga became as small as a thumb. Taking him, King Nala went towards that part of the forest where there was no wildfire." (9) |
| आकाशदेशमासाद्य विमुक्तं कृष्णवर्त्मना । उत्स्रष्टुकामं तं नागः पुनः कर्कोटकोऽब्रवीत् ॥10॥ |
अग्निके प्रभावसे रहित आकाश-देशमें पहुँचनेपर जब नलने उस नागको छोड़नेका विचार किया, उस समय कर्कोटकने फिर कहा-- ॥10॥ | "Reaching a place in the sky, free from the influence of fire, when Nala thought of releasing the Naga, Karkoṭaka said again..." (10) |
| पदानि गणयन् गच्छ स्वानि नैषध कानिचित् । तत्र तेऽहं महाबाहो श्रेयो धास्यामि यत् परम् ॥11॥ |
'नैषध! आप अपने कुछ पग गिनते हुए चलिये। महाबाहो! ऐसा करनेपर मैं आपके लिये परम कल्याणका साधन करूँगा” ॥11॥ | "'O Nala! Walk counting some of your steps. O mighty-armed one! By doing so, I will become a source of great benefit for you.'" (11) |
| ततः संख्यातुमारब्धमदशद् दशमे पदे । तस्य दष्टस्य तद् रूपं क्षिप्रमन्तरधीयत ॥12॥ |
तब राजा नलने अपने पग गिनने आरम्भ किये। पग गिनते-गिनते जब राजा नलने 'दश' कहा, तब नागने उन्हें डंस लिया। उसके डँसते ही उनका पहला रूप तत्काल अन्तर्हित (होकर श्यामवर्ण) हो गया ॥12॥ | "Then King Nala started counting his steps. While counting, when King Nala said 'ten,' the Naga bit him. As soon as he was bitten, his previous form instantly disappeared (and became dark-complexioned)." (12) |
| स दृष्ट्वा विस्मितस्तस्थावात्मानं विकृतं नलः । स्वरूपधारिणं नागं ददर्श स महीपतिः ॥13॥ |
अपने रूपको इस प्रकार विकृत (गौरवर्णसे श्यामवर्ण) हुआ देख राजा नलको बड़ा विस्मय हुआ। उन्होने अपने पूर्वस्वरूपको धारण करके खड़े हुए कर्कोटक नागको देखा ॥13॥ | "Seeing his form thus transformed (from fair to dark), King Nala was greatly astonished. He saw Karkoṭaka Naga standing there, having assumed his original form." (13) |
| ततः कर्कोटको नागः सान्त्वयन् नलमब्रवीत् । मया तेऽन्तर्हितं रूपं न त्वां विद्युर्जना इति ॥14॥ |
तब कर्कोटक नागने राजा नलको सान्त्वना देते हुए कहा--'राजन्! मैंने आपके पहले रूपको इसलिये अदृश्य कर दिया है कि लोग आपको पहचान न सकें ॥14॥ | "Then Karkoṭaka Naga consoled King Nala, saying, 'O King! I have made your previous form invisible so that people cannot recognize you.'" (14) |
| यत्कृते चासि निकृतो दुःखेन महता नल । विषेण स मदीयेन त्वयि दुःखं निवत्स्यति ॥15॥ |
"महाराज नल! जिस कलियुगके कपटसे आपको महान् दुःखका सामना करना पड़ा | "'O King Nala! You have faced great sorrow due to the deceit of Kaliyuga (the age of vice)...'" (15) |
| विषेण संवृतैगत्रियावत् त्वां न विमोक्ष्यति । तावत् त्वयि महाराज दुःखं वै स निवत्स्यति ॥16॥ |
'कलियुगके सारे अंग मेरे विषसे व्याप्त हो जायँगे। महाराज! वह जबतक आपको छोड़ नहीं देगा, तबतक आपके भीतर बड़े दुःखसे निवास करेगा ॥16॥ | "'All the limbs of Kaliyuga will be affected by my venom. O King! Until he leaves you, he will reside within you, causing great sorrow.'" (16) |
| अनागा येन निकृतस्त्वमनर्हो जनाधिप । क्रोधादसूययित्वा तं रक्षा मे भवतः कृता ॥17॥ |
"नरेश्वर! आप छल-कपटद्घारा सताये जानेयोग्य नहीं थे, तो भी जिसने बिना किसी अपराधके आपके साथ कपटका व्यवहार किया है, उसीके प्रति क्रोधसे दोषदृष्टि रखकर मैंने आपकी रक्षा की है ॥17॥ | "'O lord of men! You were not deserving of being tormented by deceit, yet I have protected you out of anger towards the one who has acted deceitfully with you without any fault, with a critical eye towards his wrongdoing.'" (17) |
| न ते भयं नरव्याघ्र दंष्ट्रिभ्यः श्रुतोऽपि वा । ब्रह्मविद्धयश्च भविता मत्प्रसादान्नराधिप ॥18॥ |
'नरव्याघ्र महाराज! मेरे प्रसादसे आपको दाढ़ोंवाले जन्तुओं और शत्रुओंसे तथा वेदवेत्ताओंके शाप आदिसे भी कभी भय नहीं होगा ॥18॥ | "'O tiger among men! By my grace, you will never fear animals with fangs, enemies, or curses from those who know the Vedas.'" (18) |
| राजन् विषनिमित्ता च न ते पीडा भविष्यति । संग्रामेषु च राजेन्द्र शश्चज्जयमवाप्स्यसि ॥19॥ |
'राजन्! आपको विषजनित पीड़ा कभी नहीं होगी। राजेन्द्र! आप युद्धमें भी सदा विजय प्राप्त करेंगे ॥19॥ | "'O King! You will never suffer from the effects of poison. O lord of kings! You will always be victorious in battle.'" (19) |
| गच्छ राजन्नितः सूतो बाहुकोऽहमिति ब्रुवन् । समीपमृतुपर्णस्य स हि चैवाक्षनैपुणः ॥20॥ |
'राजन्! अब आप यहाँसे अपनेको बाहुक नामक सूत बताते हुए राजा ऋतुपर्णके समीप जाइये। वे झूतविद्यामें बड़े निपुण हैं ॥20॥ | "'O King! Now, introducing yourself as the charioteer Vahuka, go to King Ṛtuparṇa. He is very skilled in the science of dice.'" (20) |
| अयोध्यां नगरीं रम्यामद्य वै निषधेश्वर
। स तेऽक्षहृदयं दाता राजाश्वहृदयेन वै ॥21॥ इक्ष्वाकुकुलजः श्रीमान् मित्रं चैव भविष्यति । भविष्यसि यदाक्षज्ञः श्रेयसा योक्ष्यसे तदा ॥22॥ |
"निषधेश्वर! आप आज ही रमणीय अयोध्यापुरीको चले जाइये। इक्ष्वाकुकुलमें उत्पन्न श्रीमान् राजा ऋतुपर्ण आपसे अश्वविद्याका रहस्य सीखकर बदलेमें आपको द्यूतक्रीडाका रहस्य बतलायेंगे और आपके मित्र भी हो जायेंगे। जब आप ह्यूतविद्याके ज्ञाता होंगे, तब पुनः कल्याणभागी हो जायेगे ॥ 21-22॥ | "'O lord of Nishadha! Go to the beautiful city of Ayodhya today itself. The illustrious King Ṛtuparṇa, born in the Ikshvaku lineage, will learn the secrets of horsemanship from you and in return, will teach you the secrets of dice and become your friend. When you become knowledgeable in the science of dice, you will again become fortunate.'" (21-22) |
| सममेष्यसि दारैस्त्वं मा स्म शोके मनः कृथाः । राज्येन तनयाभ्यां च सत्यमेतद् ब्रवीमि ते ॥23॥ |
“मैं सच कहता हूँ, आप एक ही साथ अपनी पत्नी, दोनों संतानों तथा राज्यको प्राप्त कर लेंगे; अतः अपने मनमें चिन्ता न कीजिये ॥23॥ | "'I speak the truth, you will regain your wife, both your children, and your kingdom all at once, so do not worry.'" (23) |
| स्वं रूपं च यदा द्रष्टुमिच्छेथास्त्वं नराधिप । संस्मर्तव्यस्तदा तेऽहं वासश्चेदं निवासयेः ॥24॥ |
'नरेश्वर! जब आप अपने (पहलेवाले) रूपको देखना चाहें, उस समय मेरा स्मरण करें और इस कपड़ेको ओढ़ लें ॥24॥ | "'O lord of men! When you wish to see your (previous) form, remember me and wear this cloth.'" (24) |
| अनेन वाससाच्छन्नः स्वं रूपं प्रतिपत्स्यसे । इत्युक्त्वा प्रददौ तस्मै दिव्यं वासोयुगं तदा ॥25॥ |
“इस वस्त्रसे आच्छादित होते ही आप अपना पहला रूप प्राप्त कर लेंगे।' ऐसा कहकर नागने उन्हें दो दिव्य वस्त्र प्रदान किये ॥25॥ | "'As soon as you are covered with this garment, you will regain your original form.' Saying so, the Naga gave him two divine garments." (25) |
| एवं नलं च संदिश्य वासो दत्त्वा च कौरव । नागराजस्ततो राजंस्तत्रैवान्तरधीयत ॥26॥ |
कुरुनन्दन युधिष्ठिर! इस प्रकार राजा नलको संदेश और वस्त्र देकर नागराज कर्कोटक वहीं अन्तर्धान हो गया ॥ 26 ॥ | "O descendant of Kuru, Yudhishthira! Thus, giving this message and the garments to King Nala, Karkoṭaka Naga disappeared right there." (26) |
| इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि नलोपाख्यानपर्वणि नलकर्कोटकसंवादे षट्षष्टितमोऽध्यायः ॥66॥ | इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत नलोपाख्यानपर्वमें नलककॉटकसंवादविषयक छाछठवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥66॥ | "Thus ends the sixty-sixth chapter in the Nalopakhyana Parva of the Vana Parva in the Sri Mahabharata, describing the conversation between Nala and Karkoṭaka." (66) |
| सप्तषष्टितमोध्याय: | सड़सठवाँ अध्याय | **Chapter Sixty-Seventh: |
| राजा नलका ऋतुपर्णके यहाँ अश्वाध्यक्षके पदपर नियुक्त होना और वहाँ दमयन्तीके लिये निरन्तर चिन्तित रहना तथा उनकी जीवलसे बातचीत | राजा नलका ऋतुपर्णके यहाँ अश्वाध्यक्षके पदपर नियुक्त होना और वहाँ दमयन्तीके लिये निरन्तर चिन्तित रहना तथा उनकी जीवलसे बातचीत | King Nala's Appointment as Chief Horseman under Ṛtuparṇa and His Constant Worry for Damayanti; His Conversation with Jīvala** |
| बृहदश्च उवाच तस्मिन्नन्तर्हिते नागे प्रययौ नैषधो नलः । ऋतुपर्णस्य नगरं प्राविशद् दशमेऽहनि ॥1॥ |
बृहदश्च मुनि कहते हैं--कर्कोटक नागके अन्तर्धान हो जानेपर निषधनरेश नलने दसवें दिन राजा ऋतुपर्णके नगरमें प्रवेश किया ॥1॥ | Sage Brihadasva continues: "After Karkoṭaka Naga disappeared, on the tenth day, the King of Nishadha, Nala, entered the city of King Ṛtuparṇa." (1) |
| स राजानमुपातिष्ठद् बाहुकोऽहमिति ब्रुवन् । अश्वानां वाहने युक्तः पृथिव्यां नास्ति मत्समः ॥2॥ |
वे बाहुक नामसे अपना परिचय देते हुए राजा ऋतुपर्णके यहाँ उपस्थित हुए और बोले --'घोड़ोंको हाँकनेकी कलामें इस पृथ्वीपर मेरे समान दूसरा कोई नहीं है ॥2॥ | "Introducing himself as Vahuka, he appeared before King Ṛtuparṇa and said, 'There is no one equal to me on this earth in the art of driving horses.'" (2) |
| अर्थकृच्छ्रेषु चैवाहं प्रष्टव्यो नैपुणेषु च । अन्नसंस्कारमपि च जानाम्यन्यैर्विशेषतः ॥3॥ |
“मै इन दिनों अर्थसंकटमें हूँ। आपको किसी भी कलाकी निपुणताके विषयमे सलाह लेनी हो तो मुझसे पूछ सकते हैं। अन्न-संस्कार (भाँतिं-भाँतिकी रसोई बनानेका कार्य) भी मैं दूसरोंकी अपेक्षा विशेष जानता हूँ ॥3॥ | "'I am currently facing financial difficulties. If you need advice on any skill, you can ask me. I also know the art of cooking (preparing various kinds of dishes) better than others.'" (3) |
| यानि शिल्पानि लोकेऽस्मिन् यच्चैवान्यत् सुदुष्करम् । सर्व यतिष्ये तत् कर्तुमृतुपर्ण भरस्व माम् ॥4॥ |
“इस जगत्में जितनी भी शिल्पकलाएँ हैं तथा दूसरे भी जो अत्यन्त कठिन कार्य हैं, मैं उन सबको अच्छी तरह करनेका प्रयत्न कर सकता हूँ। महाराज ऋतुपर्ण! आप मेरा भरण- पोषण कीजिये” ॥4॥ | "'I can skillfully perform all the crafts in this world and other extremely difficult tasks. O King Ṛtuparṇa! Please provide me with shelter and sustenance.'" (4) |
| ऋतुपर्ण उवाच वस बाहुक भद्रं ते सर्वमेतत् करिष्यसि । शीघ्रयाने सदा बुद्धिर्ध्रियते मे विशेषतः ॥5॥ |
ऋतुपर्णने कहा--बाहुक! तुम्हारा भला हो। तुम मेरे यहाँ निवास करो। ये सब कार्य तुम्हें करने होंगे। मेरे मनमें सदा यही विचार विशेषतः रहता है कि मैं शीघ्रतापूर्वक कहीं भी पहुँच सकूँ ॥5॥ | "Ṛtuparṇa said, 'Vahuka! May you prosper. Stay with me. You will have to perform all these tasks. I always have this thought in my mind that I should be able to reach anywhere quickly.'" (5) |
| स त्वमातिष्ठ योगं तं येन शीघ्रा हया मम । भवेयुरश्वाध्यक्षोऽसि वेतनं ते शतं शतम् ॥6॥ |
अतः तुम ऐसा उपाय करो, जिससे मेरे घोड़े शीघ्रगामी हो जायँँ। आजसे तुम हमारे अश्चाध्यक्ष हो। दस हजार मुद्राएँ तुम्हारा वार्षिक वेतन है ॥6॥ | "'Therefore, find a way to make my horses swift. From today, you are our chief horseman. Ten thousand coins is your annual salary.'" (6) |
| त्वामुपस्थास्यतश्चैव नित्यं वार्ष्णेयजीवलौ । एताभ्यां रंस्यसे सार्ध वस वै मयि बाहुक ॥7॥ |
वार्ष्णेय और जीवल--ये दोनों सारथि तुम्हारी सेवामें रहेंगे। बाहुक! इन दोनोंके साथ तुम बड़े सुखसे रहोगे। तुम मेरे यहाँ रहो ॥7॥ | "'Vārṣṇeya and Jīvala - these two charioteers will be at your service. Vahuka! You will live very happily with these two. Stay with me.'" (7) |
| बृहदश्च उवाच एवमुक्तो नलस्तेन न्यवसत् तत्र पूजितः । ऋतुपर्णस्य नगरे सहवार्ष्णेयजीवलः ॥8॥ |
बृहदश्च मुनि कहते है-राजन्! राजाके ऐसा कहनेपर नल वार्ष्णेय और जीवलके साथ सम्मानपूर्वक ऋतुपर्णके नगरमें निवास करने लगे ॥8॥ | Sage Brihadasva says: "O King! When the king said so, Nala respectfully started living in Ṛtuparṇa's city with Vārṣṇeya and Jīvala." (8) |
| स वै तत्रावसद् राजा वैदर्भीमनुचिन्तयन् । सायं सायं सदा चेमं श्लोकमेकं जगाद ह ॥9॥ |
वे दमयन्तीका निरन्तर चिन्तन करते हुए वहाँ रहने लगे। वे प्रतिदिन सायंकाल इस एक श्लोकको पढ़ा करते थे ॥9॥ | "He stayed there, constantly thinking about Damayanti. Every day at dusk, he used to recite this verse..." (9) |
| क्व नु सा क्षुत्पिपासार्ता श्रान्ता शेते तपस्विनी । स्मरन्ती तस्य मन्दस्य कं वा साद्योपतिष्ठति ॥10॥ |
'भूख-प्याससे पीड़ित और थकी-माँदी वह तपस्विनी उस मन्दबुद्धि पुरुषका स्मरण करती हुई कहाँ सोती होगी तथा अब वह किसके समीप रहती होगी?” ॥10॥ | "'Where does that ascetic woman, afflicted with hunger, thirst, and fatigue, sleep, remembering that foolish man, and with whom does she reside now?'" (10) |
| एवं ब्रुवन्तं राजानं निशायां जीवलोऽब्रवीत् । कामेनां शोचसे नित्यं श्रोतुमिच्छामि बाहुक ॥11॥ |
एक दिन रात्रिके समय जब राजा इस प्रकार बोल रहे थे 'जीवलने पूछा-बाहुक! तुम प्रतिदिन किस स्त्रीके लिये शोक करते हो, मैं सुनना चाहता हूँ ॥11॥ | "One day, at night, when the king was speaking like this, Jīvala asked, 'Vahuka! I want to hear about the woman you grieve for every day.'" (11) |
| आयुष्मन् कस्य वा नारी यामेवमनुशोचसि
। तमुवाच नलो राजा मन्दप्रज्ञस्य कस्यचित् ॥12॥ आसीद् बहुमता नारी तस्यादृढतरं वचः । स वै केनचिदर्थेन तया मन्दो व्ययुज्यत ॥13॥ |
“आयुष्मन्! वह किसकी पत्नी है, जिसके लिये तुम इस प्रकार निरन्तर शोकमग्न रहते हो।' तब राजा नलने उससे कहा-'किसी अल्पबुद्धि पुरुषके एक स्त्री थी, जो उसके अत्यन्त आदरकी पात्र थी। किंतु उस पुरुषकी बात अत्यन्त दृढ़ नहीं थी। वह अपनी प्रतिज्ञासे फिसल गया। किसी विशेष प्रयोजनसे विवश होकर वह भाग्यहीन पुरुष अपनी पत्नीसे बिछुड़ गया ॥ 12-13॥ | "'O long-lived one! Whose wife is she, for whom you are constantly immersed in sorrow?' Then King Nala said to him, 'There was a woman belonging to a man of little intelligence, who was very dear to him. But that man's word was not very firm. He failed to keep his promise. Compelled by some special reason, that unfortunate man was separated from his wife.'" (12-13) |
| विप्रयुक्तः स मन्दात्मा भ्रमत्यसुखपीडितः । दह्यमानः स शोकेन दिवारात्रमतन्द्रितः ॥14॥ |
'पत्नीसे विलग होकर वह मन्दबुद्धि मानव दिन-रात शोकाग्निसे दग्ध एवं दुःखसे पीड़ित होकर आलस्यसे रहित हो इधर-उधर भटकता रहता है ॥14॥ | "'Separated from his wife, that foolish man wanders around day and night, consumed by the fire of sorrow, afflicted with grief, and restless.'" (14) |
| निशाकाले स्मरंस्तस्याः श्लोकमेकं स्म गायति
। स विभ्रमन् महीं सर्वा क्वचिदासाद्य किंचन ॥15॥ वसत्यनर्हस्तद् दुःखं भूय एवानुसंस्मरन् । |
'रातमें उसीका स्मरण करके वह एक श्लोकको गाया करता है। सारी पृथ्वीका चक्कर लगाकर वह कभी किसी स्थानमें पहुँचा और वहीं निरन्तर उस प्रियतमाका स्मरण करके दुःख भोगता रहता है। यद्यपि वह उस दुःखको भोगनेके योग्य है नहीं ॥15॥ | "'Remembering her at night, he sings a verse. Wandering all over the earth, he sometimes reaches a place and stays there, constantly remembering that beloved and suffering sorrow, even though he does not deserve to experience that sorrow.'" (15) |
| सा तु तं पुरुषं नारी कृच्छरेऽप्यनुगता वने ॥16॥ त्यक्ता तेनाल्पपुण्येन दुष्करं यदि जीवति । एका बालानभिज्ञा च मार्गाणामतथोचिता ॥17॥ |
'वह नारी इतनी पतिव्रता थी कि संकटकालमें भी उस पुरुषके पीछे-पीछे वनमें चली गयी; किंतु उस अल्प पुण्यवाले पुरुषने उसे वनमें ही त्याग दिया। अब तो यदि वह जीवित होगी तो बड़े कष्टसे उसके दिन बीतते होंगे। वह स्त्री अकेली थी। उसे मार्गका ज्ञान नहीं था। जिस संकटमें वह पड़ी थी, उसके योग्य वह कदापि नहीं थी ॥ 16-17॥ | "'That woman was so devoted to her husband that she followed him into the forest even in times of distress, but that man of little merit abandoned her in the forest. Now, if she is alive, her days must be passing with great difficulty. That woman was alone. She did not know the way. She was not at all deserving of the distress she was in.'" (16-17) |
| क्षुत्पिपासापरीताङ्गी दुष्करं यदि जीवति
। श्वापदाचरिते नित्यं वने महति दारुणे ॥18॥ त्यक्ता तेनाल्पभाग्येन मन्दप्रज्ञेन मारिष । इत्येवं नैषधो राजा दमयन्तीमनुस्मरन् ॥ अज्ञातवासं न्यवसद् राज्ञस्तस्य निवेशने ॥19॥ |
'भूख और प्याससे उसके अंग व्याप्त हो रहे थे। उस दशामें परित्यक्त होकर वह यदि जीवित भी हो तो भी उसका जीवित रहना बहुत कठिन है। आर्य जीवल! अत्यन्त भयंकर विशाल वनमें जहाँ नित्य-निरन्तर हिंसक जन्तु विचरते रहते हैं, उस मन्दबुद्धि एवं मन्दभाग्य पुरुषने उसका त्याग कर दिया था।' इस प्रकार निषधनरेश राजा नल दमयन्तीका निरन्तर स्मरण करते हुए राजा ऋतुपर्णके यहाँ अज्ञातवास कर रहे थे ॥ 18-19॥ | "'Her body was afflicted with hunger and thirst. Abandoned in that condition, even if she is alive, it is very difficult for her to survive. O noble Jīvala! That foolish and unfortunate man abandoned her in a vast and terrifying forest where predatory animals roam constantly.' Thus, King Nala of Nishadha, constantly remembering Damayanti, was living incognito at King Ṛtuparṇa's place." (18-19) |
| इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि नलोपाख्यानपर्वणि नलविलापे सप्तषष्टितमोऽध्यायः ॥67॥ | इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत नलोपाख्यानपर्वमें नलविलापविषयक सड़सठवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥67॥ | "Thus ends the sixty-seventh chapter in the Nalopakhyana Parva of the Vana Parva in the Sri Mahabharata, describing Nala's lament." (67) |
| अष्टषष्टितमोध्याय: | अरसठवाँ अध्याय | **Chapter Sixty-Eighth: |
| विदर्भराजका नल-दमयन्तीकी खोजके लिये ब्राह्मणोंको भेजना, सुदेव ब्राह्मणका चेदिराजके भवनमें जाकर मन- ही-मन दमयन्तीके गुणोंका चिन्तन और उससे भेंट करना | विदर्भराजका नल-दमयन्तीकी खोजके लिये ब्राह्मणोंको भेजना, सुदेव ब्राह्मणका चेदिराजके भवनमें जाकर मन- ही-मन दमयन्तीके गुणोंका चिन्तन और उससे भेंट करना | The King of Vidarbha Sends Brahmins to Search for Nala and Damayanti; The Brahmin Sudeva Arrives at the Chedi King's Palace, Contemplates Damayanti's Qualities, and Meets Her** |
| बृहदश्च उवाच हृतराज्ये नले भीमः सभार्ये च वनं गते । द्विजान् प्रस्थापयामास नलदर्शनकाङ्क्षया ॥1॥ |
बृहदश्च मुनि कहते है-राजन्! राज्यका अपहरण हो जानेपर जब राजा नल पत्नीसहित वनमें चले गये, तब विदर्भनरेश भीमने नलका पता लगानेके लिये बहुत-से ब्राह्मणोंको इधर-उधर भेजा ॥1॥ | Sage Brihadasva narrates: "O King! When King Nala went into the forest with his wife after losing his kingdom, the King of Vidarbha, Bhima, sent many Brahmins in all directions to find Nala." (1) |
| संदिदेश च तान् भीमो वसु दत्त्वा च पुष्कलम् । मृगयध्वं नलं चैव दमयन्तीं च मे सुताम् ॥2॥ |
राजा भीमने प्रचुर धन देकर ब्राह्मणोंको यह संदेश दिया-"आपलोग राजा नल और मेरी पुत्री दमयन्तीकी खोज करें ॥2॥ | "Giving abundant wealth to the Brahmins, King Bhima instructed them, 'Search for King Nala and my daughter Damayanti.'" (2) |
| अस्मिन् कर्मणि सम्पन्ने विज्ञाते निषधाधिपे । गवां सहसरं दास्यामि यो वस्तावानयिष्यति ॥3॥ |
'निषधनरेश नलका पता लग जानेपर जब यह कार्य सम्पन्न हो जायगा, तब मैं आपलोगोंमेंसे जो भी नल-दमयन्तीको यहाँ ले आयेगा, उसे एक हजार गौरं दूँगा ॥3॥ | "'When this task is accomplished and the King of Nishadha, Nala, is found, I will give a thousand cows to whoever among you brings Nala and Damayanti here.'" (3) |
| अग्रहारांश्च दास्यामि ग्रामं नगरसम्मितम्
। न चेच्छक्याविहानेतुं दमयन्ती नलोऽपि वा ॥4॥ ज्ञातमात्रेऽपि दास्यामि गवां दशशतं धनम् । |
'साथ ही जीविकाके लिये अग्रहार (करमुक्त भूमि) दूँगा और ऐसा गाँव दे दूँगा, जो आयमें नगरके समान होगा। यदि नल-दमयन्तीमेंसे किसी एकको या दोनोंको ही यहाँ ले आना सम्भव न हो सके तो केवल उनका पता लग जानेपर भी मैं एक हजार गोधन दान करूँगा” ॥4॥ | "'Along with that, I will give tax-free land for livelihood and a village that yields income like a city. If it is not possible to bring either one or both of them here, even if you only discover their whereabouts, I will still donate a thousand cows.'" (4) |
| इत्युक्तास्ते ययुर्हृष्टा ब्राह्मणाः सर्वतो दिशम् ॥5॥ पुरराष्ट्राणि चिन्वन्तो नैषधं सह भार्यया । नैव क्वापि प्रपश्यन्ति नलं वा भीमपुत्रिकाम् ॥6॥ ततश्चेदिपुरीं रम्यां सुदेवो नाम वै द्विजः । विचिन्वानोऽथ वैदर्भीमपश्यद् राजवेश्मनि ॥7॥ |
राजाके ऐसा कहनेपर वे सब ब्राह्मण बड़े प्रसन्न होकर सब दिशाओंमें चले गये और नगर तथा राष्ट्रोंमें पत्नीसहित निषधनरेश नलका अनुसंधान करने लगे; परंतु कहीं भी वे नल अथवा भीमकुमारी दमयन्तीको नहीं देख पाते थे। तदनन्तर सुदेव नामक ब्राह्मणने पता लगाते हुए रमणीय चेदिनगरीमें जाकर वहाँ राजमहलमें विदर्भकुमारी दमयन्तीको देखा ॥ 5-7॥ | "Hearing this from the king, all those Brahmins were very pleased and went in all directions, searching for the King of Nishadha, Nala, along with his wife, in cities and kingdoms. But they could not find Nala or Damayanti, the daughter of Bhima, anywhere. Then, a Brahmin named Sudeva, while searching, reached the beautiful city of the Chedis and saw Damayanti, the princess of Vidarbha, in the royal palace there." (5-7) |
| पुण्याहवाचने राज्ञः सुनन्दासहितां स्थिताम्
। मन्दं प्रख्यायमानेन रूपेणाप्रतिमेन ताम् ॥8॥ निबद्धां धूमजालेन प्रभामिव विभावसोः । तां समीक्ष्य विशालाक्षीमधिकं मलिनां कृशाम् । तर्कयामास भैमीति कारणैरुपपादयन् ॥9॥ |
वह राजाके पुण्याहवाचनके समय सुनन्दाके साथ खड़ी थी। उसका अनुपम रूप (मैलसे आवृत होनेके कारण) मन्द-मन्द प्रकाशित हो रहा था, मानो अग्निकी प्रभा धूमसमूहसे आवृत हो रही हो। विशाल नेत्रोंवाली उस राजकुमारीको अधिक मलिन और दुर्बल देख उपर्युक्त कारणोंसे उसकी पहचान करते हुए सुदेवने निश्चय किया कि यह भीमकुमारी दमयन्ती ही है ॥ 8-9॥ | "She was standing with Sunanda during the king's auspicious invocation ceremony. Her unparalleled beauty was dimly visible (due to being covered in dirt), like the glow of fire obscured by smoke. Seeing that princess with large eyes, more disheveled and weak, recognizing her from the aforementioned signs, Sudeva concluded that this was indeed Damayanti, the daughter of Bhima." (8-9) |
| सुदेव उवाच यथेयं मे पुरा दृष्टा तथारूपेयमङ्गना । कृतार्थोऽस्म्यद्य दृष्ट्वेमां लोककान्तामिव श्रियम् ॥10॥ |
सुदेव मन-ही-मन बोले--मैंने पहले जिस रूपमे इस कल्याणमयी राजकन्याको देखा है, वैसी ही यह आज भी है। लोककमनीय लक्ष्मीकी भाँति इस भीमकुमारीको देखकर आज मैं कृतार्थ हो गया हूँ ॥10॥ | "Sudeva thought to himself, 'This auspicious princess is still the same as when I saw her before. Seeing this daughter of Bhima, like the universally adored Lakshmi, I am fulfilled today.'" (10) |
| पूर्णचन्द्रनिभां श्यामां चारुवृत्तपयोधराम् । कुर्वन्तीं प्रभया देवीं सर्वा वितिमिरा दिशः ॥11॥ |
यह श्यामा युवती पूर्ण चन्द्रमाके समान कान्तिमती है। इसके स्तन बड़े मनोहर हैं। यह देवी अपनी प्रभासे सम्पूर्ण दिशाओंको आलोकित कर रही है ॥11॥ | "This dark-complexioned young woman is radiant like the full moon. Her breasts are very beautiful. This goddess illuminates all directions with her splendor." (11) |
| चारुपद्मविशालाक्षीं मन्मथस्य रतीमिव । इष्टों समस्तलोकस्य पूर्णचन्द्रप्रभामिव ॥12॥ |
उसके बड़े-बड़े नेत्र मनोहर कमलोंकी शोभाको लज्जित कर रहे हैं। यह कामदेवकी रति-सी जान पड़ती है। पूर्णिमाके चन्द्रमाकी चाँदनीके समान यह सब लोगोंके लिये प्रिय है ॥12॥ | "Her large, captivating eyes put the beauty of lotuses to shame. She appears like Rati, the consort of Kamadeva (the god of love). Like the moonlight of the full moon, she is dear to everyone." (12) |
| विदर्भसरसस्तस्माद् दैवदोषादिवोद्धताम्
। मलपङ्कानुलिप्ताङ्गीं मृणालीमिव चोद्धृताम् ॥13॥ पौर्णमासीमिव निशां राहुग्रस्तनिशाकराम् । पतिशोकाकुलां दीनां शुष्कस्त्रोतां नदीमिव ॥14॥ |
विदर्भरूपी सरोवरसे यह कमलिनी मानो प्रारब्धके दोषसे निकाल ली गयी है। इसके मलिन अंग कीचड़ लिपटी हुई नलिनीके समान प्रतीत होते हैं। यह उस पूर्णिमाकी रजनीके समान जान पड़ती है, जिसके चन्द्रमापर मानो राहुने ग्रहण लगा रखा हो। पति-शोकसे व्याकुल और दीन होनेके कारण यह सूखे जल-प्रवाहवाली सरिताके समान प्रतीत होती है ॥ 13-14॥ | "It is as if this lotus flower has been taken out of the lake of Vidarbha due to the fault of destiny. Her soiled limbs appear like a lotus covered in mud. She seems like the night of the full moon, as if Rahu (a celestial serpent) has eclipsed the moon. Distressed and miserable due to grief for her husband, she appears like a river with a dried-up stream." (13-14) |
| विध्वस्तपर्णकमलां वित्रासितविहंगमाम् । हस्तिहस्तपरामृष्टां व्याकुलामिव पद्मिनीम् ॥15॥ |
इसकी दशा उस पुष्करिणीके समान दिखायी देती है, जिसे हाथियोंने अपने शुण्डदण्डसे मथ डाला हो तथा जो नष्ट हुए पत्तोवाले कमलसे युक्त हो एवं जिसके भीतर निवास करनेवाले पक्षी अत्यन्त भयभीत हो रहे हों। यह दुःखसे अत्यन्त व्याकुल-सी प्रतीत हो रही है ॥15॥ | "Her condition appears like a pond that has been churned by elephants with their mighty trunks, filled with withered lotuses, and where the birds residing within are terrified. She seems extremely distraught with sorrow." (15) |
| सुकुमारीं सुजाताङ्गीं रत्नगर्भगृहोचिताम् । दह्यमानामिवार्केण मृणालीमिव चोद्धृताम् ॥16॥ |
मनोहर अंगोंवाली यह सुकुमारी राजकन्या उन महलोंमें रहनेयोग्य है, जिनका भीतरी भाग रत्नोंका बना हुआ है। (इस समय दुःखने इसे ऐसा दुर्बल कर दिया है कि) यह सरोवरसे निकाली और सूर्यकी किरणोंसे जलायी हुई कमलिनीके समान प्रतीत हो रही है ॥16॥ | "This delicate princess with beautiful limbs deserves to live in palaces whose interiors are made of jewels. (Currently, sorrow has weakened her so much that) she appears like a lotus flower taken out of a lake and scorched by the sun's rays." (16) |
| रूपौदार्यगुणोपेतां मण्डनार्हाममण्डिताम् । चन्द्रलेखामिव नवां व्योम्नि नीलाश्रसंवृताम् ॥17॥ |
यह रूप और उदारता आदि गुणोंसे सम्पन्न है। शृंगार धारण करनेके योग्य होनेपर भी यह शृंगारशून्य है, मानो आकाशमें मेघोंकी काली घटासे आवृत नूतन चन्द्रकला हो ॥17॥ | "She is endowed with beauty, generosity, and other virtues. Though deserving of adornments, she is devoid of them, like the new crescent moon in the sky obscured by dark clouds." (17) |
| कामभोगैः प्रियैर्हीनां हीनां बन्धुजनेन च । देहं संधारयन्तीं हि भर्तृदर्शनकाङ्क्षया ॥18॥ |
यह राजकन्या प्रिय कामभोगोंसे वंचित है। अपने बन्धुजनोंसे बिछुड़ी हुई है और पतिके दर्शनकी इच्छासे अपने (दीन-दुर्बल) शरीरको धारण कर रही है ॥18॥ | "This princess is deprived of beloved pleasures. Separated from her relatives, she sustains her (weak and frail) body with the desire to see her husband." (18) |
| भर्ता नाम परं नार्या भूषणं भूषणैर्विना । एषा हि रहिता तेन शोभमाना न शोभते ॥19॥ |
वास्तवमें पति ही नारीका सबसे श्रेष्ठ आभूषण है। उसके होनेसे वह बिना आभूषणोंके सुशोभित होती है; परंतु यह पतिरूप आभूषणसे रहित होनेके कारण शोभामयी होकर भी सुशोभित नहीं हो रही है ॥19॥ | "Indeed, a husband is the best ornament for a woman. With him, she is adorned even without ornaments. But this woman, devoid of the ornament of her husband, despite being inherently beautiful, does not appear adorned." (19) |
| दुष्करं कुरुतेऽत्यन्तं हीनो यदनया नलः । धारयत्यात्मनो देहं न शोकेनापि सीदति ॥20॥ |
इससे विलग होकर राजा नल यदि अपने शरीरको धारण करते हैं और शोकसे शिथिल नहीं हो रहे हैं तो यह समझना चाहिये कि वे अत्यन्त दुष्कर कर्म कर रहे हैं ॥20॥ | "If King Nala, separated from her, is still alive and not weakened by grief, it should be understood that he is performing an extremely difficult task." (20) |
| इमामसितकेशान्तां शतपत्रायतेक्षणाम् । सुखार्हा दुःखितां दृष्ट्वा ममापि व्यथते मनः ॥21॥ |
काले-काले केशों और कमलके समान विशाल नेत्रोंसे सुशोभित इस राजकन्याको, जो सदा सुख भोगनेके ही योग्य है, दुःखित देखकर मेरे मनमें भी बड़ी व्यथा हो रही है ॥21॥ | "Seeing this princess, adorned with dark hair and large lotus-like eyes, who always deserves to enjoy happiness, now sorrowful, my heart is also filled with great pain." (21) |
| कदा नु खलु दुःखस्य पारं यास्यति वै शुभा । भर्तुः समागमात् साध्वी रोहिणी शशिनो यथा ॥22॥ |
जैसे रोहिणी चन्द्रमाके संयोगसे सुखी होती है, उसी प्रकार यह शुभलक्षणा साध्वी राजकुमारी अपने पतिके समागमसे (संतुष्ट हो) कब इस दुःखके समुद्रसे पार हो सकेगी ॥22॥ | "Just as Rohini (a lunar mansion) is happy in conjunction with the moon, when will this auspicious and virtuous princess, reunited with her husband, cross this ocean of sorrow?" (22) |
| अस्या नूनं पुनर्लाभान्नैषधः प्रीतिमेष्यति । राजा राज्यपरिभ्रष्टः पुनर्लब्ध्वा च मेदिनीम् ॥23॥ |
जैसे कोई राजा एक बार अपने राज्यसे च्युत होकर फिर उसी राज्यभूमिको प्राप्त कर लेनेपर अत्यन्त आनन्दका अनुभव करता है, उसी प्रकार पुनः इसके मिल जानेपर निषधनरेश नलको निश्चय ही बड़ी प्रसन्नता होगी ॥23॥ | "Just as a king, once dethroned from his kingdom, experiences great joy upon regaining it, similarly, upon being reunited with her, the King of Nishadha, Nala, will surely be overjoyed." (23) |
| तुल्यशीलवयोयुक्तां तुल्याभिजनसंवृताम् । नैषधोऽर्हति वैदर्भी तं चेयमसितेक्षणा ॥24॥ |
विदर्भकुमारी दमयन्ती राजा नलके समान शील और अवस्थासे युक्त है, उन्हीके तुल्य उत्तम कुलसे सुशोभित है। निषधनरेश नल विदर्भकुमारीके योग्य हैं और यह कजरारे नेत्रोंवाली वैदर्भी नलके योग्य है ॥24॥ | "Damayanti, the princess of Vidarbha, is endowed with character and age similar to King Nala, and adorned with an equally noble lineage. The King of Nishadha, Nala, is worthy of the princess of Vidarbha, and this Vaidarbhi with kohl-rimmed eyes is worthy of Nala." (24) |
| युक्तं तस्याप्रमेयस्य वीर्यसत्त्ववतो मया । समाश्वासयितुं भार्या पतिदर्शनलालसाम् ॥25॥ |
राजा नलका पराक्रम और धैर्य असीम है। उनकी यह पत्नी पतिदर्शनके लिये लालायित और उत्कण्ठित है, अतः मुझे इससे मिलकर इसे आश्वासन देना चाहिये ॥25॥ | "King Nala's valor and patience are boundless. This wife of his is eager and yearning to see her husband, therefore, I should meet her and console her." (25) |
| अहमाश्चासयाम्येनां पूर्णचन्द्रनिभाननाम् । अदृष्टपूर्वा दुःखस्य दुःखार्ता ध्यानतत्पराम् ॥26॥ |
इस पूर्णचन्द्रमुखी राजकुमारीने पहले कभी दुःखको नहीं देखा था। इस समय दुःखसे आतुर हो पतिके ध्यानमें परायण है, अतः मैं इसे आश्वासन देनेका विचार कर रहा हूँ ॥26॥ | "This princess with a face like the full moon has never experienced sorrow before. Now, distressed by grief, she is absorbed in thoughts of her husband, so I am thinking of consoling her." (26) |
| बृहदश्च उवाच एवं विमृश्य विविधैः कारणैर्लक्षणैश्च ताम्
। उपागम्य ततो भैमीं सुदेवो ब्राह्मणोऽब्रवीत् ॥27॥ अहं सुदेवो वैदर्भि भ्रातुस्ते दयितः सखा । भीमस्य वचनाद् राज्ञस्त्वामन्वेष्टुमिहागतः ॥28॥ |
बृहदश्च मुनि कहते हैं-युधिष्ठिर! इस प्रकार भाँति-भाँतिके कारणों और लक्षणोंसे दमयन्तीको पहचानकर और अपने कर्तव्यके विषयमे विचार करके सुदेव ब्राह्मण उसके समीप गये और इस प्रकार बोले-'विदर्भराजकुमारी! मैं तुम्हारे भाईका प्रिय सखा सुदेव हूँ। महाराज भीमकी आज्ञासे तुम्हारी खोज करनेके लिये यहाँ आया हूँ ॥ 27-28॥ | Sage Brihadasva says: "O Yudhishthira! Thus, recognizing Damayanti by various signs and characteristics, and contemplating his duty, Sudeva the Brahmin approached her and said, 'O princess of Vidarbha! I am Sudeva, a dear friend of your brother. I have come here to search for you at the behest of King Bhima.'" (27-28) |
| कुशली ते पिता राज्ञि जननी भ्रातरश्च ते । आयुष्मन्तौ कुशलिनौ तत्रस्थौ दारकौ च तौ ॥29॥ |
'निषधदेशकी महारानी! तुम्हारे पिता, माता और भाई सब सकुशल हैं और कुण्डिनपुरमें जो तुम्हारे बालक हैं, वे भी कुशलसे हैं ॥29॥ | "'O queen of Nishadha! Your father, mother, brother, and everyone else are well, and your children in Kundinapura are also doing well.'" (29) |
| त्वत्कृते बन्धुवर्गाश्च गतसत्त्वा इवासते । अन्वेष्टारो ब्राह्मणाश्च भ्रमन्ति शतशो महीम् ॥30॥ |
तुम्हारे बन्धु-बान्धव तुम्हारी ही चिन्तासे मृतक-तुल्य हो रहे हैं। (तुम्हारी खोज करनेके लिये) सैकड़ों ब्राह्मण इस पृथ्वीपर घूम रहे हैं" ॥30॥ | "'Your relatives are like the living dead, constantly worrying about you. Hundreds of Brahmins are wandering this earth (searching for you).'" (30) |
| बृहदश्च उवाच अभिज्ञाय सुदेवं तं दमयन्ती युधिष्ठिर । पर्यपृच्छत तान् सर्वान् क्रमेण सुहृदः स्वकान् ॥31॥ |
बृहदश्च मुनि कहते हैं--युधिष्ठिर! सुदेवको पहचानकर दमयन्तीने क्रमशः अपने सभी सगे-सम्बन्धियोंका कुशल समाचार पूछा ॥31॥ | Sage Brihadasva continues: "O Yudhishthira! Recognizing Sudeva, Damayanti inquired about the well-being of all her relatives one by one." (31) |
| रुरोद च भृशं राजन् वैदर्भी शोककर्शिता
। दृष्ट्वा सुदेवं सहसा भ्रातुरिष्टं द्विजोत्तमम् ॥32॥ रुदतीं तामथो दृष्ट्वा सुनन्दा शोककर्शिता । सुदेवेन सहैकान्ते कथयन्तीं च भारत ॥33॥ |
राजन्! अपने भाईके प्रिय मित्र द्विजश्रेष्ठ सुदेवको सहसा आया देख दमयन्ती शोकसे व्याकुल हो फूट-फूटकर रोने लगी। भारत! तदनन्तर उसे सुदेवके साथ एकान्तमें बात करती तथा रोती देख सुनन्दा शोकसे व्याकुल हो उठी ॥ 32-33॥ | "O King! Suddenly seeing Sudeva, the best of Brahmins and a dear friend of her brother, Damayanti, overwhelmed with sorrow, burst into tears. O descendant of Bharata! Then, seeing her talking with Sudeva in private and crying, Sunanda became worried." (32-33) |
| जनित्र्यै कथयामास सैरन्ध्री रोदितीति च । ब्राह्मणेन सहागम्य तां वेद यदि मन्यसे ॥34॥ |
उसने अपनी मातासे जाकर कहा--'माँ! सैरन्ध्री एक ब्राह्मणसे मिलकर बहुत रो रही है। यदि तुम ठीक समझो तो इसका कारण जाननेकी चेष्टा करो” ॥34॥ | "She went to her mother and said, 'Mother! The Sairandhri is crying a lot after meeting a Brahmin. If you think it's appropriate, try to find out the reason.'" (34) |
| अथ चेदिपतेर्माता राज्ञश्चान्तःपुरात् तदा । जगाम यत्र सा बाला ब्राह्मणेन सहाभवत् ॥35॥ |
तदनन्तर चेदिराजकी माता उस समय अन्तःपुरसे निकलकर उसी स्थानपर गयीं, जहाँ राजकन्या दमयन्ती ब्राह्मणके साथ खड़ी थी ॥35॥ | "Then, the mother of the Chedi king immediately left the inner chambers and went to the place where Princess Damayanti was standing with the Brahmin." (35) |
| ततः सुदेवमानाय्य राजमाता विशाम्पते
। पप्रच्छ भार्या कस्येयं सुता वा कस्य भाविनी ॥36॥ कथं च नष्टा ज्ञातिभ्यो भर्तुर्वा वामलोचना । त्वया च विदिता विप्र कथमेवंगता सती ॥37॥ |
युधिष्ठिर! तब राजमाताने सुदेवको बुलाकर पूछा-'विप्रवर! जान पड़ता है, तुम इसे जानते हो। बताओ, यह सुन्दरी युवती किसकी पत्नी अथवा किसकी पुत्री है? यह सुन्दर नेत्रोंवाली सुन्दरी अपने भाई-बन्धुओं अथवा पतिसे किस प्रकार विलग हुई है? यह सती- साध्वी नारी ऐसी दुरवस्थामें क्यो पड़ गयी? ॥ 36-37॥ | "O Yudhishthira! Then the queen mother called Sudeva and asked, 'O best of Brahmins! It seems you know her. Tell me, whose wife or whose daughter is this beautiful young woman? How did this beautiful girl with lovely eyes get separated from her relatives or husband? Why has this virtuous and noble woman fallen into such a miserable condition?'" (36-37) |
| एतदिच्छाम्यहं श्रोतुं त्वत्तः सर्वमशेषतः । तत्त्वेन हि ममाचक्ष्व पृच्छन्त्या देवरूपिणीम् ॥38॥ |
(ब्रह्मन्! इस देवरूपिणी नारीके विषयमे यह सारा वृत्तान्त मैं पूर्णरूपसे सुनना चाहती हूँ। मैं जो कुछ पूछती हूँ, वह मुझे ठीक-ठीक बताओ” ॥38॥ | "'(O Brahmin! I want to hear the complete story about this goddess-like woman. Tell me exactly what I am asking.)'" (38) |
| एवमुक्तस्तया राजन् सुदेवो द्विजसत्तमः । सुखोपविष्ट आचष्ट दमयन्त्या यथातथम् ॥39॥ |
राजन्! राजमाताके इस प्रकार पूछनेपर वे द्विजश्रेष्ठ सुदेव सुखपूर्वक बैठकर दमयन्तीका यथार्थ वृत्तान्त बताने लगे ॥39॥ | "O King! When the queen mother asked this, that best of Brahmins, Sudeva, sat down comfortably and started narrating the true story of Damayanti." (39) |
| इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि नलोपाख्यानपर्वणि दमयन्तीसुदेवसंवादे अष्टषष्टितमोऽध्यायः ॥68॥ | इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत नलोपाख्यानपर्वमें दमयन्ती-सुदेव- संवादविषयक अरसठवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥68॥ | "Thus ends the sixty-eighth chapter in the Nalopakhyana Parva of the Vana Parva in the Sri Mahabharata, describing the conversation between Damayanti and Sudeva." (68) |
| एकोनसप्ततितमोऽध्यायः | उनहत्तरवाँ अध्याय | **Chapter Sixty-Ninth: |
| दमयन्तीका अपने पिताके यहाँ जाना ओर वहाँसे नलको टूँढनेके लिये अपना संदेश देकर ब्राह्मणको भेजना | दमयन्तीका अपने पिताके यहाँ जाना ओर वहाँसे नलको टूँढनेके लिये अपना संदेश देकर ब्राह्मणको भेजना | Damayanti Returns to Her Father's Home and Sends a Brahmin with a Message to Find Nala** |
| सुदेव उवाच विदर्भराजो धर्मात्मा भीमो नाम महाद्युतिः । सुतेयं तस्य कल्याणी दमयन्तीति विश्रुता ॥1॥ |
सुदेवने कहा--देवि! विदर्भदेशके राजा महा-तेजस्वी भीम बड़े धर्मात्मा हैं। यह उन्हींकी पुत्री है। इस कल्याणस्वरूपा राजकन्याका नाम दमयन्ती है ॥1॥ | Sudeva said: "O Devi! The king of Vidarbha, the immensely radiant Bhima, is a very righteous man. This is his daughter. The name of this auspicious princess is Damayanti." (1) |
| राजा तु नैषधो नाम वीरसेनसुतो नलः । भार्येयं तस्य कल्याणी पुण्यश्लोकस्य धीमतः ॥2॥ |
वीरसेनपुत्र नल निषधदेशके सुप्रसिद्ध राजा हैं। उन्हीं (परम) बुद्धिमान् पुण्यश्लोक नलकी यह कल्याणमयी पत्नी है ॥2॥ | "Nala, the son of Virasena, is the renowned king of Nishadha. This blessed woman is the wife of that (highly) intelligent and virtuous Nala." (2) |
| स द्यूतेन जितो भ्रात्रा हृतराज्यो महीपतिः । दमयन्त्या गतः सार्ध न प्राज्ञायत कस्यचित् ॥3॥ |
एक दिन राजा नल अपने भाईके द्वारा जूएमें हार गये। उसीमें उनका सारा राज्य चला गया। वे दमयन्तीके साथ वनमें चले गये। तबसे अबतक किसीको उनका पता नहीं लगा ॥3॥ | "One day, King Nala lost a gambling match to his brother, and his entire kingdom was lost. He went into the forest with Damayanti. Since then, no one has been able to find them." (3) |
| ते वयं दमयन्त्यर्थे चरामः पृथिवीमिमाम् । सेयमासादिता बाला तव पुत्रनिवेशने ॥4॥ |
हम अनेक ब्राह्मण दमयन्तीको ढूँढ़नेके लिये इस पृथ्वीपर विचर रहे हैं। आज आपके पुत्रके महलमें मुझे यह राजकुमारी मिली है ॥4॥ | "Many Brahmins like us are wandering this earth in search of Damayanti. Today, I have found this princess in your son's palace." (4) |
| अस्या रूपेण सदृशी मानुषी न हि विद्यते । अस्या ह्येष भ्रुवोर्मध्ये सहजः पिप्लुरुत्तमः ॥5॥ |
रूपमे इसकी समानता करनेवाली कोई भी मानवकन्या नहीं है। इसके दोनों भौंहोंके बीच एक जन्मजात उत्तम तिलका चिल्ल है ॥5॥ | "There is no human girl who can compare to her beauty. There is an auspicious birthmark, a mole, between her eyebrows." (5) |
| श्यामायाः पद्मसंकाशो लक्षितोऽन्तर्हितो मया । मलेन संवृतो ह्यास्याश्छन्नोऽभ्रेणेव चन्द्रमाः ॥6॥ |
मैंने देखा है, इस श्यामा राजकुमारीके ललाटमें वह कमलके समान चिह्न छिपा हुआ है। मेघमालासे टके हुए चन्द्रमाकी भाँति उसका वह चिल्ल मैलसे ढक गया है ॥6॥ | "I have seen that lotus-like mark hidden on the forehead of this dark-complexioned princess. Like the moon obscured by clouds, that mole is covered with dirt." (6) |
| चिह्नभूतो विभूत्यर्थमयं धात्रा विनिर्मितः
। प्रतिपत्कलुषस्येन्दोर्लेखा नातिविराजते ॥7॥ न चास्या नश्यते रूपं वपुर्मलसमाचितम् । असंस्कृतमभिव्यक्तं भाति काञ्चनसंनिभम् ॥8॥ अनेन वपुषा बाला पिप्लुनानेन सूचिता । लक्षितेयं मया देवी निभृतोऽग्निरिवोष्मणा ॥9॥ |
विधाताके द्वारा निर्मित यह चिह्न इसके भावी ऐश्वर्यका सूचक है। इस समय यह प्रतिपदाकी मलिन चन्द्रकलाके समान अधिक शोभा नहीं पा रही है। इसका सुवर्ण-जैसा सुन्दर शरीर मैलसे व्याप्त और संस्कारशून्य (मार्जन आदिसे रहित) होनेपर भी स्पष्ट रूपसे उद्धासित हो रहा है। इसका रूप-सौन्दर्य नष्ट नहीं हुआ है। जैसे छिपी हुई आग अपनी गरमीसे पहचान ली जाती है, उसी प्रकार यद्यपि देवी दमयन्ती मलिन शरीरसे युक्त है तो भी इस ललाटवर्ती तिलके चिल्लसे ही मैंने इसे पहचान लिया है ॥ 7-9॥ | "This mark, created by the creator, is an indicator of her future prosperity. Currently, it is not very prominent, like the faint crescent moon on the first day of the lunar fortnight. Her beautiful, golden body, covered in dirt and lacking proper care (cleansing, etc.), is still clearly radiant. Her beauty has not faded. Just as hidden fire is recognized by its heat, similarly, although Devi Damayanti's body is soiled, I recognized her by this mole on her forehead." (7-9) |
| तच्छुत्वा वचनं तस्य सुदेवस्य विशाम्पते । सुनन्दा शोधयामास पिप्लुप्रच्छादनं मलम् ॥10॥ |
युधिष्ठिर! सुदेवका यह वचन सुनकर सुनन्दाने दमयन्तीके ललाटवर्ती चिल्लको ढँकनेवाली मैल धो दी ॥10॥ | "O Yudhishthira! Hearing these words of Sudeva, Sunanda washed away the dirt covering the mole on Damayanti's forehead." (10) |
| स मलेनापकृष्टेन पिप्लुस्तस्या व्यरोचत । दमयन्त्या यथा व्यभ्रे नभसीव निशाकरः ॥11॥ |
मैल धुल जानेपर उसके ललाटका वह चिल्ल उसी प्रकार चमक उठा, जैसे बादलरहित आकाशमें चन्द्रमा प्रकाशित होता है ॥11॥ | "With the dirt removed, the mole on her forehead shone brightly, like the moon in a cloudless sky." (11) |
| पिप्लुं दृष्ट्वा सुनन्दा च राजमाता च भारत । रुदत्यौ तां परिष्वज्य मुहूर्तमिव तस्थतुः ॥12॥ |
भारत! उस चिह्वको देखकर सुनन्दा और राजमाता दोनों रोने लगीं और दमयन्तीको हृदयसे लगाये दो घड़ीतक स्तब्ध खड़ी रहीं ॥12॥ | "O descendant of Bharata! Seeing that mark, both Sunanda and the queen mother started crying and stood motionless for two hours, embracing Damayanti." (12) |
| उत्सृज्य बाष्पं शनकै राजमातेदमब्रवीत् । भगिन्या दुहिता मेऽसि पिप्लुनानेन सूचिता ॥13॥ |
तत्पश्चात् राजमाताने आँसू बहाते हुए धीरेसे कहा--'बेटी! तुम मेरी बहिनकी पुत्री हो। इस चिल्लके कारण मैने भी तुम्हें पहचान लिया ॥13॥ | "Then, the queen mother, shedding tears, said softly, 'Daughter! You are my sister's child. I also recognized you by this mole.'" (13) |
| अहं च तव माता च राज्ञस्तस्य महात्मन: । सुते दशार्णाधिपतेः सुदाम्नश्चारुदर्शने ॥14॥ |
'सुन्दरी! मैं और तुम्हारी माता दोनों दशार्णदेशके स्वामी महामना राजा सुदामाकी पुत्रियाँ हैं ॥14॥ | "'O beautiful one! Your mother and I are both daughters of the noble King Sudama, the ruler of the Dasharna country.'" (14) |
| भीमस्य राज्ञः सा दत्ता वीरबाहोरहं पुनः । त्वं तु जाता मया दृष्टा दशार्णेषु पितुर्गृहे ॥15॥ |
“तुम्हारी माँका ब्याह राजा भीमके साथ हुआ और मेरा चेदिराज वीरबाहुके साथ। तुम्हारा जन्म दशार्णदेशमें मेरे पिताके ही घरपर हुआ और मैंने अपनी आँखों देखा ॥15॥ | "'Your mother was married to King Bhima, and I to the Chedi king Virabahu. You were born in the Dasharna country, at my father's house itself, and I saw it with my own eyes.'" (15) |
| यथैव ते पितुर्गेहं तथैव मम भामिनि । यथैव च ममैश्वर्यं दमयन्ति तथा तव ॥16॥ |
"भामिनि! तुम्हारे लिये जैसा पिताका घर है, वैसा ही मेरा घर है। दमयन्ती! यह सारा ऐश्वर्य जैसे मेरा है, उसी प्रकार तुम्हारा भी है” ॥16॥ | "'O beautiful one! My home is like your father's home. Damayanti! All this wealth is yours just as it is mine.'" (16) |
| तां प्रहृष्टेन मनसा दमयन्ती विशाम्पते । प्रणम्य मातुर्भगिनीमिदं वचनमब्रवीत् ॥17॥ |
युधिष्ठिर! तब दमयन्तीने प्रसन्न हृदयसे अपनी मौसीको प्रणाम करके कहा — ॥17॥ | "O Yudhishthira! Then Damayanti, with a joyful heart, bowed to her aunt and said..." (17) |
| अज्ञायमानापि सती सुखमस्म्युषिता त्वयि । सर्वकामैः सुविहिता रक्षयमाणा सदा त्वया ॥18॥ |
“माँ! यद्यपि तुम मुझे पहचानती नहीं थी, तब भी मैं तुम्हारे यहाँ बड़े सुखसे रही हूँ। तुमने मेरी इच्छानुसार सारी सुविधाएँ कर दीं और सदा तुम्हारे द्वारा मेरी रक्षा होती रही ॥18॥ | "'Mother! Even though you did not recognize me, I have been very happy here. You provided me with all the comforts according to my wishes, and you always protected me.'" (18) |
| सुखात् सुखतरो वासो भविष्यति न संशयः । चिरविप्रोषितां मातर्मामनुज्ञातुमर्हसि ॥19॥ |
'अब यदि मैं यहाँ रहूँ तो यह मेरे लिये अधिक-से-अधिक सुखदायक होगा, इसमें संशय नहीं है, किंतु मैं बहुत दिनोंसे प्रवासमें भटक रही हूँ, अतः माताजी! मुझे विदर्भ जानेकी आज्ञा दीजिये ॥19॥ | "'Now, if I stay here, it will be most pleasant for me, there is no doubt, but I have been wandering in exile for a long time, so, mother, please permit me to go to Vidarbha.'" (19) |
| दारकौ च हि मे नीतौ वसतस्तत्र बालकौ । पित्रा विहीनौ शोकार्तौ मया चैव कथं नु तौ ॥20॥ |
“मैने अपने बच्चोंको पहले ही कुण्डिनपुर भेज दिया था। वे वहीं रहते हैं। पितासे तो उनका वियोग हो ही गया है; मुझसे भी वे बिछुड़ गये हैं, ऐसी दशामें वे शोकार्त बालक कैसे रहते होंगे? ॥20॥ | "'I had already sent my children to Kundinapura. They are staying there. They are already separated from their father; now they are separated from me too, in such a situation, how must those grief-stricken children be living?'" (20) |
| यदि चापि प्रियं किंचिन्मयि कर्तुमिहेच्छसि
। विदर्भान् यातुमिच्छामि शीघ्रं मे यानमादिश ॥21॥ बाढमित्येव तामुक्त्वा हृष्टा मातृष्वसा नृप । गुप्तां बलेन महता पुत्रस्यानुमते ततः ॥22॥ प्रस्थापयद् राजमाता श्रीमतीं नरवाहिना । यानेन भरतश्रेष्ठ स्वन्नपानपरिच्छदाम् ॥23॥ |
“माँ! यदि तुम मेरा कुछ भी प्रिय करना चाहती हो तो मेरे लिये शीघ्र किसी सवारीकी व्यवस्था कर दो। मैं विदर्भदेश जाना चाहती हूँ।” राजन्! तब “बहुत अच्छा” कहकर दमयन्तीकी मौसीने प्रसन्नतापूर्वक अपने पुत्रकी राय लेकर सुन्दरी दमयन्तीको पालकीपर बिठाकर विदा किया। उसकी रक्षाके लिये बहुत बड़ी सेना दे दी। भरतश्रेष्ठ! राजमाताने दमयन्तीके साथ खाने-पीनेकी तथा अन्य आवश्यक सामग्रियोंकी अच्छी व्यवस्था कर दी ॥ 21-23॥ | "'Mother! If you wish to do anything for my sake, please arrange for some transportation soon. I want to go to Vidarbha.' O King! Then, saying 'Very well,' Damayanti's aunt, happily, after consulting her son, bid farewell to the beautiful Damayanti, seating her in a palanquin. She provided a large army for her protection. O best of Bharatas! The queen mother made excellent arrangements for food, drink, and other necessities for Damayanti." (21-23) |
| ततः सा न चिरादेव विदर्भानगमत् पुनः । तां तु बन्धुजनः सर्वः प्रहृष्टः समपूजयत् ॥24॥ |
तदनन्तर वहाँसे विदा हो वह थोड़े ही दिनम विदर्भदेशकी राजधानीमें जा पहुँची। उसके आगमनसे माता-पिता आदि सभी बन्धु-बान्धव बड़े प्रसन्न हुए और सबने उसका स्वागत-सत्कार किया ॥24॥ | "Then, departing from there, she reached the capital of Vidarbha within a few days. Her parents and all her relatives were overjoyed by her arrival, and everyone welcomed and honored her." (24) |
| सर्वान् कुशलिनो दृष्ट्वा बान्धवान् दारकौ च तौ
। मातरं पितरं चोभौ सर्व चैव सखीजनम् ॥25॥ देवताः पूजयामास ब्राह्मणांश्च यशस्विनी । परेण विधिना देवी दमयन्ती विशाम्पते ॥26॥ |
राजन्! समस्त बन्धु-बान्धवों, दोनों बच्चों, माता-पिता और सम्पूर्ण सखियोंको सकुशल देखकर यशस्विनी देवी दमयन्तीने उत्तम विधिके साथ देवताओं और ब्राह्मणोंका पूजन किया ॥ 25-26॥ | "O King! Seeing all her relatives, both her children, her parents, and all her friends well, the glorious Devi Damayanti worshipped the gods and Brahmins with proper rituals." (25-26) |
| अतर्पयत् सुदेवं च गोसहस्रेण पार्थिवः । प्रीतो दृष्ट्वैव तनयां ग्रामेण द्रविणेन च ॥27॥ |
राजा भीम अपनी पुत्रीको देखकर अत्यन्त प्रसन्न हुए। उन्होंने एक हजार गौ, एक गाँव तथा धन देकर सुदेव ब्राह्मणको संतुष्ट किया ॥27॥ | "King Bhima was extremely happy to see his daughter. He pleased Sudeva the Brahmin by giving him a thousand cows, a village, and wealth." (27) |
| सा व्युष्टा रजनीं तत्र पितुर्वेश्मनि भाविनी । विश्रान्ता मातरं राजन्निदं वचनमब्रवीत् ॥28॥ |
युधिष्ठिर! भाविनी दमयन्तीने उस रातमें पिताके घरमें विश्राम किया। सबेरा होनेपर उसने मातासे कहा-- ॥28॥ | "O Yudhishthira! The wise Damayanti rested in her father's house that night. In the morning, she said to her mother..." (28) |
| दसयन्त्युवाच मां चेदिच्छसि जीवन्तीं मातः सत्यं ब्रवीमि ते । नलस्य नरवीरस्य यतस्वानयने पुनः ॥29॥ |
दमयन्ती बोली--माँ! यदि मुझे जीवित देखना चाहती हो तो मैं तुमसे सच कहती हूँ, नरवीर महाराज नलकी खोज करानेका पुनः प्रयत्न करो ॥29॥ | "Damayanti said, 'Mother! If you want to see me alive, I tell you truthfully, make efforts again to find the heroic King Nala.'" (29) |
| दमयन्त्या तथोक्ता तु सा देवी भृशदुःखिता । बाष्पेणापिहिता राज्ञी नोत्तरं किंचिदब्रवीत् ॥30॥ |
दमयन्तीके ऐसा कहनेपर महारानीकी आँखें आँसुओंसे भर आयीं। वे अत्यन्त दुःखी हो गयीं और तत्काल उसे कोई उत्तर न दे सकी ॥30॥ | "When Damayanti said this, the queen's eyes filled with tears. She became extremely sad and could not answer her immediately." (30) |
| तदवस्थां तु तां दृष्ट्वा सर्वमन्तःपुरं तदा । हाहाभूतमतीवासीद् भृशं च प्ररुरोद ह ॥31॥ |
तब महारानीकी यह दयनीय अवस्था देख उस समय सारे अन्तःपुरमें हाहाकार मच गया। सब-के-सब फूट-फूटकर रोने लगे ॥31॥ | "Then, seeing the queen's pitiful condition, there was an uproar in the entire inner chambers. Everyone started crying bitterly." (31) |
| ततो भीमं महाराजं भार्या वचनमब्रवीत् । दमयन्ती तव सुता भर्तारमनुशोचति ॥32॥ |
तदनन्तर महाराज भीमसे उनकी पत्नीने कहा--'प्राणनाथ! आपकी पुत्री दमयन्ती अपने पतिके लिये निरन्तर शोकमें डूबी रहती है ॥32॥ | "Thereafter, the queen said to King Bhima, 'My lord! Your daughter Damayanti is constantly immersed in sorrow for her husband.'" (32) |
| अपकृष्य च लज्जां सा स्वयमुक्तवती नृप । प्रयतन्तां तव प्रेष्याः पुण्यश्लोकस्य मार्गणे ॥33॥ |
'नरेश्वर! उसने लाज छोड़कर स्वयं अपने मुँहसे कहा है, अतः आपके सेवक पुण्यश्लोक महाराज नलका पता लगानेका प्रयत्न करें! ॥33॥ | "'O lord of men! She has spoken herself, abandoning all shame, therefore, let your servants try to find the virtuous King Nala!'" (33) |
| तया प्रदेशितो राजा ब्राह्मणान् वशवर्तिनः । प्रस्थापयद् दिशः सर्वा यतध्वं नलमार्गणे ॥34॥ |
महारानीसे प्रेरित हो राजा भीमने अपने अधीनस्थ ब्राह्मणोंको यह कहकर सब दिशाओंमें भेजा कि 'आपलोग नलको ढूँढ़नेकी चेष्टा करें' ॥34॥ | "Motivated by the queen, King Bhima sent the Brahmins under his command in all directions, saying, 'Try to find Nala.'" (34) |
| ततो विदर्भाधिपतेर्नियोगाद् ब्राह्मणास्तदा । दमयन्तीमथो सृत्वा प्रस्थिताः स्मेत्यथाब्रुवन् ॥35॥ |
तत्पश्चात् विदर्भनरेशकी आज्ञासे ब्राह्मणलोग प्रस्थित हो दमयन्तीके पास जाकर बोले -- राजकुमारी! हम सब नलका पता लगाने जा रहे हैं (क्या आपको कुछ कहना है?) ॥35॥ | "Then, at the behest of the king of Vidarbha, the Brahmins went to Damayanti and said, 'O Princess! We are all going to search for Nala (do you have anything to say?)'" (35) |
| अथ तानब्रवीद् भैमी सर्वराष्ट्रेष्विदं वचः । ब्रुवध्वं जनसंसत्सु तत्र तत्र पुनः पुनः ॥36॥ |
तब भीमकुमारीने उन ब्राह्मणोंसे कहा-'सब राष्ट्रोमें घूम-घूमकर जनसमुदायमें आपलोग बार-बार मेरी यह बात बोलें ॥36॥ | "Then, Damayanti, the daughter of Bhima, said to those Brahmins, 'Wandering through all the kingdoms, repeatedly speak these words of mine to the people..." (36) |
| क्व नु त्वं कितवच्छित्त्वा वस्त्रार्थं प्रस्थितो मम । उत्सृज्य विपिने सुप्तामनुरक्तां प्रियां प्रिय ॥37॥ |
“ओ जुआरी प्रियतम! तुम वनमों सोयी हुई और अपने पतिमें अनुराग रखनेवाली मुझ प्यारी पत्नीको छोड़कर तथा मेरे आधे वस्त्रको फाड़कर कहाँ चल दिये? ॥37॥ | "'O gambler, my beloved! Where have you gone, leaving me, your beloved wife, sleeping in the forest, devoted to you, and tearing half of my garment?'" (37) |
| सा वै यथा त्वया दृष्टा तथाऽऽस्ते त्वत्प्रतीक्षिणी । दह्यमाना भृशं बाला वस्त्रार्थेनाभिसंवृता ॥38॥ |
“उसे तुमने जिस अवस्थामें देखा था, उसी अवस्थामें वह आज भी है और तुम्हारे आगमनकी प्रतीक्षा कर रही है। आधे वस्त्रसे अपने शरीरको ढँककर वह युवती तुम्हारी विरहाग्निमें निरन्तर जल रही है ॥38॥ | "'She is still in the same condition as you saw her, and she is waiting for your return. Covering her body with half a garment, that young woman is constantly burning in the fire of separation from you.'" (38) |
| तस्या रुदत्याः सततं तेन शोकेन पार्थिव । प्रसादं कुरु वै वीर प्रतिवाक्यं ददस्व च ॥39॥ |
'वीर भूमिपाल! सदा तुम्हारे शोकसे रोती हुई अपनी उस प्यारी पत्नीपर पुनः कृपा करो और मुझे मेरी बातका उत्तर दो” ॥39॥ | "'O heroic king! Have mercy again on your beloved wife, who always cries for you, and answer me.'" (39) |
| एवमन्यच्च वक्तव्यं कृपां कुर्याद् यथा मयि । वायुना धूयमानो हि वनं दहति पावकः ॥40॥ |
(ब्राह्मणो! ये तथा और भी बहुत-सी ऐसी बातें आप कहें, जिससे वे मुझपर कृपा करें। वायुकी सहायतासे प्रज्वलित आग सारे वनको जला डालती है (इसी प्रकार विरहकी व्याकुलता मुझे जला रही है) ॥40॥ | "'(O Brahmins! Say these and many other such things that may make him merciful towards me. Just as the wind-driven fire burns down the entire forest (similarly, the agony of separation is burning me).)" (40) |
| भर्तव्या रक्षणीया च पत्नी पत्या हि सर्वदा । तन्नष्टमुभयं कस्माद् धर्मज्ञस्य सतस्तव ॥41॥ |
“प्राणनाथ! पतिको उचित है कि वह सदा अपनी पत्नीका भरण-पोषण एवं संरक्षण करे। आप धर्मज्ञ और साधु पुरुष हैं, आपके ये दोनों कर्तव्य सहसा नष्ट कैसे हो गये? ॥41॥ | "'O lord of my life! It is the duty of a husband to always provide for and protect his wife. You are righteous and virtuous, how have these two duties of yours suddenly vanished?'" (41) |
| ख्यातः प्राज्ञः कुलीनश्च सानुक्रोशो भवान् सदा । संवृत्तो निरनुक्रोशः शङ्के मद्भाग्यसंक्षयात् ॥42॥ |
“आप विख्यात विद्वान्, कुलीन और सदा सबके प्रति दयाभाव रखनेवाले हैं, परंतु मेरे हृदयमें यह संदेह होने लगा है कि आप मेरा भाग्य नष्ट होनेके कारण मेरे प्रति निर्दय हो गये हैं ॥42॥ | "'You are a renowned scholar, noble, and always compassionate towards everyone, but doubt has arisen in my heart that you have become merciless towards me due to my misfortune.'" (42) |
| तत् कुरुष्व नरव्याघ्र दयां मयि नरर्षभ । आनृशंस्यं परो धर्मस्त्वत्त एव हि मे श्रुतः ॥43॥ |
'नरव्याघ्र! नरोत्तम! मुझपर दया करो। मैंने तुम्हारे ही मुखसे सुन रखा है कि दयालुता सबसे बड़ा धर्म है" ॥43॥ | "'O tiger among men! O best of men! Have mercy on me. I have heard from your own mouth that compassion is the greatest dharma (righteousness).'" (43) |
| एवं ब्रुवाणान् यदि वः प्रतिब्रूयात् कथंचन । स नरः सर्वथा ज्ञेयः कश्चासौ क्व नु वर्तते ॥44॥ |
‘ब्राह्मणो! यदि आपके ऐसी बातें कहनेपर कोई किसी प्रकार भी आपको उत्तर दे तो उस मनुष्यका सब प्रकारसे परिचय प्राप्त कीजियेगा कि वह कौन है और कहाँ रहता है, इत्यादि ॥44॥ | "'O Brahmins! If anyone responds to you in any way after hearing these words, then learn everything about that man - who he is, where he lives, etc.'" (44) |
| यश्चैवं वचनं श्रुत्वा ब्रूयात् प्रतिवचो नरः । तदादाय वचस्तस्य ममावेद्यं द्विजोत्तमाः ॥45॥ |
'विप्रवरो! आपके इन वचनोंको सुनकर जो कोई मनुष्य जैसा भी उत्तर दे, उसकी वह बात याद रखकर आपलोग मुझे बतावें ॥45॥ | "'O best of Brahmins! Remember whatever any man says in response to these words of yours and tell me.'" (45) |
| यथा च वो न जानीयाद् ब्रुवतो मम शासनात् । पुनरागमनं चैव तथा कार्यमतन्द्रितैः ॥46॥ |
'किसीको भी यह नहीं मालूम होना चाहिये कि आपलोग मेरी आज्ञासे ये बातें कह रहे हैं। जब कोई उत्तर मिल जाय, तब आप आलस्य छोड़कर पुनः यहाँ तुरंत लौट आवें ॥46॥ | "'No one should know that you are speaking these words at my behest. When you receive a response, abandon all laziness and return here immediately.'" (46) |
| यदि वासौ समृद्धः स्याद् यदि वाप्यधनो भवेत् । यदि वाप्यसमर्थः स्याज्ज्ञेयमस्य चिकीर्षितम् ॥47॥ |
“उत्तर देनेवाला पुरुष धनवान् हो या निर्धन, समर्थ हो या असमर्थ, वह क्या करना चाहता है, इस बातको जाननेका प्रयत्न कीजिये" ॥47॥ | "'Whether the man who responds is wealthy or poor, capable or incapable, try to learn what he intends to do.'" (47) |
| एवमुक्तास्त्वगच्छस्ते ब्राह्मणाः सर्वतो दिशम्
। नलं मृगयितुं राजंस्तदा व्यसनिनं तथा ॥48॥ ते पुराणि सराष्ट्राणि ग्रामान् घोषांस्तथाऽऽश्रमान् । अन्वेषन्तो नलं राजन् नाधिजग्मुर््विजातयः ॥49॥ |
राजन्! दमयन्तीके ऐसा कहनेपर वे ब्राह्मण संकटमें पड़े हुए राजा नलको ढूँढ़नेके लिये सब दिशाओंकी ओर चले गये। युधिष्ठिर! उन ब्राह्मणोंने नगरों, राष्ट्रों, गाँवों, गोष्ठो तथा आश्रमोंमें भी नलका अन्वेषण किया; कितु उन्हें कहीं भी उनका पता न लगा ॥ 48-49॥ | "O King! When Damayanti said this, those Brahmins went in all directions to search for King Nala, who was in distress. O Yudhishthira! Those Brahmins searched for Nala in cities, kingdoms, villages, cowherd settlements, and even hermitages, but they could not find any trace of him." (48-49) |
| तच्च वाक्यं तथा सर्वे तत्र तत्र विशाम्पते । श्रावयांचक्रिरे विप्रा दमयन्त्या यथेरितम् ॥50॥ |
महाराज! दमयन्तीने जैसा बताया था, उस वाक्यको सभी ब्राह्मण भिन्न-भिन्न स्थानोंमें जाकर लोगोंको सुनाया करते थे ॥50॥ | "O King! The Brahmins went to different places and recited the words that Damayanti had told them." (50) |
| इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि नलोपाख्यानपर्वणि नलान्वेषणे एकोनसप्ततितमोऽध्यायः ॥69॥ | इस प्रकार श्रीयहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत नलोपाख्यानपर्वमें नलकी खोजविषयक उनहत्तरवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥69॥ | "Thus ends the sixty-ninth chapter in the Nalopakhyana Parva of the Vana Parva in the Sri Mahabharata, describing the search for Nala." (69) |
| सप्ततितमोऽध्यायः | सत्तरवाँ अध्याय | **Chapter Seventieth: |
| पर्णादका दमयन्तीसे बाहुकरूपधारी नलका समाचार बताना और दमयन्तीका ऋतुपर्णके यहाँ सुदेव नामक ब्राह्मणको स्वयंवरका संदेश देकर भेजना | पर्णादका दमयन्तीसे बाहुकरूपधारी नलका समाचार बताना और दमयन्तीका ऋतुपर्णके यहाँ सुदेव नामक ब्राह्मणको स्वयंवरका संदेश देकर भेजना | Parṇāda Informs Damayanti about Nala Disguised as Vahuka; Damayanti Sends Sudeva the Brahmin to Ṛtuparṇa with News of a Second Swayamvara** |
| बृहदश्च उवाच अथ दीर्घस्य कालस्य पर्णादो नाम वै द्विजः । प्रत्येत्य नगरं भैमीमिदं वचनमब्रवीत् ॥1॥ |
बृहदश्च मुनि कहते हैं--राजन्! तदनन्तर दीर्घ-कालके पश्चात् पर्णाद नामक ब्राह्मण विदर्भदेशकी राजधानीमें लौटकर आये और दमयन्तीसे इस प्रकार बोले ॥1॥ | Sage Brihadasva narrates: "O King! After a long time, a Brahmin named Parṇāda returned to the capital of Vidarbha and spoke to Damayanti as follows..." (1) |
| नैषधं मृगयानेन दमयन्ति मया नलम् । अयोध्यां नगरीं गत्वा भाङ्गासुरिमुपस्थितः ॥2॥ |
"दमयन्ती! मैं निषधनरेश नलको ढूँढ़ता हुआ अयोध्या नगरीमें गया और वहाँ राजा ऋतुपर्णके दरबारमें उपस्थित हुआ ॥2॥ | "Damayanti! I went to the city of Ayodhya in search of King Nala of Nishadha and appeared in the court of King Ṛtuparṇa." (2) |
| श्रावितश्च मया वाक्यं त्वदीयं स महाजने
। ऋतुपर्णो महाभागो यथोक्तं वरवर्णिनि ॥3॥ तच्छुत्वा नाब्रवीत् किंचिदृतुपर्णो नराधिपः । न च पारिषदः कश्चिद् भाष्यमाणो मयासकृत् ॥4॥ |
“वहाँ बहुत लोगोंकी भीडमे मैंने तुम्हारा वाक्य महाभाग ऋतुपर्णको सुनाया। वरवर्णिनि! उस बातको सुनकर राजा ऋतुपर्ण कुछ न बोले। मेरे बार-बार कहनेपर भी उनका कोई सभासद् भी इसका उत्तर न दे सका ॥ 3-4॥ | "There, in the midst of a large crowd, I recited your message to the noble Ṛtuparṇa. O beautiful one! Hearing those words, King Ṛtuparṇa remained silent. Even after I repeated it several times, none of his courtiers could answer." (3-4) |
| अनुज्ञातं तु मां राज्ञा विजने कश्चिदब्रवीत् । ऋतुपर्णस्य पुरुषो बाहुको नाम नामतः ॥5॥ |
“परंतु ऋतुपर्णके यहाँ बाहुक नामधारी एक पुरुष है, उसने जब मैं राजासे विदा लेकर लौटने लगा, तब मुझसे एकान्तमें आकर तुम्हारी बातोंका उत्तर दिया ॥5॥ | "However, there is a man named Vahuka in Ṛtuparṇa's service. When I was about to take leave of the king and return, he approached me privately and responded to your words." (5) |
| सूतस्तस्य नरेन्द्रस्य विरूपो हूस्वबाहुकः । शीघ्रयानेषु कुशलो मृष्टकर्ता च भोजने ॥6॥ |
“वह महाराज ऋतुपर्णका सारथि है। उसकी भुजाएँ छोटी हैं तथा वह देखनेमें कुरूप भी है। वह घोड़ोंको शीघ्र हाँकनेमें कुशल है और अपने बनाये हुए भोजनमें बड़ा मिठास उत्पन्न कर देता है ॥6॥ | "He is the charioteer of King Ṛtuparṇa. His arms are short, and he is also unpleasant to look at. He is skilled in driving horses swiftly and creates great sweetness in the food he prepares." (6) |
| स विनिःश्वस्य बहुशो रुदित्वा च पुनः पुनः । कुशलं चैव मां पृष्ट्वा पश्चादिदमभाषत ॥7॥ |
“बाहुकने बार-बार लंबी साँसें खींचकर अनेक बार रोदन किया और मुझसे कुशल- समाचार पूछकर फिर वह इस प्रकार कहने लगा-- ॥7॥ | "Vahuka sighed deeply several times, wept repeatedly, and after inquiring about my well-being, he said..." (7) |
| वैषम्यमपि सम्प्राप्ता गोपायन्ति कुलस्त्रियः । आत्मानमात्मना सत्यो जितः स्वर्गो न संशयः ॥8॥ |
'उत्तम कुलकी स्त्रियाँ बड़े भारी संकटमें पड़कर भी स्वयं अपनी रक्षा करती हैं। ऐसा करके वे सत्य और स्वर्ग दोनोंपर विजय पा लेती हैं, इसमें संशय नहीं है ॥8॥ | "'Women of noble families protect themselves even in the face of great adversity. By doing so, they conquer both truth and heaven, there is no doubt.' (8) |
| रहिता भर्तृभिश्चैव न कुप्यन्ति कदाचन । प्राणांश्चारित्रकवचान् धारयन्ति वरस्त्रियः ॥9॥ |
शरेष्ठ नारियाँ अपने पतियोंसे परित्यक्त होनेपर भी कभी क्रोध नहीं करतीं। वे सदाचाररूपी कवचसे आवृत प्राणोंको धारण करती हैं ॥9॥ | "'Noble women never get angry even when abandoned by their husbands. They preserve their lives, protected by the armor of virtuous conduct.'" (9) |
| विषमस्थेन मूढेन परिभ्रष्टसुखेन च । यत् सा तेन परित्यक्ता तत्र न क्रोद्धुमर्हति ॥10॥ |
“वह पुरुष बड़े संकटमें था, सुखके साधनोंसे वंचित होकर किंकर्तव्यविमूढ हो गया था। ऐसी दशामें यदि उसने अपनी पत्नीका परित्याग किया है तो इसके लिये पत्नीको उसपर क्रोध नहीं करना चाहिये ॥10॥ | "'That man was in great distress, deprived of all means of happiness, and bewildered about what to do. In such a situation, if he abandoned his wife, she should not be angry with him.'" (10) |
| प्राणयात्रां परिप्रेप्सोः शकुनैर्हृतवाससः । आधिभिर्दह्यमानस्य श्यामा न क्रोद्धुमर्हति ॥11॥ |
"जीविका पानेके लिये चेष्टा करते समय पक्षियोंने जिसके वस्त्रका अपहरण कर लिया था और जो अनेक प्रकारकी मानसिक चिन्ताओंसे दग्ध हो रहा था, उस पुरुषपर श्यामाको क्रोध नहीं करना चाहिये ॥11॥ | "'The dark-haired woman should not be angry with the man whose clothes were stolen by birds while he was trying to earn a living and who was consumed by various mental anxieties.'" (11) |
| सत्कृतासत्कृता वापि पति दृष्ट्वा तथागतम् । भ्रष्टराज्यं श्रिया हीनं क्षुधितं व्यसनाप्लुतम् ॥12॥ |
'पतिने उसका सत्कार किया हो या असत्कार-उसे चाहिये कि पतिको वैसे संकटमें पड़ा देखकर उसे क्षमा कर दे; क्योंकि वह राज्य और लक्ष्मीसे वंचित हो भूखसे पीड़ित एवं विपत्तिके अथाह सागरमें डूबा हुआ था” ॥12॥ | "'Whether her husband treated her well or badly, she should forgive him seeing him in such distress, for he was deprived of his kingdom and wealth, afflicted with hunger, and drowning in the vast ocean of calamity.'" (12) |
| तस्य तद् वचनं श्रुत्वा त्वरितोऽहमिहागतः । श्रुत्वा प्रमाणं भवती राज्ञश्चैव निवेदय ॥13॥ |
'बाहुककी वह बात सुनकर मैं तुरंत यहाँ चला आया। यह सब सुनकर अब कर्तव्याकर्तव्यके निर्णयमें तुम्हीं प्रमाण हो। (तुम्हारी इच्छा हो तो) महाराजको भी ये बातें सूचित कर दो” ॥13॥ | "'Hearing these words of Vahuka, I immediately came here. Having heard all this, you are the authority on deciding what should be done. (If you wish) you can also inform the king about this.'" (13) |
| एतच्छुत्वाश्रुपूर्णाक्षी पर्णादस्य विशाम्पते । दमयन्ती रहोऽभ्येत्य मातरं प्रत्यभाषत ॥14॥ |
युधिष्ठिर! पर्णादका यह कथन सुनकर दमयन्तीके नेत्रोंमें आँसू भर आया। उसने एकान्तमें जाकर अपनी मातासे कहा-- ॥14॥ | "O Yudhishthira! Hearing these words of Parṇāda, Damayanti's eyes filled with tears. She went to her mother privately and said..." (14) |
| अयमर्थो न संवेद्यो भीमे मातः कदाचन
। त्वत्संनिधौ नियोक्ष्येऽहं सुदेवं द्विजसत्तमम् ॥15॥ यथा न नृपतिर्भीमः प्रतिपद्योत मे मतम् । तथा त्वया प्रकर्तव्यं मम चेत् प्रियमिच्छसि ॥16॥ |
'माँ! पिताजीको यह बात कदापि मालूम न होनी चाहिये। मैं तुम्हारे ही सामने विप्रवर सुदेवको इस कार्यमें लगाउँगी। तुम ऐसी चेष्टा करो, जिससे पिताजीको मेरा विचार ज्ञात न हो। यदि तुम मेरा प्रिय करना चाहती हो तो तुम्हें इसके लिये सचेष्ट रहना होगा ॥ 15-16॥ | "'Mother! Father should never know about this. I will engage the Brahmin Sudeva in this task in your presence. Please ensure that father does not come to know about my plan. If you wish to do me a favor, you must be vigilant about this.'" (15-16) |
| यथा चाहं समानीता सुदेवेनाशु बान्धवान्
। तेनैव मङ्गलेनाशु सुदेवो यातु मा चिरम् ॥17॥ समानेतुं नलं मातरयोध्यां नगरीमितः । |
'जैसे सुदेवने मुझे यहाँ लाकर बन्धु-बान्धवोंसे शीघ्र मिला दिया, उसी मंगलमय उद्देश्यकी सिद्धिके लिये सुदेव ब्राह्मण फिर शीघ्र ही यहाँसे अयोध्या जायं, देर न करें। माँ! वहाँ जानेका उद्देश्य है, महाराज नलको यहाँ ले आना” ॥17॥ | "'Just as Sudeva brought me here and quickly reunited me with my relatives, for the accomplishment of the same auspicious purpose, let Sudeva the Brahmin quickly depart from here to Ayodhya without delay. Mother! The purpose of going there is to bring King Nala here.'" (17) |
| विश्रान्तं तु ततः पश्चात् पर्णादं द्विजसत्तमम् ॥18॥ अर्चयामास वैदर्भी धनेनातीव भाविनी । नले चेहागते तत्र भूयो दास्यामि ते वसु ॥19॥ |
इतनेहीमें विप्रवर पर्णाद जब विश्राम कर चुके, तब विदर्भराजकुमारी दमयन्तीने बहुत धन देकर उनका सत्कार किया और यह भी कहा-'महाराज नलके यहाँ पधारनेपर मैं आपको और भी धन दूँगी ॥ 18-19॥ | "Meanwhile, when the Brahmin Parṇāda had rested, Damayanti, the princess of Vidarbha, honored him with much wealth and also said, 'When King Nala arrives here, I will give you even more wealth.'" (18-19) |
| त्वया हि मे बहु कृतं यदन्यो न करिष्यति । यद् भर्त्राहं समेष्यामि शीघ्रमेव द्विजोत्तम ॥20॥ |
'विप्रवर! आपने मेरा बहुत बड़ा उपकार किया, जो दूसरा नहीं कर सकता; क्योंकि अब मैं अपने स्वामीसे शीघ्र ही मिल सकूँगी” ॥20॥ | "'O best of Brahmins! You have done me a great favor that no one else could, because now I will be able to meet my husband soon.'" (20) |
| द हि नज स एवमुक्तोऽथाश्चास्य आशीवदिः सुमङ्गलैः । गृहानुपययौ चापि कृतार्थः सुमहामनाः ॥21॥ |
दमयन्तीके ऐसा कहनेपर अत्यन्त उदार हृदयवाले पर्णाद अपने परम मंगलमय आशीर्वादोंद्वारा उसे आश्वासन दे कृतार्थ हो अपने घर चले गये ॥21॥ | "When Damayanti said this, the generous-hearted Parṇāda, consoling her with his most auspicious blessings, felt gratified and returned to his home." (21) |
| ततः सुदेवमाभाष्य दमयन्ती युधिष्ठिर । अब्रवीत् संनिधौ मातुर्दुःखशोकसमन्विता ॥22॥ |
युधिष्ठिर! तदनन्तर दमयन्तीने सुदेव ब्राह्मणको बुलाकर अपनी माताके समीप दुःख- शोकसे पीडित होकर कहा-- ॥22॥ | "O Yudhishthira! Then, Damayanti called Sudeva the Brahmin and, distressed with sorrow, said to him in the presence of her mother..." (22) |
| गत्वा सुदेव नगरीमयोध्यावासिनं नृपम् । ऋतुपर्ण वचो ब्रूहि सम्पतन्निव कामगः ॥23॥ |
'सुदेवजी! आप इच्छानुसार चलनेवाले द्रुतगामी पक्षीकी भाँति शीघ्रतापूर्वक अयोध्या नगरीमें जाकर वहाँके निवासी राजा ऋतुपर्णसे कहिये- ॥23॥ | "'Sudeva! Go swiftly to the city of Ayodhya like a fast-flying bird that travels wherever it wishes, and tell King Ṛtuparṇa who resides there..." (23) |
| आस्थास्यति पुनर्भैमी दमयन्ती स्वयंवरम् । तत्र गच्छन्ति राजानो राजपुत्राश्च सर्वशः ॥24॥ |
'भीमकुमारी दमयन्ती पुनः स्वयंवर करेगी। वहाँ बहुत-से राजा और राजकुमार सब ओरसे जा रहे हैं ॥24॥ | "'Damayanti, the daughter of Bhima, will hold another swayamvara (self-choice ceremony). Many kings and princes are coming there from all directions.'" (24) |
| तथा च गणितः कालः श्वोभूते स भविष्यति । यदि सम्भावनीयं ते गच्छ शीघ्रमरिंदम ॥25॥ |
'उसके लिये समय नियत हो चुका है। कल ही स्वयंवर होगा। शत्रुदमन! यदि आपका वहाँ पहुँचना सम्भव हो तो शीघ्र जाइये ॥25॥ | "'The time for it has been fixed. The swayamvara will be held tomorrow itself. O subduer of enemies! If it is possible for you to reach there, go quickly.'" (25) |
| सूर्योदये द्वितीयं सा भतरं वरयिष्यति । न हि स ज्ञायते वीरो नलो जीवति वा न वा ॥26॥ |
'कल सूर्योदय होनेके बाद वह दूसरे पतिका वरण कर लेगी; क्योंकि वीरवर नल जीवित हैं या नहीं, इसका कुछ पता नहीं लगता है" ॥26॥ | "'Tomorrow, after sunrise, she will choose another husband because there is no news whether the heroic Nala is alive or not.'" (26) |
| एवं तया यथोक्तो वै गत्वा राजानमब्रवीत् । ऋतुपर्ण महाराज सुदेवो ब्राह्मणस्तदा ॥27॥ |
महाराज! दमयन्तीके इस प्रकार बतानेपर सुदेव ब्राह्मणने राजा ऋतुपर्णके पास जाकर वही बात कही ॥27॥ | "O King! When Damayanti instructed him thus, Sudeva the Brahmin went to King Ṛtuparṇa and conveyed the same message." (27) |
| इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि नलोपाख्यानपर्वणि दमयन्तीपुनःस्वयंवरकथने सप्ततितमोऽध्यायः ॥70॥ | इस प्रकार श्रीमहा भारत वनपर्वके अन्तर्गत नलोपाख्यानपर्वमें दमयन्तीके पुन: स्वयंवरकी चचसि सम्बन्ध रखनेवाला सत्तरवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥70॥ | "Thus ends the seventieth chapter in the Nalopakhyana Parva of the Vana Parva in the Sri Mahabharata, relating to Damayanti's plan for a second swayamvara." (70) |
| एकसप्ततितमोऽध्यायः | इकहत्तरवाँ अध्याय | **Chapter Seventy-First: |
| राजा ऋतुपर्णका विदर्भदेशको प्रस्थान, राजा नलके विषयमे वाष्णेयका विचार और बाहुककी अद्भुत अश्वसंचालन-कलासे वार्ष्णेय और ऋतुपर्णका प्रभावित होना | राजा ऋतुपर्णका विदर्भदेशको प्रस्थान, राजा नलके विषयमे वाष्णेयका विचार और बाहुककी अद्भुत अश्वसंचालन-कलासे वार्ष्णेय और ऋतुपर्णका प्रभावित होना | King Ṛtuparṇa Departs for Vidarbha; Vārṣṇeya's Thoughts about King Nala and His Amazement at Vahuka's Extraordinary Skill in Driving Horses** |
| बृहदश्च उवाच श्रुत्वा वचः सुदेवस्य ऋतुपर्णो नराधिपः । सान्त्ययन् श्लक्ष्णया वाचा बाहुकं प्रत्यभाषत ॥1॥ |
बृहदश्च मुनि कहते हैं-युधिष्ठिर! सुदेवकी वह बात सुनकर राजा ऋतुपर्णने मधुर वाणीसे सान्त्वना देते हुए बाहुकसे कहा- ॥1॥ | Sage Brihadasva narrates: "O Yudhishthira! Hearing those words of Sudeva, King Ṛtuparṇa, consoling him with sweet words, said to Vahuka..." (1) |
| विदर्भान् यातुमिच्छामि दमयन्त्याः स्वयंवरम् । एकाह्ना हयतत्त्वज्ञ मन्यसे यदि बाहुक ॥2॥ |
"बाहुक! तुम अश्वविद्याके तत्त्वज्ञ हो, यदि मेरी बात मानो तो मैं दमयन्तीके स्वयंवरमें सम्मिलित होनेके लिये एक ही दिनमें विदर्भदेशकी राजधानीमें पहुँचना चाहता हूँ! ॥2॥ | "Vahuka! You are knowledgeable in the science of horses. If you agree, I wish to reach the capital of Vidarbha in a single day to attend Damayanti's swayamvara!" (2) |
| एवमुक्तस्य कौन्तेय तेन राज्ञा नलस्य ह । व्यदीर्यत मनो दुःखात् प्रदध्यौ च महामनाः ॥3॥ |
कुन्तीनन्दन! राजा ऋतुपर्णे ऐसा कहनेपर राजा नलका मन अत्यन्त दुःखसे विदीर्ण होने लगा। महामना नल बहुत देरतक किसी भारी चिन्तामें निमग्न हो गये ॥3॥ | "O son of Kunti! When King Ṛtuparṇa said this, King Nala's mind was torn with sorrow. The noble-minded Nala was immersed in deep thought for a long time." (3) |
| दमयन्ती वदेदेतत् कुर्याद् दुःखेन मोहिता । अस्मदर्थे भवेद् वायमुपायश्चिन्तितो महान् ॥4॥ |
वे सोचने लगे-'क्या दमयन्ती ऐसी बात कह सकती है? अथवा सम्भव है, दुःखसे मोहित होकर वह ऐसा कार्य कर ले। कहीं ऐसा तो नहीं है कि उसने मेरी प्राप्तिके लिये यह महान् उपाय सोच निकाला हो? ॥4॥ | "He thought, 'Could Damayanti really say such a thing? Or perhaps, overwhelmed with grief, she might do such a thing. Could it be that she has devised this great plan to find me?'" (4) |
| नृशंसं बत वैदर्भी भर्तृकामा तपस्विनी
। मया क्षुद्रेण निकृता कृपणा पापबुद्धिना ॥5॥ स्त्रीस्वभावश्चलो लोके मम दोषश्च दारुणः । स्यादेवमपि कुर्यात् सा विवासाद् गतसौह्ृदा ॥6॥ |
'तपस्विनी एवं दीन विदर्भराजकुमारीको मुझ नीच एवं पापबुद्धि पुरुषने धोखा दिया है, इसीलिये वह ऐसा निष्ठुर कार्य करनेको उद्यत हो गयी। संसारमें स्त्रीका चंचल स्वभाव प्रसिद्ध है। मेरा अपराध भी भयंकर है। सम्भव है मेरे प्रवाससे उसका हार्दिक स्नेह कम हो गया हो, अतः वह ऐसा भी कर ले ॥ 5-6॥ | "'That ascetic and miserable princess of Vidarbha has been deceived by me, a lowly and sinful man, that is why she is ready to do such a cruel thing. The fickle nature of women is well known in the world. My offense is also grave. It is possible that her heartfelt affection has diminished due to my absence, so she might do this.'" (5-6) |
| मम शोकेन संविग्ना नैराश्यात् तनुमध्यमा । नैवं सा कर्हिचित् कुर्यात् सापत्या च विशेषतः ॥7॥ |
“क्योंकि पतली कमरवाली वह युवती मेरे शोकसे अत्यन्त उद्विग्न हो उठी होगी और मेरे मिलनेकी आशा न होनेके कारण उसने ऐसा विचार कर लिया होगा, परंतु मेरा हृदय कहता है कि वह कभी ऐसा नहीं कर सकती। विशेषतः वह संतानवती है। इसलिये भी उससे ऐसी आशा नहीं की जा सकती ॥7॥ | "'Because that young woman with a slender waist must be extremely distressed by my sorrow, and seeing no hope of my return, she must have thought this way. But my heart says that she can never do this. Especially since she has children, such an act cannot be expected from her.'" (7) |
| यदत्र सत्यं वासत्यं गत्वा वेत्स्यामि निश्चयम् । ऋतुपर्णस्य वै काममात्मार्थं च करोम्यहम् ॥8॥ |
“इसमें कितना सत्य या असत्य है-इसे मैं वहाँ जाकर ही निश्चितरूपसे जान सकूँगा, अतः मैं अपने लिये ही ऋतुपर्णकी इस कामनाको पूर्ण करूँगा” ॥8॥ | "'I will be able to know for sure how much truth or falsehood there is in this only by going there, so I will fulfill this desire of Ṛtuparṇa for my own sake.'" (8) |
| इति निश्चित्य मनसा बाहुको दीनमानसः
। कृताञ्जलिरुवाचेदमृतुपर्ण जनाधिपम् ॥9॥ प्रतिजानामि ते वाक्यं गमिष्यामि नराधिप । एकाह्ना पुरुषव्याघ्र विदर्भनगरीं नृप ॥10॥ |
मन-ही-मन ऐसा निश्चय करके दीनहूदय बाहुकने दोनों हाथ जोड़कर राजा ऋतुपर्णसे इस प्रकार कहा--“नरेश्वर! पुरुषसिंह! मैंने आपकी आज्ञा सुनी है, मैं प्रतिज्ञापूर्वक कहता हूँ कि मैं एक ही दिनमें विदर्भदेशकी राजधानीमें आपके साथ जा पहुँचूँगा' ॥ 9-10॥ | "Having decided this in his mind, the disheartened Vahuka, with folded hands, said to King Ṛtuparṇa, 'O King! O lion among men! I have heard your command. I promise that I will reach the capital of Vidarbha with you in a single day.'" (9-10) |
| ततः परीक्षामश्वानां चक्रे राजन् स बाहुकः । अश्वशालामुपागम्य भाङ्गासुरिनृपाज्ञया ॥11॥ |
युधिष्ठिर! तदनन्तर बाहुकने अश्वशालामें जाकर राजा ऋतुपर्णकी आज्ञासे अश्वोंकी परीक्षा की ॥11॥ | "O Yudhishthira! Then, Vahuka went to the stable and, at King Ṛtuparṇa's command, examined the horses." (11) |
| स त्वर्यमाणो बहुश ऋतुपर्णेन बाहुकः । अश्वाज्जिज्ञासमानो वै विचार्य च पुनः पुनः । अध्यगच्छत् कृशानश्चान् समर्थानध्वनि क्षमान् ॥12॥ |
ऋतुपर्ण बाहुकको बार-बार उत्तेजित करने लगे, अतः उसने अच्छी तरह विचार करके अश्वोंकी परीक्षा कर ली और ऐसे अश्वोंको चुना, जो देखनेमें दुबले होनेपर भी मार्ग तय करनेमें शक्तिशाली एवं समर्थ थे ॥12॥ | "Ṛtuparṇa repeatedly urged Vahuka, so he carefully examined the horses and chose those that, despite appearing lean, were strong and capable of covering long distances." (12) |
| तेजोबलसमायुक्तान् कुलशीलसमन्वितान् । वर्जिताँल्लक्षणैहीनैः पृथुप्रोथान् महाहनून् ॥13॥ |
वे तेज और बलसे युक्त थे। वे अच्छी जातिके और अच्छे स्वभावके थे। उनमें अशुभ लक्षणोंका सर्वथा अभाव था। उनकी नाक मोटी और थूथन (ठोड़ी) चौड़ी थी ॥13॥ | "They were endowed with speed and strength. They were of good breed and temperament. They were completely devoid of inauspicious marks. Their noses were thick, and their mouths (chins) were broad." (13) |
| शूद्धान् दशभिरावर्तैः सिन्धुजान् वातरंहसः । दृष्ट्वा तानब्रवीद् राजा किंचित् कोपसमन्वितः ॥14॥ |
वे वायुके समान वेगशाली सिन्धुदेशके घोड़े थे। वे दस आवर्त (भँवरियों)-के चिल्लोंसे युक्त होनेके कारण निर्दोष थे। उन्हें देखकर राजा ऋतुपर्णने कुछ कुपित होकर कहा -- ॥14॥ | "They were swift horses from the Sindhu region, as fast as the wind. They were flawless, possessing ten whorls (hair patterns). Seeing them, King Ṛtuparṇa, somewhat annoyed, said..." (14) |
| किमिदं प्रार्थितं कर्तु प्रलब्धव्या न ते वयम् । कथमल्पबलप्राणा वक्ष्यन्तीमे हया मम । महदध्वानमपि च गन्तव्यं कथमीदृशैः ॥15॥ |
“क्या तुमसे ऐसे ही घोड़े चुननेके लिये कहा था, तुम मुझे धोखा तो नहीं दे रहे हो। ये अल्प बल और शक्तिवाले घोड़े कैसे मेरा इतना बड़ा रास्ता तय कर सकेंगे? ऐसे घोड़ोंसे इतनी दूरतक रथ कैसे ले जाया जायगा?” ॥15॥ | "'Did I ask you to choose such horses? Are you not deceiving me? How will these horses with little strength and power be able to cover such a long distance for me? How will the chariot be taken so far with such horses?'" (15) |
| बाहुक उवाच एको ललाटे द्वौ मूर्ध्नि द्वौ द्वौ पार्श्चोपपार्श्चयोः । द्वौ द्वौ वक्षसि विज्ञेयौ प्रयाणे चैक एव तु ॥16॥ |
बाहुकने कहा-राजन्! ललाटमें एक, मस्तकमें दो, पार्श्वभागमें दो, उपपार्श्वभागमें भी दो, छातीमें दोनों ओर दो दो और पीठमें एक--इस प्रकार कुल बारह भेँवरियोंको पहचानकर घोड़े रथमें जोतने चाहिये ॥16॥ | "Vahuka said, 'O King! Horses should be harnessed to the chariot after identifying a total of twelve whorls - one on the forehead, two on the head, two on each side, two on each flank, two on each side of the chest, and one on the back.'" (16) |
| एते हया गमिष्यन्ति विदर्भान् नात्र संशयः । यानन्यान् मन्यसे राजन् ब्रूहि तान् योजयामि ते ॥17॥ |
ये मेरे चुने हुए घोड़े अवश्य विदर्भदेशकी राजधानीतक पहुँचेंगे, इसमें संशय नहीं है। महाराज! इन्हें छोड़कर आप जिनको ठीक समझें, उन्हींको मैं रथमें जोत दूँगा ॥17॥ | "These horses I have chosen will surely reach the capital of Vidarbha, there is no doubt. O King! Leaving these aside, I will harness whichever horses you deem fit.'" (17) |
| ऋतुपर्ण उवाच त्वमेव हयतत्त्वज्ञः कुशलो ह्यसि बाहुक । यान् मन्यसे समर्थास्त्वं क्षिप्रं तानेव योजय ॥18॥ |
ऋतुपर्ण बोले-बाहुक! तुम अश्वविद्याके तत्त्वज्ञ और कुशल हो, अतः तुम जिन्हें इस कार्यमे समर्थ समझो, उन्हींको शीघ्र जोतो ॥18॥ | "Ṛtuparṇa said, 'Vahuka! You are knowledgeable and skilled in the science of horses, so quickly harness those whom you consider capable for this task.'" (18) |
| ततः सदश्वांश्चतुरः कुलशीलसमन्वितान् । योजयामास कुशलो जवयुक्तान् रथे नलः ॥19॥ |
तब चतुर एवं कुशल राजा नलने अच्छी जाति और उत्तम स्वभावके चार वेगशाली घोड़ोंको रथमें जोता ॥19॥ | "Then, the clever and skillful King Nala harnessed four swift horses of good breed and excellent temperament to the chariot." (19) |
| ततो युक्तं रथं राजा समारोहत् त्वरान्वितः । अथ पर्यपतन् भूमौ जानुभिस्ते हयोत्तमाः ॥20॥ |
जुते हुए रथपर राजा ऋतुपर्ण बड़ी उतावलीके साथ सवार हुए। इसलिये उनके चढ़ते ही वे उत्तम घोड़े घुटनोंके बल पृथ्वीपर गिर पड़े ॥20॥ | "King Ṛtuparṇa hurriedly mounted the harnessed chariot. Due to his haste, those excellent horses fell to the ground on their knees as soon as he got on." (20) |
| ततो नरवरः श्रीमान् नलो राजा विशाम्पते । सान्त्वयामास तानश्चांस्तेजोबलसमन्वितान् ॥21॥ |
युधिष्ठिर! तब नरश्रेष्ठ श्रीमान् राजा नलने तेज और बलसे सम्पन्न उन घोड़ोंको पुचकारा ॥21॥ | "O Yudhishthira! Then, the noble King Nala, the best of men, caressed those horses endowed with speed and strength." (21) |
| रश्मिभिश्च समुद्यम्य नलो यातुमियेष सः
। सूतमारोप्य वार्ष्णेयं जवमास्थाय वै परम् ॥22॥ ते चोद्यमाना विधिवद् बाहुकेन हयोत्तमाः । समुत्पेतुरथाकाशं रथिनं मोहयन्निव ॥23॥ |
फिर अपने हाथमें बागडोर ले उन्हें काबूमें करके रथको आगे बढ़ानेकी इच्छा की। वार्ष्णेय सारथिको रथपर बैठाकर अत्यन्त वेगका आश्रय ले उन्होंने रथ हाँक दिया। बाहुकके द्वारा विधिपूर्वक हाँके जाते हुए वे उत्तम अश्व रथीको मोहित-से करते हुए इतने तीव्र वेगसे चले, मानो आकाशमें उड़ रहे हों ॥ 22-23॥ | "Then, taking the reins in his hand, he controlled them and wished to drive the chariot forward. Making Vārṣṇeya the charioteer sit on the chariot, he drove with great speed. Driven skillfully by Vahuka, those excellent horses, as if captivating the chariot rider, moved with such swiftness that it seemed as if they were flying in the sky." (22-23) |
| तथा तु दृष्ट्वा तानश्वान् वहतो वातरंहसः । अयोध्याधिपतिः श्रीमान् विस्मयं परमं ययौ ॥24॥ |
उस प्रकार वायुके समान वेगसे रथका वहन करनेवाले उन अश्वोंको देखकर श्रीमान् अयोध्यानरेशको बड़ा विस्मय हुआ ॥24॥ | "Seeing those horses carrying the chariot with a speed like the wind, the illustrious king of Ayodhya was greatly amazed." (24) |
| रथघोषं तु तं श्रुत्वा हयसंग्रहणं च तत्
। वार्ष्णेयश्चिन्तयामास बाहुकस्य हयज्ञताम् ॥25॥ किं नु स्यान्मातलिरयं देवराजस्य सारथिः । तथा तल्लक्षणं वीरे बाहुके दृश्यते महत् ॥26॥ |
रथकी आवाज सुनकर और घोड़ोंको काबूमें करनेकी वह कला देखकर वार्ष्णेयने बाहुकके अश्व-विज्ञानपर सोचना आरम्भ किया। “क्या यह देवराज इन्द्रका सारथि मातलि है? इस वीर बाहुकमें मातलिका-सा ही महान् लक्षण देखा जाता है ॥ 25-26॥ | "Hearing the sound of the chariot and seeing the skill in controlling the horses, Vārṣṇeya started thinking about Vahuka's knowledge of horses. 'Is this Mātali, the charioteer of Indra, the king of gods? This heroic Vahuka possesses great qualities like Mātali.'" (25-26) |
| शालिहोत्रोऽथ किं नु स्याद्धयानां कुलतत्त्ववित् । मानुषं समनुप्राप्तो वपुः परमशोभनम् ॥27॥ |
'अथवा घोड़ोंकी जाति और उनके विषयकी तात्त्विक बातें जाननेवाले ये आचार्य शालिहोत्र तो नहीं हैं, जो परम सुन्दर मानव शरीर धारण करके यहाँ आ पहुँचे हैं ॥27॥ | "'Or could this be Acharya Shalihotra himself, the knower of horse breeds and their nature, who has come here assuming a human form?'" (27) |
| उताहोस्विद् भवेद् राजा नलः परपुरंजयः । सोऽयं नृपतिरायात इत्येवं समचिन्तयत् ॥28॥ |
“अथवा शत्रुओंकी राजधानीपर विजय पानेवाले साक्षात् राजा नल ही तो इस रूपमे नहीं आ गये हैं? अवश्य वे ही है, इस प्रकार वार्ष्णेयने चिन्तन करना प्रारम्भ किया ॥28॥ | "'Or could this be King Nala himself, the conqueror of enemy capitals, who has come in this disguise? Surely it is him,' thus Vārṣṇeya started thinking." (28) |
| अथ चेह नलो विद्यां वेत्ति तामेव बाहुकः । तुल्यं हि लक्षये ज्ञानं बाहुकस्य नलस्य च ॥29॥ |
"राजा नल इस जगत्में जिस विद्याको जानते हैं, उसीको बाहुक भी जानता है। बाहुक और नल दोनोंका ज्ञान मुझे एक-सा दिखायी देता है ॥29॥ | "'Vahuka knows the same science of horses that King Nala knows in this world. The knowledge of both Vahuka and Nala seems identical to me.'" (29) |
| अपि चेदं वयस्तुल्यं बाहुकस्य नलस्य च । नायं नलो महावीर्यस्तदिद्यश्च भविष्यति ॥30॥ |
'इसी प्रकार बाहुक और नलकी अवस्था भी एक है। यह महापराक्रमी राजा नल नहीं है तो भी उनके ही समान विद्वान् कोई दूसरा महापुरुष होगा ॥30॥ | "'Similarly, the age of Vahuka and Nala is also the same. If this mighty hero is not King Nala, then he must be some other great man with similar knowledge.'" (30) |
| प्रच्छन्ना हि महात्मानश्चरन्ति पृथिवीमिमाम् । दैवेन विधिना युक्ताः शास्त्रोक्तैश्च निरूपणैः ॥31॥ |
'बहुत-से महात्मा प्रच्छन्न रूप धारण करके देवोचित विधि तथा शास्त्रोक्त नियमोंसे युक्त होकर इस पृथ्वीपर विचरते रहते हैं ॥31॥ | "'Many great souls wander this earth in disguise, following divine and scriptural rules.'" (31) |
| भवेन्न मतिभेदो मे गात्रवैरूप्यतां प्रति । प्रमाणात् परिहीनस्तु भवेदिति मतिर्मम ॥32॥ |
“इसके शरीरकी रूपहीनताको लक्ष्य करके मेरी बुद्धिमें यह भेद नहीं पैदा होता कि यह नल नहीं है, परंतु राजा नलकी जो मोटाई है, उससे यह कुछ दुबला-पतला है। उससे मेरे मनमें यह विचार होता है कि सम्भव है, यह नल न हो ॥32॥ | "'Considering the unassuming appearance of his body, my intellect does not create this distinction that this is not Nala. But he is somewhat thinner than King Nala. This makes me think that perhaps this is not Nala.'" (32) |
| वयःप्रमाणं तत्तुल्यं रूपेण तु विपर्ययः । नलं सर्वगुणैर्युक्तं मन्ये बाहुकमन्ततः ॥33॥ |
“इसकी अवस्थाका प्रमाण तो उन्हीके समान है, परंतु रूपकी दृष्टिसे तो अन्तर पड़ता है। फिर भी अन्ततः मैं इसी निर्णयपर पहुँचता हूँ कि मेरी रायमें बाहुक सर्वगुणसम्पन्न राजा नल ही है" ॥33॥ | "'The evidence of his age is similar to Nala's, but there is a difference in appearance. Yet, ultimately, I arrive at this conclusion that, in my opinion, Vahuka is indeed the all-accomplished King Nala.'" (33) |
| एवं विचार्य बहुशो वार्ष्णेयः पर्यचिन्तयत् । हृदयेन महाराज पुण्यश्लोकस्य सारथिः ॥34॥ |
महाराज युधिष्ठिर! इस प्रकार पुण्यश्लोक नलके सारथि वार्ष्णेयने बार-बार उपर्युक्त रूपसे विचार करते हुए मन-ही-मन उक्त धारणा बना ली ॥34॥ | "O King Yudhishthira! Thus, the charioteer Vārṣṇeya, repeatedly contemplating in the aforementioned manner, formed this belief in his mind." (34) |
| ऋऋतुपर्णश्च राजेन्द्रो बाहुकस्य हयज्ञताम् । चिन्तयन् मुमुदे राजा सहवार्ष्णेयसारथिः ॥35॥ |
महाराज ऋतुपर्ण भी बाहुकके अश्वसंचालन-विषयक ज्ञानपर विचार करके वार्ष्णेय सारथिके साथ बहुत प्रसन्न हुए ॥35॥ | "King Ṛtuparṇa was also very pleased with Vārṣṇeya the charioteer, considering Vahuka's knowledge of driving horses." (35) |
| ऐकाग्रयं च तथोत्साहं हयसंग्रहणं च तत् । परं यत्नं च सम्प्रेक्ष्य परां मुदमवाप ह ॥36॥ |
उसकी वह एकाग्रता, वह उत्साह, घोड़ोंको काबूमें रखनेकी वह कला और वह उत्तम प्रयत्न देखकर उन्हें बड़ी प्रसन्नता प्राप्त हुई ॥36॥ | "He was greatly pleased seeing his focus, enthusiasm, skill in controlling the horses, and excellent efforts." (36) |
| इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि नलोपाख्यानपर्वणि ऋतुपर्णविदर्भगमने एकसप्ततितमोऽध्यायः ॥71॥ | इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत नलोपाख्यानपर्वमें ऋठुपर्णका विदभदिशमें गमनविषयक इकहत्तरवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥71॥ | "Thus ends the seventy-first chapter in the Nalopakhyana Parva of the Vana Parva in the Sri Mahabharata, describing Ṛtuparṇa's journey to Vidarbha." (71) |
| दिसप्ततितमोध्याय: | बहत्तरवाँ अध्याय | **Chapter Seventy-Second: |
| ऋतुपर्णके उत्तरीय वस्त्र गिरने और बहेड़ेके वृक्षके फलोंको गिननेके विषयमें नलके साथ ऋतुपर्णकी बातचीत, ऋतुपर्णसे नलको दूतविदयाके तविद्याके रहस्यकी प्राप्ति और उनके 2 कलियुगका निकलना | ऋतुपर्णके उत्तरीय वस्त्र गिरने और बहेड़ेके वृक्षके फलोंको गिननेके विषयमें नलके साथ ऋतुपर्णकी बातचीत, ऋतुपर्णसे नलको दूतविदयाके तविद्याके रहस्यकी प्राप्ति और उनके 2 कलियुगका निकलना | Ṛtuparṇa's Upper Garment Falls; His Conversation with Nala about Counting the Fruits of a Myrobalan Tree; Nala Receives the Secret of Dice from Ṛtuparṇa; Kaliyuga Leaves Nala** |
| बृहदश्च उवाच स नदीः पर्वतांश्चैव वनानि च सरांसि च । अचिरेणातिचक्राम खेचरः खे चरन्निव ॥1॥ |
बृहदश्च मुनि कहते हैं-युधिष्ठिर! जैसे पक्षी आकाशमें उड़ता है, उसी प्रकार बाहुक (बड़े वेगसे) शीप्रतापूर्वक कितनी ही नदियों, पर्वतो, वनों और सरोवरोंको लोँघता हुआ आगे बढ़ने लगा ॥1॥ | Sage Brihadasva narrates: "O Yudhishthira! Just as a bird flies in the sky, similarly, Vahuka started moving forward (with great speed), swiftly crossing many rivers, mountains, forests, and lakes." (1) |
| तथा प्रयाते तु रथे तदा भाङ्गासुरिर्नृपः । उत्तरीयमधोऽपश्यद् भ्रष्टं परपुरंजयः ॥2॥ |
जब रथ इस प्रकार तीव्र गतिसे दौड़ रहा था, उसी समय शत्रुओंके नगरोंको जीतनेवाले राजा ऋतुपर्णने देखा, उनका उत्तरीय वस्त्र नीचे गिर गया है ॥2॥ | "While the chariot was moving with such swiftness, King Ṛtuparṇa, the conqueror of enemy cities, noticed that his upper garment had fallen down." (2) |
| ततः स त्वरमाणस्तु पटे निपतिते तदा
। ग्रहीष्यामीति तं राजा नलमाह महामनाः ॥3॥ निगृह्णीष्व महाबुद्धे हयानेतान् महाजवान् । वार्ष्णेयो यावदेनं मे पटमानयतामिह ॥4॥ |
उस समय वस्त्र गिर जानेपर उन महामना नरेशने बड़ी उतावलीके साथ नलसे कहा --“महामते! इस वेगशाली घोड़ोंको (थोड़ी देरके लिये) रोक लो। मैं अपनी गिरी हुई चादर लूँगा। जबतक यह वार्ष्णेय उतरकर मेरे उत्तरीय वस्त्रको ला दे, तबतक रथको रोके रहो' ॥ 3-4॥ | "At that moment, when the garment fell, that noble-minded king hurriedly said to Nala, 'O wise one! Stop these swift horses (for a moment). I will retrieve my fallen garment. Keep the chariot halted until Vārṣṇeya gets down and brings my upper garment.'" (3-4) |
| नलस्तं प्रत्युवाचाथ दूरे भ्रष्टः पटस्तव । योजनं समतिक्रान्तो नाहर्तु शक्यते पुनः ॥5॥ |
यह सुनकर नलने उसे उत्तर दिया-'महाराज! आपका वस्त्र बहुत दूर गिरा है। मैं उस स्थानसे चार कोस आगे आ गया हूँ। अब फिर वह नहीं लाया जा सकता” ॥5॥ | "Hearing this, Nala replied, 'O King! Your garment has fallen far behind. I have come four kos (approximately 8 miles) ahead of that place. Now it cannot be retrieved.'" (5) |
| एवमुक्तो नलेनाथ तदा भाङ्गासुरिर्नृपः । आससाद वने राजन् फलवन्तं बिभीतकम् ॥6॥ |
राजन्! नलके ऐसा कहनेपर राजा ऋतुपर्ण चुप हो गये। अब वे एक वनमें एक बहेड़ेके वृक्षके पास आ पहुँचे, जिसमें बहुत-से फल लगे थे ॥6॥ | "O King! When Nala said this, King Ṛtuparṇa became silent. Now they reached a myrobalan tree in a forest, laden with many fruits." (6) |
| तं दृष्ट्वा बाहुकं राजा त्वरमाणोऽभ्यभाषत । ममापि सूत पश्य त्वं संख्याने परमं बलम् ॥7॥ |
उस वृक्षको देखकर राजा ऋतुपर्णने तुरंत ही बाहुकसे कहा-'सूत! तुम देखो, मुझमें भी गणना करने (हिसाब लगाने) की कितनी अद्भुत शक्ति है ॥7॥ | "Seeing that tree, King Ṛtuparṇa immediately said to Vahuka, 'O charioteer! See how amazing my ability to calculate (count) is.'" (7) |
| सर्वः सर्व न जानाति सर्वज्ञो नास्ति कश्चन । नैकत्र परिनिष्ठास्ति ज्ञानस्य पुरुषे क्वचित् ॥8॥ |
'सब लोग सभी बातें नहीं जानते। संसारमें कोई भी सर्वज्ञ नहीं है तथा एक ही पुरुषमें सम्पूर्ण ज्ञानकी प्रतिष्ठा नहीं है ॥8॥ | "'Not everyone knows everything. No one in the world is omniscient, and complete knowledge does not reside in a single person.'" (8) |
| वृक्षेऽस्मिन् यानि पर्णानि फलान्यपि च बाहुक
। पतितान्यपि यान्यत्र तत्रैकमधिकं शतम् ॥9॥ एकपत्राधिकं चात्र फलमेकं च बाहुक । पञ्चकोट्योऽथ पत्राणां द्वयोरपि च शाखयोः ॥10॥ प्रचिनुह्यस्य शाखे द्वे याश्चाप्यन्याः प्रशाखिकाः । आभ्यां फलसहसे द्वे पञ्चोनं शतमेव च ॥11॥ |
'बाहुक! इस वृक्षपर जितने पत्ते और फल हैं, उन सबको मैं बताता हूँ। पेड़के नीचे जो पत्ते और फल गिरे हुए हैं, उनकी संख्या एक सौ अधिक है, इसके सिवा एक पत्र तथा एक फल और भी अधिक है; अर्थात् नीचे गिरे हुए पत्तों और फलोंकी संख्या वृक्षमें लगे हुए पत्तों और फलोंसे एक सौ दो अधिक है। इस वृक्षकी दोनों शाखाओंमें पाँच करोड़ पत्ते है। तुम्हारी इच्छा हो तो इन दोनों शाखाओं तथा इसकी अन्य प्रशाखाओं (को काटकर उन)-के पत्ते गिन लो। इसी प्रकार इन शाखाओंमें दो हजार पंचानबे फल लगे हुए हैं ॥ | "'Vahuka! I can tell you the total number of leaves and fruits on this tree. The number of leaves and fruits that have fallen under the tree is one hundred more than those on the tree, plus one extra leaf and one extra fruit. That is, the number of fallen leaves and fruits is one hundred and two more than those on the tree. There are five crore leaves on both branches of this tree. If you wish, you can cut these two branches and its other sub-branches and count their leaves. Similarly, there are two thousand and ninety-five fruits on these branches.'" (9-11) |
| ततो रथमवस्थाप्य राजानं बाहुकोऽब्रवीत्
। परोक्षमिव मे राजन् कत्थसे शत्रुकर्शन ॥12॥ प्रत्यक्षमेतत् कर्तास्मि शातयित्वा बिभीतकम् । अथात्र गणिते राजन् विद्यते न परोक्षता ॥13॥ प्रत्यक्षं ते महाराज शातयिष्ये बिभीतकम् । अहं हि नाभिजानामि भवेदेवं न वेति वा ॥14॥ |
यह सुनकर बाहुकने रथ खड़ा करके राजासे कहा--*शत्रुसूदन नरेश! आप जो कह रहे हैं, वह संख्या परोक्ष है। मैं इस बहेड़ेके वृक्षको काटकर उसके फलोंकी संख्याको प्रत्यक्ष करूगा। महाराज! आपकी आँखोंके सामने इस बहेड़ेको काटूँगा। इस प्रकार गणना कर लेनेपर वह संख्या परोक्ष नहीं रह जायगी। बिना ऐसा किये मैं तो नहीं समझ सकता कि (फलोंकी) संख्या इतनी है या नहीं ॥ 12-14॥ | "Hearing this, Vahuka stopped the chariot and said to the king, 'O enemy-subduing king! The number you are stating is unseen. I will cut down this myrobalan tree and verify the number of fruits. O King! I will cut down this myrobalan tree in front of your eyes. By counting in this way, the number will no longer remain unseen. Without doing this, I cannot believe whether the number (of fruits) is indeed that or not.'" (12-14) |
| संख्यास्यामि फलान्यस्य पश्यतस्ते जनाधिप । मुहूर्तमपि वार्ष्णेयो रश्मीन् यच्छतु वाजिनाम् ॥15॥ |
"जनेश्वर! यदि वार्ष्णेय दो घड्ीतक भी इन घोड़ोंकी लगाम संभाले तो मै आपके देखते-देखते इसके फलोंको गिन लूँगा” ॥15॥ | "'O lord of people! If Vārṣṇeya holds the reins of these horses for even two hours, I will count the fruits in front of you.'" (15) |
| तमब्रवीन्नृपः सूतं नायं कालो विलम्बितुम्
। बाहुकस्त्वब्रवीदेनं परं यत्नं समास्थितः ॥16॥ प्रतीक्षस्व मुहूर्त त्वमथवा त्वरते भवान् । एष याति शिवः पन्था याहि वार्ष्णेयसारथिः ॥17॥ |
तब राजाने सारथिसे कहा-'यह विलम्ब करनेका समय नहीं है।' बाहुक बोला- “मै प्रयत्नपूर्वक शीघ्र ही गणना समाप्त कर दूँगा। आप दो ही घड़ीतक प्रतीक्षा कीजिये। अथवा यदि आपको बड़ी जल्दी हो तो यह विदर्भदेशका मंगलमय मार्ग है, वार्ष्णेयको सारथि बनाकर चले जाइये” ॥ 16-17॥ | "Then the king said to the charioteer, 'This is not the time to delay.' Vahuka said, 'I will finish counting quickly with effort. Please wait for just two hours. Or if you are in great haste, this is the auspicious path to Vidarbha, proceed with Vārṣṇeya as your charioteer.'" (16-17) |
| अब्रवीदृतुपर्णस्तु सान्त्वयन् कुरुनन्दन । त्वमेव यन्ता नान्योऽस्ति पृथिव्यामपि बाहुक ॥18॥ |
कुरुनन्दन! तब ऋतुपर्णने उसे सान्त्वना देते हुए कहा--“बाहुक! तुम्हीं इन घोड़ोंको हाँक सकते हो। इस कलामें पृथ्वीपर तुम्हारे जैसा दूसरा कोई नहीं है ॥18॥ | "O descendant of Kuru! Then Ṛtuparṇa consoled him and said, 'Vahuka! Only you can drive these horses. There is no one else on earth like you in this skill.'" (18) |
| त्वत्कृते यातुमिच्छामि विदर्भान् हयकोविद । शरणं त्वां प्रपन्नोऽस्मि न विषघ्नं कर्तुमर्हसि ॥19॥ |
'घोड़ोंके रहस्यको जाननेवाले बाहुक! तुम्हारे ही प्रयत्नसे मैं विदर्भदेशकी राजधानीमें पहुँचना चाहता हूँ। देखो, तुम्हारी शरणमे आया हूँ। इस कार्यमें विघ्न न डालो ॥19॥ | "'O Vahuka, knower of the secrets of horses! I wish to reach the capital of Vidarbha through your efforts alone. See, I have come to you for refuge. Do not create obstacles in this task.'" (19) |
| कामं च ते करिष्यामि यन्मां वक्ष्यसि बाहुक । विदर्भान् यदि यात्वाद्य सूर्य दर्शयितासि मे ॥20॥ |
'बाहुक! यदि आज विदर्भदेशमें पहुँचकर तुम मुझे सूर्यका दर्शन करा सको तो तुम जो कहोगे, तुम्हारी वही इच्छा पूर्ण करूँगा” ॥20॥ | "'Vahuka! If you can take me to Vidarbha today and show me the sun, then I will fulfill any wish you ask.'" (20) |
| अथाब्रवीद् बाहुकस्तं संख्याय च बिभीतकम् । ततो विदर्भान् यास्यामि कुरुष्वैवं वचो मम ॥21॥ |
यह सुनकर बाहुकने कहा--'मैं बहेड़ेके फलोंको गिनकर विदर्भदेशको चलूँगा। आप मेरी यह बात मान लीजिये" ॥21॥ | "Hearing this, Vahuka said, 'I will count the fruits of the myrobalan tree and then proceed to Vidarbha. Please accept this request of mine.'" (21) |
| अकाम इव तं राजा गणयस्वेत्युवाच ह
। एकदेशं च शाखायाः समादिष्टं मयानघ ॥22॥ गणयस्वाश्च॒तत्त्वज्ञ ततस्त्वं प्रीतिमावह । सोऽवतीर्य रथात् तूर्णं शातयामास तं द्रुमम् ॥23॥ |
राजाने मानो अनिच्छासे कहा-'अच्छा, गिन लो। अश्वविद्याके तत्त्वको जाननेवाले निष्पाप बाहुक! मेरे बताये अनुसार तुम शाखाके एक ही भागको गिनो। इससे तुम्हें बड़ी प्रसन्नता होगी'। बाहुकने रथसे उतरकर तुरंत ही उस वृक्षको काट डाला ॥ 22-23॥ | "The king said, seemingly reluctantly, 'Alright, count them. O sinless Vahuka, knower of the essence of horsemanship! Count only one part of the branch as I have instructed. This will greatly please you.' Vahuka got down from the chariot and immediately cut down the tree." (22-23) |
| ततः स विस्मयाविष्टो राजानमिदमब्रवीत् । गणयित्वा यथोक्तानि तावन्त्येव फलानि तु ॥24॥ |
गिननेसे उसे उतने ही फल मिले। तब उसने विस्मित होकर राजा ऋतुपर्णसे कहा -- ॥24॥ | "Upon counting, he found the same number of fruits. Then, astonished, he said to King Ṛtuparṇa..." (24) |
| अत्यद्भुतमिदं राजन् दृष्टवानस्मि ते बलम्
। श्रोतुमिच्छामि तां विद्यां ययैतज्ज्ञायते नृप ॥25॥ तमुवाच ततो राजा त्वरितो गमने नृप । विद्धयक्षहृदयज्ञं मां संख्याने च विशारदम् ॥26॥ |
'राजन्! आपमें गणितकी यह अद्भुत शक्ति मैंने देखी है। नराधिप! जिस विद्यासे यह गिनती जान ली जाती है, उसे मैं सुनना चाहता हूँ।' राजा तुरंत जानेके लिये उत्सुक थे, अतः उन्होंने बाहुकसे कहा--“तुम मुझे दूत-विद्याका मर्मज्ञ और गणितमें अत्यन्त निपुण समझो" ॥ 25-26॥ | "'O King! I have witnessed this amazing ability of yours in mathematics. O king! I wish to learn the science by which this counting is known.' The king was eager to leave immediately, so he said to Vahuka, 'Consider me an expert in the science of dice and highly skilled in mathematics.'" (25-26) |
| बाहुकस्तमुवाचाथ देहि विद्यामिमां मम । मत्तोऽपि चाश्वहृदयं गृहाण पुरुषर्षभ ॥27॥ |
बाहुकने कहा--'पुरुषश्रेष्ठ! तुम यह विद्या मुझे बतला दो और बदलेमें मुझसे भी अश्व-विद्याका रहस्य ग्रहण कर लो” ॥27॥ | "Vahuka said, 'O best of men! Teach me this science, and in return, learn the secrets of horsemanship from me.'" (27) |
| ऋतुपर्णस्ततो राजा बाहुकं कार्यगौरवात् । हयज्ञानस्य लोभाच्च तं तथेत्यब्रवीद् वचः ॥28॥ |
तब राजा ऋतुपर्णने कार्यकी गुरुता और अश्व-विज्ञानके लोभसे बाहुकको आश्वासन देते हुए कहा-'तथास्तु” ॥28॥ | "Then King Ṛtuparṇa, considering the importance of the task and lured by the knowledge of horses, assured Vahuka, 'So be it.'" (28) |
| यथोक्तं त्वं गृहाणेदमक्षाणां हृदयं परम् । निक्षेपो मेऽश्चहृदयं त्वयि तिष्ठतु बाहुक । एवमुक्त्वा ददौ विद्यामृतुपर्णो नलाय वै ॥29॥ |
"बाहुक! तुम मुझसे द्यूत-विद्याका गूढ़ रहस्य ग्रहण करो और अश्वविज्ञानको मेरे लिये अपने ही पास धरोहरके रूपमें रहने दो।' ऐसा कहकर ऋतुपर्णने नलको अपनी विद्या दे दी ॥29॥ | "'Vahuka! You learn the secret of dice from me, and let the science of horses remain with me as a legacy.' Saying so, Ṛtuparṇa imparted his knowledge to Nala." (29) |
| तस्याक्षहृदयज्ञस्य शरीरान्निःसृतः कलिः
। कर्कोटकविषं तीक्ष्णं मुखात् सततमुद्धमन् ॥30॥ कलेस्तस्य तदार्तस्य शापाग्निः स विनिःसृतः । स तेन कर्शितो राजा दीर्घकालमनात्मवान् ॥31॥ |
द्यूत-विद्याका रहस्य जाननेके अनन्तर नलके शरीरसे कलियुग निकला। तब कर्कोटक नागके तीखे विषको अपने मुखसे बार-बार उगल रहा था। उस समय कष्टमें पड़े हुए कलियुगकी वह शापाग्नि भी दूर हो गयी। राजा नलको उसने दीर्घकालतक कष्ट दिया था और उसीके कारण वे किकर्तव्यविमूढ हो रहे थे ॥ 30-31॥ | "After learning the secret of dice, Kaliyuga left Nala's body. He was repeatedly vomiting the potent venom of Karkoṭaka Naga from his mouth. At that moment, the curse-born fire of Kaliyuga, who was suffering, also subsided. He had tormented King Nala for a long time, and because of him, Nala was bewildered about what to do." (30-31) |
| ततो विषविमुक्तात्मा स्वं रूपमकरोत् कलिः । तं शप्तुमैच्छत् कुपितो निषधाधिपतिर्नलः ॥32॥ |
तदनन्तर विषके प्रभावसे मुक्त होकर कलियुगने अपने स्वरूपको प्रकट किया। उस समय निषधनरेश नलने कुपित हो कलियुगको शाप देनेकी इच्छा की ॥32॥ | "Then, freed from the influence of the venom, Kaliyuga revealed his true form. At that time, King Nala of Nishadha, enraged, wished to curse Kaliyuga." (32) |
| तमुवाच कलिर्भीतो वेपमानः कृताञ्जलिः । कोपं संयच्छ नृपते कीर्ति दास्यामि ते पराम् ॥33॥ |
तब कलियुग भयभीत हो कापता हुआ हाथ जोड़कर उनसे बोला-'महाराज! अपने क्रोधको रोकिये। मैं आपको उत्तम कीर्ति प्रदान करूँगा ॥33॥ | "Then Kaliyuga, terrified and trembling, with folded hands, said to him, 'O King! Please restrain your anger. I will grant you great fame.'" (33) |
| इन्द्रसेनस्य जननी कुपिता माशपत् पुरा । यदा त्वया परित्यक्ता ततोऽहं भृशपीडितः ॥34॥ |
'इन्द्रसेनकी माता दमयन्तीने, पहले जब उसे आपने वनमें त्याग दिया था, कुपित होकर मुझे शाप दे दिया। उससे मैं बड़ा कष्ट पाता रहा हूँ ॥34॥ | "'Damayanti, the mother of Indrasena, cursed me in anger when you abandoned her in the forest. I have suffered greatly because of that.'" (34) |
| अवसं त्वयि राजेन्द्र सुदुःखमपराजित । विषेण नागराजस्य दह्यमानो दिवानिशम् ॥35॥ |
'किसीसे पराजित न होनेवाले महाराज! मैं आपके शरीरमें अत्यन्त दुःखित होकर रहता था। नागराज कर्कोटकके विषसे मैं दिन-रात झुलसता जा रहा था (इस प्रकार मुझे अपने कियेका कठोर दण्ड मिल गया है) ॥35॥ | "'O King, unconquered by anyone! I resided in your body, causing you great distress. I was being scorched day and night by the venom of Naga king Karkoṭaka (thus, I have received severe punishment for my actions).'" (35) |
| शरणं त्वां प्रपन्नोऽस्मि शृणु चेदं वचो मम
। ये च त्वां मनुजा लोके कीर्तयिष्यन्त्यतन्द्रिताः । मत्प्रसूतं भयं तेषां न कदाचिद् भविष्यति ॥36॥ भयार्तं शरणं यातं यदि मां त्वं न शप्स्यसे । एवमुक्तो नलो राजा न्ययच्छत् कोपमात्मनः ॥37॥ |
“अब मैं आपकी शरणमें हूँ। आप मेरी यह बात सुनिये। यदि भयसे पीड़ित और शरणमें आये हुए मुझको आप शाप नहीं देंगे तो संसारमें जो मनुष्य आलस्यरहित हो आपकी कीर्ति-कथाका कीर्तन करेंगे, उन्हें मुझसे कभी भय नहीं होगा।' कलियुगके ऐसा कहनेपर राजा नलने अपने क्रोधको रोक लिया ॥ 36-37॥ | "'Now I am under your refuge. Please listen to me. If you do not curse me, who is afflicted with fear and has come to you for shelter, then those in the world who diligently sing your praises will never be harmed by me.' When Kaliyuga said this, King Nala restrained his anger." (36-37) |
| ततो भीतः कलिः क्षिप्रं प्रविवेश बिभीतकम् । कलिस्त्वन्यैस्तदादृश्यः कथयन् नैषधेन वै ॥38॥ |
तदनन्तर कलियुग भयभीत हो तुरंत ही बहेड़ेके वृक्षमें समा गया। वह जिस समय निषधराज नलके साथ बात कर रहा था, उस समय दूसरे लोग उसे नहीं देख पाते थे॥38॥ | "Then, terrified, Kaliyuga immediately entered the myrobalan tree. While he was talking to King Nala of Nishadha, others could not see him." (38) |
| ततो गतज्वरो राजा नैषधः परवीरहा
। सम्प्रणष्टे कलौ राजा संख्यायास्य फलान्युत ॥39॥ मुदा परमया युक्तस्तेजसाथ परेण वै । रथमारुह्य तेजस्वी प्रययौ जवनैर्हयैः ॥40॥ |
तदनन्तर कलियुगके अदृश्य हो जानेपर शत्रुवीरोंका संहार करनेवाले निषधनरेश राजा नल सारी चिन्ताओंसे मुक्त हो गये। बहेड़ेके फलोंको गिनकर उन्हें बड़ी प्रसन्नता हुई। वे उत्तम तेजसे युत्ह तेजस्वी रूप धारण करके रथपर चढ़े और वेगशाली घोड़ोंको हाँकते हुए विदर्भदेशको चल दिये ॥ 39-40॥ | "Thereafter, when Kaliyuga disappeared, King Nala of Nishadha, the slayer of enemy heroes, was freed from all anxieties. He was very pleased after counting the fruits of the myrobalan tree. Endowed with excellent radiance, he assumed a radiant form, mounted the chariot, and proceeded towards Vidarbha, driving the swift horses." (39-40) |
| बिभीतककश्चाप्रशस्तः संवृत्तः कलिसंश्रयात्
। हयोत्तमानुत्पततो द्विजानिव पुनः पुनः ॥41॥ नलः संचोदयामास प्र्ृष्टेनान्तरात्मना । विदर्भाभिमुखो राजा प्रययौ स महायशाः ॥42॥ |
कलियुगके आश्रय लेनेसे बहेड़ेका वृक्ष निन्दित हो गया। तदनन्तर राजा नलने प्रसन्नचित्तसे पुनः घोड़ोंको हाँकना आरम्भ किया। वे उत्तम अश्व पक्षियोंकी तरह बार-बार उड़ते हुए-से प्रतीत हो रहे थे। अब महायशस्वी राजा नल विदर्भदेशकी ओर (बड़े वेगसे बढ़े) जा रहे थे ॥ 41-42॥ | "The myrobalan tree became condemned due to giving shelter to Kaliyuga. Then, King Nala, with a cheerful mind, started driving the horses again. Those excellent horses seemed to be flying repeatedly like birds. Now the glorious King Nala was proceeding towards Vidarbha (with great speed)." (41-42) |
| नले तु समतिक्रान्ते कलिरप्यगमद् गृहम् । ततो गतज्वरो राजा नलोऽभूत् पृथिवीपतिः । विमुक्तः कलिना राजन् रूपमात्रवियोजितः ॥43॥ |
नलके चले जानेपर कलि अपने घर चले गये। राजन्! कलिसे मुक्त हो भूमिपाल राजा नल सारी चिन्ताओंसे छुटकारा पा गये; किंतु अभीतक उन्हें अपना पहला रूप नहीं प्राप्त हुआ था। उनमें केवल इतनी ही कमी रह गयी थी ॥43॥ | "After Nala left, Kali returned to his abode. O King! Freed from Kali, King Nala, the ruler of the earth, was relieved of all anxieties, but he had not yet regained his original form. This was the only thing lacking." (43) |
| इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि नलोपाख्यानपर्वणि कलिनिर्गमे द्विसप्ततितमोऽध्यायः ॥72॥ | इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत नलोपाख्यानपर्वमें कलियुगनिर्गमनाविषयक बहत्तरवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥72॥ | "Thus ends the seventy-second chapter in the Nalopakhyana Parva of the Vana Parva in the Sri Mahabharata, describing the departure of Kaliyuga." (72) |
| त्रिसप्ततितमोऽध्यायः | तिहत्तरवॉ अध्याय | **Chapter Seventy-Third: |
| ऋतुपर्णका कुण्डिनपुरमें प्रवेश, दमयन्तीका विचार तथा भीमके द्वारा ऋतुपर्णका स्वागत | ऋतुपर्णका कुण्डिनपुरमें प्रवेश, दमयन्तीका विचार तथा भीमके द्वारा ऋतुपर्णका स्वागत | Ṛtuparṇa Arrives in Kuṇḍinapura; Damayanti's Thoughts; Bhima Welcomes Ṛtuparṇa** |
| बृहदश्च उवाच ततो विदर्भान् सम्प्राप्तं सायाह्ने सत्यविक्रमम् । ऋतुपर्ण जना राज्ञे भीमाय प्रत्यवेदयन् ॥1॥ |
बृहदश्च मुनि कहते हैं-युधिष्ठिर! तदनन्तर शाम होते-होते सत्यपराक्रमी राजा ऋतुपर्ण विदर्भराज्यमें जा पहुँचे। लोगोंने राजा भीमको इस बातकी सूचना दी ॥1॥ | Sage Brihadasva narrates: "O Yudhishthira! By evening, the truthful and valiant King Ṛtuparṇa reached the kingdom of Vidarbha. People informed King Bhima about this." (1) |
| स भीमवचनाद् राजा कुण्डिनं प्राविशत् पुरम् । नादयन् रथघोषेण सर्वाः स विदिशो दिशः ॥2॥ |
भीमके अनुरोधसे राजा ऋतुपर्णने अपने रथकी घर्घराहटद्वारा सम्पूर्ण दिशा- विदिशाओंको प्रतिध्वनित करते हुए कुण्डिनपुरमें प्रवेश किया ॥2॥ | "At Bhima's request, King Ṛtuparṇa entered Kuṇḍinapura, the city resounding with the clatter of his chariot in all directions." (2) |
| ततस्तं रथनिर्घोषं नलाश्वास्तत्र शुश्रुवुः । श्रुत्वा तु समहृष्यन्त पुरेव नलसंनिधौ ॥3॥ |
नलके घोड़े वहीं रहते थे, उन्होंने रथका वह घोष सुना। सुनकर वे उतने ही प्रसन्न और उत्साहित हुए, जितने कि पहले नलके समीप रहा करते थे ॥3॥ | "Nala's horses, who were staying there, heard the sound of the chariot. Hearing it, they became as happy and excited as they used to be in Nala's presence." (3) |
| दमयन्ती तु शुश्राव रथघोषं नलस्य तम् । यथा मेघस्य नदतो गम्भीरं जलदागमे ॥4॥ |
दमयन्तीने भी नलके रथकी वह घर्घराहट सुनी, मानो वर्षाकालमें गरजते हुए मेघोंका गम्भीर घोष सुनायी देता हो ॥4॥ | "Damayanti also heard the clatter of Nala's chariot, like the deep rumble of thundering clouds during the rainy season." (4) |
| परं विस्मयमापन्ना श्रुत्वा नादं महास्वनम् । नलेन संगृहीतेषु पुरेव नलवाजिषु । सदृशं रथनिर्घोषं मेने भौमी तथा हयाः ॥5॥ |
वह महाभयंकर रथनाद सुनकर उसे बड़ा विस्मय हुआ। पूर्वकालमें राजा नल जब घोड़ोंकी बाग सँभालते थे, उन दिनों उनके रथसे जैसी गम्भीर ध्वनि प्रकट होती थी, वैसी ही उस समयके रथकी घर्घराहट भी दमयन्ती और उसके घोड़ोंको जान पड़ी ॥5॥ | "She was astonished to hear that terrifying chariot sound. The clatter of the chariot at that time seemed to Damayanti and his horses to be the same deep sound that emanated from King Nala's chariot when he used to hold the reins." (5) |
| प्रासादस्थाश्च शिखिनः शालास्थाश्चैव वारणाः । हयाश्च शुश्नुवुस्तस्य रथघोषं महीपतेः ॥6॥ |
महलपर बैठे हुए मयूरो, गजशालामें बंधे हुए गजराजों और अश्वशालाके अश्चौने राजाके रथका वह अद्भुत घोष सुना ॥6॥ | "The peacocks sitting on the palace, the elephants tied in the elephant sheds, and the horses in the stables all heard the extraordinary sound of the king's chariot." (6) |
| तच्छुत्वा रथनिर्घोषं वारणाः शिखिनस्तथा । प्रणेदुरुन्मुखा राजन् मेघनाद इवोत्सुकाः ॥7॥ |
राजन्! रथकी उस आवाजको सुनकर हाथी और मयूर अपना मुँह ऊपर उठाकर उसी प्रकार उत्कण्ठापूर्वक अपनी बोली बोलने लगे, जैसे वे मेघोंकी गर्जना होनेपर बोला करते हैं ॥7॥ | "O King! Hearing the sound of the chariot, the elephants and peacocks raised their heads and eagerly trumpeted and screeched, just as they do when they hear thunder." (7) |
| दमयन्त्युवाच यथासौ रथनिर्घोषः पूरयन्निव मेदिनीम् । ममाह्लादयते चेतो नल एष महीपतिः ॥8॥ |
(उस समय) दमयन्तीने (मन-ही-मन) कहा-अहो! रथकी वह घर्घराहट इस पृथ्वीको गुँजाती हुई जिस प्रकार मेरे मनको आह्लाद प्रदान कर रही है, उससे जान पड़ता है, ये महाराज नल ही पधारे हैं ॥8॥ | "(At that time) Damayanti said (to herself), 'Oh! The way the clatter of the chariot is echoing through the earth and delighting my heart, it seems that King Nala himself has arrived.'" (8) |
| अद्य चन्द्राभववत्रं तं न पश्यामि नलं यदि । असंख्येयगुणं वीरं विनङ्क्षयामि न संशयः ॥9॥ |
आज यदि असंख्य गुणोंसे विभूषित तथा चन्द्रमाके समान मुखवाले वीरवर नलको न देखूँगी तो अपने इस जीवनका अन्त कर दूँगी, इसमें संशय नहीं है ॥9॥ | "If I do not see the heroic Nala today, adorned with countless virtues and with a face like the moon, I will surely end my life." (9) |
| यदि वै तस्य वीरस्य बाह्धोर्नाद्याहमन्तरम् । प्रविशामि सुखस्पर्शं न भविष्याम्यसंशयम् ॥10॥ |
आज यदि मैं उन वीरशिरोमणि नलकी दोनों भुजाओंके मध्यभागे, जिसका स्पर्श अत्यन्त सुखद है, प्रवेश न कर सकी तो अवश्य जीवित न रह सकूँगी ॥10॥ | "If I cannot embrace the chest of that jewel among heroes, Nala, whose touch is most pleasurable, I will surely not be able to live." (10) |
| यदि मां मेघनिर्घोषो नोपगच्छति नैषधः । अद्य चामीकरप्रख्यं प्रवेक्ष्यामि हुताशनम् ॥11॥ |
यदि रथद्धारा मेचके समान गम्भीर गर्जना करनेवाले निषधदेशके स्वामी महाराज नल आज मेरे पास नहीं पधारेंगे तो मैं सुवर्णके समान देदीप्यमान दहकती हुई आगमें प्रवेश कर जाऊंगी ॥11॥ | "If King Nala, the lord of Nishadha, who makes a deep roar like thunder with his chariot, does not come to me today, I will enter a blazing fire, radiant like gold." (11) |
| यदि मां सिंहविक्रान्तो मत्तवारणविक्रमः । नाभिगच्छति राजेन्द्रो विनङ्क्ष्यामि न संशयः ॥12॥ |
यदि सिंहके समान पराक्रमी और मतवाले हाथीके समान मस्तानी चालसे चलनेवाले राजराजेश्वर नल मेरे पास नहीं आयेंगे तो आज अपने जीवनको नष्ट कर दूँगी, इसमें संशय नहीं है ॥12॥ | "If Nala, the king of kings, valiant like a lion and with a majestic gait like a rutting elephant, does not come to me, I will surely end my life today." (12) |
| न स्मराम्यनृतं किंचिन्न स्मराम्यपकारताम् । न च पर्युषितं वाक्यं स्वैरेष्वपि कदाचन ॥13॥ |
मुझे याद नहीं कि स्वेच्छापूर्वक अर्थात् हँसी-मजाकमें भी मैं कभी झूठ बोली हूँ, स्मरण नहीं कि कभी किसीका मेरेद्वारा अपकार हुआ हो तथा यह भी स्मरण नहीं कि मैंने प्रतिज्ञा की हुई बातका उल्लंघन किया हो ॥13॥ | "I do not remember ever intentionally lying, even in jest. I do not recall ever harming anyone, nor do I remember ever breaking a promise." (13) |
| प्रभुः क्षमावान् वीरश्च दाता चाप्यधिको नृपैः । रहोऽनीचानुवर्ती च क्लीबवन्मम नैषधः ॥14॥ |
मेरे निषधराज नल शक्तिशाली, क्षमाशील, वीर, दाता, सब राजाओंसे श्रेष्ठ, एकान्तमें भी नीच कर्मसे दूर रहनेवाले तथा परायी स्त्रीके लिये नपुंसकतुल्य हैं ॥ | "My Nala, the king of Nishadha, is powerful, forgiving, heroic, generous, the best among all kings, one who stays away from vile deeds even in solitude, and is like a eunuch towards other women." (14) |
| गुणांस्तस्य स्मरन्त्या मे तत्पराया दिवानिशम् । हृदयं दीर्यत इदं शोकात् प्रियविनाकृतम् ॥15॥ |
मैं (सदा) उन्हीके गुणोंका स्मरण करती और दिन-रात उन्हीके परायण रहती हूँ। प्रियतम नलके बिना मेरा यह हृदय उनके विरहशोकसे विदीर्ण-सा होता रहता है ॥15॥ | "I (always) remember his virtues and am devoted to him day and night. Without my beloved Nala, my heart feels torn apart by the sorrow of separation." (15) |
| एवं विलपमाना सा नष्टसंज्ञेव भारत । आरुरोह महद् वेश्म पुण्यश्लोकदिदृक्षया ॥16॥ |
भारत! इस प्रकार विलाप करती हुई दमयन्ती अचेत-सी हो गयी। वह पुण्यश्लोक नलके दर्शनकी इच्छासे ऊँचे महलकी छतपर जा चढ़ी ॥16॥ | "O descendant of Bharata! Lamenting in this way, Damayanti became unconscious. Desiring to see the virtuous Nala, she climbed to the roof of the high palace." (16) |
| ततो मध्यमकक्षायां ददर्श रथमास्थितम् । ऋतुपर्ण महीपालं सहवार्ष्णेयबाहुकम् ॥17॥ |
वहाँसे उसने देखा, वार्ष्णेय और बाहुकके साथ रथपर बैठे हुए महाराज ऋतुपर्ण मध्यम कक्षा (परकोटे)-में पहुँच गये हैं ॥17॥ | "From there, she saw King Ṛtuparṇa, seated on the chariot with Vārṣṇeya and Vahuka, reaching the middle rampart (of the fort)." (17) |
| ततोऽवतीर्य वार्ष्णेयो बाहुकश्च रथोत्तमात् । हयांस्तानवमुच्याथ स्थापयामास वै रथम् ॥18॥ |
तदनन्तर वार्ष्णेय और बाहुकने उस उत्तम रथसे उतरकर घोड़े खोल दिये और रथको एक जगह खड़ा कर दिया ॥18॥ | "Then, Vārṣṇeya and Vahuka got down from that excellent chariot, unharnessed the horses, and parked the chariot in one place." (18) |
| सोऽवतीर्य रथोपस्थादृतुपर्णो नराधिपः । उपतस्थे महाराजं भीमं भीमपराक्रमम् ॥19॥ |
इसके बाद राजा ऋतुपर्ण रथके पिछले भागसे उतरकर भयानक पराक्रमी महाराज भीमसे मिले ॥19॥ | "After this, King Ṛtuparṇa got down from the back of the chariot and met the mighty King Bhima." (19) |
| तं भीमः प्रतिजग्राह पूजया परया ततः । स तेन पूजितो राज्ञा ऋतुपर्णो नराधिपः ॥20॥ |
तदनन्तर भीमने बड़े आदर-सत्कारके साथ उन्हें अपनाया और राजा ऋतुपर्णका भलीभाँति आदर-सत्कार किया ॥20॥ | "Then, Bhima received him with great honor and hospitality and welcomed King Ṛtuparṇa properly." (20) |
| स तत्र कुण्डिने रम्ये वसमानो महीपतिः । न च किंचित् तदापश्यत् प्रेक्षमाणो मुहुर्मुहुः । स तु राज्ञा समागम्य विदर्भपतिना तदा ॥21॥ |
अकस्मात् सहसा प्राप्तं स्त्रीमन्त्रं न स्म विन्दति । भूपाल ऋतुपर्ण रमणीय कुण्डिनपुरमें ठहर गये। उन्हें बार-बार देखनेपर भी वहाँ (स्वयंवर-जैसी) कोई चीज नहीं दिखायी दी। वे विदर्भनरेशसे मिलकर सहसा इस बातको न जान सके कि यह स्त्रियोंकी अकस्मात् गुप्त मन्त्रणामात्र थी ॥21॥ | "King Ṛtuparṇa stayed in the beautiful city of Kuṇḍinapura. Despite looking around repeatedly, he could not see any sign of a swayamvara. Meeting the king of Vidarbha, he could not immediately understand that this was just a sudden, secret plan of the women." (21) |
| किं कार्य स्वागतं तेऽस्तु राज्ञा पृष्टः स भारत ॥22॥ | भरतनन्दन युधिष्ठिर! विदर्भराजने स्वागत-पूर्वक ऋतुपर्णसे पूछा-'आपके यहाँ पधारनेका क्या कारण है?” ॥22॥ | "O Yudhishthira, descendant of Bharata! The king of Vidarbha welcomed Ṛtuparṇa and asked, 'What is the reason for your arrival here?'" (22) |
| नाभिजज्ञे स नृपतिर्दुहित्रर्थे समागतम् । ऋतुपर्णोऽपि राजा स धीमान् सत्यपराक्रमः ॥23॥ |
राजा भीम यह नहीं जानते थे कि दमयन्तीके लिये ही इनका शुभागमन हुआ है। राजा ऋतुपर्ण भी बड़े बुद्धिमान् और सत्यपराक्रमी थे ॥23॥ | "King Bhima did not know that Ṛtuparṇa had come for Damayanti. King Ṛtuparṇa was also very intelligent and truthful." (23) |
| राजानं राजपुत्रं वा न स्म पश्यति कंचन
। नैव स्वयंवरकथां न च विप्रसमागमम् ॥24॥ ततो व्यगणयद् राजा मनसा कोसलाधिपः । आगतोऽस्मीत्युवाचैनं भवन्तमभिवादकः ॥25॥ |
उन्होंने वहाँ किसी भी राजा या राजकुमारको नहीं देखा। ब्राह्मणोंका भी वहाँ समागम नहीं हो रहा था। स्वयंवरकी तो कोई चर्चातक नहीं थी। तब कोशलनरेशने मन-ही-मन कुछ विचार किया और विदर्भराजसे कहा-'राजन्! मैं आपका अभिवादन करनेके लिये आया हू" ॥ 24-25॥ | "He did not see any king or prince there. There was no gathering of Brahmins either. There was no talk of a swayamvara. Then, the king of Kosala thought to himself and said to the king of Vidarbha, 'O King! I have come to pay my respects to you.'" (24-25) |
| राजापि च स्मयन् भीमो मनसा समचिन्तयन्
। अधिकं योजनशतं तस्यागमनकारणम् ॥26॥ ग्रामान् बहूनतिक्रम्य नाध्यगच्छद् यथातथम् । अल्पकार्य विनिर्दिष्टं तस्यागमनकारणम् ॥27॥ |
यह सुनकर राजा भीम भी मुसकरा दिये और मन-ही-मन सोचने लगे-'ये बहुत-से गाँवोंको लॉँघकर सौ योजनसे भी अधिक दूर चले आये हैं, किंतु कार्य इन्होंने बहुत साधारण बतलाया है। फिर इनके आगमनका क्या कारण है, इसे मैं ठीक-ठीक न जान सका ॥ 26-27॥ | "Hearing this, King Bhima smiled and thought to himself, 'He has come a long distance of more than a hundred yojanas, crossing many villages, but he has stated a very ordinary reason. I could not understand the real reason for his arrival.'" (26-27) |
| पश्चादुदर्के ज्ञास्यामि कारणं यद् भविष्यति । नैतदेवं स नृपतिस्तं सत्कृत्य व्यसर्जयत् ॥28॥ |
“अच्छा, जो भी कारण होगा पीछे मालूम कर लूँगा। ये जो कारण बता रहे हैं, इतना ही इनके आगमनका हेतु नहीं है।' ऐसा विचारकर राजाने उन्हें सत्कारपूर्वक विश्रामके लिये विदा किया ॥28॥ | "'Well, I will find out the reason later. The reason he is stating is not the only motive for his arrival.' Thinking this, the king politely bid him farewell to rest." (28) |
| विश्राम्यतामित्युवाच क्लान्तोऽसीति पुनः पुनः । स सत्कृतः प्रहृष्टात्मा प्रीतः प्रीतेन पार्थिवः ॥29॥ |
ओर कहा--'आप बहुत थक गये होंगे, अतः विश्राम कीजिये।' विदर्भनरेशके द्वारा प्रसन्नतापूर्वक आदर-सत्कार पाकर राजा ऋतुपर्णको बड़ी प्रसन्नता हुई ॥29॥ | "And said, 'You must be very tired, so please rest.' King Ṛtuparṇa was very pleased to receive such a warm welcome from the king of Vidarbha." (29) |
| राजप्रेष्यैरनुगतो दिष्टं वेश्म समाविशत्
। ऋतुपर्णे गते राजन् वार्ष्णेयसहिते नृपे ॥30॥ बाहुको रथमादाय रथशालामुपागमत् । स मोचयित्वा तानश्चानुपचर्य च शास्त्रतः ॥31॥ स्वयं चैतान् समाश्चास्य रथोपस्थ उपाविशत् । |
फिर वे राजसेवकोंके साथ गये और बताये हुए भवनमें विश्रामके लिये प्रवेश किया। राजन्! वार्ष्णेयसहित ऋतुपर्णके चले जानेपर बाहुक रथ लेकर रथशालामें गया। उसने उन घोड़ोंको खोल दिया और अश्वशास्त्रकी विधिके अनुसार उनकी परिचर्या करनेके बाद घोड़ोंको पुचकारकर उन्हें धीरज देनेके पश्चात् वह स्वयं भी रथके पिछले भागमें जा बैठा ॥ 30-31 ॥ | "Then he went with the royal attendants and entered the designated chambers to rest. O King! After Ṛtuparṇa left with Vārṣṇeya, Vahuka took the chariot to the stable. He unharnessed the horses and, after tending to them according to the science of horses, caressed them, reassured them, and then himself sat in the back of the chariot." (30-31) |
| दमयन्त्यपि शोकार्ता दृष्ट्वा भाङ्गासुरिं नृपम्
॥32॥ सूतपुत्रं च वार्ष्णेयं बाहुकं च तथाविधम् । चिन्तयामास वैदर्भी कस्यैष रथनिःस्वनः ॥33॥ |
दमयन्ती भी शोकसे आतुर हो राजा ऋतुपर्ण, सूतपुत्र वार्ष्णेय तथा पूर्वोक्त बाहुकको देखकर सोचने लगी-'यह किसके रथकी घर्घराहट सुनायी पड़ती थी ॥ 32-33॥ | "Damayanti, distressed with sorrow, seeing King Ṛtuparṇa, Vārṣṇeya the charioteer's son, and the aforementioned Vahuka, started thinking, 'Whose chariot was making that clattering sound?'" (32-33) |
| नलस्येव महानासीन्न च पश्यामि नैषधम्
। वार्ष्णेयेन भवेन्नूनं विद्या सैवोपशिक्षिता ॥34॥ तेनाद्य रथनिर्घोषो नलस्येव महानभूत् । आहोस्विदृतुपर्णोऽपि यथा राजा नलस्तथा । यथायं रथनिर्घोषो नैषधस्येव लक्ष्यते ॥35॥ |
“वह गम्भीर घोष तो महाराज नलके रथ-जैसा था; परंतु इन आगन्तुकोमे मुझे निषधराज नल नहीं दिखायी देते। वार्ष्पेयने भी नलके समान ही अश्वविद्या सीख ली हो, निश्चय ही यह सम्भावना की जा सकती है। तभी आज रथकी आवाज बड़े जोरसे सुनायी दे रही थी, जैसे नलके रथ हाँकते समय हुआ करती है। कहीं ऐसा तो नहीं है कि राजा ऋतुपर्ण भी वैसे ही अश्वविद्यामें निपुण हों, जैसे राजा नल हैं; क्योकि नलके ही समान इनके रथका भी गम्भीर घोष लक्षित होता है” ॥ 34-35॥ | "'That deep rumble was like the sound of King Nala's chariot, but I do not see King Nala of Nishadha among these guests. It is certainly possible that Vārṣṇeya has also learned the same skill of horsemanship as Nala. That is why the sound of the chariot was so loud today, like it used to be when Nala drove the chariot. Could it be that King Ṛtuparṇa is also as skilled in horsemanship as King Nala, because the deep rumble of his chariot is similar to Nala's?'" (34-35) |
| एवं सा तर्कयित्वा तु दमयन्ती विशाम्पते । दूतीं प्रस्थापयामास नैषधान्वेषणे शुभा ॥36॥ |
युधिष्ठिर! इस प्रकार विचार करके शुभलक्षणा दमयन्तीने नलका पता लगानेके लिये अपनी दूतीको भेजा ॥36॥ | "O Yudhishthira! Thinking in this way, the auspicious Damayanti sent her maid as a messenger to find out about Nala." (36) |
| इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि नलोपाख्यानपर्वणि ऋतुपर्णस्य भीमपुरप्रवेशे त्रिसप्ततितमोऽध्यायः ॥73॥ | इय प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत नलोपाख्यानपर्वमें ऋठुपर्णका राजा भीमके नगरमे प्रवेशविषयक तिहत्तरवॉ अध्याय पुरा हुआ ॥73॥ | "Thus ends the seventy-third chapter in the Nalopakhyana Parva of the Vana Parva in the Sri Mahabharata, describing Ṛtuparṇa's entry into King Bhima's city." (73) |
| चतुःसप्तातितमोऽध्यायः | चीहत्तरवाँ अध्याय | **Chapter Seventy-Fourth: |
| बाहुक-केशिनी-संवाद | बाहुक-केशिनी-संवाद | The Conversation Between Vahuka and Kesinī** |
| दमयन्त्युवाच गच्छ केशिनि जानीहि क एष रथवाहकः । उपविष्टो रथोपस्थे विकृतो हस्वबाहुकः ॥1॥ |
दमयन्ती बोली-केशिनी! जाओ और पता लगाओ कि यह छोटी-छोटी बाँहोंवाला कुरूप रथवाहक, जो रथके पिछले भागमें बैठा है, कौन है? ॥1॥ | Damayanti said: "Kesinī! Go and find out who this charioteer with short arms and an unpleasant appearance is, who is sitting in the back of the chariot." (1) |
| अभ्येत्य कुशलं भद्रे मृदुपूर्वं समाहिता । पृच्छेथाः पुरुषं ह्योनं यथातत्त्वमनिन्दिते ॥2॥ |
भद्रे! इसके निकट जाकर सावधानीके साथ मधुर वाणीमें कुशल पूछना। अनिन्दिते! साथ ही इस पुरुषके विषयमें ठीक-ठीक बातें जाननेकी चेष्टा करना ॥2॥ | My dear! Approach him and inquire about his well-being with sweet and cautious words. O blameless one! Also, try to learn the truth about this man. (2) |
| अत्र मे महती शङ्का भवेदेष नलो नृपः । यथा च मनसस्तुष्टिर्हदयस्य च निर्वृतिः ॥3॥ |
इसके विषयमें मुझे बड़ी भारी शंका है। सम्भव है, इस वेषमें राजा नल ही हों। मेरे मनमें जैसा संतोष है और हृदयमें जेसी शान्ति है, इसे मेरी उक्त धारणा पुष्ट हो रही है ॥3॥ | I have a strong suspicion about him. It is possible that this is King Nala in disguise. The contentment in my mind and the peace in my heart are strengthening this belief of mine. (3) |
| ब्रूयाश्चैनं कथान्ते त्वं पर्णादवचनं यथा । प्रतिवाक्यं च सुश्रोणि बुद्धयेथास्त्वमनिन्दिते ॥4॥ |
सुश्रोणि! तुम बातचीतके सिलसिलेमें इसके सामने पर्णाद ब्राह्मणवाली बात कहना और अनिन्दिते! यह जो उत्तर दे, उसे अच्छी तरह समझना ॥4॥ | O beautiful one! In the course of your conversation, mention the words of Parṇāda the Brahmin to him, and O blameless one! Carefully observe his response. (4) |
| ततः समाहिता गत्वा दूती बाहुकमब्रवीत् । दमयन्त्यपि कल्याणी प्रासादस्था ह्युपैक्षत ॥5॥ |
तब वह दूती बड़ी सावधानीसे वहाँ जाकर बाहुकसे वार्तालाप करने लगी और कल्याणी दमयन्ती भी महलमें उसके लौटनेकी प्रतीक्षामें बैठी रही ॥5॥ | Then, that maid went there cautiously and started conversing with Vahuka, while the blessed Damayanti waited in the palace for her return. (5) |
| केशिन्युवाच स्वागतं ते मनुष्येन्द्र कुशलं ते ब्रवीम्यहम् । दमयन्त्या वचः साधु निबोध पुरुषर्षभ ॥6॥ |
केशिनीने कहा-- नरेन्द्र! आपका स्वागत है! मैं आपका कुशल समाचार पूछती हूँ। पुरुषश्रेष्ठ! दमयन्तीकी कही हुई ये उत्तम बातें सुनिये ॥6॥ | Kesinī said, 'O lord of men! Welcome! I inquire about your well-being. O best of men! Listen to these noble words spoken by Damayanti.' (6) |
| कदा वै प्रस्थिता यूयं किमर्थमिह चागताः । तत् त्वं ब्रूहि यथान्यायं वैदर्भी श्रोतुमिच्छति ॥7॥ |
विदर्भराजकुमारी यह सुनना चाहती हैं कि आपलोग अयोध्यासे कब चले हैं और किस लिये यहाँ आये हैं? आप न्यायके अनुसार ठीक-ठीक बताये ॥7॥ | The princess of Vidarbha wishes to know when you departed from Ayodhya and why you have come here. Please tell the truth. (7) |
| बाहुक उवाच श्रुतः स्वयंवसे राज्ञा कोसलेन महात्मना । द्वितीयो दमयन्त्या वै भविता श्व इति द्विजात् ॥8॥ |
बाहुक बोला-महात्मा कोसलराजने एक ब्राह्मणके मुखसे सुना था कि कल दमयन्तीका द्वितीय स्वयंवर होनेवाला है ॥8॥ | Vahuka said, 'The noble king of Kosala heard from a Brahmin that Damayanti's second swayamvara is going to take place tomorrow.' (8) |
| श्रुत्वैतत् प्रस्थितो राजा शतयोजनयायिभिः । हयैर्वातजवैर्मुख्यैरहमस्य च सारथिः ॥9॥ |
यह सुनकर राजा हवाके समान वेगवाले और सौ योजनतक दौडनेवाले अच्छे घोड़ोंसे जुते हुए रथपर सवार हो विदर्भदेशके लिये प्रस्थित हो गये। इस यात्रामे मैं ही इनका सारथि था ॥9॥ | Hearing this, the king set out for Vidarbha, riding a chariot drawn by excellent horses, swift as the wind and capable of traveling a hundred yojanas. I am his charioteer on this journey.' (9) |
| केशिन्युवाच अथ योऽसौ तृतीयो वः स कुतः कस्य वा पुनः । त्वं च कस्य कथं चेदं त्वयि कर्म समाहितम् ॥10॥ |
केशिनीने पूछा-आपलोगोंमेंसे जो तीसरा व्यक्ति है, वह कहाँसे आया है अथवा किसका सेवक है? ऐसे ही आप कौन हैं, किसके पुत्र हैं और आपपर इस कार्यका भार कैसे आया है? ॥10॥ | Kesinī asked, 'Where has the third person among you come from, or whose servant is he? Similarly, who are you, whose son are you, and how did you come to be entrusted with this task?' (10) |
| बाहुक उवाच पुण्यश्लोकस्य वै सूतो वार्ष्णेय इति विश्रुतः । स नले विद्रुते भद्रे भाङ्गासुरिमुपस्थितः ॥11॥ |
बाहुक बोला-भद्रे! उस तीसरे व्यक्तिका नाम वार्ष्णेय है। वह पुण्यश्लोक राजा नलका सारथि है। नलके वनमें निकल जानेपर वह ऋतुपर्णकी सेवामें चला गया है ॥11॥ | Vahuka said, 'My dear! The name of that third person is Vārṣṇeya. He is the charioteer of the virtuous King Nala. After Nala went into the forest, he entered the service of Ṛtuparṇa.' (11) |
| अहमप्यश्वकुशलः सूतत्वे च प्रतिष्ठितः । ऋतुपर्णेन सारथ्ये भोजने च वृतः स्वयम् ॥12॥ |
मैं भी अश्वविद्यामें कुशल हूँ और सारथिके कार्यमें भी निपुण हूँ, इसलिये राजा ऋतुपर्णने स्वयं ही मुझे वेतन देकर सारथिके पदपर नियुक्त कर लिया ॥12॥ | I am also skilled in horsemanship and proficient in the duties of a charioteer, therefore King Ṛtuparṇa himself appointed me to the position of charioteer, paying me a salary.' (12) |
| केशिन्युवाच अथ जानाति वार्ष्णेयः क्व नु राजा नलो गतः । कथं च त्वयि वा तेन कथितं स्यात् तु बाहुक ॥13॥ |
केशिनीने पूछा--बाहुक! क्या वार्ष्णेय यह जानता है कि राजा नल कहाँ चले गये, उसने आपसे महाराजके सम्बन्धे कैसी बात बतायी है? ॥13॥ | Kesinī asked, 'Vahuka! Does Vārṣṇeya know where King Nala has gone? What has he told you about the king?' (13) |
| बाहुक उवाच इहैव पुत्रौ निक्षिप्य नलस्य शुभकर्मणः । गतस्ततो यथाकामं नैष जानाति नैषधम् ॥14॥ |
बाहुक बोला--भद्रे! पुण्यकर्मा नलके दोनों बालकोंको यहीं रखकर वार्ष्णेय अपनी रुचिके अनुसार अयोध्या चला गया था। यह नलके विषयमें कुछ नहीं जानता है ॥14॥ | Vahuka said, 'My dear! Leaving both the children of the virtuous Nala here, Vārṣṇeya went to Ayodhya as he pleased. He knows nothing about Nala.' (14) |
| न चान्यः पुरुषः कश्चिन्नलं वेत्ति यशस्विनि । गूढश्चरति लोकेऽस्मिन् नष्टरूपे महीपतिः ॥15॥ |
यशस्विनि! दूसरा कोई पुरुष भी नलको नहीं जानता। राजा नलका पहला रूप अदृश्य हो गया है। वे इस जगतमें गूढ़भावसे विचरते हैं ॥15॥ | O glorious one! No other man knows about Nala either. King Nala's previous form has disappeared. He wanders this world incognito.' (15) |
| आत्मैव तु नलं वेद या चास्य तदनन्तरा । न हि वै स्वानि लिङ्गानि नलः शंसति कर्हिचित् ॥16॥ |
परमात्मा ही नलको जानते हैं तथा उसकी जो अन्तरात्मा है, वह उन्हें जानती है, दूसरा कोई नहीं; क्योकि राजा नल अपने लक्षणों या चिह्लोंको कभी दूसरोंके सामने नहीं प्रकट करते हैं ॥16॥ | Only the Supreme Being knows Nala, and his own soul knows him, no one else, because King Nala never reveals his identity or marks to others.' (16) |
| केशिन्युवाच योऽसावयोध्यां प्रथमं गतोऽसौ ब्राह्मणस्तदा । इमानि नारीवाक्यानि कथयानः पुनः पुनः ॥17॥ |
केशिनीने कहा--पहली बार अयोध्यामें जब वे ब्राह्मणदेवता गये थे, तब उन्होंने स्त्रियोंकी सिखायी हुई निम्नांकित बातें बार-बार कही थी-- ॥17॥ | Kesinī said, 'When those Brahmins went to Ayodhya the first time, they repeatedly spoke these words taught by the women... (17) |
| क्व नु त्वं कितवच्छित्त्वा वस्त्रार्थं प्रस्थितो मम । उत्सृज्य विपिने सुप्तामनुरक्तां प्रियां प्रिय ॥18॥ |
“ओ जुआरी प्रियतम! तुम अपने प्रति अनुराग रखनेवाली वनमे सोयी हुई मुझ प्यारी पत्नीको छोड़कर तथा मेरे आधे वस्त्रको फाड़कर कहाँ चल दिये? ॥18॥ | 'O gambler, my beloved! Where have you gone, leaving me, your beloved wife, sleeping in the forest, devoted to you, and tearing half of my garment?' (18) |
| सा वै यथा समादिष्टा तथाऽऽस्ते त्वत्प्रतीक्षिणी । दह्यमाना दिवा रात्रौ वस्त्रार्धेनाभिसंवृता ॥19॥ |
“उसे तुमने जिस अवस्थामें देखा था, उसी अवस्थामें वह आज भी है और तुम्हारे आगमनकी प्रतीक्षा कर रही है। आधे वस्त्रसे अपने शरीरको ढककर वह युवती दिन-रात तुम्हारी विरहाग्निमें जल रही है ॥19॥ | 'She is still in the same condition as you saw her, and she is waiting for your return. Covering her body with half a garment, that young woman is burning day and night in the fire of separation from you.' (19) |
| तस्या रुदन्त्याः सततं तेन दुःखेन पार्थिव । प्रसादं कुरु मे वीर प्रतिवाक्यं वदस्व च ॥20॥ |
'वीर भूमिपाल! सदा तुम्हारे शोकसे रोती हुई अपनी उसी प्यारी पत्नीपर पुनः कृपा करो और मेरी बातका उत्तर दो” ॥20॥ | 'O heroic king! Have mercy again on your beloved wife, who always cries for you, and answer me.' (20) |
| तस्यास्तत् प्रियमाख्यानं प्रवदस्व महामते । तदेव वाक्यं वैदर्भी श्रोतुमिच्छत्यनिन्दिता ॥21॥ |
"महामते! इसके उत्तरमें आप दमयन्तीको प्रिय लगनेवाली कोई बात कहिये। साध्वी विदर्भकुमारी आपकी उसी बातको पुनः सुनना चाहती है" ॥21॥ | 'O wise one! Say something pleasing to Damayanti in response to this. The virtuous princess of Vidarbha wishes to hear those same words from you again.' (21) |
| एतच्छुत्वा प्रतिवचस्तस्य दत्तं त्वया किल । यत् पुरा तत् पुनस्त्वत्तो वैदर्भी श्रोतुमिच्छति ॥22॥ |
बाहुक! ब्राह्मणके मुखसे यह वचन सुनकर पहले आपने जो उत्तर दिया था, उसीको वैदर्भी आपके मुँहसे पुन: सुनना चाहती हैं ॥22॥ | 'Vahuka! The Vaidarbhi wishes to hear again from your mouth the same reply that you gave earlier upon hearing these words from the Brahmin.' (22) |
| बृहदश्च उवाच एवमुक्तस्य केशिन्या नलस्य कुरुनन्दन । हृदयं व्यथितं चासीदश्रुपूर्णे च लोचने ॥23॥ |
बृहदश्च मुनि कहते है--युधिष्ठिर! केशिनीके ऐसा कहनेपर राजा नलके हृदयमें बड़ी वेदना हुई। उनकी दोनों आँखें आँसुओंसे भर गयीं ॥23॥ | Sage Brihadasva narrates: "O Yudhishthira! When Kesinī said this, King Nala's heart was filled with great pain. Both his eyes filled with tears." (23) |
| स निगृह्यात्मनो दुःखं दह्यमानो महीपतिः । वाष्पसंदिग्धया वाचा पुनरेवेदमब्रवीत् ॥24॥ |
निषधनरेश शोकाग्निसे दग्ध हो रहे थे, तो भी उन्होने अपने दुःखके वेगको रोककर अश्रुगदगद वाणीमें पुनः यों कहना आरम्भ किया ॥24॥ | The king of Nishadha was burning with the fire of sorrow, yet he controlled his grief and started speaking again in a voice choked with tears. (24) |
| बाहुक उवाच वैषम्यमपि सम्प्राप्ता गोपायन्ति कुलस्त्रियः । आत्मानमात्मना सत्यो जितः स्वर्गो न संशयः ॥25॥ |
बाहुक बोला-उत्तम कुलकी स्त्रियाँ बड़े भारी संकटमें पड़कर भी स्वयं अपनी रक्षा करती हैं। ऐसा करके वे स्वर्ग और सत्य दोनोंपर विजय पा लेती हैं, इसमें संशय नहीं है ॥25॥ | Vahuka said, 'Women of noble families protect themselves even in the face of great adversity. By doing so, they conquer both heaven and truth, there is no doubt.' (25) |
| रहिता भर्तृभिश्चापि न क्रुध्यन्ति कदाचन । प्राणांश्चारित्रकवचान् धारयन्ति वरस्त्रियः ॥26॥ |
रेष्ठ नारियाँ अपने पतियोंसे परित्यक्त होनेपर भी कभी क्रोध नहीं करतीं। वे सदा सदाचाररूपी कवचसे आवृत प्राणोंको धारण करती हैं ॥26॥ | 'Noble women never get angry even when abandoned by their husbands. They always preserve their lives, protected by the armor of virtuous conduct.' (26) |
| विषमस्थेन मूढेन परिभ्रष्टसुखेन च । यत् सा तेन परित्यक्ता तत्र न क्रोद्धुमर्हति ॥27॥ |
वह पुरुष बड़े संकटमें था तथा सुखके साधनोंसे वञ्चित होकर किंकर्तव्यविमूढ़ हो गया था। ऐसी दशामें यदि उसने अपनी पत्नीका परित्याग किया है, तो इसके लिये पत्नीको उसपर क्रोध नहीं करना चाहिये ॥27॥ | 'That man was in great distress, deprived of all means of happiness, and bewildered about what to do. In such a situation, if he abandoned his wife, she should not be angry with him.' (27) |
| प्राणयात्रां परिप्रेप्सोः शकुनैर्हृतवाससः । आधिभिर्दह्यमानस्य श्यामा न क्रोद्धुमर्हति ॥28॥ |
जीविका पानेके लिये चेष्टा करते समय पक्षियोंने जिसके वस्त्रका अपहरण कर लिया था और जो अनेक प्रकारकी मानसिक चिन्ताओंसे दग्ध हो रहा था, उस पुरुषपर श्यामाको क्रोध नहीं करना चाहिये ॥28॥ | 'The dark-haired woman should not be angry with the man whose clothes were stolen by birds while he was trying to earn a living and who was consumed by various mental anxieties.' (28) |
| सत्कृतासत्कृता वापि पति दृष्ट्वा तथाविधम् । राज्यभ्भष्टं श्रिया हीनं क्षुधितं व्यसनाप्लुतम् ॥29॥ |
पतिने उसका सत्कार किया हो या असत्कार; उसे चाहिये कि पतिको वैसे संकटमें पड़ा देखकर उसे क्षमा कर दे; क्योंकि वह राज्य और लक्ष्मीसे वंचित हो भूखसे पीड़ित एवं विपत्तिके अथाह सागरमें डूबा हुआ था ॥29॥ | 'Whether her husband treated her well or badly, she should forgive him seeing him in such distress, for he was deprived of his kingdom and wealth, afflicted with hunger, and drowning in the vast ocean of calamity.' (29) |
| एवं ब्रुवाणस्तद् वाक्यं नलः परमदुर्मनाः । न वाष्पमशकत् सोढुं प्ररुरोद च भारत ॥30॥ |
इस प्रकार पूर्वोक्त बातें कहते हुए नलका मन अत्यन्त उदास हो गया। भारत! वे अपने उमड़ते हुए आँसुओंको रोक न सके तथा रोने लगे ॥30॥ | Saying these aforementioned words, Nala's heart became extremely heavy. O descendant of Bharata! He could not hold back his surging tears and started crying. (30) |
| ततः सा केशिनी गत्वा दमयन्त्यै न्यवेदयत् । तत् सर्व कथितं चैव विकारं तस्य चैव तम् ॥31॥ |
तदनन्तर केशिनीने भीतर जाकर दमयन्तीसे यह सब निवेदन किया। उसने बाहुककी कही हुई सारी बातों और उसके मनोविकारोंको भी यथावत् कह सुनाया ॥31॥ | Then, Kesinī went inside and reported everything to Damayanti. She accurately conveyed all the words spoken by Vahuka and his emotional state. (31) |
| इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि नलोपाख्यानपर्वणि नलकेशिनीसंवादे चतुःसप्ततितमोऽध्यायः ॥74॥ | इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत नलोपाख्यानपर्वमें नल-केशिनीसंवादविषयक चीहत्तरवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥74॥ | Thus ends the seventy-fourth chapter in the Nalopakhyana Parva of the Vana Parva in the Sri Mahabharata, describing the conversation between Nala and Kesinī. (74) |
| पञ्चसप्ततितमोऽध्यायः | पचहत्तरवोँ अध्याय | **Chapter Seventy-Fifth: |
| दमयन्तीके आदेशसे केशिनीद्वारा बाहुक" ककी परीक्षा तथा बाहुकका अपने लड़के-लड़कियोंको उनसे प्रेम करना | दमयन्तीके आदेशसे केशिनीद्वारा बाहुक" ककी परीक्षा तथा बाहुकका अपने लड़के-लड़कियोंको उनसे प्रेम करना | At Damayanti's Behest, Kesinī Tests Vahuka; Vahuka Shows Affection to His Children** |
| बृहदश्च उवाच दमयन्ती तु तच्छुत्वा भृशं शोकपरायणा । शङ्कमाना नलं तं वै केशिनीमिदमब्रवीत् ॥1॥ |
बृहदश्च मुनि कहते हैं-युधिष्ठिर! यह सब सुनकर दमयन्ती अत्यन्त शोकमग्न हो गयी। उसके हृदयमें निश्चितरूपसे बाहुकके नल होनेका संदेह हो गया और वह केशिनीसे इस प्रकार बोली-- ॥1॥ | Sage Brihadasva continues: "O Yudhishthira! Hearing all this, Damayanti was deeply saddened. She became certain that Vahuka was indeed Nala and said to Kesinī..." (1) |
| गच्छ केशिनि भूयस्त्वं परीक्षां कुरु बाहुके । अब्रुवाणा समीपस्था चरितान्यस्य लक्षय ॥2॥ |
'केशिनि! फिर जाओ और बाहुककी परीक्षा करो। अबकी बार तुम कुछ बोलना मत। निकट रहकर उसके चरित्रोंपर दृष्टि रखना ॥2॥ | "'Kesinī! Go again and test Vahuka. This time, do not speak anything. Observe his actions closely.'" (2) |
| यदा च किंचित् कुर्यात् स कारणं तत्र भामिनि । तत्र संचेष्टमानस्य लक्षयन्ती विचेष्टितम् ॥3॥ |
'भामिनि! जब वह कोई काम करे तो उस कार्यको करते समय उसकी प्रत्येक चेष्टा और उसके कारणपर लक्ष्य रखना ॥3॥ | "'O beautiful one! When he performs any task, pay attention to every action and its reason.'" (3) |
| न चास्य प्रतिबन्धेन देयोऽग्निरपि केशिनि । याचते न जलं देयं सर्वथा त्वरमाणया ॥4॥ |
"केशिनि! वह आग्रह करे तो भी उसे आग न देना और माँगनेपर भी किसी प्रकार जल्दीमें आकर पानी भी न देना ॥4॥ | "'Kesinī! Do not give him fire even if he insists, and do not give him water in haste even if he asks for it.'" (4) |
| एतत् सर्व समीक्ष्य त्वं चरितं मे निवेदय
। निमित्तं यत् त्वया दृष्टं बाहुके दैवमानुषम् ॥5॥ यच्चान्यदपि पश्येथास्तच्चाख्येयं त्वया मम । |
'बाहुकके इन सब चरित्रोंकी समीक्षा करके फिर मुझे सब बात बताना। बाहुकमें यदि तुम्हें कोई दिव्य अथवा मानवोचित विशेषता दिखायी दे तथा और भी जो कोई विशेषता दृष्टिगोचर हो तो उसपर भी दृष्टि रखना और मुझे आकर बताना" ॥5॥ | "'After examining all these actions of Vahuka, tell me everything. If you see any divine or human qualities in Vahuka, and any other special traits, observe them and come back and tell me.'" (5) |
| दमयन्त्यैवमुक्ता सा जगामाथ च केशिनी ॥6॥ निशम्याथ हयज्ञस्य लिङ्गानि पुनरागमत् । |
दमयन्तीके ऐसा कहनेपर केशिनी पुनः वहाँ गयी और अश्वविद्याविशारद बाहुकके लक्षणोंका अवलोकन करके वह फिर लौट आयी ॥6॥ | "When Damayanti said this, Kesinī went there again and, after observing the characteristics of Vahuka, the expert in horsemanship, she returned." (6) |
| सा तत् सर्व यथावृत्तं दमयन्त्यै न्यवेदयत् । निमित्तं यत् तया दृष्टं बाहुके दैवमानुषम् ॥7॥ |
उसने बाहुकमें जो दिव्य अथवा मानवोचित विशेषताएँ देखीं, उनका यथावत् समाचार पूर्णरूपसे दमयन्तीको बताया ॥7॥ | "She reported to Damayanti everything she had observed, all the divine and human qualities in Vahuka." (7) |
| केशिन्युवाच दृढं शुच्युपचारोऽसौ न मया मानुषः क्वचित् । दृष्टपूर्वः श्रुतो वापि दमयन्ति तथाविधः ॥8॥ |
केशिनीने कहा-दमयन्ती! उसका प्रत्येक व्यवहार अत्यन्त पवित्र है। ऐसा मनुष्य तो मैंने कहीं भी पहले न तो देखा है और न सुना ही है ॥8॥ | "Kesinī said, 'Damayanti! Every action of his is extremely pure. I have never seen or heard of such a man anywhere before.'" (8) |
| हृस्वमासाद्य संचारं नासौ विनमते क्वचित् । तं तु दृष्ट्वा यथाऽसंगमुत्सर्पति यथासुखम् ॥9॥ |
किसी छोटे-से-छोटे दरवाजेपर जाकर भी वह झुकता नहीं है। उसे देखकर बड़ी आसानीके साथ दरवाजा ही इस प्रकार ऊँचा हो जाता है कि जिससे मस्तकका उससे स्पर्श न हो ॥9॥ | "'He does not stoop even when passing through the smallest door. Upon seeing him, the doorway itself rises in such a way that his head does not touch it.'" (9) |
| संकटेऽप्यस्य सुमहान् विवरो जायतेऽधिकः
। ऋतुपर्णस्य चार्थाय भोजनीयमनेकशः ॥10॥ प्रेषितं तत्र राज्ञा तु मांसं चैव प्रभूतवत् । तस्य प्रक्षालनार्थाय कुम्भास्तत्रोपकल्पिताः ॥11॥ |
संकुचित स्थानमें भी उसके लिये बहुत बड़ा अवकाश बन जाता है। राजा भीमने ऋतुपर्णके लिये अनेक प्रकारके भोज्य पदार्थ भेजे थे। उसमें प्रचुर मात्रामें केला आदि फलोंका गूदा भी था,- उसको धोनेके लिये वहाँ खाली घड़े रख दिये थे ॥ 10-11॥ | "'Even in a narrow space, a large opening is created for him. King Bhima had sent various kinds of food for Ṛtuparṇa. There was also a large quantity of banana pulp and other fruits; empty pots were kept there to wash them.'" (10-11) |
| ते तेनावेक्षिताः कुम्भाः पूर्णा एवाभवंस्ततः
। ततः प्रक्षालनं कृत्वा समधिश्रित्य बाहुकः ॥12॥ तृणमुष्टिं समादाय सवितुस्तं समादधत् । अथ प्रज्वलितस्तत्र सहसा हव्यवाहनः ॥13॥ |
परंतु बाहुकके देखते ही वे सारे घड़े पानीसे भर गये। उससे खाद्य पदार्थोको धोकर बाहुकने चूल्हेपर चढ़ा दिया। फिर एक मुदरी तिनका लेकर सूर्यकी किरणोंसे ही उसे उद्दीप्त किया। फिर तो देखते-ही-देखते सहसा उसमें आग प्रज्वलित हो गयी ॥ 12-13॥ | "'But upon seeing Vahuka, all those pots were filled with water. Vahuka washed the food items with it and placed them on the stove. Then, taking a handful of straw, he ignited it with just the sun's rays. Suddenly, fire blazed in it.'" (12-13) |
| तदद्भुततमं दृष्ट्वा विस्मिताहमिहागता । अन्यच्च तस्मिन् सुमहदाश्चर्यं लक्षितं मया ॥14॥ |
यह अद्भुत बात देखकर मैं आश्चर्यचकित होकर यहाँ आयी हूँ। बाहुकमें एक और भी बड़े आश्चर्यकी बात देखी है ॥14॥ | "'Seeing this wondrous act, I was astonished and came here. I have seen another even more amazing thing in Vahuka.'" (14) |
| यदग्निमपि संस्पृश्य नैवासौ दह्यते शुभे । छन्देन चोदकं तस्य वहत्यावर्जितं द्रुतम् ॥15॥ |
शुभे! वह अग्निका स्पर्श करके भी जलता नहीं है। पात्रमें रखा हुआ थोड़ा-सा जल भी उसकी इच्छाके अनुसार तुरंत ही प्रवाहित हो जाता है ॥15॥ | "'O auspicious one! He does not get burned even when touching fire. A small amount of water kept in a vessel flows instantly according to his will.'" (15) |
| अतीव चान्यत् सुमहदाश्चर्य दृष्टवत्यहम्
। यत् स पुष्पाण्युपादाय हस्ताभ्यां ममृदे शनैः ॥16॥ मृद्यमानानि पाणिभ्यां तेन पुष्पाणि नान्यथा । भूय एव सुगन्धीनि हृषितानि भवन्ति हि । एतान्यद्भुतलिङ्कानि दृष्ट्वाहं द्रुतमागता ॥17॥ |
एक और भी अत्यन्त आश्चर्यजनक बात मुझे उसमें दिखायी दी है। वह फूल लेकर उन्हें हाथोंसे धीरे-धीरे मसलता था। हाथोंसे मसलनेपर भी वे फूल विकृत नहीं होते थे अपितु और भी सुगन्धित और विकसित हो जाते थे। ये अद्भुत लक्षण देखकर मैं शीघ्रतापूर्वक यहाँ आयी हूँ ॥ 16-17॥ | "'I saw another astonishing thing in him. He took flowers and gently crushed them with his hands. Even after being crushed by his hands, those flowers were not spoiled but became even more fragrant and bloomed. Seeing these wondrous signs, I quickly came here.'" (16-17) |
| बृहदश्च उवाच दमयन्ती तु तच्छुत्वा पुण्यश्लोकस्य चेष्टितम् । अमन्यत नलं प्राप्तं कर्मचेष्टाभिसूचितम् ॥18॥ |
बृहदश्च मुनि कहते है--युधिष्ठिर! दमयन्तीने पुण्यश्लोक महाराज नलकी-सी बाहुककी सारी चेष्टाओंको सुनकर मन-ही-मन यह निश्चय कर लिया कि महाराज नल ही आये हैं। अपने कार्यो और चेष्टाओंद्वारा वे पहचान लिये गये हैं ॥18॥ | Sage Brihadasva narrates: "O Yudhishthira! Hearing about all the actions of Vahuka, which resembled those of the virtuous King Nala, Damayanti concluded in her mind that it was indeed King Nala who had arrived. He had been recognized by his actions and behavior." (18) |
| सा शङ्कमाना भर्तारं बाहुकं पुनरिङ्गितैः
। केशिनीं श्लक्ष्णया वाचा रुदती पुनरब्रवीत् ॥19॥ पुनर्गच्छ प्रमत्तस्य बाहुकस्योपसंस्कृतम् । महानसाद् द्रुतं मांसमानयस्वेह भाविनि ॥20॥ सा गत्वा बाहुकस्याग्रे तन्मांसमपकृष्य च । अत्युष्णमेव त्वरिता तत्क्षणात् प्रियकारिणी ॥21॥ |
चेष्टाओंद्वारा उसके मनमें यह प्रबल आशंका जम गयी कि बाहुक मेरे पति ही हैं। फिर तो वह रोने लगी और मधुर वाणीमे केशिनीसे बोली-'सखि! एक बार फिर जाओ और जब बाहुक असावधान हो तो उसके द्वारा विशेषविधिसे उबालकर तैयार किया गया फलोंका गूदा रसोई घरमेंसे शीघ्र उठा लाओ।' केशिनी दमयन्तीकी प्रियकारिणी सखी थी। वह तुरंत गयी और जब बाहुकका ध्यान दूसरी ओर गया तब उसके उबाले हुए गरम-गरम फलोंके गूदेमेंसे थोड़ा-सा निकालकर तत्काल ले आयी ॥ 19-21॥ | "Due to his actions, a strong suspicion arose in her mind that Vahuka was indeed her husband. Then she started crying and said to Kesinī in a sweet voice, 'Friend! Go one more time, and when Vahuka is not paying attention, quickly bring the fruit pulp that he has specially prepared by boiling, from the kitchen.' Kesinī was Damayanti's dear friend. She immediately went and, when Vahuka's attention was diverted, she took some of the hot fruit pulp that he had boiled and brought it back at once." (19-21) |
| दमयन्त्यै ततः प्रादात् केशिनी कुरुनन्दन । सो चिता नलसिद्धस्य मांसस्य बहुशः पुरा ॥22॥ |
कुरुनन्दन! केशिनीने वह फलोंका गूदा दमयन्तीको दे दिया। उसे पहले अनेक बार नलके द्वारा उबाले हुए फलोंके गूदेके स्वादका अनुभव था ॥22॥ | "O descendant of Kuru! Kesinī gave that fruit pulp to Damayanti. She had tasted the fruit pulp boiled by Nala many times before." (22) |
| प्राश्य मत्वा नलं सूत प्राक्रोशद् भृशदुःखिता
। वैक्लव्यं परमं गत्वा प्रक्षाल्य च मुखं ततः ॥23॥ मिथुनं प्रेषयामास केशिन्या सह भारत । इन्द्रसेनां सह भ्रात्रा समभिज्ञाय बाहुकः ॥24॥ अभिद्रुत्य ततो राजा परिष्वज्याङ्कमानयत् । बाहुकस्तु समासाद्य सुतौ सुरसुतोपमौ ॥25॥ भृशं दुःखपरीतात्मा सुस्वरं प्ररुरोद ह । नैषधो दर्शयित्वा तु विकारमसकृत् तदा । उत्सृज्य सहसो पुत्रौ केशिनीमिदमब्रवीत् ॥26॥ |
उसे खाकर वह पूर्णरूपसे इस निश्चयपर पहुँच गयी कि बाहुक सारथि वास्तवमें राजा नल हैं। फिर तो वह अत्यन्त दुखी होकर विलाप करने लगी। उस समय उसकी व्याकुलता बहुत बढ़ गयी। भारत! फिर उसने मुँह धोकर केशिनीके साथ अपने बच्चोंको बाहुकके पास भेजा। बाहुकरूपी राजा नलने इन्द्रसेना और उसके भाई इन्द्रसेनको पहचान लिया और दौड़कर दोनों बच्चोंको छातीसे लगाकर गोदमें ले लिया। देवकुमारोंके समान उन दोनों सुन्दर बालकोंको पाकर निषधराज नल अत्यन्त दुःखमग्न हो जोर-जोरसे रोने लगे। उन्होंने बार-बार अपने मनोविकार दिखाये और सहसा दोनों बच्चोंको छोड़कर केशिनीसे इस प्रकार कहा-- ॥ 23-26॥ | "Eating it, she became completely certain that Vahuka the charioteer was indeed King Nala. Then, extremely saddened, she started lamenting. Her anxiety greatly increased at that time. O descendant of Bharata! Then, after washing her face, she sent her children to Vahuka with Kesinī. King Nala, in the guise of Vahuka, recognized Indrasena and her brother Indrasena and, rushing towards them, embraced both the children and took them on his lap. Finding those two beautiful children, like the sons of gods, the king of Nishadha, Nala, was overwhelmed with sorrow and started crying loudly. He repeatedly expressed his emotions and, suddenly releasing both the children, said to Kesinī..." (23-26) |
| इदं च सदृशं भद्रे मिथुनं मम पुत्रयोः । अतो दृष्ट्वैव सहसा बाष्पमुत्सृष्टवानहम् ॥27॥ |
“भद्रे! ये दोनों बालक मेरे पुत्र और पुत्रीके समान हैं, इसीलिये इन्हें देखकर सहसा मेरे नेत्रोंसे आँसू बहने लगे ॥27॥ | "'My dear! These two children are like my own son and daughter, that is why tears started flowing from my eyes upon seeing them.'" (27) |
| बहुशः सम्पतन्तीं त्वां जनः संकेतदोषतः । वयं च देशातिथयो गच्छ भद्रे यथासुखम् ॥28॥ |
'भद्रे! तुम बार-बार आती-जाती हो, लोग किसी दोषकी आशंका कर लेंगे और हमलोग इस देशके अतिथि हैं; अतः तुम सुखपूर्वक महलमें चली जाओ" ॥28॥ | "'My dear! You are coming and going repeatedly, people will suspect something amiss, and we are guests in this country, so please return to the palace.'" (28) |
| इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि नलोपाख्यानपर्वणि कन्यापुत्रदर्शने पञ्चसप्ततितमोऽध्यायः ॥75॥ | इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत नलोपाख्यानपर्वमें नलका अपनी पुत्री और पुत्रके देखनेये सम्बन्ध रखनेवाला पचहत्तरवोँ अध्याय पूरा हुआ ॥75॥ | "Thus ends the seventy-fifth chapter in the Nalopakhyana Parva of the Vana Parva in the Sri Mahabharata, relating to Nala seeing his daughter and son." (75) |
| 'मांस' शब्दका अर्थ 'संस्कृत-शब्दार्थ-कौस्तुभ' में फलका गूदा किया गया है। |
'मांस' शब्दका अर्थ 'संस्कृत-शब्दार्थ-कौस्तुभ' में फलका गूदा किया गया है। | The word 'meat' has been translated into 'Sanskrit-semantics-kaustubha'. |
| षट्सप्ततितमोऽध्यायः | छिहत्तरवाँ अध्याय | **Chapter Seventy-Sixth: |
| दमयन्ती और बाहुककी बातचीत, नलका प्राकट्य और नल-दमयन्ती-मिलन | दमयन्ती और बाहुककी बातचीत, नलका प्राकट्य और नल-दमयन्ती-मिलन | The Conversation Between Damayanti and Vahuka; Nala Reveals Himself; Nala and Damayanti Reunite** |
| बृहदश्च उवाच सर्व विकारं दृष्ट्वा तु पुण्यश्लोकस्य धीमतः । आगत्य केशिनी सर्व दमयन्त्यै न्यवेदयत् ॥1॥ |
बृहदश्च मुनि कहते हैं-युधिष्ठिर! परम बुद्धिमान् पुण्यश्लोक राजा नलके सम्पूर्ण विकारोंको देखकर केशिनीने दमयन्तीको आकर बताया ॥1॥ | Sage Brihadasva narrates: "O Yudhishthira! Observing all the emotions of the wise and virtuous King Nala, Kesinī returned and informed Damayanti." (1) |
| दमयन्ती ततो भूयः प्रेषयामास केशिनीम् । मानुः सकाशं दुःखार्ता नलदर्शनकाङ्क्षया ॥2॥ |
अब दमयन्ती नलके दर्शनकी अभिलाषासे दुःखातुर हो गयी। उसने केशिनीको पुनः अपनी माँके पास भेजा ॥2॥ | "Now Damayanti, distressed with sorrow and longing to see Nala, sent Kesinī to her mother again." (2) |
| परीक्षितो मे बहुशो बाहुको नलशङ्कया । रूपे मे संशयस्त्वेकः स्वयमिच्छामि वेदितुम् ॥3॥ |
(और यह कहलाया--) “माँ! मेरे मनमें बाहुकके ही नलके होनेका संदेह था, जिसकी मैंने बार-बार परीक्षा करा ली है और सब लक्षण तो मिल गये हैं। केवल नलके रूपमें संदेह रह गया है। इस संदेहका निवारण करनेके लिये मैं स्वयं पता लगाना चाहती हूँ ॥3॥ | "(And instructed her,) 'Mother! I suspected that Vahuka was Nala, and I have tested him repeatedly. All the signs match, except for his appearance. I wish to clear this doubt myself.'" (3) |
| स वा प्रवेश्यतां मातर्मा वानुज्ञातुमर्हसि । विदितं वाथवा ज्ञातं पितुर्मे संविधीयताम् ॥4॥ |
“माताजी! या तो बाहुकको महलमें बुलाओ या मुझे ही बाहुकके निकट जानेकी आज्ञा दो। तुम अपनी रुचिके अनुसार पिताजीसे सूचित करके अथवा उन्हें इसकी सूचना दिये बिना इसकी व्यवस्था कर सकती हो” ॥4॥ | "'Mother! Either summon Vahuka to the palace or allow me to go to him. You can arrange this as you see fit, either by informing father or without informing him.'" (4) |
| एवमुक्ता तु वैदर्भ्या सा देवी भीममब्रवीत् । दुहितुस्तमभिप्रायमन्वजानात् स पार्थिवः ॥5॥ |
दमयन्तीके ऐसा कहनेपर महारानीने विदर्भनरेश भीमसे अपनी पुत्रीका यह अभिप्राय बताया। सब बातें सुनकर महाराजने आज्ञा दे दी ॥5॥ | "When Damayanti said this, the queen conveyed her daughter's intention to King Bhima of Vidarbha. Hearing everything, the king gave his permission." (5) |
| सा वै पित्राभ्यनुज्ञाता मात्रा च भरतर्षभ
। नलं प्रवेशयामास यत्र तस्याः प्रतिश्रयः ॥6॥ तां स्म दृष्ट्वैव सहसा दमयन्तीं नलो नृपः । आविष्टः शोकदुःखाभ्यां बभूवाश्नुपरिप्लुतः ॥7॥ |
भरतकुलभूषण! पिता और माताकी आज्ञा ले दमयन्तीने नलको राजभवनके भीतर जहाँ वह स्वयं रहती थी, बुलवाया। दमयन्तीको सहसा सामने उपस्थित देख राजा नल शोक और दुःखसे व्याप्त हो नेत्रोंसे आँसू बहाने लगे ॥ 6-7॥ | "O ornament of the Bharata race! With the permission of her father and mother, Damayanti summoned Nala to the inner chambers of the royal palace where she resided. Suddenly seeing Damayanti before him, King Nala, overwhelmed with sorrow and grief, started shedding tears." (6-7) |
| तं तु दृष्ट्वा तथायुक्तं दमयन्ती नलं तदा । तीव्रशोकसमाविष्टा बभूव वरवर्णिनी ॥8॥ |
उस समय नलको उस अवस्थामें देखकर सुन्दरी दमयन्ती भी तीव्र शोकसे व्याकुल हो गयी ॥8॥ | "Seeing Nala in that condition, the beautiful Damayanti was also overcome with intense sorrow." (8) |
| ततः काषायवसना जटिला मलपङ्किनी । दमयन्ती महाराज बाहुकं वाक्यमब्रवीत् ॥9॥ |
महाराज! तदनन्तर मलिन वस्त्र पहने, जटा धारण किये, मैल और पंकसे मलिन दमयन्तीने बाहुकसे पूछा ॥9॥ | "O King! Then, Damayanti, wearing soiled clothes, with matted hair, and covered in dirt and mud, asked Vahuka..." (9) |
| पूर्व दृष्टस्त्वया कश्चिद् धर्मज्ञो नाम बाहुक । सुप्तामुत्सृज्य विपिने गतो यः पुरुषः स्त्रियम् ॥10॥ |
'बाहुक! तुमने पहले किसी ऐसे धर्मज्ञ पुरुषको देखा है, जो अपनी सोयी हुई पत्नीको वनमें अकेली छोड़कर चले गये थे ॥10॥ | "'Vahuka! Have you ever seen a righteous man who abandoned his sleeping wife alone in the forest?'" (10) |
| अनागसं प्रियां भार्या विजने श्रममोहिताम् । अपहाय तु को गच्छेत् पुण्यश्लोकमृते नलम् ॥11॥ |
“पुण्यश्लोक महाराज नलके सिवा दूसरा कौन होगा, जो एकान्तमें थकावटके कारण अचेत सोयी हुई अपनी निर्दोष प्रियतमा पत्नीको छोड़कर जा सकता हो ॥11॥ | "'Who else but the virtuous King Nala could leave his innocent and beloved wife alone in the wilderness, unconscious due to exhaustion?'" (11) |
| किमु तस्य मया बाल्यादपराद्धं महीपतेः । यो मामुत्सृज्य विपिने गतवान् निद्रयार्दिताम् ॥12॥ |
“न जाने उन महाराजका मैने बचपनसे ही क्या अपराध किया था, जो नींदकी मारी हुई मुझ असहाय अबलाको जंगलमें छोड़कर चल दिये ॥12॥ | "'I do not know what wrong I did to that king since childhood that he left me, a helpless woman, asleep in the forest.'" (12) |
| साक्षाद् देवानपाहाय वृतो यः स पुरा मया । अनुव्रतां साभिकामां पुत्रिणीं त्यक्तवान् कथम् ॥13॥ |
'पहले स्वयंवरके समय साक्षात् देवताओंको छोड़कर मैंने उनका वरण किया था। मैं उनकी अनुगत भक्त, निरन्तर उन्हें चाहनेवाली और पुत्रवती हूँ, तो भी उन्होंने कैसे मुझे त्याग दिया? ॥13॥ | "'At the time of the swayamvara, I chose him, rejecting even the gods themselves. I am devoted to him, constantly desiring him, and the mother of his children, yet how could he abandon me?'" (13) |
| अग्नौ पाणि गृहीत्वा तु देवानामग्रतस्तथा । भविष्यामीति सत्यं तु प्रतिश्रुत्य क्व तद् गतम् ॥14॥ |
'अग्निके समीप और देवताओंके समक्ष मेरा हाथ पकड़कर और “मैं तेरा ही अनुगत होकर रहूँगा” ऐसी प्रतिज्ञा करके जिन्होंने मुझे अपनाया था, उनका वह सत्य कहाँ चला गया?” ॥14॥ | "'Where has that truth gone, with which he took my hand near the fire and in the presence of the gods, and vowed, "I will remain devoted to you alone," and accepted me?'" (14) |
| दमयन्त्या ब्रुवन्त्यास्तु सर्वमेतदरिंदम । शोकजं वारि नेत्राभ्यामसुखं प्रास्रवद् बहु ॥15॥ |
शत्रुदमन युधिष्ठिर! दमयन्ती जब ये सब बातें कह रही थी, उस समय नलके नेत्रोंसे शोकजनित दुःखपूर्ण आँसुओंकी अजस्र धारा बहती जा रही थी ॥15॥ | "O Yudhishthira, slayer of enemies! While Damayanti was saying all this, a continuous stream of sorrow-filled tears flowed from Nala's eyes." (15) |
| अतीव कृष्णसाराभ्यां रक्तान्ताभ्यां जलं तु तत् । परिस्रवन् नलो दृष्ट्वा शोकार्तामिदमब्रवीत् ॥16॥ |
उनकी आँखोंकी पुतलियाँ काली थीं और नेत्रके किनारे कुछ-कुछ लाल थे। उनसे निरन्तर अश्रुधारा बहाते हुए नलने दमयन्तीको शोकसे आतुर देख इस प्रकार कहा -- ॥16॥ | "The pupils of his eyes were black, and the corners were slightly red. Continuously shedding tears, seeing Damayanti distressed with sorrow, Nala said..." (16) |
| मम राज्यं प्रणष्टं यन्नाहं तत् कृतवान् स्वयम् । कलिना तत् कृतं भीरु यच्च त्वामहमत्यजम् ॥17॥ |
'भीरु! मेरा जो राज्य नष्ट हो गया और मैंने जो तुम्हें त्याग दिया, वह सब कलियुगकी करतूत थी। मैंने स्वयं कुछ नहीं किया था ॥17॥ | "'O timid one! The loss of my kingdom and my abandoning you were all the deeds of Kaliyuga. I myself did nothing.'" (17) |
| यत् त्वया धर्मकृच्छे तु शापेनाभिहतः पुरा
। वनस्थया दुःखितया शोचन्त्या मां दिवानिशम् ॥18॥ स मच्छरीरे त्वच्छापाद् दह्यामानोऽवसत् कलिः । त्वच्छापदग्धः सततं सोऽग्नावग्निरिवाहितः ॥19॥ |
'पहले जब तुम वनमें दुखी होकर दिन-रात मेरे लिये शोक करती थी और उस समय धर्मसंकटमें पड़नेपर तुमने जिसे शाप दे दिया था, वही कलियुग मेरे शरीरमे तुम्हारी शापग्निसे दग्ध होता हुआ निवास करता था, जैसे आगमे रखी हुई आग हो; उसी प्रकार वह कलि तुम्हारे शापसे दग्ध हो सदा मेरे भीतर रहता था ॥ 18-19॥ | "'Earlier, when you were grieving in the forest, lamenting for me day and night, and in that moment of moral crisis, you cursed Kaliyuga. That same Kaliyuga resided in my body, burning with the fire of your curse, like fire within fire. Similarly, that Kali, scorched by your curse, always remained within me.'" (18-19) |
| मम च व्यवसायेन तपसा चैव निर्जितः । दुःखस्यान्तेन चानेन भवितव्यं हि नौ शुभे ॥20॥ |
“शुभे! मेरे व्यवसाय (उद्योग) तथा तपस्यासे कलियुग परास्त हो चुका है। अतः अब हमारे दुःखोका अन्त हो जाना चाहिये ॥20॥ | "'O auspicious one! Kaliyuga has been defeated by my efforts (endeavors) and austerities. Therefore, our sorrows should now end.'" (20) |
| विमुच्य मां गतः पापस्ततोऽहमिह चागतः । त्वदर्थ विपुलश्रोणि न हि मेऽन्यत् प्रयोजनम् ॥21॥ |
“सुन्दरी! पापी कलियुग मुझे छोड़कर चला गया, इसीसे मैं तुम्हारी प्राप्तिका उद्देश्य लेकर यहाँ आया हूँ। इसके सिवा, मेरे आगमनका दूसरा कोई प्रयोजन नहीं है ॥21॥ | "'O beautiful one! The sinful Kaliyuga has left me, that is why I have come here with the aim of reuniting with you. There is no other reason for my arrival.'" (21) |
| कथं नु नारी भर्तारमनुरक्तमनुव्रतम् । उत्सृज्य वरयेदन्यं यथा त्वं भीरु कर्हिचित् ॥22॥ |
'भीरु! कोई भी स्त्री कभी अपने अनुरक्त एवं भक्त पतिको त्यागकर दूसरे पुरुषका वरण कैसे कर सकती है? जैसा कि तुम करने जा रही हो ॥22॥ | "'O timid one! How can any woman abandon her devoted and loving husband and choose another man, as you are about to do?'" (22) |
| दूताश्चरन्ति पृथिवीं कृत्स्नां नृपतिशासनात् । भैमी किल स्म भर्तारं द्वितीयं वरयिष्यति ॥23॥ |
'विदर्भनरेशकी आज्ञासे सारी पृथ्वीपर दूत विचरते हैं और यह घोषणा कर रहे हैं कि दमयन्ती द्वितीय पतिका वरण करेगी ॥23॥ | "'At the behest of the king of Vidarbha, messengers are wandering all over the earth, proclaiming that Damayanti will choose a second husband.'" (23) |
| स्वैरवृत्ता यथाकाममनुरूपमिवात्मनः । श्रुत्वैव चैवं त्वरितो भाङ्गासुरिरुपस्थितः ॥24॥ |
'दमयन्ती स्वेच्छाचारिणी है और अपनी रुचिके अनुसार किसी अनुरूप पतिका वरण कर सकती है', यह सुनकर ही राजा ऋतुपर्ण बड़ी उतावलीके साथ यहाँ उपस्थित हुए है" ॥24॥ | "'Hearing that Damayanti is independent and can choose any suitable husband according to her wishes, King Ṛtuparṇa has come here in great haste.'" (24) |
| दमयन्ती तु तच्छुत्वा नलस्य परिदेवितम् । प्राञ्जलिर्वेपमाना च भीता वचनमब्रवीत् ॥25॥ |
दमयन्ती नलका यह विलाप सुनकर काँप उठी और भयभीत हो हाथ जोड़कर यह वचन बोली ॥25॥ | "Hearing this lament of Nala, Damayanti trembled and, frightened, with folded hands, said..." (25) |
| दमयन्त्युवाच न मामर्हसि कल्याण दोषेण परिशङ्कितुम् । मया हि देवानुत्सृज्य वृतस्त्वं निषधाधिप ॥26॥ |
दमयन्तीने कहा-कल्याणमय निषधनरेश! आपको मुझपर दोषारोपण करते हुए मेरे चरित्रपर संदेह नहीं करना चाहिये। (आपके प्रति अनन्य प्रेमके कारण ही) मैंने देवताओंको छोड़कर आपका वरण किया है ॥26॥ | "Damayanti said, 'O auspicious king of Nishadha! You should not blame me or doubt my character. (Due to my unwavering love for you,) I chose you, rejecting the gods.'" (26) |
| तवाभिगमनार्थ तु सर्वतो ब्राह्मणा गताः । वाक्यानि मम गाथाभिर्गायमाना दिशो दश ॥27॥ |
आपका पता लगानेके लिये ही चारों ओर ब्राह्मणलोग भेजे गये और वे मेरी कही हुई बातोंको सब दिशाओंमें गाथाके रूपमे गाते फिरे ॥27॥ | "Brahmins were sent in all directions to find you, and they wandered around, reciting my words as ballads." (27) |
| ततस्त्वां ब्राह्मणो विद्वान् पर्णादो नाम पार्थिव । अभ्यगच्छत् कोसलायामृतुपर्णनिवेशने ॥28॥ |
राजन्! इसी योजनाके अनुसार पर्णाद नामक विद्वान् ब्राह्मण अयोध्यापुरीमें ऋतुपर्णके राजभवनमें गये थे ॥ | "O King! According to this plan, the learned Brahmin Parṇāda went to the royal palace of Ṛtuparṇa in the city of Ayodhya." (28) |
| तेन वाक्ये कृते सम्यकू प्रतिवाक्ये तथाऽऽहृते । उपायोऽयं मया दृष्टो नैषधानयने तव ॥29॥ |
उन्होंने वहाँ मेरी बात उपस्थित की और वहाँसे आपके द्वारा प्राप्त हुआ ठीक-ठीक उत्तर वे ले आये। निषधराज! इसके बाद आपको यहाँ बुलानेके लिये मुझे यह उपाय सूझा (कि एक ही दिनके बाद होनेवाले स्वयंवरका समाचार देकर ऋतुपर्णको बुलाया जाय) ॥29॥ | "He conveyed my message there and brought back the exact reply received from you. O king of Nishadha! After that, this idea occurred to me to bring you here (to inform Ṛtuparṇa about a swayamvara happening the next day and summon him).'" (29) |
| त्वामृते न हि लोकेऽन्य एकाह्ना पृथिवीपते । समर्थो योजनशतं गन्तुमश्वैर्नराधिप ॥30॥ |
नरेश्वर! पृथ्वीनाथ! मैं यह अच्छी तरह जानती हूँ कि इस जगत्में आपके सिवा दूसरा कोई ऐसा पुरुष नहीं है, जो एक ही दिनमें घोड़े जुते हुए रथकी सवारीसे सौ योजन दूरतक जानेमें समर्थ हो ॥30॥ | "O lord of men! O lord of the earth! I know very well that there is no other man in this world except you who can travel a hundred yojanas in a single day by chariot." (30) |
| स्पृशेयं तेन सत्येन पादावेतौ महीपते । यथा नासत्कृतं किंचिन्मनसापि चराम्यहम् ॥31॥ |
महीपते! मैं मनसे भी कभी कोई असदाचरण नहीं करती हूँ और इसी सत्यकी शपथ खाकर आपके इन दोनों चरणोंका स्पर्श करती हूँ ॥31॥ | "O king! I never even think of any unrighteousness, and swearing by this truth, I touch both your feet." (31) |
| अयं चरति लोकेऽस्मिन् भूतसाक्षी सदागतिः । एष मे मुञ्चतु प्राणान् यदि पापं चराम्यहम् ॥32॥ |
ये सदा गतिशील वायुदेवता इस जगते निरन्तर विचरते रहते हैं, अतः ये सम्पूर्ण भूतोंके साक्षी हैं। यदि मैने पाप किया है तो ये मेरे प्राणोंका हरण कर लें ॥32॥ | "The ever-moving god of wind constantly wanders this world, therefore he is a witness to all beings. If I have committed any sin, let him take my life." (32) |
| यथा चरति तिग्मांशुः परेण भुवनं सदा । स मुञ्चतु मम प्राणान् यदि पापं चराम्यहम् ॥33॥ |
प्रचण्ड किरणोंवाले सूर्यदेव समस्त भुवनोंके ऊपर विचरते हैं, (अतः वे भी सबके शुभाशुभ कर्म देखते रहते हैं।) यदि मैंने पाप किया है तो ये मेरे प्राणोंका हरण कर लें ॥33॥ | "The sun god with his fierce rays travels above all the worlds, (therefore he also sees the good and bad deeds of everyone). If I have committed any sin, let him take my life." (33) |
| चन्द्रमाः सर्वभूतानामन्तश्चरति साक्षिवत् । स मुञ्चतु मम प्राणान् यदि पापं चराम्यहम् ॥34॥ |
चित्तके अभिमानी देवता चन्द्रमा समस्त प्राणियोंके अन्तःकरणमें साक्षीरूपसे विचरते हैं। यदि मैने पाप किया है तो वे मेरे प्राणोंका हरण कर लें ॥34॥ | "The moon god, the lord of the mind, resides as a witness in the hearts of all beings. If I have committed any sin, let him take my life." (34) |
| एते देवास्त्रयः कृत्स्नं त्रैलोक्यं धारयन्ति वै । विब्रुवन्तु यथा सत्यमेतद् देवास्त्यजन्तु माम् ॥35॥ |
ये पूर्वोक्त तीन देवता सम्पूर्ण त्रिलोकीको धारण करते हैं। मेरे कथनमें कितनी सचाई है, इसे देवतालोग स्वयं स्पष्ट करें। यदि मैं झूठ बोलती हूँ तो देवता मेरा त्याग कर दें ॥35॥ | "These three aforementioned gods sustain the entire three worlds. Let the gods themselves clarify the truth in my statement. If I am lying, let the gods abandon me." (35) |
| एवमुक्तस्तथा वायुरन्तरिक्षादभाषत । नैषा कृतवती पापं नल सत्यं ब्रवीमि ते ॥36॥ |
दमयन्तीके ऐसा कहनेपर अन्तरिक्षलोकसे वायु-देवताने कहा--“नल! मैं तुमसे सत्य कहता हूँ, इस दमयन्तीने कभी कोई पाप नहीं किया है ॥36॥ | "When Damayanti said this, the wind god said from the sky, 'Nala! I tell you truthfully, this Damayanti has never committed any sin.'" (36) |
| राजञ्छीलनिधिः स्फीतो दमयन्त्या सुरक्षितः । साक्षिणो रक्षिणश्चास्या वयं त्रीन् परिवत्सरान् ॥37॥ |
'राजन्! दमयन्तीने अपने शीलकी उज्ज्वल निधिको सदा सुरक्षित रखा है। हमलोग तीन वर्षोंतक निरन्तर इसके रक्षक और साक्षी रहे हैं ॥37॥ | "'O King! Damayanti has always preserved the radiant treasure of her chastity. We have been her protectors and witnesses for three years.'" (37) |
| उपायो विहितश्चायं त्वदर्थमतुलोऽनया । न होकाह्वा शतं गन्ता त्वामृतेऽन्यः पुमानिह ॥38॥ |
“तुम्हारी प्राप्तिके लिये दमयन्तीने यह अनुपम उपाय ढूँढ़ निकाला था; क्योंकि इस जगतूमें तुम्हारे सिवा दूसरा कोई पुरुष नहीं है, जो एक दिनमें सौ योजन (रथद्वारा) जा सके ॥38॥ | "'Damayanti devised this unique plan to find you because there is no other man in this world except you who can travel a hundred yojanas in a single day (by chariot).'" (38) |
| उपपन्ना त्वया भैमी त्वं च भैम्या महीपते । नात्र शङ्का त्वया कार्या संगच्छ सह भार्यया ॥39॥ |
'राजन्! भीमकुमारी दमयन्ती तुम्हारे योग्य है और तुम दमयन्तीके योग्य हो। तुम्हे इसके चरित्रके विषयमे कोई शंका नहीं करनी चाहिये। तुम अपनी पत्नीसे निःशंक होकर मिलो" ॥39॥ | "'O King! Damayanti, the daughter of Bhima, is worthy of you, and you are worthy of Damayanti. You should not have any doubts about her character. Reunite with your wife without any fear.'" (39) |
| तथा ब्रुवति वायौ तु पुष्पवृष्टिः पपात ह । देवदुन्दुभयो नेदुर्ववौ च पवनः शिवः ॥40॥ |
वायुदेवके ऐसा कहते समय आकाशसे फूलोंकी वर्षा हो रही थी, देवताओंकी दुन्दुभियाँ बज रही थीं और मंगलमय पवन चलने लगा ॥40॥ | "While the wind god was saying this, flowers rained from the sky, divine drums sounded, and auspicious winds started blowing." (40) |
| तदद्भुतमयं दृष्ट्वा नलो राजाथ भारत । दमयन्त्यां विशङ्कां तामुपाकर्षदरिंदमः ॥41॥ |
युधिष्ठिर! यह अद्भुत दृश्य देखकर शत्रुसूदन राजा नलने दमयन्तीके विरुद्ध होनेवाली शंकाको त्याग दिया ॥41॥ | "O Yudhishthira! Seeing this wondrous sight, King Nala, the slayer of enemies, abandoned all doubts against Damayanti." (41) |
| ततस्तद् वस्त्रमजरं प्रावृणोद् वसुधाधिपः । संस्मृत्य नागराजं तं ततो लेभे स्वकं वपुः ॥42॥ |
तदनन्तर उन भूपालने नागराज कर्कोटकका स्मरण करके उसके दिये हुए अजीर्ण वस्त्रको ओढ़ लिया। उससे उन्हें अपने पूर्वस्वरूपकी प्राप्ति हो गयी ॥42॥ | "Then, that king, remembering Karkoṭaka the Naga king, wore the two garments given by him. This restored his previous form." (42) |
| स्वरूपिणं तु भर्तरि दृष्ट्वा भीमसुता तदा । प्राक्रोशदुच्चैरालिङ्गय पुण्यश्लोकमनिन्दिता ॥43॥ |
अपने वास्तविक रूपमे प्रकट हुए अपने पतिदेव पुण्यश्लोक महाराज नलको देखकर सती साध्वी दमयन्ती उनके हृदयसे लगकर उच्च स्वरसे रोने लगी ॥43॥ | "Seeing her husband, the virtuous King Nala, appear in his true form, the chaste and virtuous Damayanti embraced him and cried loudly." (43) |
| भैमीमपि नलो राजा भ्राजमानो यथा पुरा । सस्वजे स्वसुतौ चापि यथावत् प्रत्यनन्दत ॥44॥ |
राजा नलका रूप पहलेकी ही भाँति ही प्रकाशित हो रहा था। उन्होंने भी दमयन्तीको छातीसे लगा लिया और अपने दोनों बालकोंको भी प्यार-दुलार करके प्रसन्न किया ॥44॥ | "King Nala's appearance was as radiant as before. He also embraced Damayanti and, showing affection to both his children, made them happy." (44) |
| ततः स्वोरसि विन्यस्य वक्त्रं तस्य शुभानना । परीता तेन दुःखेन निःशश्चासायतेक्षणा ॥45॥ |
तत्पश्चात् सुन्दर मुख और विशाल नेत्रोंवाली दमयन्ती नलके मुखको अपने वक्षःस्थलपर रखकर दुःखसे व्याकुल हो लंबी साँसे खींचने लगी ॥45॥ | "Then, Damayanti, with her beautiful face and large eyes, placed Nala's face on her bosom and, distressed with sorrow, sighed deeply." (45) |
| तथैव मलदिग्धाङ्गी परिष्वज्य शुचिस्मिताम् । सुचिरं पुरुषव्याघ्रस्तस्थौ शोकपरिप्लुतः ॥46॥ |
इसी प्रकार पवित्र मुसकान तथा मैलसे भरे हुए अंगोंवाली दमयन्तीको हृदयसे लगाकर पुरुषसिंह नल बहुत देरतक शोकमग्न खड़े रहे ॥46॥ | "Similarly, the lion among men, Nala, embracing Damayanti, who had a pure smile and dirt-covered limbs, stood there for a long time, immersed in sorrow." (46) |
| ततः सर्वं यथावृत्तं दमयन्त्या नलस्य च । भीमायाकथयत् प्रीत्या वैदर्भ्या जननी नृप ॥47॥ |
'राजन्! तदनन्तर (दमयन्तीके द्वारा मालूम होनेपर) दमयन्तीकी माताने अत्यन्त प्रसन्नतापूर्वक राजा भीमसे नल-दमयन्तीका सारा वृत्तान्त यथावत् कह सुनाया” ॥47॥ | "O King! Then (when Damayanti informed her), Damayanti's mother, with great joy, narrated the entire story of Nala and Damayanti to King Bhima." (47) |
| ततोऽब्रवीन्महाराजः कृतशौचमहं नलम् । दमयन्त्या सहोपेतं कल्ये द्रष्टा सुखोषितम् ॥48॥ |
तब महाराज भीमने कहा--“आज नलको सुखपूर्वक यहीं रहने दो। कल सबेरे स्नान आदिसे शुद्ध हुए दमयन्तीसहित नलसे मै मिलूँगा' ॥48॥ | "Then King Bhima said, 'Let Nala stay here comfortably today. Tomorrow morning, after purifying themselves with a bath, I will meet Nala along with Damayanti.'" (48) |
| ततस्तौ सहितौ रात्रिं कथयन्तौ पुरातनम् । वने विचरितं सर्वमूषतुर्मुदितौ नृप ॥49॥ |
राजन्! तत्पश्चात् वे दोनों दम्पति रातभर वनमें रहनेकी पुरानी घटनाओंको एक-दूसरेसे कहते हुए प्रसन्नतापूर्वक एक साथ रहे ॥49॥ | "O King! Then, that couple stayed together happily throughout the night, narrating to each other their experiences of living in the forest." (49) |
| गृहे भीमस्य नृपतेः परस्परसुखैषिणौ । वसेतां हृष्टसंकल्पौ वैदर्भी च नलश्च ह ॥50॥ |
एक-दूसरेको सुख देनेकी इच्छा रखनेवाले दमयन्ती और नल राजा भीमके महलमें प्रसन्नचित्त होकर रहे ॥50॥ | "Damayanti and Nala, desiring to bring happiness to each other, stayed in King Bhima's palace with joyful hearts." (50) |
| स चतुर्थे ततो वर्षे संगम्य सह भार्यया । सर्वकामैः सुसिद्धार्थो लब्धवान् परमां मुदम् ॥51॥ |
चौथे वर्षमें अपनी प्यारी पत्नीसे मिलकर सम्पूर्ण कामनाओंसे सफलमनोरथ हो नल अत्यन्त आनन्दमें निमग्न हो गये ॥51॥ | "In the fourth year, reunited with his beloved wife, all his desires fulfilled, Nala was immersed in great joy." (51) |
| दमयन्त्यपि भर्तारमासाद्याप्यायिता भृशम् । अर्धसंजातसस्येव तोयं प्राप्य वसुंधरा ॥52॥ |
जैसे आधी जमी हुई खेतीसे भरी वसुधा वर्षाका जल पाकर उल्लसित हो उठती है, उसी प्रकार दमयन्ती भी अपने पतिको पाकर बहुत संतुष्ट हुई ॥52॥ | "Just as the earth, filled with half-grown crops, rejoices upon receiving rainwater, similarly Damayanti was very content to be reunited with her husband." (52) |
| सैवं समेत्य व्यपनीय तन्द्रां शान्तज्वरा हर्षविवृद्धसत्त्वा । रराज भैमी समवाप्तकामा शीतांशुना रात्रिरिवोदितेन ॥53॥ |
जैसे चन्द्रोदयसे रात्रिकी शोभा बढ़ जाती है, उसी प्रकार भीमकुमारी दमयन्ती पतिसे मिलकर आलस्यका त्याग करके निश्चिन्त और हर्षोल्लसित हृदयसे पूर्णकाम होकर अत्यन्त शोभा पाने लगी ॥53॥ | "Just as the beauty of the night increases with the rising of the moon, similarly, Damayanti, the daughter of Bhima, reunited with her husband, abandoning all lethargy, became free from worries, her heart filled with joy and completely fulfilled, and attained great splendor." (53) |
| इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि नलोपाख्यानपर्वणि नलदमयन्तीसमागमे षट्सप्ततितमोऽध्यायः ॥76॥ | इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत नलोपाख्यानपर्वमें नलदमयन्तीसमागमविषयक छिहत्तरवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥76॥ | "Thus ends the seventy-sixth chapter in the Nalopakhyana Parva of the Vana Parva in the Sri Mahabharata, describing the reunion of Nala and Damayanti." (76) |
| सप्तसप्ततितमोऽध्यायः | सतहत्तरवाँ अध्याय | **Chapter Seventy-Seventh: |
| नलके प्रकट होनेपर विदर्भनगरमें महान् उत्सवका आयोजन, ऋतुपर्ण पर्णके साथ नलका वार्तालाप और ऋतुपर्णका अश्चविद्या सीखकर अयोध्या जाना | नलके प्रकट होनेपर विदर्भनगरमें महान् उत्सवका आयोजन, ऋतुपर्ण पर्णके साथ नलका वार्तालाप और ऋतुपर्णका अश्चविद्या सीखकर अयोध्या जाना | Grand Celebrations in Vidarbha after Nala's Return; Nala's Conversation with Ṛtuparṇa; Ṛtuparṇa Learns the Science of Horses and Returns to Ayodhya** |
| बृहदश्च उवाच अथ तां व्युषितो रात्रिं नलो राजा स्वलंकृतः । वैदर्भ्या सहितः काले ददर्श वसुधाधिपम् ॥1॥ |
बृहदश्च मुनि कहते हैं-युधिष्ठिर! तदनन्तर वह रात बीतनेपर राजा नल वस्त्राभूषणोंसे अलंकृत हो दमयन्तीके साथ यथासमय राजा भीमसे मिले ॥1॥ | Sage Brihadasva narrates: "O Yudhishthira! After that night passed, King Nala, adorned with garments and ornaments, appeared before King Bhima at the appropriate time, along with Damayanti." (1) |
| ततोऽभिवादयामास प्रयतः श्वशुरं नलः । ततोऽनु दमयन्ती च ववन्दे पितरं शुभा ॥2॥ |
स्नानादिसे पवित्र हुए राजा नलने विनीतभावसे श्वशुरको प्रणाम किया। तत्पश्चात् शुभलक्षणा दमयन्तीने भी पिताकी वन्दना की ॥2॥ | "Purified by bathing and other rituals, King Nala humbly bowed to his father-in-law. Then, the auspicious Damayanti also paid her respects to her father." (2) |
| तं भीमः प्रतिजग्राह पुत्रवत् परया मुदा
। यथार्ह पूजयित्वा च समाश्वासयत प्रभुः ॥3॥ नलेन सहितां तत्र दमयन्तीं पतिव्रताम् । |
राजा भीमने बड़ी प्रसन्रताके साथ नलको पुत्रकी भाँति अपनाया और नलसहित पतिव्रता दमयन्तीका यथायोग्य आदर-सत्कार करके उन्हें आश्वासन दिया ॥3॥ | "King Bhima, with great joy, embraced Nala like a son and, honoring and consoling both Nala and the virtuous Damayanti, reassured them." (3) |
| तामर्हणां नलो राजा प्रतिगृह्य यथाविधि ॥4॥ परिचर्या स्वकां तस्मै यथावत् प्रत्यवेदयत् । ततो बभूव नगरे सुमहान् हर्षजः स्वनः ॥5॥ जनस्य सम्प्रह्ृष्टस्य नलं दृष्ट्वा तथाऽऽगतम् । |
राजा नलने उस पूजाको विधिपूर्वक स्वीकार करके अपनी ओरसे भी श्वशुरका सेवा- सत्कार किया। तदनन्तर विदर्भनगरमें राजा नलको इस प्रकार आया देख हर्षोल्लासमे भरी हुई जनताका महान् आनन्दजनित कोलाहल होने लगा ॥ 4-5॥ | "King Nala duly accepted the honors and, in turn, paid his respects to his father-in-law. Then, seeing King Nala arrive in the city of Vidarbha in this manner, there arose a great joyous uproar among the delighted populace." (4-5) |
| अशोभयच्च नगरं पताकाध्वजमालिनम् ॥6॥ सिक्ताः सुमृष्टपुष्पाढ्या राजमार्गाः स्वलंकृताः । द्वारि द्वारि च पौराणां पुष्पभङ्गः प्रकल्पितः ॥7॥ |
विदर्भनरेशने ध्वजा, पताकाओंकी पंक्तियोंसे कुण्डिनपुरको अद्भुत शोभासे सम्पन्न किया। सड़कोंको खूब झाड़-बुहारकर उनपर छिड़काव किया गया था। फूलोंसे उन्हें अच्छी तरह सजाया गया था। पुरवासियोंके द्वार-द्वारपर सुगंध फैलानेके लिये राशि-राशि फूल बिखेरे गये थे ॥ 6-7॥ | "The king of Vidarbha adorned Kuṇḍinapura with flags and banners, creating a wondrous spectacle. The streets were thoroughly cleaned and sprinkled with water. They were beautifully decorated with flowers. Heaps of flowers were scattered at the doorways of the citizens to spread fragrance." (6-7) |
| अर्चितानि च सर्वाणि देवतायतनानि च
। ऋतुपर्णोऽपि शुश्राव बाहुकच्छद्मिनं नलम् ॥8॥ दमयन्त्या समायुक्तं जहृषे च नराधिपः । |
सम्पूर्ण देवमन्दिरोंकी सजावट और देवमूर्तियोंकी पूजा की गयी थी। राजा ऋतुपर्णने भी जब यह सुना कि बाहुकके वेषमें राजा नल ही थे और अब वे दमयन्तीसे मिले हैं, तब उन्हें बड़ा हर्ष हुआ ॥8॥ | "All the temples were decorated, and the deities were worshipped. King Ṛtuparṇa was also overjoyed when he heard that it was King Nala himself in the guise of Vahuka, and that he had now been reunited with Damayanti." (8) |
| तमानाय्य नलं राजा क्षमयामास पार्थिवम् ॥9॥ | उन्होंने राजा नलको बुलवाकर उनसे क्षमा माँगी ॥9॥ | "He summoned King Nala and asked for his forgiveness." (9) |
| स च तं क्षमयामास हेतुभिर्बुद्धिसम्मितः
। स सत्कृतो महीपालो नैषधं विस्मिताननः ॥10॥ उवाच वाक्यं तत्त्वज्ञो नैषधं वदतां वरः । बुद्धिमान् नलने भी अनेक युक्तियोंद्वारा उनसे क्षमा-याचना की। |
नलसे आदर-सत्कार पाकर वक्ताओंमें श्रेष्ठ एवं तत्त्वज्ञ राजा ऋतुपर्ण मुसकराते हुए मुखसे बोले ॥10॥ | "Honored by Nala, King Ṛtuparṇa, the best among orators and a man of wisdom, said with a smile..." (10) |
| दिष्ट्या समेतो दारैः स्वैर्भवानित्यभ्यनन्दत ॥11॥ | 'निषधनरेश! यह बड़े सौभाग्यकी बात है कि आप अपनी बिछुड़ी हुई पत्नीसे मिले।' ऐसा कहकर उन्होंने नलका अभिनन्दन किया ॥11॥ | "'O king of Nishadha! It is a matter of great fortune that you have been reunited with your wife.' Saying this, he congratulated Nala." (11) |
| किंचित् तु नापराधं ते कृतवानस्मि नैषध । अज्ञातवासे वसतो मद्गृहे वसुधाधिप ॥12॥ |
(और पुनः कहा) “नैषध! भूपालशिरोमणे! आप मेरे घरपर जब अज्ञातवासकी अवस्थामें रहते थे, उस समय मैंने आपका कोई अपराध तो नहीं किया है? ॥12॥ | "(And said again,) 'O Nala! O jewel among kings! Did I commit any offense against you while you were living incognito in my house?'" (12) |
| यदि वाबुद्धिपूर्वाणि यदि बुद्धयापि कानिचित् । मया कृतान्यकार्याणि तानि त्वं क्षन्तुमर्हसि ॥13॥ |
'उन दिनों यदि मैंने बिना जाने या जान-बूझकर आपके साथ अनुचित बर्ताव किये हों तो उन्हें आप क्षमा कर दें” ॥13॥ | "'If I behaved improperly with you during those days, knowingly or unknowingly, please forgive me.'" (13) |
| नल उवाच न मेऽपराधं कृतवांस्त्वं स्वल्पमपि पार्थिव । कृतेऽपि च न मे कोपः क्षन्तव्यं हि मया तव ॥14॥ |
नलने कहा-'राजन्! आपने मेरा कभी थोड़ासा भी अपराध नहीं किया है और यदि किया भी हो तो उसके लिये मेरे हृदयम क्रोध नहीं है। मुझे आपके प्रत्येक बर्तावको क्षमा ही करना चाहिये” ॥14॥ | "Nala said, 'O King! You have never committed even the slightest offense against me, and even if you have, there is no anger in my heart for it. I should forgive every action of yours.'" (14) |
| 58 न बन Rs पूर्व ह्यपि सखा मेऽसि सम्बन्धी च जनाधिप । अत ऊर्ध्व तु भूयस्त्वं प्रीतिमाहर्तुमर्हसि ॥15॥ |
जनेश्वर! आप पहले भी मेरे सखा और सम्बन्धी थे और इसके बाद भी आपको मुझपर अधिक-से-अधिक प्रेम रखना चाहिये ॥15॥ | "'O lord of people! You were my friend and relative before, and even more so now, you should have the greatest affection for me.'" (15) |
| सर्वकामैः सुविहितैः सुखमस्म्युषितस्त्वयि । न तथा स्वगृहे राजन् यथा तव गृहे सदा ॥16॥ |
राजन्! मेरी समस्त कामनाएँ वहाँ अच्छी तरह पूर्ण की गयीं और इसके कारण मैं सदा आपके यहाँ सुखी रहा। महाराज! आपके भवनमें मुझे जेसा आराम मिला, वैसा अपने घरमे भी नहीं मिला ॥16॥ | "'O King! All my needs were well taken care of there, and because of this, I was always happy in your house. O King! I received more comfort in your palace than in my own home.'" (16) |
| इदं चैव हयज्ञानं त्वदीयं मयि तिष्ठति । तदुपाकर्तुमिच्छामि मन्यसे यदि पार्थिव । एवमुक्त्वा ददौ विद्यामृतुपर्णाय नैषधः ॥17॥ |
आपका अश्वविज्ञान मेरे पास धरोहरके रूपमे पड़ा है। राजन्! यदि आप ठीक समझें तो मैं उसे आपको देनेकी इच्छा रखता हूँ। ऐसा कहकर निषधराज नलने ऋतुपर्णको अश्वविद्या प्रदान की ॥17॥ | "'Your knowledge of horses is with me as a trust. O King! If you deem it fit, I wish to return it to you.' Saying so, Nala, the king of Nishadha, imparted the science of horses to Ṛtuparṇa." (17) |
| स च तां प्रतिजग्राह विधिदृष्टेन कर्मणा
। गृहीत्वा चाश्वहृदयं राजन् भाङ्गासुरिर्नृपः ॥18॥ निषधाधिपतेश्नापि दत्त्वाक्षहृदयं नृपः । सूतमन्यमुपादाय ययौ स्वपुरमेव ह ॥19॥ |
युधिष्ठिर! ऋतुपर्णने भी शास्त्रीय विधिके अनुसार उनसे अश्वविद्या ग्रहण की। अश्चोंका रहस्य ग्रहण करके और निषधनरेश नलको पुनः द्यूतविद्याका रहस्य समझाकर दूसरा सारथि साथ ले राजा ऋतुपर्ण अपने नगरको चले गये ॥ 18-19॥ | "O Yudhishthira! Ṛtuparṇa also learned the science of horses from him according to the prescribed methods. After learning the secrets of horses and once again teaching the secrets of dice to King Nala of Nishadha, King Ṛtuparṇa returned to his city, taking another charioteer with him." (18-19) |
| ऋतुपर्णे गते राजन् नलो राजा विशाम्पते । नगरे कुण्डिने कालं नातिदीर्घमिवावसत् ॥20॥ |
राजन्! ऋतुपर्णके चले जानेपर राजा नल कुण्डिनपुरमें कुछ समयतक रहे। वह काल उन्हें थोड़े समयके समान ही प्रतीत हुआ ॥20॥ | "O King! After Ṛtuparṇa's departure, King Nala stayed in Kuṇḍinapura for some time. That period seemed to him like a very short time." (20) |
| इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि नलोपाख्यानपर्वणि ऋतुपर्णस्वदेशगमने सप्तसप्ततितमोऽध्यायः ॥77॥ | इय प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत नलोपाख्यानपर्वमें ऋतुपर्णका स्वदेशगमनविषयक सतहत्तरवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥77॥ | "Thus ends the seventy-seventh chapter in the Nalopakhyana Parva of the Vana Parva in the Sri Mahabharata, describing Ṛtuparṇa's return to his homeland." (77) |
| अष्टसप्ततितमोऽध्यायः | अठहत्तरवाँ अध्याय | **Chapter Seventy-Eighth: |
| राजा नलका पुष्करको जूएमें हराना और उसको राजधानीमें अपने नगरमे प्रवेश करना | राजा नलका पुष्करको जूएमें हराना और उसको राजधानीमें अपने नगरमे प्रवेश करना | King Nala Defeats Pushkara in Gambling and Returns to His Capital City** |
| बृहदश्च उवाच स मासमुष्य कौन्तेय भीममामन्त्र्य नैषधः । पुरादल्पपरीवारो जगाम निषधान् प्रति ॥1॥ |
बृहदश्च मुनि कहते हैं-युधिष्ठिर! निषध-नरेश एक मासतक कुण्डिनपुरमें रहकर राजा भीमकी आज्ञा ले थोड़े-से सेवकोंसहित वहाँसे निषधदेशकी ओर प्रस्थित हुए ॥1॥ | Sage Brihadasva narrates: "O Yudhishthira! The king of Nishadha, after staying in Kuṇḍinapura for a month, took leave of King Bhima and set out for the kingdom of Nishadha with a small retinue." (1) |
| रथेनैकेन शुभ्रेण दन्तिभिः परिषोडशैः । पञ्चाशद्धरिर्हयैश्चैव षट्शतैश्च पदातिभिः ॥2॥ |
उनके साथ चारों ओरसे सोलह हाथियोंद्वारा घिरा हुआ एक सुन्दर रथ, पचास घोड़े और छः सौ पैदल सैनिक थे ॥2॥ | "He had with him a beautiful chariot surrounded by sixteen elephants on all sides, fifty horses, and six hundred foot soldiers." (2) |
| स कम्पयन्निव महीं त्वरमाणो महीपतिः । प्रविवेशाथ संरब्धस्तरसैव महामनाः ॥3॥ |
महामना राजा नलने इन सबके द्वारा पृथ्वीको कम्पित-सी करते हुए बड़ी उतावलीके साथ रोषावेशमें भरे वेगपूर्वक निषधदेशकी राजधानीमें प्रवेश किया ॥3॥ | "The noble-minded King Nala, with all these, making the earth tremble, swiftly entered the capital of Nishadha, filled with righteous anger." (3) |
| ततः पुष्करमासाद्य वीरसेनसुतो नलः
। उवाच दीव्याव पुनर्बहुवित्तं मयार्जितम् ॥4॥ दमयन्ती च यच्चान्यन्मम किंचन विद्यते । एष वै मम संन्यासस्तव राज्यं तु पुष्कर ॥5॥ पुनः प्रवर्ततां द्यूतमिति मे निश्चिता मतिः । एकपाणेन भत्रं ते प्राणयोश्च पणावहे ॥6॥ |
तदनन्तर वीरसेनपुत्र नलने पुष्करके पास जाकर कहा--“अब हम दोनों फिरसे जूआ खेलें। मैंने बहुत धन प्राप्त किया है। दमयन्ती तथा अन्य जो कुछ भी मेरे पास है, यह सब मेरी ओरसे दाँवपर लगाया जायगा और पुष्कर! तुम्हारी ओरसे सारा राज्य ही दाँवपर रखा जायगा। इस एक पणके साथ हम दोनोंमें फिर जूएका खेल प्रारम्भ हो, यह मेरा निश्चित विचार है। तुम्हारा भला हो, यदि ऐसा न कर सको तो हम दोनों अपने प्राणोंकी बाजी लगावें ॥4-6॥ | "Then, Nala, the son of Virasena, went to Pushkara and said, 'Let us gamble again. I have acquired much wealth. Damayanti and everything else I possess will be wagered from my side, and Pushkara, your entire kingdom will be staked from your side. With this single wager, let the game of dice commence between us, this is my firm decision. May you prosper, if you cannot do this, then let us wager our lives.'" (4-6) |
| जित्वा परस्वमाहृत्य राज्यं वा यदि वा वसु । प्रतिपाणः प्रदातव्यः परमो धर्म उच्यते ॥7॥ |
'जूएके दाँवमें दूसरेका राज्य या धन जीतकर रख लिया जाय तो उसे यदि वह पुनः खेलना चाहे तो प्रतिपण (बदलेका दाव) देना चाहिये, यह परम धर्म कहा गया है ॥7॥ | "'It is said to be the highest dharma (righteousness) that if one wins another's kingdom or wealth in gambling, and the loser wishes to play again, then a counter-wager must be offered.'" (7) |
| न चेद् वाञ्छसि त्वं द्यूतं युद्धद्यूतं प्रवर्तताम् । द्वैरथेनास्तु वै शान्तिस्तव वा मम वा नृप ॥8॥ |
"यदि तुम पासोंसे जूआ खेलना न चाहो तो बाणोद्धारा युद्धका जूआ प्रारम्भ होना चाहिये। राजन्! द्वैरथयुद्धके द्वारा तुम्हारी अथवा मेरी शान्ति हो जाय ॥8॥ | "'If you do not wish to gamble with dice, then let the game of war begin with arrows. O King! Let peace be established between us through a duel.'" (8) |
| वंशभोज्यमिदं राज्यमर्थितव्यं यथा तथा । येन केनाप्युपायेन वृद्धानामिति शासनम् ॥9॥ |
'यह राज्य हमारी वंशपरम्पराके उपभोगमें आनेवाला है। जिस-किसी उपायसे भी जैसे-तैसे इसका उद्धार करना चाहिये; ऐसा वृद्ध पुरुषोंका उपदेश है ॥9॥ | "'This kingdom is meant to be enjoyed by our lineage. It should be recovered by any means necessary; this is the advice of the elders.'" (9) |
| द्वयोरेकतरे बुद्धिः क्रियतामद्य पुष्कर । कैतवेनाक्षवत्यां तु युद्धे वा ना ताम्यतां धनुः ॥10॥ |
“पुष्कर! आज तुम दोमेंसे एकमे मन लगाओ। छलपूर्वक जूआ खेलो अथवा युद्धके लिये धनुषपर प्रत्यञ्चा चढ़ाओ' ॥10॥ | "'Pushkara! Choose one of the two today. Gamble deceitfully or string your bow for battle.'" (10) |
| नैषधेनैवमुक्तस्तु पुष्करः प्रहसन्निव । ध्रुवमात्मजयं मत्वा प्रत्याह पृथिवीपतिम् ॥11॥ |
निषधराज नलके ऐसा कहनेपर पुष्करने अपनी विजयको अवश्यम्भावी मानकर हँसते हुए उनसे कहा-- ॥11॥ | "Hearing these words of King Nala of Nishadha, Pushkara, confident of his victory, laughed and said to him..." (11) |
| दिष्ट्या त्वयार्जितं वित्तं प्रतिपाणाय नैषध । दिष्ट्या च दुष्कृतं कर्म दमयन्त्याः क्षयं गतम् ॥12॥ |
“नैषध! सौभाग्यकी बात है कि तुमने दाँवपर लगानेके लिये धनका उपार्जन कर लिया है। यह भी आनन्दकी बात है कि दमयन्तीके दुष्कर्मोका क्षय हो गया ॥12॥ | "'O Nala! It is fortunate that you have earned wealth to wager. It is also a matter of joy that Damayanti's misfortune has ended.'" (12) |
| दिष्ट्या च ध्रियसे राजन् सदारोऽद्य महाभुज
। धनेनानेन वै भैमी जितेन समलंकृता ॥13॥ मामुपस्थास्यति व्यक्तं दिवि शक्रमिवाप्सराः । नित्यशो हि स्मरामि त्वां प्रतीक्षेऽपि च नैषध ॥14॥ |
'महाबाहु नरेश! सौभाग्यसे तुम पत्नीसहित अभी जीवित हो। इसी धनको जीत लेनेपर दमयन्ती शृंगार करके निश्चय ही मेरी सेवामें उपस्थित होगी, ठीक उसी तरह, जैसे स्वर्गलोककी अप्सरा देवराज इन्द्रकी सेवामें जाती है। नैषध! मैं प्रतिदिन तुम्हारी याद करता हूँ और तुम्हारी राह भी देखा करता हूँ ॥ 13-14॥ | "'O mighty-armed king! By good fortune, you are still alive, along with your wife. After winning this wealth, Damayanti, adorned with ornaments, will surely attend to me, just as the celestial nymphs serve Indra, the king of gods. O Nala! I remember you every day and also look forward to your return.'" (13-14) |
| देवनेन मम प्रीतिर्न भवत्यसुहद्रणैः
। जित्वा त्वद्य वरारोहां दमयन्तीमनिन्दिताम् ॥15॥ कृतकृत्यो भविष्यामि सा हि मे नित्यशो हदि । |
“शत्रुओंके साथ जूआ खेलनेसे मुझे कभी तृप्ति ही नहीं होती। आज श्रेष्ठ अंगोंवाली अनिन्द्य सुन्दरी दमयन्तीको जीतकर मैं कृतार्थ हो जाऊँगा; क्योंकि वह सदा मेरे हृदयमन्दिरमें निवास करती है” ॥15॥ | "'I am never satisfied with gambling against enemies. Today, by winning the beautiful and blameless Damayanti with excellent features, I will be fulfilled, because she always resides in the temple of my heart.'" (15) |
| श्रुत्वा तु तस्य वा वाचो बह्वबद्धप्रलापिनः ॥16॥ इयेष स शिरश्छेत्तुं खड्गेन कुपितो नलः । स्मयंस्तु रोषताम्राक्षस्तमुवाच नलो नृपः ॥17॥ |
इस प्रकार बहुत-से असम्बद्ध प्रलाप करनेवाले पुष्करकी ये बाते सुनकर राजा नलको बड़ा क्रोध हुआ। उन्होने तलवारसे उसका सिर काट लेनेकी इच्छा की। रोषसे उनकी आँखें लाल हो गयीं तो भी राजा नलने हँसते हुए उससे कहा-- ॥ 16-17॥ | "Hearing these incoherent ramblings of Pushkara, King Nala was enraged. He wished to cut off his head with his sword. His eyes turned red with fury, yet King Nala, laughing, said to him..." (16-17) |
| पणावः किं व्याहरसे जितो न व्याहरिष्यसि
। ततः प्रावर्तत द्यूतं पुष्करस्य नलस्य च ॥18॥ एकपाणेन वीरेण नलेन स पराजितः । स रत्नकोशनिचयैः प्राणेन पणितोऽपि च ॥19॥ |
“अब हम दोनों जूआ प्रारम्भ करें, तुम अभी व्यर्थ बकवाद क्यों करते हो? हार जानेपर ऐसी बातें न कर सकोगे।' तदनन्तर पुष्कर तथा राजा नलमें एक ही दंव लगानेकी शर्त रखकर जूएका खेल प्रारम्भ हुआ। तब वीर नलने पुष्करको हरा दिया। पुष्करने रत्न, खजाना तथा प्राणोंतककी बाजी लगा दी थी ॥ 18-19॥ | "'Let us begin the game now, why are you babbling in vain? You will not be able to speak such things after losing.' Then, the game of dice commenced between Pushkara and King Nala with the condition of a single wager. The heroic Nala defeated Pushkara. Pushkara had wagered his jewels, treasury, and even his life." (18-19) |
| जित्वा च पुष्करं राजा प्रहसन्निदमब्रवीत्
। मम सर्वमिदं राज्यमव्यग्रं हतकण्टकम् ॥20॥ वैदर्भी न त्वया शक्या राजापसद वीक्षितुम् । तस्यास्त्वं सपरीवारो मूढ दासत्वमागतः ॥21॥ |
पुष्करको परास्त करके राजा नलने हँसते हुए उससे कहा--'नृपाधम! अब यह शान्त और अकण्टक सारा राज्य मेरे अधिकारमें आ गया। विदर्भकुमारी दमयन्तीकी ओर तू आँख उठाकर देख भी नहीं सकता। मूर्ख! आजसे तू परिवारसहित दमयन्तीका दास हो गया ॥ 20-21॥ | "After defeating Pushkara, King Nala, laughing, said to him, 'O vile king! Now this entire peaceful and undisturbed kingdom is under my control. You cannot even look at Damayanti, the princess of Vidarbha. O fool! From today, you, along with your family, are Damayanti's slaves.'" (20-21) |
| न त्वया तत् कृतं कर्म येनाहं विजितः पुरा । कलिना तत् कृतं कर्म त्वं च मूढ न बुध्यसे ॥22॥ |
"पहले तेरे द्वारा जो मै पराजित हो गया था, उसमे तेरा कोई पुरुषार्थ नहीं था। मूढ़! वह सब कलियुगकी करतूत थी, जिसे तू नहीं जानता है ॥22॥ | "'There was no valor on your part when you defeated me earlier. O fool! It was all the doing of Kaliyuga, which you do not know.'" (22) |
| नाहं परकृतं दोषं त्वय्याधास्ये कथंचन । यथासुखं वै जीव त्वं प्राणानवसृजामि ते ॥23॥ |
“दूसरे (कलियुग)-के किये हुए अपराधको मैं किसी तरह तेरे मत्थे नहीं मढूँगा। तू सुखपूर्वक जीवित रह। मैं तेरे प्राण तुझे वापस देता हूँ ॥23॥ | "'I will not hold you responsible for the offense committed by another (Kaliyuga). Live happily. I return your life to you.'" (23) |
| तथैव सर्वसम्भारं स्वमंशं वितरामि ते । तथैव च मम प्रीतिस्त्वयि वीर न संशय: ॥24॥ |
“तेरा सारा सामान और तेरे हिस्सेका धन भी तुझे लौटाये देता हूँ। वीर! तेरे ऊपर मेरा पूर्ववत् प्रेम बना रहेगा, इसमें संशय नहीं है ॥24॥ | "'I also return all your belongings and your share of the wealth. O hero! My affection for you will remain as before, there is no doubt.'" (24) |
| सौहार्द चापि मे त्वत्तो न कदाचित् प्रहास्यति । पुष्कर त्वं हि मे भ्राता संजीव शरदः शतम् ॥25॥ |
'तेरे प्रति जो मेरा सौहार्द रहा है, वह कभी मेरे हृदयसे दूर नहीं होगा। पुष्कर! तू मेरा भाई है, जा, सौ वर्षोतक जीवित रह” ॥25॥ | "'The friendship I have for you will never fade from my heart. Pushkara! You are my brother, go and live for a hundred years.'" (25) |
| एवं नलः सान्त्वयित्वा भ्रातरं सत्यविक्रमः । स्वपुरं प्रेषयामास परिष्वज्य पुनः पुनः ॥26॥ |
इस प्रकार सत्यपराक्रमी राजा नलने अपने भाई पुष्करको सान्त्वना दे बार-बार हृदयसे लगाकर उसकी राजधानीको भेज दिया ॥26॥ | "Thus, the truthful King Nala consoled his brother Pushkara, repeatedly embracing him, and sent him back to his kingdom." (26) |
| सान्त्वितो नैषधेनैवं पुष्करः प्रत्युवाच तम्
। पुण्यश्लोकं तदा राजन्नभिवाद्य कृताञ्जलिः ॥27॥ कीर्तिरस्तु तवाक्षय्या जीव वर्षशतं सुखी । यो मे वितरसि प्राणानधिष्ठानं च पार्थिव ॥28॥ |
राजन्! निषधराजके इस प्रकार सान्त्वना देनेपर पुष्करने पुण्यश्लोक नलको हाथ जोड़कर प्रणाम किया और इस प्रकार कहा--'पृथ्वीनाथ! आप जो मुझे प्राण और निवासस्थान भी वापस दे रहे हैं, इससे आपकी अक्षय कीर्ति बनी रहे। आप सौ वर्षोंतक जीये और सुखी रहं" ॥ 27-28॥ | "O King! Consoled in this way by the king of Nishadha, Pushkara, with folded hands, bowed to the virtuous Nala and said, 'O lord of the earth! May your fame remain imperishable for returning my life and kingdom to me. May you live for a hundred years and be happy.'" (27-28) |
| स तथा सत्कृतो राज्ञा मासमुष्य तदा नृप
। प्रययौ पुष्करो हृष्टःस्वपुरं स्वजनावृतः ॥29॥ महत्या सेनया सार्ध विनीतैः परिचारकैः । भ्राजमान इवादित्यो वपुषा पुरुषर्षभ ॥30॥ |
नरश्रेष्ठ युधिष्ठिर! राजा नलके द्वारा इस प्रकार सत्कार पाकर पुष्कर एक मासतक वहाँ टिका रहा और फिर आत्मीय जनोंके साथ प्रसन्नतापूर्वक अपनी राजधानीको चला गया। उसके साथ विशाल सेना और विनयशील सेवक भी थे। वह शरीरसे सूर्यकी भाँति प्रकाशित हो रहा था ॥ 29-30॥ | "O Yudhishthira, best of men! Honored in this way by King Nala, Pushkara stayed there for a month and then happily returned to his capital with his relatives. He was accompanied by a large army and humble servants. His body was radiant like the sun." (29-30) |
| प्रस्थाप्य पुष्करं राजा वित्तवन्तमनामयम् । प्रविवेश पुरं श्रीमानत्यर्थमुपशोभिताम् ॥31॥ |
पुष्करको धन-वित्तके साथ सकुशल घर भेजकर श्रीमान् राजा नलने अपने अत्यन्त शोभासम्पन्न नगरमें प्रवेश किया ॥31॥ | "After sending Pushkara home safely with his wealth, the illustrious King Nala entered his own magnificent city." (31) |
| प्रविश्य सान्त्वयामास पौरांश्च निषधाधिपः । पौरा जानपदाश्चापि सम्प्रह्ृष्टतनूरुहाः ॥32॥ |
प्रवेश करके निषधनरेशने पुरवासियोंको सान्त्वना दी। नगर और जनपदके लोग बड़े प्रसन्न हुए। उनके शरीरमें रोमांच हो आया ॥32॥ | "Entering the city, the king of Nishadha consoled the citizens. The people of the city and the countryside were overjoyed. Their bodies thrilled with delight." (32) |
| ऊचुः प्राञ्जलयः सर्वे सामात्यप्रमुखा जनाः । अद्या स्म निर्वृता राजन् पुरे जनपदेऽपि च । उपासितुं पुनः प्राप्ता देवा इव शतक्रतुम् ॥33॥ |
मन्त्री आदि सब लोगोंने हाथ जोड़कर कहा-'महाराज! आज हम नगर और जनपदके निवासी संतोषसे साँस ले सके हैं। जैसे देवता देवराज इन्द्रकी सेवामें उपस्थित होते हैं, उसी प्रकार अब हमें पुनः आपकी उपासना करने-आपके पास बैठनेका शुभ अवसर प्राप्त हुआ है” ॥33॥ | "The ministers and all the people said with folded hands, 'O King! Today, we, the residents of the city and the countryside, can breathe freely with contentment. Just as the gods attend to Indra, their king, similarly, we have once again received this auspicious opportunity to serve you and sit in your presence.'" (33) |
| इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि नलोपाख्यानपर्वणि पुष्करपराभवपूर्वकं राज्यप्रत्यानयने अष्टसप्ततितमोऽध्यायः ॥78॥ | इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत नलोपाख्यानपर्वमें पुष्करको हराकर राजा नलके अपने नगरमे आनेसे सम्बन्ध रखनेवाला अठहत्तरवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥78॥ | "Thus ends the seventy-eighth chapter in the Nalopakhyana Parva of the Vana Parva in the Sri Mahabharata, relating to King Nala's return to his city after defeating Pushkara." (78) |
| एकोनाशीतितमोऽध्यायः | उन्यासीवाँ अध्याय | **Chapter Seventy-Ninth: |
| राजा नलके आख्यानके कीर्तनका महत्त्व, बृहदश्च मुनिका युधिष्ठिरको आश्वासन देना तथा द्यूतविद्या और अश्चविद्याका रहस्य बताकर जाना | राजा नलके आख्यानके कीर्तनका महत्त्व, बृहदश्च मुनिका युधिष्ठिरको आश्वासन देना तथा द्यूतविद्या और अश्चविद्याका रहस्य बताकर जाना | Significance of Reciting the Story of King Nala; Brihadasva Consoles Yudhishthira and Departs after Imparting Knowledge of Dice and Horses** |
| बृहदश्च उवाच प्रशान्ते तु पुरे हृष्टे सम्प्रवृत्ते महोत्सवे । महत्या सेनया राजा दमयन्तीमुपानयत् ॥1॥ |
बृहदश्च मुनि कहते हैं—युधिष्ठिर! जब नगरमे शान्ति छा गयी और सब लोग प्रसन्न हो गये, सर्वत्र महान् उत्सव होने लगा, उस समय राजा नल विशाल सेनाके साथ जाकर दमयन्तीको विदर्भदेशसे बुला लाये ॥1॥ | Sage Brihadasva narrates: "O Yudhishthira! When peace prevailed in the city, and everyone was happy, grand celebrations took place everywhere. At that time, King Nala, with a large army, went and brought Damayanti back from Vidarbha." (1) |
| दमयन्तीमपि पिता सत्कृत्य परवीरहा । प्रास्थापयदमेयात्मा भीमो भीमपराक्रमः ॥2॥ |
दमयन्तीके पिता भयंकर पराक्रमी भीम अप्रमेय आत्मबलसे सम्पन्न थे, शत्रुपक्षके वीरोंका हनन करनेमें समर्थ थे। उन्होंने अपनी पुत्री दमयन्तीको बड़े सत्कारके साथ विदा किया ॥2॥ | "Damayanti's father, the mighty Bhima, possessed immeasurable strength and was capable of slaying enemy warriors. He bid farewell to his daughter Damayanti with great honor." (2) |
| आगतायां तु वैदर्भ्या सपुत्रायां नलो नृपः
। वर्तयामास मुदितो देवराडिव नन्दने ॥3॥ तथा प्रकाशतां यातो जम्बुद्वीपे स राजसु । पुनः शशास तद् राज्यं प्रत्याहृत्य महायशाः ॥4॥ |
पुत्र और पुत्रीसहित दमयन्तीके आ जानेपर राजा नल सब बर्ताव-व्यवहार बड़े आनन्दसे सम्पन्न करने लगे। जैसे नन्दनवनमें देवराज इन्द्र शोभा पाते हैं, उसी प्रकार वे जम्बूद्वीपके समस्त राजाओंमें प्रकाशमान हो रहे थे। वे महायशस्वी नरेश अपने राज्यको पुनः वापस लेकर उसका न्यायपूर्वक शासन करने लगे ॥ 3-4॥ | "With the arrival of Damayanti, along with their son and daughter, King Nala started performing all his duties and activities with great joy. He shone among all the kings of Jambudvipa, just as Indra, the king of gods, shines in Nandana garden. The glorious king, having regained his kingdom, started ruling it justly." (3-4) |
| ईजे च विविधैर्यज्ञैर्विधिवच्चाप्तदक्षिणैः । तथा त्वमपि राजेन्द्र ससुह्ृद् यक्ष्यसेऽचिरात् ॥5॥ |
उन्होंने पर्याप्त दक्षिणासे युक्त विविध प्रकारके यज्ञोद्वारा विधिपूर्वक भगवानका यजन किया। राजेन्द्र! इसी प्रकार तुम भी पुनः अपना राज्य पाकर सुहृदोंसहित शीघ्र ही यज्ञका अनुष्ठान करोगे ॥5॥ | "He duly worshipped the Lord with various kinds of yajnas (sacrifices) accompanied by ample dakshina (donations). O king of kings! Similarly, you too will regain your kingdom and soon perform yajnas with your friends." (5) |
| दुःखमेतादृशं प्राप्तो नलः परपुरंजयः । देवनेन नरश्रेष्ठ सभार्यो भरतर्षभ ॥6॥ |
भरतश्रेष्ठ! पुरुषोत्तम! शत्रुओंकी राजधानीपर विजय पानेवाले महाराज नल जूआ खेलनेके कारण अपनी पत्नीसहित इस प्रकारके महान् संकटमें पड़ गये थे ॥6॥ | "O best of Bharatas! O noblest of men! King Nala, the conqueror of enemy capitals, had fallen into such great distress along with his wife due to gambling." (6) |
| एकाकिनेव सुमहन्नलेन पृथिवीपते । दुःखमासादितं घोरं प्राप्तश्चाभ्युदयः पुनः ॥7॥ |
पृथ्वीपते! राजा नलने अकेले ही यह भयंकर और महान् दु:ख प्राप्त किया था; उन्हें पुनः अभ्युदयकी प्राप्ति हुई ॥7॥ | "O lord of the earth! King Nala alone had endured this terrible and great suffering; he attained prosperity again." (7) |
| त्वं पुनभ्रातृसहितः कृष्णया चैव पाण्डव । रमसेऽस्मिन् महारण्ये धर्ममेवानुचिन्तयन् ॥8॥ |
पाण्डुनन्दन! तुम तो अपने सभी भाइयों और महारानी द्रीपदीके साथ इस महान् वनमें भ्रमण करते हो और निरन्तर धर्मके ही चिन्तनमें लगे रहते हो ॥8॥ | "O son of Pandu! You are wandering in this great forest with all your brothers and Queen Draupadi, constantly absorbed in thoughts of dharma (righteousness)." (8) |
| ब्राह्मणैश्च महाभागीर्वेदवेदाङ्गपारगैः । नित्यमन्वास्यसे राजंस्तत्र का परिदेवना ॥9॥ |
राजन्! महान् भाग्यशाली वेद-वेदांगोंके पारंगत विद्धान् ब्राह्मण सदा तुम्हारे साथ रहते हैं; फिर तुम्हारे लिये इस परिस्थितिमें शोककी क्या बात है? ॥9॥ | "O King! Great and fortunate Brahmins, well-versed in the Vedas and Vedangas, always accompany you; then why do you grieve in this situation?" (9) |
| कर्कोटकस्य नागस्य दमयन्त्या नलस्य च । ऋतुपर्णस्य राजर्षेः कीर्तनं कलिनाशनम् ॥10॥ |
कर्कोटक नाग, दमयन्ती, नल तथा राजर्षि ऋतुपर्णकी चर्चा कलियुगके दोषका नाश करनेवाली है ॥10॥ | "The story of Karkoṭaka Naga, Damayanti, Nala, and the royal sage Ṛtuparṇa destroys the influence of Kaliyuga (the age of vice)." (10) |
| इतिहासमिमं चापि कलिनाशनमच्युत । शक्यमाश्चसितु श्रुत्वा त्वद्विधेन विशाम्पते ॥11॥ |
महाराज! तुम्हारे-जैसे लोगोंको यह कलिनाशक इतिहास सुनकर आश्वासन प्राप्त हो सकता है ॥11॥ | "O King! People like you can find solace by listening to this history that conquers Kali." (11) |
| अस्थिरत्वं च संचिन्त्य पुरुषार्थस्य नित्यदा । तस्योदये व्यये चापि न चिन्तयितुमर्हसि ॥12॥ |
पुरुषको प्राप्त होनेवाले सभी विषय सदा अस्थिर एवं विनाशशील हैं। यह सोचकर उनके मिलने या नष्ट होनेपर तुम्हें तनिक भी चिन्ता नहीं करनी चाहिये ॥12॥ | "All worldly things are impermanent and perishable. Realizing this, you should not worry even slightly about their gain or loss." (12) |
| श्रुत्वेतिहासं नृपते समाश्चसिहि मा शुचः । व्यसने त्वं महाराज न विषीदितुमर्हसि ॥13॥ |
नरेश! इस इतिहासको सुनकर तुम धैर्य धारण करो, शोक न करो, महाराज! तुम्हे संकटमें पड़नेपर विषादग्रस्त नहीं होना चाहिये ॥13॥ | "O King! Listening to this story, be patient, do not grieve. O King! You should not be despondent in times of distress." (13) |
| विषमावस्थिते दैवे पौरुषेऽफलतां गते । विषादयन्ति नात्मानं सत्त्वोपाश्रयिणो नराः ॥14॥ |
जब दैव (प्रारब्ध) प्रतिकूल हो और पुरुषार्थ निष्फल हो जाय, उस समय भी सत्त्वगुणका आश्रय लेनेवाले मनुष्य अपने मनमें विषाद नहीं लाते ॥14॥ | "Even when fate (destiny) is unfavorable, and human effort is fruitless, those who take refuge in the quality of sattva (goodness) do not let despair enter their minds." (14) |
| ये चेदं कथयिष्यन्ति नलस्य चरितं महत्
। श्रोष्यन्ति चाप्यभीक्ष्णं वै नालक्ष्मीस्तान् भजिष्यति ॥15॥ अर्थास्तस्योपपत्स्यन्ते धन्यतां च गमिष्यति । |
जो राजा नलके इस महान् चरित्रका वर्णन करेंगे अथवा निरन्तर सुनेंगे, उन्हें दरिद्रता नहीं प्राप्त होगी। उनके सभी मनोरथ सिद्ध होंगे और वे संसारमें धन्य हो जायेगे ॥153॥ | "Those who narrate or constantly listen to this great story of King Nala will not be afflicted with poverty. All their desires will be fulfilled, and they will become blessed in the world." (15) |
| इतिहासमिमं श्रुत्वा पुराणं शश्च॒दुत्तमम् ॥16॥ पुत्रान् पौत्रान् पशूंश्चापि लभते नृषु चाम्र्यताम् । आरोग्यप्रीतिमांश्चैव भविष्यति न संशयः ॥17॥ |
इस प्राचीन एवं उत्तम इतिहासका सदा ही श्रवण करके मनुष्य पुत्र, पौत्र, पशु तथा मानवोंमें श्रेष्ठता प्राप्त कर लेता है। साथ ही वह नीरोग और प्रसन्न होता है, इसमें संशय नहीं है ॥ 16-17॥ | "By always listening to this ancient and excellent history, a person attains sons, grandsons, cattle, and superiority among humans. Along with this, they become free from diseases and happy, there is no doubt." (16-17) |